तीज : आस्था, प्रेम और नारी सम्मान का जीवंत पर्व : बिमल सरार्फ
बिमल सरार्फ, रक्सौल, 13 सितम्बर 2026 । भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां पर्व और त्योहार केवल उत्सव मनाने के अवसर नहीं होते, बल्कि वे जीवन के गहरे मूल्यों और संस्कारों का संदेश भी देते हैं। तीज ऐसा ही एक पर्व है, जिसमें आस्था के साथ प्रेम, समर्पण, त्याग, आत्मसंयम और नारी सम्मान की भावना जुड़ी हुई है। बदलते समय में भी तीज की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है, बल्कि इसके मूल भाव को समझें तो आज के समाज में इसकी आवश्यकता और अधिक महसूस होती है।
क्या है तीज की कथा?
पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उन्होंने अनेक कठिनाइयों और लंबे समय तक तप करते हुए अपनी साधना जारी रखी। उनकी अटूट श्रद्धा, धैर्य और संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया।
इसी आस्था और तपस्या की स्मृति में तीज का पर्व मनाया जाता है। यह कथा केवल पति-पत्नी के संबंध की कहानी नहीं है, बल्कि यह दृढ़ संकल्प, धैर्य, विश्वास और अपने उद्देश्य के प्रति समर्पण का संदेश भी देती है।
तीज में महिलाएं व्रत रखती हैं, शिव-पार्वती की पूजा करती हैं, सुहाग और परिवार की मंगलकामना करती हैं। कहीं झूले पड़ते हैं, लोकगीत गाए जाते हैं तो कहीं महिलाएं सामूहिक रूप से मिलकर अपनी खुशियां साझा करती हैं। इस प्रकार तीज धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का भी पर्व बन जाता है।
तीज का वास्तविक भावार्थ क्या है?
यदि तीज को केवल व्रत और पूजा तक सीमित कर दिया जाए तो इसके व्यापक अर्थ को समझना कठिन होगा। तीज का वास्तविक संदेश है कि प्रेम केवल पाने का नाम नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान, समझ और जिम्मेदारी निभाने का नाम है।
माता पार्वती की तपस्या हमें बताती है कि जीवन में किसी भी अच्छे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए धैर्य और दृढ़ संकल्प आवश्यक है। वहीं शिव-पार्वती का संबंध यह संदेश देता है कि दांपत्य जीवन केवल अधिकारों पर नहीं, बल्कि समानता, विश्वास, सम्मान और परस्पर सहयोग पर टिकता है।
इस दृष्टि से तीज केवल महिलाओं का पर्व नहीं, बल्कि पूरे समाज को रिश्तों की गरिमा समझाने वाला पर्व है।
आज के भारत-नेपाल में तीज की प्रासंगिकता
आज भारत-नेपाल तेजी से बदल रहा है। आधुनिकता ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन भागदौड़, तनाव और व्यस्तता ने रिश्तों के बीच दूरी भी बढ़ाई है। परिवार एक साथ रहते हुए भी कई बार भावनात्मक रूप से दूर दिखाई देते हैं। ऐसे समय में तीज हमें याद दिलाता है कि रिश्तों को केवल समय नहीं, बल्कि समझ, संवाद और संवेदना भी चाहिए।
आज तीज का सबसे महत्वपूर्ण संदेश नारी सम्मान से जुड़ता है। जिस समाज में महिलाओं को केवल परंपराओं को निभाने वाली नहीं, बल्कि परिवार और समाज के निर्माण की महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में देखा जाए, वही समाज वास्तव में प्रगतिशील कहलाता है।
इसलिए तीज पर महिलाओं के व्रत और श्रृंगार के साथ-साथ उनके सपनों, स्वतंत्र सोच, शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सम्मान की भी बात होनी चाहिए। किसी भी पर्व की सार्थकता तभी है, जब उसका संदेश हमारे व्यवहार में दिखाई दे।
परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संतुलन
समय बदलता है और उसके साथ परंपराओं को देखने का नजरिया भी बदलता है। तीज की परंपरा को आधुनिकता के विरोध में खड़ा करने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि इसकी सकारात्मक भावनाओं को आज के जीवन से जोड़ने की जरूरत है।
आज की तीज ऐसी हो, जहां पूजा के साथ परिवार में संवाद हो, उपवास के साथ आत्मसंयम का भाव हो, श्रृंगार के साथ आत्मसम्मान हो और उत्सव के साथ जरूरतमंदों की सहायता की भावना भी हो।
पति अपनी पत्नी के व्रत को केवल एक परंपरा न समझकर उसकी भावनाओं का सम्मान करे और पत्नी भी दांपत्य जीवन को केवल त्याग के रूप में नहीं, बल्कि समान भागीदारी के रूप में देखे। यही तीज के मूल भाव को आधुनिक जीवन में सार्थक रूप देने का रास्ता है।
नई पीढ़ी तक पहुंचे तीज का संदेश
आज की नई पीढ़ी को यदि हम अपनी संस्कृति से जोड़ना चाहते हैं तो केवल परंपराएं बताना पर्याप्त नहीं होगा। हमें यह भी बताना होगा कि उन परंपराओं के पीछे छिपा संदेश क्या है।
तीज की कथा बच्चों और युवाओं को यह सिखा सकती है कि सच्चे रिश्ते विश्वास से बनते हैं, लक्ष्य धैर्य से प्राप्त होते हैं और सम्मान के बिना कोई संबंध मजबूत नहीं रह सकता।
पर्व तभी जीवित रहते हैं, जब उनकी आत्मा जीवित रहती है। केवल रीति निभाने से संस्कृति आगे नहीं बढ़ती, बल्कि उसके मूल विचारों को अपने जीवन में उतारने से संस्कृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी मजबूत होती है।
तीज का संदेश घर से समाज तक
तीज हमें यह भी सिखाता है कि खुशी केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के साथ बांटने से बढ़ती है। इस पर्व को परिवार के मिलन, महिलाओं के सम्मान, सामाजिक सहयोग और मानवीय संवेदना का अवसर बनाया जा सकता है।
आज आवश्यकता है कि हम तीज को केवल सजने-संवरने और व्रत रखने का पर्व न मानें, बल्कि इसे प्रेम, सम्मान, समानता और सामाजिक सद्भाव का उत्सव बनाएं।
तीज की सबसे बड़ी सुंदरता यही है कि इसकी जड़ें परंपरा में हैं, लेकिन इसका संदेश आज भी उतना ही आधुनिक और उपयोगी है।
तीज हमें बताता है कि आस्था मन को शक्ति देती है, प्रेम रिश्तों को जोड़ता है, धैर्य जीवन को दिशा देता है और सम्मान रिश्तों को स्थायी बनाता है।
इसीलिए तीज केवल कैलेंडर में आने वाला एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है, जो प्रेम में विश्वास, रिश्तों में सम्मान और जीवन में संयम का संदेश देती है।
यही तीज की सच्ची प्रासंगिकता है और यही इसका वास्तविक भावार्थ भी।


