आज से पितृपक्ष (सोलह श्राद्ध) आरंभ: जानिए इसका धार्मिक महत्व और शास्त्रीय विधान
हिंदू धर्म परंपरा के अनुसार आज से पितृपक्ष अर्थात सोलह श्राद्ध का शुभारंभ हो गया है। यह पक्ष आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से शुरू होकर आश्विन शुक्ल प्रतिपदा (अमावस्या तक) चलता है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत पूर्वजों की तिथि के अनुसार तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करते हैं।
नेपाली समाज में इसे सोलह श्राद्ध कहा जाता है, क्योंकि पितरों के निमित्त सोलह तिथियों तक श्रद्धा और विधि-विधान से पितृ कर्म किए जाते हैं।
पितृपक्ष का धार्मिक महत्व
वैदिक परंपरा के अनुसार किसी भी बड़े पर्व, यज्ञ या शुभ कार्य से पहले अपने पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करना आवश्यक माना गया है। दशैं और तिहार जैसे महान पर्वों से पहले आने वाला पितृपक्ष संतानों को अपने पूर्वजों के प्रति कर्तव्य का बोध कराता है। ऐसी मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने से मन की शुद्धि होती है और पितृ ऋण से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
पितृपक्ष शुरू होते ही पशुपतिनाथ क्षेत्र सहित नेपाल के विभिन्न तीर्थस्थलों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने दिवंगत पितरों की स्मृति में तर्पण और पिंडदान करने पहुँचते हैं।
शास्त्रों के अनुसार सोलह श्राद्ध की विधि
शास्त्रों में प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावस्या और पूर्णिमा—इन सभी तिथियों पर पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने का विधान बताया गया है। मान्यता है कि इससे पितरों की आत्मा को शांति प्राप्त होती है।
जिन लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती, वे पितृपक्ष की पंचमी, अष्टमी, द्वादशी या अमावस्या के दिन श्राद्ध कर सकते हैं।
श्राद्ध की तिथि का निर्धारण दिवंगत व्यक्ति की मृत्यु जिस तिथि को हुई थी, उसी चंद्र तिथि के आधार पर किया जाता है।
तर्पण और पिंडदान कैसे किया जाता है?
श्राद्ध के दौरान पितरों को तर्पण, पिंडदान और भोजन अर्पित किया जाता है। पिंड सामान्यतः गाय के दूध, चावल और खीर आदि से बनाए जाते हैं और पुरोहित के मार्गदर्शन में “स्वधा” मंत्र का उच्चारण करते हुए अर्पित किए जाते हैं।
तर्पण का अर्थ है पवित्र जल को पितरों के नाम समर्पित करना। इसके लिए गंगाजल या अन्य पवित्र जल में कुश, जौ, तिल, पुष्प, चंदन और पंचामृत का उपयोग किया जाता है।
शास्त्रों में क्या कहा गया है?
हिंदू धर्मग्रंथों—विशेषकर गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण और महाभारत—में पितृपक्ष और श्राद्ध कर्म के महत्व का विस्तृत वर्णन मिलता है।
शास्त्रीय विधान के अनुसार—
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एकोद्दिष्ट श्राद्ध (वार्षिक तिथि का श्राद्ध) मध्याह्न में किया जाता है।
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पार्वण श्राद्ध (पितृपक्ष में किया जाने वाला श्राद्ध) अपराह्न में किया जाता है।
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आभ्युदयिक श्राद्ध प्रातःकाल करने का विधान है।
श्राद्ध कहाँ करना चाहिए?
शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक गृहस्थ को यथासंभव अपने घर में ही श्राद्ध करना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि दूसरे के घर या भूमि पर श्राद्ध करना उचित नहीं माना जाता। जो लोग शहरों में किराए के मकान में रहते हैं, उनके लिए निकट के तीर्थ, नदी, मंदिर या तुलसी के चौरे पर तर्पण और श्राद्ध करना उपयुक्त माना गया है।
पितृपक्ष से जुड़ी मान्यता
धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृपक्ष में पितर पितृलोक से पृथ्वी पर आते हैं और अपनी संतानों से श्रद्धापूर्वक तर्पण, पिंडदान, भोजन और दान की अपेक्षा रखते हैं। कहा जाता है कि श्रद्धा से किए गए श्राद्ध से प्रसन्न होकर पितर अपनी संतानों को वंश-वृद्धि, सुख, शांति, समृद्धि और धन-धान्य का आशीर्वाद देकर पुनः पितृलोक लौट जाते हैं।


