तराई की तपिश : तनाव के पीछे छिपा मास्टरप्लान – डा.विधुप्रकाश कायस्थ
डा.विधुप्रकाश कायस्थ, हिमालिनी, अंक सितंबर। नेपाल का दक्षिणी समतल भूभाग–भारत से खुली सीमा से जुड़ा उर्वर मधेश–तराई क्षेत्र–इस समय सांप्रदायिक तनाव की गंभीर चपेट में है । सुनसरी, सिराहा, धनुषा, सप्तरी से लेकर बांके तक धार्मिक–जातीय झड़पों की डरावनी श्रृंखलाएं देखने को मिली हैं । कफ्र्यू, पथराव, पुलिस फायरिंग और धन–जन की क्षति हाल के दिनों में समाचार माध्यमों की सुर्खियां बनी हुई हैं ।
बाहर से देखने पर ये घटनाएं पड़ोसियों के बीच की सामान्य गलतफहमियों या स्थानीय रंजिश से उपजे आकस्मिक और स्वतःस्फूर्त झगड़े जैसी लगती हैं । हालांकि, विश्लेषकों ने इस बात पर बहस शुरू कर दी है कि ये घटनाएं न तो अचानक हुई हैं और न ही विशुद्ध रूप से धार्मिक हैं । यह तर्क सामने आ रहा है कि ये राजनीतिक और भू–राजनीतिक लाभ उठाने के उद्देश्य से सामाजिक विभाजन का उपयोग करने वाली एक बहुस्तरीय रणनीतिक योजना का परिणाम हो सकती हैं ।
सतह पर दिखते कारण ः उकसावा और दैनिक विवाद की चिंगारियां
सतह पर देखने पर अशांति के तात्कालिक कारण काफी सामान्य दिखाई देते हैं–जिन्हें सार्वजनिक प्रदर्शन, ध्वनि प्रदूषण और सोशल मीडिया पर फैलने वाली उत्तेजना के मिश्रण के रूप में देखा जा सकता है ः
धार्मिक जुलूस और सार्वजनिक स्थलों का विवाद ः सुनसरी सहित अन्य सीमावर्ती जिलों में हालिया झड़पें ‘बोल बम’ या अन्य धार्मिक यात्राओं के दौरान तेज आवाज में बजाए गए डीजे और लाउडस्पीकरों के कारण शुरू हुईं । संवेदनशील बस्तियों से होकर जुलूस ले जाना, भड़काऊ नारेबाजी और झंडे गाड़ना तात्कालिक तनाव का कारण बने ।
डिजिटल अफवाहें और भ्रामक जानकारीः तीव्र डिजिटल तकनीक के विकास के साथ, स्थानीय छोटे–मोटे विवाद अब केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहते । स्थानीय प्रशासन या नागरिक समाज के प्रतिनिधि शांति पहल कर पाएं, उससे पहले ही भ्रामक वीडियो, एडिटेड क्लिप्स और भड़काऊ टिप्पणियां सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती हैं । यह महज कुछ मिनटों में सामान्य कहासुनी को धार्मिक और सांस्कृतिक अस्मिता की लड़ाई में बदल देता है ।
निचले स्तर पर संस्थागत विफलता ः स्थानीय प्रशासन की अप्रभावी उपस्थिति, पूर्व–सूचना (इंटेलिजेंस) का अभाव और भीड़ नियंत्रण के लिए शुरुआत में ही आंसू गैस या लाठीचार्ज÷गोलीबारी जैसे कड़े कदम उठाने से सामान्य स्थिति भी उग्र और हिंसक रूप ले लेती है । ये सतही कारण यह तो स्पष्ट करते हैं कि हिंसा कैसे भड़की, लेकिन यह उत्तर नहीं देते कि कई सीमावर्ती जिलों में एक साथ और सुनियोजित तरीके से ऐसी घटनाएं क्यों हो रही हैं । इसके लिए पर्दे के पीछे के रणनीतिक स्वार्थों को समझना आवश्यक है ।
अदृश्य मास्टरप्लान ः निहित स्वार्थ और रणनीतिक उद्देश्य
धार्मिक कट्टरता के बाहरी आवरण के भीतर विचलित करने वाली राजनीतिक रणनीति, वोट बैंक का खेल और भू–राजनीतिक दांव–पेच छिपे हुए हैं ।
१. ध्रुवीकरण के जरिए चुनावी वोट बैंक सुरक्षित करने की रणनीति
नेपाल का वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य गंभीर वैधता के संकट से गुजर रहा है । आर्थिक मंदी, युवाओं का सामूहिक पलायन और निरंतर भ्रष्टाचार के कारण आम नागरिकों में स्थापित राजनीतिक दलों और नेतृत्व के प्रति तीव्र असंतोष है । जब राजनीतिक नेतृत्व विकास, रोजगार और सुशासन देने में विफल रहता है, तब अपने अस्तित्व को बचाने के लिए वे ’पहचान की राजनीति’ का सहारा लेते हैं ।
समाज में निरंतर सांप्रदायिक शंका और भय का माहौल बनाकर लोगों को अपने–अपने धार्मिक और जातीय दायरे में सिमटने पर मजबूर किया जाता है । जब हर राजनीतिक फैसले को धार्मिक या जातीय अस्मिता से जोड़ दिया जाता है, तब नेता अपने काम का हिसाब दिए बिना ही वोट बैंक सुरक्षित कर लेते हैं । इस मायने में, सांप्रदायिक तनाव सुशासन न दे पाने वालों के लिए राजनीतिक जीवनरक्षक दवा बन गया है ।
२. सीमा पार की विचारधारा का प्रभाव और बाहरी राजनीतिक खेल
नेपाल तथा भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों के बीच की खुली सीमा ने सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक आदान–प्रदान को सहज बनाया है । हाल के वर्षों में सीमा पार की कट्टरपंथी विचारधाराओं और उग्र सामाजिक–धार्मिक आंदोलनों ने नेपाल के सीमावर्ती जिलों में प्रभाव जमाना शुरू कर दिया है ।
कुछ बाहरी राजनीतिक व धार्मिक समूह नेपाल के धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक ढांचे को अपनी विचारधारा के अनुकूल नहीं मानते । तराई–मधेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में उग्रवादी व धार्मिक समूहों को उकसाकर या सहयोग देकर वे नेपाल के सामाजिक सौहार्द को पुनर्गठित करना चाहते हैं । इस प्रकार मधेश को एक आयातित वैचारिक लड़ाई की प्रयोगशाला बनाया जा रहा है, जिसका नेपाली समाज के ऐतिहासिक सह–अस्तित्व से कोई लेना–देना नहीं है ।
३. संस्थागत विफलता और सुशासन से ध्यान भटकाने की चाल
जब भी देश में बड़े भ्रष्टाचार, राजनीतिक घोटालों या नीतिगत विफलताओं के मुद्दे उजागर होते हैं, तब राजनीतिक हलकों का ध्यान अचानक धार्मिक और जातीय विवादों की ओर मोड़ दिया जाता है । सांप्रदायिक अशांति एक मजबूत ‘धुएं की दीवार’ (क्mयपभ क्अचभभल) का काम करती है । यह मीडिया का ध्यान खींचती है, नागरिक समाज को बांटती है और सुरक्षा एजेंसियों को भीड़ नियंत्रण में उलझा देती है–जिससे सरकार की बड़ी विफलताएं और भ्रष्टाचार के मुद्दे पृष्ठभूमि में चले जाते हैं ।
तराई के मजदूर वर्ग को धार्मिक आधार पर बांटने से वे भूमि सुधार, कृषि संकट या बेरोजगारी जैसे साझा आर्थिक मुद्दों पर एकजुट नहीं हो पाते, जिससे अभिजात वर्ग की सत्ता सुरक्षित रहती है ।
निष्कर्ष ः सौहार्द की पुनर्बहाली और आगे का रास्ता
नेपाल की वास्तविक ताकत इसकी शांत, लचीली और सह–अस्तित्व पर आधारित सांस्कृतिक परंपरा में निहित है । सदियों से तराई–मधेश में हिंदू, मुस्लिम, पहाड़ी और मधेशी समुदाय एक–दूसरे पर आर्थिक निर्भरता, साझा भूगोल और सांस्कृतिक उत्सवों में सहभागी होकर पड़ोसियों के रूप में रहते आए हैं । हालिया सांप्रदायिक अशांति कोई स्वाभाविक धार्मिक नफरत नहीं है; यह तो समाज में आग लगाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने वाले समूहों द्वारा पैदा किया गया एक कृत्रिम संकट है ।
इस सुनियोजित षड्यंत्र को विफल करने के लिए नेपाल को बहुआयामी कदम उठाने होंगे ः
– डिजिटल साक्षरता और पूर्व–सूचना प्रणालीः सरकार को भ्रामक जानकारी फैलाने वाले डिजिटल नेटवर्क पर निगरानी बढ़ानी चाहिए और विवाद के उग्र होने से पहले ही स्थानीय शांति समितियों को सक्रिय करना चाहिए ।
– प्रशासन की निष्पक्षता ः सीमावर्ती जिलों की सुरक्षा एजेंसियों को पूरी निष्पक्षता से काम करना होगा । राजनीतिक पहुंच के आधार पर छूट न देकर, तनाव भड़काने वाले किसी भी व्यक्ति को कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए ।
– स्थानीय नेतृत्व का पुनर्जागरण ः नागरिक समाज, बुद्धिजीवियों और स्थानीय प्रतिनिधियों को बाहरी या स्वार्थी समूहों द्वारा तय किए गए सांप्रदायिक एजेंडे को खारिज करते हुए साझा आर्थिक विकास, शिक्षा और नागरिक गरिमा के विषयों पर संवाद शुरू करना चाहिए ।
दक्षिणी सीमावर्ती क्षेत्र में हाल ही में दिखा सांप्रदायिक तनाव धार्मिक या सांस्कृतिक भिन्नता का स्वतःस्फूर्त विस्फोट नहीं है; यह सत्ता और स्वार्थ बचाने के लिए रचा गया एक चालाक राजनीतिक हथियार है । सामान्य मुद्दों को जातीय या धार्मिक रंग देकर नागरिकों के बीच दरार डालना और उन्हीं सामाजिक खंडहरों पर खड़े होकर राजनीतिक रोटियां सेकना यहाँ का दुष्प्रयास है ।
सतही तौर पर दिखाए गए बहानों और उनके पीछे छिपे व्यापक मास्टरप्लान के बीच के सूक्ष्म अंतर को समझना और उसका विश्लेषण करना ही नेपाल के लोकतंत्र, राष्ट्रीय अखंडता और सदियों पुराने सामाजिक सौहार्द की रक्षा करने का पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है ।
जब तक नागरिक समाज, स्थानीय नेतृत्व और आम जनता ऐसे प्रायोजित षड्यंत्रों को पहचानकर एकजुट होकर इसका विरोध नहीं करेंगे, तब तक सीमावर्ती क्षेत्र की शांति और विकास हमेशा जोखिम में रहेगा । आज की जरूरत भ्रामक उकसावे में न आकर विवेकपूर्ण नागरिक एकजुटता के माध्यम से हमारे साझा सामाजिक ताने–बाने को और मजबूत बनाने की है ।
रोम के सीजÞर से गणतांत्रिक नेपाल तक
अजय कुमार झा
इतिहास अपनेआप को कभी हूबहू नहीं दोहराता, लेकिन मनुष्य की राजनीतिक प्रवृत्तियाँ बार–बार लौटती हैं । सत्ता का अहंकार, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, ईष्र्या, भय, षड्यंत्र, अफवाह, भीड़ का मनोविज्ञान और राष्ट्र हित के नाम पर निजी स्वार्थ–ये वे तत्व हैं जो युग बदलने के बाद भी राजनीति में बने रहते हैं । इसीलिए लगभग दो हजार वर्ष पहले रोम में घटित जूलियस सीजÞर की हत्या आज भी केवल इतिहास की घटना नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतावनी के रूप में पढ़ी जा सकती है । १५ मार्च ४४ ईसा पूर्व–रोम का वह दिन, जिसे इतिहास ने क्ष्मभक या ःबचअज के नाम से याद रखा । सीजÞर को सीनेट की बैठक के दौरान षड्यंत्रकारियों ने विश्वासघात कर मार डाला । ब्रुटस, कैसियस और उनके साथियों ने दावा किया कि वे रोम के गणतंत्र को एक व्यक्ति की निरंकुश सत्ता से बचा रहे हैं । लेकिन इतिहास ने उनके दावे का परिणाम कुछ और दिखाया । सीजÞर तो मारा गया, लेकिन गणतंत्र नहीं बचा । इसके बाद राजनीतिक संघर्ष, गृहयुद्ध और सत्ता की प्रतिस्पर्धा बढ़ी और अंततः ऑक्टेवियन ऑगस्टस के नेतृत्व में रोम की राजनीतिक व्यवस्था साम्राज्य की दिशा में चली गई । यही इतिहास का सबसे बड़ा व्यंग्य है–“कभी–कभी व्यवस्था को बचाने के नाम पर की गई राजनीति उसी व्यवस्था के पतन का कारण बन जाती है ।”
नेपाल ने भी एक युग बदला–लेकिन क्या राजनीतिक संस्कृति बदली ? नेपाल ने २८ मई २००८ को संविधान सभा की घोषणा के माध्यम से राजतंत्र का अंत करते हुए संघीय लोकतान्त्रिक गणतंत्र की स्थापना की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया । २०१५ में नया संविधान जारी हुआ और नेपाल ने संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रात्मक शासन व्यवस्था को संस्थागत रूप दिया । उस समय जनता की आकांक्षा केवल राजतंत्र समाप्त करना नहीं थी । जनता चाहती थी–सुशासन, न्याय, रोजगार, भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन, समान अवसर, सम्मानजनक जीवन और राष्ट्र की समृद्धि । लेकिन आज सबसे कठिन प्रश्न यही है–“ क्या शासन–व्यवस्था बदलने के साथ शासन की संस्कृति भी बदली ?”
यदि राजतंत्र गया लेकिन सत्ता के प्रति वही अहंकार रहा, यदि व्यवस्था बदली लेकिन भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति नहीं बदली, यदि नेता बदले लेकिन राजनीतिक संस्कार नहीं बदले, यदि संविधान बदला लेकिन नागरिक के जीवन में अपेक्षित परिवर्तन नहीं आया–तो जनता के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है । और लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब जनता व्यवस्था पर विश्वास खोने लगे । जब आम नागरिकों में अपने आदर्श नेताओं के प्रति घृणा उत्पन्न होने लगे । जब वर्तमान सत्ता, शासन और सिस्टम पर से भरोशा उठने लगे । तब भीषण बिद्रोह की लहर स्वतः उठने लगाती है । नेपाल का जेनजी बिद्रोह इसीका जीवन्त उदाहरण है । अतः ध्यान रहे ! असंतोष को दबाइए मत–समझिए । समझदारी के साथ जनता में संतोष का माहौल तैयार कीजिए । अन्यथा घात लगाकर बैठे चाण्डाल पक्षी और पशु रूपी भेडि़ए उसी असंतोष के आड़ में आपको नोच नोच कर मार डालेगा । लोकतंत्र को लोकतांत्रिक संस्कार से ही समझना होगा । इसमे व्यक्ति अहंकार ज्योंहि हावी होता है, उसी क्षण से राष्ट्रीय अस्मिता का क्षरण आरम्भ हो जाता है ।
मेरी दृष्टि में नेपाल के युवाओं में बढ़ता असंतोष केवल राजनीतिक नारा नहीं है । यह रोजगार, शिक्षा, अवसर, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता और भविष्य की अनिश्चितता जैसे अनेक वास्तविक प्रश्नों से जुड़ा हुआ है । जेनजी की आंधी उसी का एक ट्रेलर था । क्योंकि जब देश का शिक्षित युवा अपने भविष्य को देश के भीतर नहीं देखता, जब लाखों युवा रोजगारी के लिए विदेश जाने को विवश होते हैं, जब उनके अपने जीवन के प्रवाह में अपनों से बिछुड़ने को विवश हो अश्रु की धार से मातृभूमि को गीला करते हैं–तब आत्मा से असंतोष पैदा होता है । जब राज्य नागरिक से लगातार त्याग मांगता है लेकिन स्वयं उत्तरदायित्व का प्रदर्शन नहीं करता–तब असंतोष पैदा होता है । और यही असंतोष यदि संस्थागत संवाद नहीं पाता तो ज्वाला मुखी का रूप धारण कर सड़क पर उतर जाता है । ज्ञातव्य हो ! सड़क का आक्रोश लोकतंत्र के लिए हमेशा खतरा ही नहीं होता । कभी–कभी वह लोकतंत्र के लिए चेतावनी भी होती है । लेकिन यही आक्रोश यदि अफवाह, घृणा, जातीय÷क्षेत्रीय विभाजन और राजनीतिक उन्माद के साथ मिल जाए, तो वही शक्ति राष्ट्र को अस्थिर भी कर सकती है । खंड खंड भी कर देती है ।
नेपाल की सबसे बड़ी चुनौती–अफवाह का लोकतंत्र है । रोम में सीजÞर के विरुद्ध भय और आशंकाओं ने राजनीतिक वातावरण को प्रभावित किया । आम नागरिकों में भ्रम और आशंका का बीजारोपण किया । जिससे काग और भेडि़ए को मनोवैज्ञानिक जन समर्थन प्राप्त हुआ । और सीजर को खुलेआम मौत के घाट उतार दिया गया । क्या राजा वीरेंद्र के साथ जो हुआ उसमें बाहरी और आतंरिक षडयंत्र की बू दिखाई नहीं देती ? नेपाली जनता के इच्छा विपरीत डालर और हुल्लड़बाजी के दमपर हिन्दू राष्ट्र का गौरवपूर्ण मान्यता को नष्ट नहीं किया गया ? इसप्रकार नेपाली राष्ट्रीयता पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक हो जाता है । लेकिन अफवाह में व्यक्ति स्वयं को दोषी नहीं मानता । उसे भीड़ का हिस्सा बना दिया जाता है ।
ध्यान रहे, आज हमारे हाथ में उससे कहीं अधिक शक्तिशाली हथियार है–सोशल मीडिया । एक अपुष्ट समाचार कुछ मिनटों में करोड़ों लोगों तक पहुँच सकता है । एक कटे–छँटे वीडियो से किसी व्यक्ति को अपराधी बनाया जा सकता है । एक झूठी सूचना से भीड़ पैदा की जा सकती है । एक षडयंत्रयुक्त भावनात्मक÷उत्तेजक भाषण से समाज को दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है । एक सांप्रदायिक नारा डायरेक्ट ऐक्शन जैसे भीषण नोआखली काण्ड बचाया जा सकता है । और फिर जनता निर्णय करती है–तथ्य देखकर नहीं, वातावरण देखकर । जनमत और जनबल का हूल देखकर । यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा है । लोकतंत्र में जनता की शक्ति सर्वोच्च है; इसलिए जनता की अज्ञानता भी उतनी ही खतरनाक हो सकती है । जिस जनता के हाथ में मतदान की शक्ति है, उसके मस्तिष्क में सत्य पहचानने की शक्ति भी होनी चाहिए । जिस अभियान के लिए निपट मूढ़ और वैज्ञानिक बुद्धि बराबर के अधिकारी हो, वहाँ दुर्घटना अवश्यंभावी है; जो लोकतंत्र का मुकुट है ।
नेपाल को “ब्रुटस” से अधिक संस्थाएँ जरूरी है । क्योंकि ब्रूटस ने स्वयं को गणतंत्र का रक्षक माना । लेकिन किसी भी गणतंत्र की रक्षा केवल किसी महान व्यक्ति को हटाकर नहीं की जा सकती । गणतंत्र व्यक्ति–विरोध से नहीं, संस्थाओं की मजबूती एवं राष्ट्र कल्याण के सशक्त भावना से बचता है । नेपाल को ऐसे राजनीतिक संस्कार की आवश्यकता है जिसमें–संसद मजबूत और दूरदर्शी हो; न्यायपालिका स्वतंत्र और विश्वसनीय हो; निर्वाचन प्रक्रिया निष्पक्ष हो; संवैधानिक संस्थाएँ राजनीतिक दबाव से मुक्त रहें; प्रशासन योग्यता और उत्तरदायित्व पर चले; भ्रष्टाचार पर वास्तविक कार्रवाई हो; पत्रकारिता स्वतंत्र लेकिन तथ्यपरक हो; विश्वविद्यालय विचार और विवेक के केंद्र बनें; और जनता को केवल चुनाव के समय नहीं, पूरे कार्यकाल में महत्वपूर्ण माना जाए । क्योंकि किसी व्यक्ति को हटाकर दूसरे व्यक्ति को बैठा देना परिवर्तन नहीं है । व्यवस्था को बदलना ही वास्तविक परिवर्तन है ।
राजनीति में खुले विरोधी से कम और छिपे हुए स्वार्थ से अधिक सावधान रहना पड़ता है । खुला विरोधी दिखाई देता है । लेकिन वह व्यक्ति जो आपके सामने मित्रता की माला लेकर खड़ा हो और भीतर से आपके पतन की प्रतीक्षा कर रहा हो–उसे पहचानना कठिन होता है । यही कारण है कि राजनीति में व्यक्ति को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि– “कौन मेरे साथ है ?” उसे यह भी पूछना चाहिए– “कौन मेरे साथ क्यों है ?” क्योंकि सत्ता के आसपास ऐसे लोग हमेशा पैदा होते हैं जिनकी निष्ठा सिद्धान्त से नहीं, अवसर से होती है । जब तक सत्ता है–वे प्रशंसा करेंगे । जब सत्ता कमजोर होगी–वे दूरी बनाएँगे । और जब सत्ता गिरने लगेगी–वे सबसे पहले पत्थर उठाएँगे । क्योंकि फूलों की माला में तक्षक छिपा हो तो माला सबसे सुंदर दिखाई देती है–जब तक वह डँस न ले ।
आगे नेपाल के अस्तित्वगत भविष्य की भविष्यवाणी करते हुए स्पष्ट कह सकता हूं कि, “नेपाल का आने वाला दशक तीन रास्तों में से किसी एक को चुन सकता है ।”
पहला रास्ता–संस्थागत पुनर्जागरण ः
यदि राजनीतिक नेतृत्व अपनी गलतियों को स्वीकार करता है, भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई होती है, युवाओं को अवसर मिलता है, शिक्षा और स्वास्थ्य में वास्तविक सुधार होता है और राज्य संस्थाएँ मजबूत होती हैं, तो नेपाल दक्षिण एशिया में एक सफल संघीय लोकतांत्रिक मॉडल बन सकता है ।
दूसरा रास्ता–लोकप्रियता की राजनीति ः
यदि सरकारें केवल लोकप्रिय नारों, सामाजिक मीडिया के प्रचार और तात्कालिक निर्णयों से जनता को प्रसन्न करने का प्रयास करेंगी, लेकिन रोजगार, उत्पादन, शिक्षा, प्रशासन और आर्थिक संरचना जैसे मूल प्रश्नों को नहीं छुएँगी, तो कुछ समय के लिए उत्साह पैदा होगा लेकिन अंततः निराशा और गहरी होगी जो बाद में नेपाल के अस्तित्व के लिए खतरा साबित होगा ।
तीसरा रास्ता–व्यवस्था के विरुद्ध जनविद्रोही मानसिकता ः
यदि भ्रष्टाचार, दण्डहीनता, राजनीतिक संरक्षणवाद, बेरोजगारी और संस्थागत अविश्वास लगातार बढ़ते रहे, तो जनता का एक वर्ग लोकतांत्रिक संस्थाओं को ही समस्या समझने लग सकता है । और यही वह क्षण होगा जब इतिहास सबसे खतरनाक मोड़ लेता है । तब लोग कहेंगे–“हमें लोकतंत्र नहीं चाहिए, हमें एक मजबूत आदमी चाहिए ।” यही वह वाक्य है जिससे हर गणतंत्र को सावधान रहना चाहिए । क्योंकि जब जनता लोकतांत्रिक संस्थाओं से निराश होकर किसी एक व्यक्ति में सम्पूर्ण समाधान खोजने लगती है, तब लोकतंत्र का वास्तविक संकट शुरू होता है ।
नेपाल को ऑक्टेवियन की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए ः रोम को अंततः ऑक्टेवियन मिला । लेकिन इतिहास की यह कल्पना खतरनाक है कि हर संकट के बाद कोई महान उद्धारक आ जाएगा ।
हमें पता होना चाहिए कि हर देश को अपना ऑक्टेवियन नहीं मिलता । और यदि मिलता भी है तो वह सीजÞर जैसा उदार, विजयी और सबको साथ लेकर चलने वाला हो–यह भी आवश्यक नहीं । इसलिए नेपाल की सबसे बड़ी भूल होगी कि वह किसी एक व्यक्ति में अपना भविष्य खोजे । नेपाल का भविष्य किसी राजा, प्रधानमंत्री, नेता या नायक के हाथ में नहीं होना चाहिए । नेपाल का भविष्य नेपाली जनता की जागरूकता और संस्थाओं की मजबूती में होना चाहिए ।
अंतिम भविष्यवाणी ः मैं भविष्य को निश्चित रूप से नहीं जानता । लेकिन इतिहास के संकेतों और आम जनता के मनोविज्ञान को पढ़कर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि– यदि नेपाल ने सत्य को अफवाह से, नीति को नारे से, राष्ट्रहित को दलहित से और योग्यता को चाटुकारिता से अलग नहीं किया, तो आने वाले वर्षों में राजनीतिक संकट केवल सरकारों की संकट नहीं रहेगी; वह संस्थाओं की संकट बन सकती है । और यदि जनता ने हर संकट के बाद केवल नया चेहरा खोजा, लेकिन पुरानी राजनीतिक संस्कृति को चुनौती नहीं दी, तो चेहरे बदलते रहेंगे और कहानी वही रहेगी । लेकिन–यदि नेपाल की जनता जागी, यदि युवाओं को अवसर मिला, यदि भ्रष्टाचार के विरुद्ध वास्तविक इच्छाशक्ति पैदा हुई, यदि शिक्षा ने विवेक पैदा किया, यदि राजनीति ने प्रतिशोध छोड़कर प्रतिस्पर्धा सीखी, और यदि संविधान को केवल कागज नहीं बल्कि जीवंत सर्वजन हिताय सामाजिक अनुबंध माना गया–तो वही नेपाल जिसकी आज चिंता की जा रही है, कल दक्षिण एशिया के लिए एक सशक्त उदाहरण बन सकता है । इसलिए आने वाले समय के लिए अंतिम चेतावनी यही है, “किसी सीजÞर को अंधी भीड़ से मत मारिए । किसी ब्रुटस को केवल मित्र समझकर आँखें मत बंद कीजिए । किसी कैसियस को राष्ट्रहित का मुखौटा पहनाकर मत पहचानिए । और किसी ऑक्टेवियन की प्रतीक्षा मत कीजिए ।”
जनता स्वयं जागे । संस्थाएँ स्वयं मजबूत हों । नेतृत्व स्वयं उत्तरदायी बने । और राष्ट्र स्वयं अपने भविष्य का निर्माता बने । क्योंकि–“इतिहास में सीजÞर की हत्या एक दिन में हुई थी, लेकिन गणतंत्र का पतन धीरे–धीरे हुआ । अतः नेपाल को उस धीमे पतन की आहट आज ही सुननी होगी ।” और याद रखिए, “हर माला में केवल फूल नहीं होते; कभी–कभी फूलों के बीच तक्षक भी छिपा होता है । माला पहनाने से पहले फूलों की सुगंध नहीं–उसके भीतर छिपे विष को पहचानना सीखिए । यही इतिहास की चेतावनी है । यही लोकतंत्र की परीक्षा है । और शायद–यही नेपाल के भविष्य का निर्णायक

पत्रकार, लेखक और मीडिया शिक्षक हैं।

