क्या नेपाल कुरुक्षेत्र बनेगा :-
श्रीमन नारायण
तिब्बत को लेकर चीन एवं तिब्बती के बीच जारी वाकयुद्ध एवं दाउपेच की वारिकियोंको समझने में असफल नेपाल कही कुरुक्षेत्र न वन जाए ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है।
तिब्बत के चीन में विलय के छ दशक हो चुके हैं। भले ही चीन इसे अपना भू-भाग दावी करे परन्तु तिब्बत के तेह्र सौ वर्षपूरानी एवं गौरवशाली स्वतन्त्रता और इतिहास को जाननेवाले इससे सहमत नहीं है। सन् ८२१ में चीन और तिब्बत के बीच सन्धी द्वारा ही दो सौ वर्षलम्बा युद्ध खत्म हुआ था, सन्धी के सम्बन्ध में तीन शिलालेख रखा गया था पहला शिलालेख स्तम्भ चीन के वादशाह के महल के सामने, दूसरा दोनो देशो के सीमा रेखा के पास और तीसरा तिब्बत की राजधानी ल्हासा के जोखाङ्ग गुम्बा के सामने आज भी खडी है। चन्द्र र्सर्ूय ग्रह-नक्षत्र एवं लामाओ के पवित्र देहको साक्षी रखकर उल्लेखित सन्धी में पर्ूव में विशाल चीन एवं पश्चिम में विशाल तिब्बत को स्वतन्त्र रुप में रहने की वात कही गई है। अपने अधीन के किल्ला, सीमा रेखा और अपने भू-भाग की दोनो देश रक्षा करेगें, एक दूसरे साथ शत्रुतापर्ूण्ा आक्रमण नहीं करेगे, आदि वातें सन्धी में जिक्र है। आजाद तिब्बत का इतिहास उसी सन्धी और युग से शुरु होता है।
१३ वी और १४ वी शताब्दी में चीन और तिब्बत दोनो मंगोल के कब्जे में आगया। उसी समय दोनो एक हुआ था ऐसा चीन का मानना है परन्तु सच्चाई वह नही है। चीन और तिब्बत ही नहीं अनेको एशियाई देश उस समय मङ्गोल शासक कुब्ला खां के अधिन आ गया था दूसरा सच यह भी है कि उस समय मङ्गोल और तिब्बती एवं मङ्गोल और चीनी के बीच के सम्बन्ध का जो विशेष पक्ष रहा है उसका भी समीक्षा होनी चाहिए क्योकि उस तरह के सम्बन्धों में काफी विविधताएं थी। तिब्बत चीन से पहले ही मंङ्गोल के कब्जे में आ गया था और चीन से पहले ही वह मंङ्गोल से आजाद भी हुआ। अतः कुब्ला खां के चीन आक्रमण का तिब्बत से कोइ रिस्ता नहीं बनता, ना ही यह सावित होता है कि तिब्बत चीन का कभी हिस्सा रहा।
सन् १६३९ में तात्कालीन दलाई लामा ने मन्चु बादशाह के साथ एक रिस्ता वनाया था उसी वादशाह ने चीन पर हमला वोल कर किङ्ग वंश की स्थापना किया था। परन्तु १९ वी शदी से तिब्बत में मन्चु शासन क्रमशः कमजोर होता गया इतना कमजोर कि सन् १८४२ और १८५६ में तिब्बत पर गोरखालियो ने धावा बोला तब भी मन्चु शासक सहयोग नहीं कर सका। बाध्य होकर बह युद्ध सन्धी के साथ खत्म हुआ। सन् १९११ में मन्चु शासन से तिब्बत का सम्बन्ध खत्म हुआ और सन् १९१२ में तिब्बत से चीनी सैनिको के हटने के वाद दलाई लामा ने औपचारिक रुप में इसे आजाद घोषित किया जो सन् १९५९ तक था।
अपनी स्वाधीनता के दौरान तिब्बतने अपना शासन खुद चलाया था। विदेश नीति, सैन्य संगठन, डाक आदि पर उसका स्वतन्त्र अस्तित्व प्रतिविम्वित था। जब कि उस समय महाशक्ति ब्रिटिश साम्राज्य एवं अन्य पडोसी देश नेपाल, भुटान आदि ने समकक्षता के आधार पर संघी कर तिब्बत को मान्यता दिया था। यर्थाथ में तिब्बत और बेलायत नें सन् १९०४ में आक्रमण के बाद एक संधी से आबद्ध थे। दूसरे विश्व युद्ध के समय में ब्रिटेन चीन और अमेरिका के दवाव के बाबजूद तिब्बत स्वतन्त्र और तटस्थ था। तिब्बत ने अपना अन्तर्रर्ााट्रय सम्बन्ध शुरुआती दौड में नेपाल, चीन, ब्रिटेन, भुटान के साथ बनाकर आगे बढÞा। उन देशो का कुटनीतिज्ञ मिशन तिब्बत कें राजधानी ल्हासा में था। नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र संघ सदस्यता के लिए आवेदन देते वक्त अपने स्वतन्त्र अस्तित्वका प्रमाण के रुप में तिब्बत के साथ के कूटनीतिक सम्बन्ध एवं ंसम्बन्धका जीक्र किया था।
यदि तिब्बत चीन का भाग था तो सन् १९५१ में चीन ने तिब्बती प्रतिनिधि मण्डलको १७ सूत्री सहमति के लिए दवाव क्यो दिया – उसके वाद चीन ने दुनिया के सामने यह ऐलान किया कि तिब्बत एक स्वतन्त्र देश है पर किससे स्वतन्त्र- चीन ने तिब्बत के साथ हुए प्रत्येक सम्झौता प्रतिबद्धताओं को दरकिनार करते हुए तिब्बत पर कब्जा जमाया। बाध्य होकर दलाई लामा ने अपने एक लाख अनुयायियों के साथ चीनी आक्रमण के खिलाफ तिब्बत छोडकर निर्वासन में चले गए और तभी से सैनिक शक्ति के दम पर चीन ने कब्जा जमा रखा है।
सन् १९९१ के अक्टुबर २८ में अमरीकी काँग्रेस ने विदेशी आधिकारिकता अधिनियम अर्न्तर्गत एक प्रस्ताव लाया था जिस में तिब्बत सहित चीन के कब्जे वाले प्रान्तो सेन्चुआन, युन्नान, गाडसु और किङर्घाई, स्थापित अन्तर्रर्ााट्रय कानून के मानदण्ड एवं मान्यता अनुसार कब्जा किए गए देश है। प्रस्ताव में आगे यह भी कहा गया है कि तिब्बत का अधिकारिक प्रतिनिधि, तिब्बत के जनता की मान्यता बाली निर्वासित सरकार और दलाई लामा ही है। आज तक वैधानिक रुप में तिब्बत में अपने हैसियत और चरित्र को नहीं गवाया है। गलत तरिके से कब्जे में फसा एक देश है। चीनी आक्रमण और पीएलए ने इसकी सम्प्रभूता चीनको नहीं सोंपा है। खुद को साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और विस्तारवाद का कट्टरविरोधी कहने वाला चीन तिब्बत में अपने सैन्य उपस्थिति के बल पर कब तक हुकुमत चलाएगी –
चीन में तो मानव अधिकारकी अवस्था कमजोर है तो तिब्बतका क्या हाल होगा – अमरीकी काँग्रेस ने एक सांसद फयाङ्ग उल्फ ने बहस के दौरान कहा कि तिब्बत में मानव अधिकार के उल्लंघन के कारण देश छोड कर नेपाल होते तीसरे मुल्क में शरण लेनेवाले शरणार्थीयो को रास्ता देने के वजाय उन्हे लौटाकर वापस पिकड के पास भेजने का काम नेपाल की सरकार कर रही है। यदि नेपाल ऐसा ही करता रहा और हमारे नीति एवं मान्यता को स्वीकार नहीं करता तो हमारा सहयोग समाप्त कर दिए जाऐं।
इस हकीकत को देखते तिब्बत का मसला महज दमन के भरपर विर्सजन होता नहीं दिख रहा है। इस मसले को दलाई लामा के होते समाधान हो जाना अच्छा है। तिब्बती शरणार्थी और चीन के वीच तकरार है इस में अमरीका भी सक्रिय होता दिख रहा है। यूरोपियन यूनियन की दिलचस्पी जगजाहिर है। तिब्बतियो पर होनेवाले दमन के विरुद्ध में अमेरीका ताल ठोककर खडÞा हो सक्ता है। ऐसे में नेपाल के कुरुक्षेत्र बनने से कौन रोक सक्ता है – नेपाल एक स्वतन्त्र लोकतान्त्रिक देश है। इसकी नीति इसके मर्यादा अनुकूल होना चाहिए। ±±±
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