तुम्हारी याद मे:बेदना
जिंदगी भी आदमी को कैसे-कैसे मोडों पर लेके जाती है, एक पल में क्या से क्या बना देती है । कभी एक झटके से आदमी को हासिल सब कुछ छीनकर उसे जिंदगी की डगर में गुमराह सा कर देती है, दर दर भटकने को लाचार कर देती है, उससे उसकी पहचान, उससे उसका घरवार, उससे उसकी अस्मिता, उससे उसकी खुशी, उससे उसकी चाहत सब छीन लेती है । उसके लिए कोई भी व्यक्ति विशेष नहीं । उसके लिए कोई व्यक्ति लाचार नहीं । उसके लिए कोई भी बच्चा नहीं उसके लिए कोई भी व्यक्ति नादान नहीं, उसके लिए कोई भी व्यक्ति धनी नहीं, उसके लिए कोई भी व्यक्ति गरीब नहीं, उसके लिए कोई भी व्यक्ति वृद्ध नहीं, उसके वही खाते में सब समान है वो सबके साथ समान व्यवहार करती है या यूँ कहें कि सबको एक ही हासिये से काटती है । किसी का कोई जोर नहीं चलता इसकी स्वछन्दता के सम्मुख । ये निरंकुश सांड की तरह इच्छाओं और आकांक्षाओं, ख्वाबों और कल्पनाओं के कोमल और स्निग्ध, सुरभित और मधुर, आकर्षा और मनोरम लता-बितानों, कोमल कलियों, मनोरम पुष्पों, सुखद निर्मल पादपो के बीच, मनमोहक हरीतिमा आच्छादित मर्मस्थल पर निःसंकोच, निःशंक, बेखौफ, अल्मस्त विचरण करता है । उसे इस बात से कोई लेना देना नहीं कि किसी की महीनों की तपस्या का किसी की सालों की मेहनत, तपस्या, हसरतों या चाहतों का चमन उसके एक ही बार रमण करने से तहस-नहस हो जाएगा, धूल धूसरित हो जाएगा, मिट्टी में मिल जाएगा । वहा फिर कुछ नहीं बचेगा । फिर वहा अवशेषों को ढूँढना भी मुश्किल हो जाएगा । फिर वे तीन के डाली से, डाली शाखाओं से, शाखाएँ स्कंध से स्कंध जडÞ से जुदा हो जाएँगे । सब खो जाएगा कहीं किसी ऐसे अधेर कूप में कि उसकी कोई भनक भी न लगेगी । ऐसा ही तो हुआ था हमारे साथ भी जब तक हम होश संभाल पाए थे कि हमें तुमसे प्यार हो गया है या तुम्हें हम से प्यार हो गया है कि अचानक एक ऐसी आाधी आई की सब कुछ बिखर गया । न पत्ते रहे न शाखाएँ ना डलियाँ रही न स्तंभ बस रहा तो वही मिट्टी के नीचे जडÞ में छिपा प्यार का वह अर्क जो आज भी कभी-कभी आाख खोलता है, उन बीते लम्हों को ।
एक बार फिर से हरा कर जाता है, जब हम तुम एक साथ जीवन की नई डगर पर चल पडÞे थे ये भी दिल को आभास न था कि कहीं कोई हमारा दुश्मन भी है, जो ऐसी स्थिति का सृजन कर देगा कि फिर हम हमेशा हमेशा को अपने प्यार से बिछडÞ जाएँगे और फिर उस स्नेहिल प्यार की मात्र और मात्र स्मृतियाँ की रह जाएगी । कैसा सुखद होता है । अचानक आप से आप किसी से दिल का लग जाना, बिना किसी स्वार्थ, बिना किसी उद्देश्य के बिना किसी चाहत के बिना किसी आशा के क्यों लगता है दिल का लग जाना बिना किसी स्वार्थ, बिना किसी उद्देश्य के बिना किसी चाहत के बिना किसी आशा के क्यों लगता है दिल किसी से ! क्या है ये जो बस अंदर ही अंदर एक सुखद अनुभूति से भर देता है, जो मन को इतना निहाल कर देता है कि फिर दिल लगाने के बाद और कुछ नजर ही नही आता । हर पल बस वही दिखाई देता है यसी में हर अच्र्छाई दिखाती है । उसका सब कुछ मन को भाता है, उसकी बुराइयाँ भी मन को लुभाती है अच्छाइयों की तो बात ही क्या । प्यार में होने पर क्यों ऐसा लगता है –
कोयल की पंचम स्वर लहरी में भी प्रियतम की ही आवाज का मादक नशा है क्योंकि खुद अपनी जुवान पर भी हमेशा उसी की यादों के गीत सजते हैं वे घडिÞयों वे पल भुलाए नहीं भुलते, जो कभी प्रियतम की बाहों में एक होकर बीते थे फिर अब प्रियतम साथ हो या न हो क्या फरक पडÞता है । प्यास से भरे दिल के लिए स्थूलता कोई मायने नहीं रखती वो पास रहे या दूर रहें, बस दिल में समाए रहते हैं । स्थूलता का संबंध शायद दैहिक संबंधों से होता है, जहाँ आत्मिक संबंध होते है, वहा इसकी कोई जरुरत नहीं होती प्रिय का स्मरण ही इतना र्सार्थक होता है कि दैहिकता, स्थूलता को पीछे छोडÞ बहुत-बहुत आगे निकल जाती है, जैसे कोई बुद्ध अपने मार्ग पर चलता हुआ एक न एक दिन आत्म ज्ञान को पा लेता है और वह अनुभूति अनिवर्चनीय होती है । बुद्ध से किसी ने पूछा था कि क्या आपने वो सब अपने भिक्षुओं को बता दिया, जो आपने पाया है, जो आप जानते है, उन्होंने कहा नहीं क्योंकि ये संभव ही नहीं अनुभूति की जाती है । बताई नहीं जाती और हासिल की चीज बडÞी मुश्किल से दस प्रतिशत ही बताई जा सकती है, ऐसी ही तो प्यार की अनुभूति । जिसे बताया नहीं जा सकता बस एहसास किया जा सकता है ।
सच, कहते हैं कि प्यार में आदमी होश खो बैठता है । अगर होश न खोए तो प्यार परवान ही कैसे चढÞे । ये प्यार की परवानगी ही तो है कि हिटलर जैसे क्रूर इंसान से भी कोई अटूट कर प्यार करता था जबकि उसका दर्ुभाग्य कि हिटलर ने कभी उसकी परवाह नहीं की । वो कहते हैं न कि प्यार कुछ देखता ही नहीं । पागल जो होता है, बस हो जाता है और जब हो जाता है तो कुछ दिखाई ही नहीं देता । पहले देखता नहीं, बाद में दिखाई नहीं देता । ये दिल का किस्सा है । इसे दिल वाले ही समझेंगे वो नहीं जो सिर्फऔर सिर्फदिमाग से सोचते और दिमाग से ही चलते हैं । पर इसका सबसे सुखद पक्ष बस एक ही है कि कभी-कभी ये बीच में ही रह जाता है । अपनी मंजिल को हासिल नहीं कर पाता और तब फिर एक और अनंत यात्रा शुरु होती है कि इस जन्म में नहीं तो क्या हुआ, हम तुम्हारे लिए दूसरे किसी जन्म में भी आएँगे ।
कैसे आनंददायी रहा होगा वह प्यार जब प्रेमी ने प्रेमिका की एक झलक भी न देखी । ना ही प्रेमिका ने प्रेमी की एक झलक देखी पर उनका प्यार एक वर्षनहीं दो वर्षनहीं सत्रह-सत्रह वर्षतक चला यानी सारी जिंदगी केवल ये पत्रों में मिलते, कहानियाँ में मिलते एक दूसरे के उपन्यासों में मिलते । एक दूसरे के लेखन के स्वयं को जँचे पक्ष की समालोचना करते तो ना जँचे पक्ष की आलोचना भी जी भरकर करते पर उनके प्यार में कभी कोई कभी नहीं आई । सच ह तिो है कि ‘प्यार में कोई जरुरी नहीं पर जरुरी है ये प्यार जिंदा रहे’ सो ये आजकल प्यार का दम भरने वाले वास्ब में प्यार करते ही कहा – अगर ये प्यार करें तो इन्हें ऐसे समाज विरोधी कदम उठाने की जरुरत ही न पडेÞ । किसी को पाने के लिए किसी को छोडÞने की जरुरत ही न पडेÞ । अस्तु प्रेम नैर्सर्गिक प्रक्रिया है, ना तो इससे विरोध ठीक, जो प्यार व्रि्रोह को जन्म दे वो प्यार नहीं । प्यार के नाम पर साग के पानी के बीच खींची जा रही एक लकीर है । िि
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