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नेपाल की नीतिविहीन राजनीति : डा. श्वेता दीप्ति

 

डा. श्वेता दीप्ति | क्या आज की राजनीति सिर्फ रणनीति का खेल रह गई है जहाँ आदर्श की सम्भावना पूरी तरह समाप्त हो चुकी है ? क्या हम किसी दल या नेता की प्रशंसा या अनुकरण सिर्फ इसलिए करने को बाध्य हैं कि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है ? नेपाल की राजनीति में जनता के समक्ष यह ज्वलंत प्रश्न है । आखिर वो किसका चुनाव करे ? किस पर यकीन करे ? देश की बागडोर किसे सौपे ? वर्तमान सरकार की नीति सामने है, प्रचण्ड सरकार के नौ महीने की उपलब्धि की शून्यता भी सभी को पता है और ओली सरकार की राष्ट्रवाद के सहारे पर देश को चलाने की नीति भी सभी जानते हैं ऐसे में सभी जानते हैं कि आगे भी देश के हिस्से में कोई चमत्कार होने की सभांवना नहीं है ।

पुराणों में वर्णित एक कथा है, जब समुद्रमंथन हुआ तो इस मंथन में अमृतकलश मिला । इस अमृतकलश के लिए देव और दानवों में युद्ध छिड़ा सभी अमृत लेना चाहते थे । देव अपनी शक्ति कम नहीं करना चाहते थे और दानव देव के समकक्ष पहुँचना चाहते थे । आज नेपालरुपी समुन्द्र में चुनावरूपी मन्थन जारी है । सभी जनता की वोटरूपी अमृत का पान करने के लिए आतुर हैं । देवता तो किसी को यहाँ कहा नहीं जा सकता पर मानव कहलाने वाले प्राणी में हम जिस नैतिकता और सदाचार की कल्पना करते हैं वो हमारे नेताओं में कहीं भी नहीं है । सूरत यह है कि उससे परे हमारे नेतागण सिद्धान्तों को ताक पर रखकर किसी भी सूरत में सत्ता प्राप्ति की कोशिश में लगे हुए हैं । विवेकानन्द ने कहा था कि “हमारी नैतिक प्रवृत्ति जितनी उन्नत होती है, उतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्ष अनुभव होता है और उतनी ही हमारी इच्छाशक्ति अधिक बलवती होती है ।” यथार्थ है कि हम अपने अनुभवों से सीख लेते हैं । गलती को सुधारने की कोशिश करते हैं । परन्तु देखा जाय तो ये सारी बातें सिर्फ आम लोगों के लिए है, खास लोगों के लिए नहीं और विशेष कर नेता जैसे प्राणी के लिए तो बिल्कुल नहीं । उनके लिए नीति, सदाचार या सद्भाव सिर्फ भाषण का विषयवस्तु हैं जो अवसर पड़ने पर उनके मुखारविन्दु से निःसृत होते हैं । जिनका उनके वास्तविक जीवन से कोई लेना देना नहीं है । बस स्वार्थ सिद्धि के लिए इसका उपयुक्त प्रयोग किया जाता है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण नेपाल की राजनीति में स्वार्थ सिद्धि के लिए हो रहे गठबन्धन में देखने को मिल रहा है ।

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स्थानीय चुनाव के बाद देश केन्द्रीय चुनाव की ओर अग्रसर है और इसके साथ ही अनैतिक गठबन्धन को भी तेजी से स्वीकार किया जा रहा है । देखा जाय तो यह कोई अस्वाभाविक प्रक्रिया नहीं है । यह होता रहा है और होता रहेगा पर सवाल यह है कि इसका असर देश, देश की जनता या देश के विकास पर क्या पड़ेगा ? क्या एक अनैतिक और सिद्धान्तविहीन गठबन्धन देश को स्थायित्व प्रदान कर सकता है, क्या देश की अस्थायी राजनीति देश को विकास की राह पर ले जा सकता है, क्या देश की पलायित युवाओं को देश रोजगार के अवसर प्रदान कर रोक सकता है ? जहाँ विचारों में सामंजस्य नहीं ऐेसे गठबन्धन से आई सरकार देश को किस नीति से चलाने की कूबत रख पाएगी ? या एक बार फिर बाँटी हुई कुर्सी और सत्ता बचाने के लिए देश को आर्थिक मार की ओर धकेलती हुई मंत्रीमण्डल के लगातार गठन की प्रक्रिया ही इस देश की नीति तय होने जा रही है ?

कुछ दिनों से अस्वाभाविक गठबन्धन की चर्चा नेपाल के शहर से लेकर गाँवों तक में जोर शोर से होती रही है खासकर वामपंथी गठबन्धन । एमाले के साथ माओ और नया शक्ति का मिलना एक नया परिदृश्य देश को देने जा रहा था । आनेवाले प्रतिनिधि सभा और प्रदेश सभा के चुनाव के लिए की गई यह गठबन्धन कम्युनिष्ट केन्द्र बनाने की घोषणा करने वाला था, परन्तु इसी बीच नयाशक्ति का इस गठबन्धन से निकलना और काँग्रेस के साथ हाथ मिलाना देश की राजनीति में एक हास्यास्पद परिस्थिति उत्पन्न करता नजर आ रहा है । खासकर बाबुराम भटराई की अनिश्चित नीति उनके ही व्यक्तित्व पर सवाल खड़ा कर रहा है । जहाँ एक सही निर्णय नहीं वहाँ देश की जनता अपना विश्वास कैसे जता सकती है ? सभी जानते हैं कि चुनावी गठबन्धन को ध्यान में रखकर किये गये गठबन्धन का उद्ेश्य क्या होता है । यहाँ सिद्धान्त नहीं स्वार्थ सर्वोपरि होता है जो निश्चय ही देश को रसातल की ओर ले जाता है । नेकपा एमाले और नेकपा माके का गठबन्धन तत्कालीन चुनाव के लिए किया गया है, यह स्पष्ट है क्योंकि इनका सफर दूर तक जाने वाला नहीं है । इन पर विश्वास करने की कोई वजह सामने नहीं है । ३४ वर्षों तक एक दूसरे को गाली देने वाले अचानक करीब कैसे आ गए ? आखिर ऐसा कौन सा चमत्कार हो गया जिसने इन्हें एक मंच पर ला खड़ा किया ? कारण सभी जानते हैं परन्तु देश की जनता का दुर्भाग्य है कि उनके पास कोई विकल्प नहीं है । उन्हें अपना प्रतिनिधि ऐसे ही अवसरवादी दलों में से चुनना होगा और देश को दाँव पर लगाना होगा । कुछ बुद्धिजीवियों का मानना है कि वामगठबन्धन संविधान कार्यान्वयन पर काम करेगी और देश को स्थायी सरकार देगी । ये महज एक भ्रम है या कहें तो कपोलकल्पना क्योंकि ऐसा कोई परिदृश्य नजर नहीं आ रहा जिससे यह साबित हो कि इनका साथ देश हित के लिए है । यह साथ सिर्फ और सिर्फ सत्ता प्राप्ति का साधन है । जहाँ एक बार फिर सत्ता बटवारे की राजनीति होगी और सत्ता बचाने के लिए जम्बो मंत्री मण्डल का गठन किया जाएगा ।

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दूसरी ओर मधेशवादी दलों पर अगर नजर डाली जाय तो यहाँ भी राजपा नेपाल और ससफो द्वारा चुनाव के मद्देनजर की गई तालमेल की स्थिति देखने को मिलती है, साथ ही काँग्रेस के साथ की । इस सन्दर्भ में यह तो कहा ही जा सकता है कि मतभेदों और स्वार्थपरकता के बावजूद ससफो और राजपा का राजनैतिक केन्द्र मधेश और मधेश की समस्या ही है, परन्तु इसमें काँग्रेस का साथ इन्हें कितना रास आएगा ? क्योंकि काँग्रेस भले ही मधेश हित की बात कर मधेश की जनता के समक्ष अपनी छवि बनाने की कोशिश करे परन्तु मधेश की समस्या के समाधान में अब तक नाकाम ही रही है । भले ही वह यह दावा करे कि उसने कोशिश की पर उनकी कोशिश के दावे भी खोखले ही रहे हैंं । दूसरी ओर ससफो और राजपा का गठबन्धन का असर दूरगामी होगा या नहीं यह तो वक्त बताएगा परन्तु आज की परिस्थितियों में मधेशी इसमें मधेश हित की सम्भावनाओं को जरुर तलाश कर रहे हैं । वो यह विश्वास कर रहे हैं कि इनका साथ देश के संसद में मधेश की स्थिति को मजबूत करेगा और मधेश की समस्या का समाधान सम्भव होगा । इनका साथ मधेश की आवश्यकता थी, समय–समय पर मधेश की जनता यह भावना व्यक्त करती आई है । अब देखना यह है कि ये दोनों दल इस भावना की कितनी कद्र करते हैं वैसे इतिहास इनका भी जाना समझा ही है । टिकट बँटवारे और समानुपाती के नाम जो चयन किए जा रहे हैं, उसमें सावधानी की आवश्यकता है । क्योंकि परिवारवाद का आरोप इनपर लगता रहा है । एक अच्छी पहल जरुर हुई है कि दलबदलुओं को नकारा जा रहा है । देखना है कि अर्मतकलश किसके हाथ लगता है और यह अमृत जनता के हित में प्रयुक्त होता है या स्वहित में ?

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