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साहब ये लोकतंत्र है,एक-दुसरे पर कीचड उछालना इसका मूलमंत्र है : मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु)

 

मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु), वीरगंज | लोकतंत्र में सत्ता का अंतिम सूत्र जनता के हाथ में होता है, अर्थात् यह एक ऐसी शासन व्यवस्था, जिसमें लोक सहमति की आवश्यकता होती है । यहाँ निर्णय जनता के सहमति से लोकहित में वास्ते लिए जाते हैं।

इसके लिए जनता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शासन में भागीदारी करती है । जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी में शासन सम्बन्धी सभी निर्णय स्वयं जनता द्वारा लिए जाते हैं, जबकि अप्रत्यक्ष भागीदारी में जनता के प्रतिनिधि शासन सम्बन्धी निर्णय करते हैं । ये प्रतिनिधि समय-समय पर जनता के बीच जाकर अपना विश्वास हासिल करते हैं ताकि उनके प्रति विश्वास की निरंतरता का स्पष्टीकरण हो सके ।

अगला सवाल आता है कि जिस लोकतंत्र की कसमें खा कर सभी चुनाव में कूद पड़े है, क्या वाकई वह लोकतंत्र है ?

लोकतंत्र कुछ विशेषताओं को अपने में समेटता रहा है । एक आम आदमी चाहे वो मधेशी हो, दलित, शोषित, उपेक्षित हो, जब लोकतंत्रीय राजनीतिक व्यवस्था के बारे में सोचता है तो अक्सर लोकतंत्र की ये विशेषताएं उसके ध्यान में रहती हैं :

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(1)   जनता की इच्छा की सर्वोच्चता । (2)   जनता के द्वारा चुनी हुई प्रतिनिधि सरकार । (3)   निष्पक्ष  चुनाव ।(4)   वयस्क मताधिकार । (5)   उत्तरदायी सरकार ।(6)   सीमित तथा संविधानिक सरकार । (7)   सरकार के हाथ में राजनीतिक शक्ति, जनता की अमानत के रूप में । (8) सरकार के निर्णयों में सलाह, दबाव तथा जनमत के द्वारा जनता का हिस्सा । (9) जनता के अधिकारों एवं स्वतंत्रता की हिफाजत, सरकार का कर्त्तव्य होना । (10) निष्पक्ष न्यायालय । (11) कानून का शासन । (12) विभिन्न राजनीतिक दलों तथा दबाव समूहों की उपस्थिति ।

अब सवाल उठता है, लोकतंत्र की आवश्यकता किसे है, निःसंदेह मधेशी, दलित, शोषित, उपेक्षित को। लेकिन क्या नेपाल में लोकतंत्र है ? राजतन्त्र में राजा देश का स्वामी होता है। सामंतवाद में सामंत सामूहिक रूप से देश के स्वामी होते हैं। लोकतंत्र में जनता चुनाव में मतदान द्वारा यह अधिकार जिन प्रतिनिधियों को सौंपती है ,उन्हें देश का राजा समझती है। प्रधानमन्त्री, या राष्ट्रपति भी स्वयं को राजा समझते हैं। लोकतंत्र तभी कहा जायगा जब जनता ख़ास कर मधेशी स्वयं को देश का स्वामी समझती हो , शासन पर उसका नियंत्रण हो और सरकार के लोग भी स्वयं को राजा न समझ कर यह समझें कि जनता राजा है और उन्हें उनके हित में कार्य करना है।

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लोकतंत्र में प्रभुसत्ता- मंत्रिमंडल, अफसरशाही , न्यायालय एवं धन-बल से शक्तिशाली लोगों में वितरित होती है जो अपनी- अपनी शक्ति के अनुसार उसका उपभोग करते रहते हैं। मंत्री मंडल स्व इच्छानुसार योजनाएं और क़ानून बनाते हैं।  उनसे जनता का हित भी हो सकता है और उनका भी।  मंत्री पैसे लेकर किसी को ठेका दिलवा दें, किसी की नियुक्ति कर दें, या योगयता के आधार पर जन हित में ये कार्य करें, यह उनकी इच्छा पर निर्भर करता है।
लोकतंत्र में 5 वर्ष बाद नेताओं को जनता के सामने जाकर वोट के लिए हाथ जोड़ने पड़ते है , सच स्वीकार करना पड़ता है कि वे सेवक हैं।  जनता की बातें ही नहीं आक्रोश का सामना भी करना पड़ता है और अनेक प्रतिष्ठित नेता चुनाव में हार भी जाते हैं।  जो जीत जाते हैं वे प्रजा पर शासन करने के लिए राजा बन जाते हैं।
लोकतंत्र में चुनाव को पर्व की संज्ञा दी जाती है। सभी यह त्योहार मनाने में व्यस्त हैं। मंत्री अपना संवैधानिक कार्य छोड़ कर प्रचार-प्रसार में लगे हैं। जगह-जगह बम विस्फोट हो रहे है और अफसर आचार-संहिता की आड़ में जिम्मेवारियों से पल्ला झाड़ रहे हैं। कई राजनीतिक पार्टियां और राजनेता आचार-संहिता लागू होने के बाद से ही राजनीतिक अनाचार में जुटे हुए हैं। अपराधी, भ्रष्टाचारी, गुंडे लोकतंत्र की गंगा में अपने पाप धो रहे हैं। खुलेआम जातिवाद की राजनीति हो रही है। टीवी स्टूडियो में बैठे विशेषज्ञ बड़ी गंभीरता से जातिगत और सांप्रदायिक आधार पर विश्लेषण करने में लगे हुए हैं।
क्या राजनैतिक पार्टियां ख़ुद अपने पार्टी के अंदर लोकतांत्रिक है ? अगर ऐसा होता तो टिकट बिक्री का आरोप न लगता और इतने ज्यादा बागी उम्मीदवार खड़े नहीं होते।
                  साहब ये लोकतंत्र है।।

एक-दुसरे पर कीचड उछालना इसका मूलमंत्र है॥

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