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कलयुग में गुलाम बने रहना मानसिक असन्तुलन की उपज है

अब्दुल खान

 

पृथ्वी की रचना हाेने के बाद जब मानव विकास का क्रम जारी हुअा तब मानव अपनी कुटिल बुद्धि की वजह से सारे प्राणियाे पर राज करना प्रारम्भ किया,मानव पर मानव का शासन करना कठिन समझने पर धर्म नामक अस्त्र का विकास किया अाैर लाेगाे पर अनेकन प्रकार से शासन करना शुरु किया । उन ही धर्माे मे से अति प्राचीनतम शाश्वत धर्म हुअा जिसे कालान्तर मे हिन्दू धर्म के नाम से प्रख्यात हुअा,उसी हिन्दू धर्म के अनुसार समय(काल) का वर्गीकरण किया जिसके अनुसार: १. द्वापर युग २. त्रेता युग ३. सत्य युग ४. कल युग। युग अनुसार पालनहार के प्रचारक भी अाना शरु किए,उन ईशदूताें,विद्वानाे अाैर विचारकाे के मेहनत से समाज का विकास हाेना शरु हुवा,नयी नयीं रचना हुई । कलयुग काे छाेड कर सभी युगाें मे राजा महाराजा अाैर शासकाें के सामने साधारण मानव न उंची अावाज मे बाेल सकते थे न सिर उठाकर चल ने का अधिकार था,बस लाेग एक पथ्थर की मूरत समान हुवा करता था,जातपात के अाधार पर सजा सुनाया जाता था,शासकाे के फरमान ही पत्थर की लकीर हाेती थी,नीच,उंच,छुवाछूत ,लाेगाे के लिए अाम बात थी,शासकाे का फरमान,बडे लाेगाे की बात न मानने पर श्राप देने की प्रथा कायम थी। कल युग एक एेसा युग है,जहाँ लाेग खुलकर अपनी बात काे अाम कर सकता है,अपने बराबरी का हक जनमत के अाधार पर लिया जा सकता है। यह युग में लाेग अपनी ईच्छा मुताविक बणिज व्यापार अाैर कार्य कर सकता है,इस युग मे गुलाम बने रहना मानसिक असन्तुलन का उपज है। इस युग का शाब्दिक अर्थ कल कारखाना का युग माना जाता है। कुछ शासक लाेग अाज भी लाेगाे की अावाज काे दवाना,जुर्म मानकार हवालात में बन्द करना,हत्या करना यह सब शासन ब्यवस्था काे पतन की अाेर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस युग मे लाेग मत के अाधार पर शासन ब्यवस्था कायम रह सकता है।अत: गुलामी का अन्त कर बराबरी का युग है कल युग।

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