Thu. Apr 16th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

छठी मैया बनाम घर की मैया !

 

व्यंग्य

बिम्मी कालिंदी शर्मा

मधेश का महापर्व छठ पर्व रविवार से आरभं हो चूका है । लोक आस्था का महापर्व छठ मधेश के जन जीवन से प्रत्यक्ष रुप से जूडा है । सूर्य प्रत्यक्ष देव अर्थात हमारे पिता हैं तो छठी मैया माता । दोनों के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है । ईसी लिए छठी मैया का गीत गाते हुए डुबते और उगते दिनानाथ को अघ्र्य दिया जाता है । दीनानाथ अर्थात दीनहीन के मालिक या पिता । अभी पूरा मधेश काबाजार और घर आगंन ईस लोक पर्व में आस्था के रगं मे सराबोर है । ईस महापर्व की विशेषता है कि ईस में धनी, गरीब या छूवाछूत का उतना भेदभाव नहीं है जितना अन्य त्यौहारों में दिखाई देता है । ईस का सब से अनुपम उदाहरण है बाघ और बकरी के एक ही घाट में पानी पीने कि कहानी जैसा ही धनी, गरीब, उची या निची जाति के लोग एक ही घाट पर एक ही साथ भगवान दीनानाथको अघ्र्य देने के लिए उठते हैं । उस समय पृथ्वीका सीना चौडा हो जाता है गर्व से ।
पर क्या भगवान दीनानाथऔर छठी मैंया की तरह हमे घर के जीवित देव अर्थात अपने माता–पिता को भी उसी तर मानते या पूजते हैं ? जिन्होने हमें पैदा किया, पाला–पोसा और बडा किया उन के प्रति हमारे मन में श्रद्धा दिन, प्रतिदिन घटती जा रही है और हम पाखंडी जैसे हो कर भगवान दीनानाथऔर छठी मैंया का व्रत और पूजन कर रहे हैं ? क्या यह ढोगं नहीं है ? क्या ईस से भगवान दीनानाथ और छठी मैया हम से प्रसन्न होगीं ? जब घर के मातापिता को ही अनादर किया जाता है, तब लाख का शीनहाओ या छठ व्रत करो कोई पूण्य नहीं मिलने वाला । अप्रत्यक्ष या अन्तर्धान में रहने वाले भगवान भी तभी प्रसन्न होते हैं जब प्रत्यक्ष या जीवित देव माता पिता अपने बच्चो से खुश हों ।
मेरें पडोस में रहने वाली एक बुढी औरत को उस का एक मात्र बेटा खाना नहीं देता है, घर से निकाल देता है जब कि घर मां के नाम से है । न वह और उस का परिवार अपनी मां, सास या दादी से बात करता है या न कुछ खाने को देता है । और कोई उस वृद्धा को कुछ खाने को दे या बात करे तो झगडा करने लगता है । अगल–बगल में किसी से उनका उठना, बैठना नहीं है । बेटा व्यापार करता है खूद ठाठ से रहता है, उस के बच्चे खुब फैशन करते हैं पर मां बेचारी कोने में दुबकी पडी रहती है और हर आने, जाने वालों को निहारती रहती है । कोई चाह कर भी उस वृद्धा के लिए कुछ नहीं कर पाता । पर उस की मंथरा जैसी राक्षसी बहू छठ का व्रत करती है । क्या यह व्रत से उस बहू का कल्याण होगा जो अपनी सास को फूटी आंख नहीं देख पाती और रातदिन सास के मरण की कामना करती कब यह बुढीया मरे और फसाद छूटे । क्योंकि चारों तरफ उस की फजिहतहो रही है । कैसे वह बहू छठ पर्व करने का साहस कर सकती है जो अपने ही घर में एक सास को वर्दाश्त नहीं कर सकती । और उस के घर में प्रसाद खाने जाना भी पाप है जो खूद पापिन है ।
ईंसान अपने कूकर्म या सूकर्म से ही पाप या पूण्य का भागी बनता है । किसी के आशिर्वाद या दूआ देने या श्राप देने से किसी का अच्छा या बूरा नहीं होता । अच्छा या बूरा तो लोगों कर्म हैं जो उसे ईंसान या शैतान बनाते हैं । पर यह जान कर भी ईसान गल्तियां करता रहता है और उस को पछतावा भी नहीं होता । ईसी को कहते हैं मूहं मे राम, रामबगली में छूरा । मन यदि पाप कर्म में लिप्त है तो शरीर द्वारा किया गया कोई भी शूभकार्य का उसे फल नहीं मिलेगा । मन का मैल तो कभी साफ नहीं होता और शरीर में साबुन घिसे जा रहे हैं और उपर से गंगाजल से नहा रहे हैं । घर, घर में प्रत्येक दिन होने वाले ईस नाटक को देख कर ईश्वर भी हंसता होगा । क्यों कि भगवान को भी बैठे बिठाए मूफ्त में नौटंकी या सिनेमा देखने को मिल रहाऔर वह सब का हिसाब रख रहा है ।
उगते दीनानाथ को अघ्र्य देने का अर्थ है धन, धान्य और संतान कि खुशहाली और सफलता । उसी तरह अस्ताचलगामी दीनानाथ को अघ्र्य देने काम तलब है देश और समाज के धरोहर बडे, बुढो और बुजुर्गो को सम्मान देना । क्योंकि कल ए भीजवान थे, उगते सूर्य कि तरह प्रकाशमान थे आज समय खत्तम हो रहा है तो यह डूब रहे हैं । पर ईन के डूबने या अस्ताने का यह मतलब यह नहीं है कि समाज में ईन का कोई मान, सम्मान नहीं है । परिवार और समाज के बुजुर्ग हमारे कल के ईतहास और आस्था के प्रतीक हैं । आज ईनको प्यार देगें या सम्मान देगें तभी तो कल नया सूरज चमकेगा अपनी नयीं राप और ताप के साथ । ईसी लिए छठी माता का पूजा जरुर किजिए पर घर की माता अनादर कर के । घर के माता पिता ही जीवित ईश्वर हैं वह खुश होगें तभी तो वह अदृश्य ईश्वर भी खुश होगा और आप सब पर दिर्घायू, सुस्वास्थ्यऔर सम्पन्नता का नेह बर्षाएगा ।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may missed