नागरिक विधेयक के ऊपर विचार–विमर्श शुरु, विधेयक के प्रति कुछ सांसदों की आपत्ति
काठमांडू, २६ नवम्बर । संघीय संसद् मातहत रहे राज्य व्यवस्था ने नेपाल नागरिकता ऐन २०६३ संशोधन के लिए निर्मित विधेयक के ऊपर दफावार विचार–विमर्श शुरु किया है । विचार–विमर्श के दौरान कुछ सांसदों ने विधेयक प्रति आपत्ति प्रकट किया है । विधेयक के प्रति असहमत सांसदों का कहना है कि मां के नाम से बिना रुकावट नागरिकता मिलनी चाहिए, विधेयक में अन्तरनिहित पिता की पहचान संबंधी प्रवधान को हटाने से ही वह यह सम्भव है ।
सांसद अंजना विशंखे ने कहा है कि मां की नाम से नागरिकता प्राप्त करना संविधान प्रदत अधिकार है, लेकिन पिता की पहचान सबंधी प्रावधान के कारण संविधान प्रदत अधिकार को कुण्ठित किया है । स्मरणीय है कि नागरिकता ऐन संशोधन विधेयक की दफा ६, खण्ड ख (क २) में लिखा है– नेपाली नागरिक मां से नेपाल में ही जन्म लेकर नेपाल में ही रहनेवाले और पिता की पहचान से बंचित व्यक्तियों की हक में पिता की पहचान ना होने की प्रमाण सहित मां को स्वघोषणा करनी चाहिए ।’ उल्लेखित प्रावधान के प्रति महिला सांसदों ने विमति राखी है । सांसद विशंखे ने कहा– ‘अगर कोई पिता अपने सन्तानों को नागरिकता बनाने के लिए जाते हैं तो उसमें मां की पहचन नहीं खोजा जाता, लेकिन वहीं कोई मां नागरिकता बनाने के लिए जाती है तो क्यों पिता की पहचान खोजा जाता है ? यह संविधान की मर्म और भावना के विपरित है ।’
दूसरे सांसद् राजेन्द्र श्रेष्ठ को भी कहना है कि महिला पुरुष के बीच बिना भेदभाव नागरिकता मिलनी चाहिए । इसीतरह सांसद् श्रेष्ठ ने तीसरे लिंगी नागरिक के संबंध में भी संशोधन प्रस्ताव पेश किया है । और सांसद कृष्णभक्त पोखरेल ने वैवाहिक अंगीकृत नागरिकता के संबंध में संशोधन प्रस्ताव किया है । उनका कहना है कि अंगीकृत नागरिकता संबंधी प्रावधान महिला और पुरुष दोनों के हक में समान होना चाहिए । उनका यह भी कहना है कि जो महिला शादी करके पुरुष के घर में आती है, उनको नेपाली नागरिकता प्राप्ति के लिए ६ महिना के भीतर पुराने देश की नागरिकता त्याग संबंधी प्रमाण पेश करना पड़ता है, इस प्रवाधान को बढ़ाकर १ साल करनी चाहिए ।

