Mon. Mar 30th, 2020

महकी महकी महफिल थी (कविता) : सरस्वती शर्मा सुबेदी

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फूल

 महकी महकी महफिल थी
वो फूलो की रात थी
सामने वाली खिडकी से
चाँदका टुकडा झाक रही थी
हजारों के महफिलो मे
चाँद सिर्फ अपना था
दुनिया की रश्मो में
अपना दिल टुकडा था
अपना सा कोइ नही
काले बादल अपने थे
टुटे हुए दिल के अन्दर
हजारों मे सपने थे
चाँद पे आँखो ने फूलो को देखा
फूल के साथ गमले थे
लेकिन मैने दिल पे झाका
दिल अपने अकेले थे
सिमट रही थी ठडीँ से
दिल युँ ही फूल सा
हजारों काँटो ने दिल के
अन्दर कतरा था
काले अधेरे पलो मे
सिर्फ चाँद से बोल रही थी
मिठी-मिठी बाते वाली चाँद
अपनी सहेली थी
बादल भी अपने थे
चाँद सूरज साथ मे थे
फूलो की वो महफिलो मे
प्रकृती की सौन्दर्य मे
मन की राज उभरे थे

सरस्वती शर्मा सुबेदी (काभ्रे)

सरस्वती शर्मा सुबेदी (काभ्रे)

 

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