Fri. Feb 21st, 2020

महिला हिंसा का मनोसामाजिक विमर्श : डा. अजय रिजाल

दहेज नहीं लाने पर बहु को जिंदा जलाया गया इस प्रकार का शीर्षक देखकर मन कांप जाता है

हिमालिनी, अंक मार्च 2019 |सामुहिक बालात्कार के बाद हत्या, प्रेमी द्वारा प्रेमिका का बलात्कार फिर हत्या, शराब के नशे में धुत व्यक्ति ने किया पत्नी पर छूरा प्रहार, दहेज नहीं लाने पर बहु को जिंदा जलाया गया इस प्रकार का शीर्षक देखकर मन कांप जाता है । आखिर क्यों हो रही है इस प्रकार की घटनायें ?
मनोचिकित्सकीय चश्मा से देखने पर पता चलता है कि इस प्रकार की घटनायें, व्यक्तित्वजन्य समस्या, साइकोसिस, मद्यपान अथवा लागुपदार्थजन्य मानसिक समस्या, बहुत बड़े तनाव इत्यादि के कारण हो रही है । परन्तु सवाल यह उठता है कि क्यों महिलायें इस प्रकार के उन्माद का निशाना बन रही हैं ? महिला अधिकारवादी के अनुसार इसका कारण पितृसतात्मक सामाजिक बनावट या लैंगिक भेदभाव इत्यादि है । अगर ऐसा है तो क्यों नहीं सभी पुरुष पीड़क बन रहे ?

महिला हिंसा का मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आपराधिक, सैद्धांतिक तथा राजनीतिक कोण से व्याख्या किया जा रहा है, परन्तु किसी एक मान्यता को लेकर हम किसी तार्किक निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते । इसलिये इसके अन्तर्सम्बन्धित तह तक पहुंच कर समाधान का उपाय सोचना चाहिये ।

विभिन्न अध्ययन के दृष्टिकोण से पीड़क ( पुरुष ) बाल्यकाल से ही हिंसा के चपेट में आ जाता है । पति या परिवार का अन्य सदस्य के द्वारा प्रताडि़त मां का बेटा व्यस्क होकर अपनी पत्नी को हिंसा का शिकार बनाता है । इसी प्रकार जो पुरुष किशोरावस्था से ही खुद हिंसा का शिकार हुआ रहता है वह आगे चलकर महिला हिंसा में उद्यत हो जाता है ।

जो महिला बचपन से ही हिंसा का शिकार रहती है अर्थात मां बाप से या परिवार के किसी अन्य सदस्य ( शिक्षक, पड़ोसी ) से प्रताडि़त रहती है, वह महिला आगे चलकर भी हिंसा को अस्वीकार नहीं कर पाती है । हिंसा से ओतप्रोत परिवार पले बढ़े किशोर किशोरी ही भविष्य में पीड़क या पीडि़त होते हैं ।

पुरुष आधिपत्य अर्थात जहां आर्थिक स्रोत का उत्पादन पुरुष ही करता हो, महिला पैसा नहीं कमाती हो वह सिर्फ छोटे बच्चे का देख भाल करती हो उस परिवार में पुरुष महिला को दबा के रखता है । परिवार अन्तर्गत श्रमविभाजन में असहमति, पति का अत्यधिक मद्यपान तथा पत्नी का पति से कुछ ज्यादा ही शिक्षित होना आदि कारक तत्व वैवाहिक जीवन में उतार चढाव पैदा कर देता है और यही हिंसा का रूप ले लेता है ।

परामर्श के लिये मेरे यहां आये हुये व्यक्तियों का अनुभव करते हुये मैंने पाया कि शराब का लत आपराधिक मनोवृति वाले व्यक्ति को हिंसा के तरफ अग्रसर करता है । मद्यपान के कारण पुरुष अपने परिवार के प्रति उत्तरदायी नहीं हो पाता है, जिससे अपनी पत्नी या परिवार के अन्य सदस्य के साथ मनमुटाव हो जाता है । इसके साथ ही बेरोजगारी, गरीबी, सामाजिक बहिष्करण आदि नकारात्मकता जुड़ी हुई है । इन सबसे तनाव, उदासीनता, दिशाहीनता तथा झगड़ा झंझट उत्पन्न होता है जो महिला हिंसा के कारक तत्व बन जाता है ।

समाज में पुरुष को पुरुषार्थ तथा प्रभुत्व प्रमाणित करना होता है और महिला सदैव कमजोर होने की प्रवृति है । अर्थात पति का अत्याचार हमेशा परिवार के आंतरिक मामला के रूप में सीमित रह जाता है और समाज उसे आसानी से स्वीकार लेता है ।
इसलिये घरेलू हिंसा को कानून के कठघरे में लाना एक समस्या है परिणामस्वरूप अभद्र घटना हो जाने की सम्भावनायें रहती है । व्यक्ति, परिवार, पड़ोसी, कार्यस्थल, समाज और समाज द्वारा अपनाये हुये सांस्कृतिक आधार महिला हिंसा के साथ अंतर्सम्बन्धित है । समाधान के लिये इन सभी अवयवों का परिचालन करना आवश्यक है ।

मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार, व्यक्तित्व विकास के लिये सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उसके परिवार का होता है, जहां वह पला बढ़ा होता है । परिवार में उचित शिक्षा, चेतना विकास के लिये सामाजिक परिस्थितियाँ भी जिम्मेदार होती है । पारिवारिक तनाव व्यवस्थापन, बेरोजगारी निराकरण और सदस्यों में व्याप्त मानसिक समस्या का उचित उपचार अत्यंत आवश्यक है ।
मद्यपान तथा लागू पदार्थ जन्य समस्या के लिये सिर्फ मनोचिकित्सक ही नहीं मनोविमर्शकर्ता और सामाजिक परिचारक का भी अहम् भूमिका होता है । इन सबके प्रयास से स्वस्थ परिवार कायम रखने में सहयोग मिलता है । ऐसे स्वस्थ परिवार में जन्मा हुआ बच्चा कभी भी पीड़क या पीडि़त नहीं होता है ।
किशोरावस्था के व्यक्तित्व विकास में संगी साथी, पड़ोसी और विशेष रूप से स्कूल – शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान होता है । मूल्य मान्यता में आधारित नैतिकमुखी शिक्षा जिन बच्चे को मिलती हैं उसका व्यक्तित्व स्वस्थ होता है । उस बच्चा का संस्कार उच्च होता है और वह बुरी लत से दूर रहता है ।
इस प्रकार के किशोर किशोरी के बीच अंकुरित प्रेम, हिंसाग्रस्त मनोग्रन्थि से दूर होता है । व्यभिचार, बलात्कार और झगड़ा झंझट का सवाल ही उठता । कार्यस्थल में व्याप्त तनाव व्यवस्थापन के लिये स्वस्थ, संयमित एवं उत्तरदायित्व बोध होने के लिये एक आवश्यक संरचना बनाना होता है । तनावजन्य मांसिक समस्या निराकरण के लिये मनोविमर्श तथा मनोचिकित्सक की भी सहायता लेनी चाहिये ।
बेरोजगारी समाधान, लैंगिक विविधता का सम्बोधन, गरीबी निवारण और अपराध निराकरण के लिये राष्ट्र को एक ठोस नीति बनाना चाहिये । राजनीतिक नेतृत्व को भी इन समस्याओं के समाधान के लिये एक मजबूत कदम उठाना चाहिये । इसमें नागरिक समाज के नाता से चिकित्सक, मिडियाकर्मी का सहयोग भी अपरिहार्य है ।
हमारी पूर्वीय संस्कृति नारी पीड़क कभी नहीं थी । मातृदेवो भव का नारा लगाने, जन्मभूमि, राष्ट्र एवं पृथ्वी को भी मां मानने वाला, विभिन्न संस्कृतियों से परिपूर्ण भला हम कैसे महिला हिंसा को मान्यता दे सकते हैं ? इन सभी तथ्यों को हृदयंगम करते हुये सांस्कृतिक एवं सभ्य जीवन बनाने के लिए हमें अग्रसर होना होगा ।

अनुवाद अ्रशु कुमारी झा
साभार कांतिपुर

Loading...

 
आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: