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नारी दिवस, नीति और व्यवहार : मीरा राजभण्डारी अमात्य

हिमालिनी, अंक मार्च 2019 |भाग्य और पत्नी के साथ से ही पुरुष एक सफल व्यक्ति होता है एक सवारी साधन में लिखे इस पंक्ति को देख कर लगा कि अगर इसका विश्लेषण किया जाय तो जीवन में सिर्फ पुरुष को सफल होने की आवश्यकता है और इसका दायित्व महिला को लेना चाहिए क्योंकि आमतौर पर यह पुरुषों के लिए यह मानसिकता देखी जाती है । पर क्या महिला की सफलता में पुरुषों की भूमिका होनी चाहिए या नहीं ? महिला की सफलता से क्या पुरुष खुद को सफल मानता है ? इस विषय में हमारा समाज मौन है । किन्तु वास्तविकता तो यह है कि दोनों के जीवन को सफल होने के लिए एक दूसरे की जरुरत है । प्रसङ्ग अन्तर्राष्ट्रीय नारी दिवस का है । सन् १८५७ के मार्च ८ में अमेरिका के न्यूयोर्क में पुरुष की ही तरह समान सुविधा एवं वेतन के लिए तथा कार्यस्थल में काम का सकारात्मक वातावरण के लिए तैयारी पोशाक उद्योग की श्रमिक महिलाओं ने अधिकार प्राप्ति के लिए प्रशासन के समक्ष प्रदर्शन किया । अपने अधिकार के प्रति सचेत श्रमिक महिलाओं ने ५१ वर्ष के बाद सन् १९०८ मार्च ८ में सन् १८५७ को आन्दोलन के प्रति समर्थन करते हुए न्यूयोर्क में पुनः प्रदर्शन किया । महिला श्रमिकों द्वारा किए गए विभेद के विरुद्ध इस आन्दोलन को दबाने की पूरी कोशिश की गई । प्रहरी का व्यापक दमन हुआ ।
अमेरिका में श्रमिकों के संघर्ष का लम्बा और उत्साहजनक इतिहास रहा है पर महिला के अधिकार के लिए हुए संघर्ष का कोई खास परिणाम सामने नहीं आया । महिला की आवश्यकता को खास महत्तव नही देने के कारण महिला श्रमिकों को विभेद ही झेलना पड़ा । किन्तु क्रान्ति का बीजारोपण हो चुका था । आन्दोलन और वकालती पहल की शृङ्खला ने निरन्तरता ली । समान काम का समान वेतन की माँग और आन्दोलन ही नारी दिवस का आधार बना । और १९१० से ८ मार्च को अन्तरराष्ट्रीय नारी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा । तत्कालीन जर्मन के साम्यवादी सिद्धान्त के हस्ती क्लारा जेट्लीन ने ८ मार्च को विश्व नारी दिवस के रूप में मनाने के लएि पूरे विश्व से आग्रह किया था । महिला अधिकार को संस्थागत करन के लिए तत्कालीन कट्टर साम्यवादी नेतृत्व लेनीन के साथ बहस करने वाली जुझारु जेट्ली उस समय यूरोप की सरकार को चुनौदी देने वाली चर्चित महिला रही । परिणामस्वरूप विश्व में ८ मार्च को नारी दिवस के रूप में ही नहीं बल्कि समस्त मानव अधिकार के वकालती कदम के रूप में विश्व सम्मान करता है ।
संयुक्त राष्ट्र सङ्घ ने महिला विकास को मानव विकास के आधार स्तम्भ के रूप में व्याख्या किया है । नेपाल के सन्र्दभ में राज्य ने महिला को एकदिन सार्वजनिक छुट्टी का प्रावधान, साप्ताहिक कार्यक्रम या गैरसरकारी संस्थाओं द्वारा पाँचतारा होटल में सेमिनार गोष्ठी में सीमित परम्परा महिला को अधिकार और विभेदरहित समाज की प्रत्याभुति दे सकती है या नहीं यह आम महिला के लिए बहस का विषय हो सकता है । संवैधानिक और कानुनी हिसाब से महिला को समान अधिकार और विभेदरहित समाज की प्रत्याभूति दिलाने पर भी व्यवहारिक रूप में महिला के अधिकार को सम्बोधन करने में कंजूसी महिला जगत को महसूस होता आया है । नेपाल के संविधान २०७२ के धारा ३८ ने महिला के हक और अधिकार को सुनिश्चित किया है । जिसमें महिला को लैङ्गिक भेदभाव बिना समान वंशीय हक से लेकर महिला विरुद्ध होने वाले धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परम्परा प्रचलन या अन्य किसी भी आधार में शोषण नहीं करने और अगर किया जाता है तो पीडि़त को कानून बमोजिम क्षतिपूर्ति प्राप्त होने का प्रावधान है तथा सम्पत्ति तथा पारिवारिक मामला में समान हक होने की प्रत्याभूति इस संविधान ने दिया है । यह एक सकारात्मक उपलब्धि है । इसी तरह नेपाल के त्रिवर्षीय योजना ने पूर्ण शान्ति हासिल करने के लिए समावेशी तथा समन्यायिक विकास पर जोर देने की रणनीति के अन्तर्गत महिला का जीवनस्तर उठाने के लिए समन्यायिक विकास रणनीति अपनाने की रणनीति लेने का लक्ष्य लिया है ।
किन्तु तथ्याङ्क के अनुसार यह रणनीति सफल नजर नहीं आ रही क्योंकि महिला अधिकार हनन, बलात्कार, यौन हिंसा जैसी घटनाओं का आँकड़ा घटने की बजाय निरन्तर बढता जा रहा है । इससे तो यही पता चलता है कि सैद्वान्तिक और नीतिगत रूप में महिला अधिकार तथा महिला विकास तथा लैङ्गिक सन्तुलन की जितनी भी वकालत कर ली जाय व्यवहार में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ है ।
गोरखापत्र से

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