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नेपाल नहीं चाहता कि नरेंद्र मोदी सरकार फिर आए ?

नई दिल्ली, २१ मई २०१९ |  भारत के लोकसभा चुनाव पर पड़ोसी देश नेपाल की भी नजर बनी हुई है. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब सत्ता में आए थे तो काठमांडू के साथ रिश्ते उतार-चढ़ाव के दौर में थे हालांकि पांच वर्षों के कार्यकाल के अंत तक आते-आते दोनों देशों के संबंध संतोषजनक स्थिति में हैं.

मोदी ने जब नेपाल का पहला दौरा किया था तो लोग सड़कों पर उनकी एक झलक पाने के लिए उमड़ पड़े थे. नेपाल की संसद में पीएम मोदी के भाषण को खूब तारीफों के पुल बांधे गए और बीजेपी नेता नरेंद्र मोदी में एक दोस्त देखा गया हालांकि कुछ समय बाद ही नेपाल में मोदी के लिए प्यार की जगह विरोध पनपने लगा.

जब नेपाल में नया संविधान पेश किया गया तो नेपाल-भारत के रिश्तों में दरार आ गई. नेपाल के संविधान में भारतीय मूल के मधेशियों के अधिकारों को नजरअंदाज किए जाने पर भारत ने नाराजगी जताई थी. मधेशियों के आंदोलन की वजह से भारत-नेपाल सीमा पर आर्थिक नाकेबंदी हो गई थी जिसके लिए नेपाल ने मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया.

उस वक्त नेपाल विनाशकारी भूकंप से उबरने की कोशिश कर रहा था. सीमा पर आर्थिक नाकेबंदी की वजह से नेपालियों की दैनिक जरूरतों की चीजों की आपूर्ति का संकट पैदा हो गया था जिससे वहां मोदी सरकार विरोधी भावनाएं मजबूत हो गईं.

2015-16 में भारत-नेपाल सीमा पर हुई आर्थिक नाकेबंदी की प्रतिक्रिया में नेपाल चीन के करीब चला गया. नेपाल प्रमुख ओली ने चीन के साथ ट्रांजिट और ट्रांसपोर्ट समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसका मतलब था कि नेपाल की आपूर्ति व्यवस्था पर अब भारत का एकाधिकार खत्म हो जाएगा.

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नेपाल की सत्ता के करीब राजनेता कांग्रेस को बीजेपी पर प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान की चीन समर्थक ओली सरकार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक चुनौती की तरह देखा जाता है.

एक साल बाद मोदी सरकार ने जब नोटबंदी का ऐलान कर दिया तो फिर एक बार दोनों देशों के बीच दूरियां पैदा हो गईं. नेपाल के भीतर नोट बदलने की सुविधा मौजूद ना होने की वजह से आम लोगों को बहुत नुकसान पहुंचा. भारत के वादे के बावजूद भारतीय रिजर्व बैंक नेपाली समकक्ष बैंक नेपाल राष्ट्र बैंक के साथ इस मुद्दे को सुलझाने में नाकामयाब रहा.

दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी साफ तौर पर दिखने लगी है. बीजेपी के 2019 के चुनावी मैनिफेस्टो में ‘पड़ोसी फर्स्ट’ की नीति का भी कहीं जिक्र नहीं है जो हैरान करने वाला है. हालांकि, कांग्रेस ने पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों की नीति को सांस लेने भर की जगह दी है और सार्क देशों के साथ रिश्ते सुधारने पर जोर देने की बात कही है.

नेपाल में केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (NCP) के पास संसद में पांच वर्ष के लिए पूर्ण बहुमत है जिससे नेपाल भारत की नई सरकार के साथ ठोस कदम आगे बढ़ाने की स्थिति में है.

भारत की नई सरकार को पिछले साल नेपाल-इंडिया एमिनेंट पर्सन्स ग्रुप (EPG) द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट की समीक्षा करनी होगी. 2016 में ईपीजी ने भारत-नेपाल के द्विपक्षीय रिश्तों पर जुलाई 2018 में अपनी रिपोर्ट पूरी की थी. यह रिपोर्ट पीएम मोदी को 6 महीने पहले ही सौंपी जानी थी लेकिन इसके कुछ मुद्दों पर असहमति के चलते नई दिल्ली ने इस रिपोर्ट को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. बाद में इस रिपोर्ट में कई सुधार किए गए लेकिन भारत अब नई सरकार बनने के बाद ही इस पर विचार करेगा.

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ईपीजी रिपोर्ट मुख्यत: नेपाल और भारत के बीच 1950 की पीस ऐंड फ्रेंडशिप ट्रीटी को लेकर है. अगर ईपीजी के सुझाव मान लिए जाते हैं तो भारत-नेपाल के रिश्तों में अभूतपूर्व परिवर्तन आ जाएगा.

सीमा पार यात्रा के लिए आईडी, सीमा पर उच्चस्तरीय निगरानी व्यवस्था, दोनों देशों की खुली सीमा के एंट्री पॉइंट्स को कम करना समेत कई कदम इस रिपोर्ट में सुझाए गए हैं. फिलहाल, दोनों देशों के नागरिकों को यात्रा के लिए किसी आईडी कार्ड या वीजा की जरूरत नहीं पड़ती है.

इसके अलावा, नेपाल की सरकार किसी तीसरे देश से स्वतंत्र तौर पर सैन्य उपकरण खरीदने का अधिकार चाहती है. 1950 की संधि के अनुच्छेद 5 के तहत नेपाल को किसी तीसरे देश से सैन्य हथियार आयात करने से नहीं रोकता है लेकिन LoE (लेटर ऑफ एक्सचेंज) में कुछ शर्तें दी गई हैं.

LoE के दूसरे पैराग्राफ में कहा गया है कि नेपाल किसी भी देश से हथियार और युद्ध सामग्री खरीदने से पहले भारत सरकार की मदद और सहमति लेगा. नेपाल इसे लेकर अक्सर अपनी आपत्ति जताता रहा है. 1989 में जब नेपाल के राजा बीरेंद्र ने चीन से सैन्य उपकरण आयात किए थे तो काठमांडू पर संधि के उल्लंघन का आरोप लगा था.

नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने चुनावी मैनिफेस्टो में संकल्प लिया था कि वह भारत के साथ सभी एकतरफा संधियों को खत्म कर देगी या उनमें संशोधन करवाएगी. नेपाल की सरकार भारत पर घरेलू राजनीति में हस्तक्षेप का भी आरोप लगाती रही है हालांकि, पिछले कुछ समय से भारत अपनी प्रतिक्रियाएं देने से बचता रहा है. सार्वजनिक मंच से काठमांडू में भारतीय राजदूत शायद ही कोई राजनीतिक बयान देते हैं. नया संविधान लागू होने के बाद से नेपाल अपनी संप्रभुता को लेकर ज्यादा आक्रामक हो चुका है.

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मधेशी समर्थक पार्टियों की संविधान संशोधन की मांग को लेकर भारत के पक्ष लेने पर काठमांडू नाखुश रहता है. 2015 में जब मधेशी समर्थक पार्टियों ने नए संविधान पर असंतोष जाहिर किया तो भारत ने सार्वजनिक तौर उनका समर्थन किया. विश्लेषकों का कहना है कि राजनीतिक स्वरूप की मांगों की वजह से मोदी सरकार को सावधानी बरतनी चाहिए थी लेकिन वह यहां चूक कर बैठी.

बाद में काठमांडू के साथ मधेशी मुद्दे पर भारत ने अपना रुख नरम किया लेकिन इसे अपनी प्राथमिकता से हटाने से इनकार कर दिया. काठमांडू में एक बार फिर से उत्सुकता है कि भारत की नई सरकार मधेशी समर्थक दलों की मांगों पर क्या रुख अपनाती है, खासकर जब संवैधानिक संशोधन के लिए आंदोलन फिर से जोर पकड़ने लगा है.

नेपाल नई दिल्ली में ऐसी सरकार बनते देखना चाहता है जो गंभीर मुद्दों को सुलझाने की दिशा में कदम आगे बढ़ा सके और उसके साथ बराबरी के संबंध स्थापित कर सके. ( साभार आजतक) 

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1 thought on “नेपाल नहीं चाहता कि नरेंद्र मोदी सरकार फिर आए ?

  1. Agar aap aisa samajhte hai to sirf KTM me hi survey kiye honge…o bhi un netaoke bich jo bhrastachar me lipt hai aur jinki roji roti bhi dusro se chhin chhor kar chalta ho……barna……Namo Again….

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