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योग धर्म भी है और विज्ञान भी : डा श्वेता दीप्ति


डा श्वेता दीप्ति, हिमालिनी, अंक जून २०१९ | मानव सभ्यता जितनी पुरानी है, उतनी ही पुरानी योग की उत्पत्ति मानी जाती है, लेकिन इस तथ्य को साबित करने का कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं है । इस क्षेत्र में व्यापक शोध के बावजूद भी, योग की उत्पत्ति के संबंध में कोई ठोस परिणाम प्राप्त नहीं हुए हैं । ऐसा माना जाता है कि भारत में योग की उत्पत्ति लगभग ५००० साल पूर्व हुई थी । बहुत से पश्चिमी विद्वानों का मानना था कि योगा की उत्पत्ति ५००० साल पूर्व नहीं, बल्कि बुद्ध (लगभग ५०० ईसा पूर्व) के समय में हुई थी । सिंधु घाटी की सबसे प्राचीन सभ्यता की खुदाई के दौरान, बहुत ही आश्चर्यजनक तथ्य उभरकर सामने आए । खुदाई के दौरान, इस सभ्यता के अस्तित्व वाले साबुन के पत्थर (सोपस्टोन) पर आसन की मुद्रा में बैठे योगी के चित्र उत्कीर्ण मिले हैं । मूल रूप से, योग की शुरूआत स्वयं के हित की बजाय सभी लोगों की भलाई के लिए हुई है ।
मूलतः योग का वर्णन सर्वप्रथम वेदों में ही हुआ है लेकिन यह विद्या वेद के लिखे जाने से १५००० ईसा पूर्व के पहले से प्रचलन में थी, क्योंकि वेदों की वाचिक परंपरा हजारों वर्ष से चली आ रही थी । अतः वेद विद्या उतनी ही प्राचीन है जितना प्राचीन ज्योतिष या सिंधु सरस्वती सभ्यता है । वेद, उपनिषद, गीता, स्मृति ग्रंथ और पुराणों में योग का स्पष्ट उल्लेख मिलता है । योग की महिमा और यज्ञों की सिद्धि के लिए उसकी परमावश्यकता बतलायी गयी है । इसी सिद्धांत को ऋक् संहिता में स्पष्ट उल्लेख पाया जाता है ।
यस्मादूते न सिध्यति यज्ञो विपश्चि तश्चन।
स धीनां  योगमिन्वति।।  (ऋक् संहिता मंडल १, सूक्त १८, मंत्र ७)
अर्थात योग के बिना विद्वान का कोई भी यज्ञकर्म नहीं सिद्ध होता, वह योग क्या है सो चित्तवृत्ति निरोधरूपी योग या एकाग्रता से समस्त कर्तव्य व्याप्त हैं, अर्थात सब कर्मों की निष्पत्ति का एकमात्र उपाय चित्तसमाधि या योग ही है ।

वैदिक योग

वेदों के अनुसार, भारत में योग की उत्पत्ति वैदिक काल में हुई है । सबसे प्राचीन योगिक शिक्षाएँ वैदिक योग या प्राचीन योग के नाम से मशहूर हैं और इसे चार वेदों – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में देखा जा सकता है । वैदिक योग से जुड़े अनुष्ठान और समारोह मन को तरोताजा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । इसलिए, उस समय लोगों ने वैदिक योग को जीवन के बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू के रूप में अपनाया था । योग को अदृश्य दुनिया से जुड़ने और अपने आप को किसी के प्रति समर्पित करने का एक तरीका माना जाता है ।  उस समय समर्पण का उपयोग करके ही एक बात पर लंबे समय तक ध्यान केंद्रित किया जाता था । इसलिए, वैदिक योग को योग की जड़ माना जाता है । संस्कृत में ऋषि वैदिक योग के गुरू “सिद्ध पुरूष” के नाम से मशहूर थे ।

प्रारम्भिक–शास्त्रीय योग

वैदिक योग के बाद प्रारम्भिक–शास्त्रीय योग का युग आया और इसे उपनिषदों के निर्माण के रूप में चिन्हित किया गया था । इसकी अवधि लगभग २,००० वर्षों की थी और यह योग दूसरी शताब्दी तक चला था । इस योग के कई रूप हैं, लेकिन इस प्रारंभिक योग के अधिकांश योग, वैदिक योग के समान ही हैं ।
उपनिषद के तीन विषय – निर्णायक सत्य (ब्राह्मण), स्व अनुभवातीत (आत्मा) और इन दोनों के बीच के संबंध को, वेदों में समझाया गया है और इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि योग की उत्पत्ति उपनिषद् के साथ हुई है । हिंदुओं की एक अत्यंत महत्वपूर्ण पवित्र पुस्तक भगवद्गीता (भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों का संग्रह), इस अवधि के उत्कृष्ट योग धर्मग्रंथों में से एक है । इसके अलावा रामायण और महाभारत (भगवद्गीता की तरह ही) में भी योग का समावेशन था । इस समय वाले योग में शरीर और मन को अपने वश में करके ध्यान केन्द्रित करने की कई तकनीक और आत्म यथार्थ की खोज करने के लिए दिव्य शक्तियाँ मौजूद थीं ।
इस अवधि का योग हिंदू धर्म के साथ–साथ बौद्ध धर्म से भी जुड़ा हुआ है क्योंकि छठी शताब्दी ईसापूर्व में भगवान बुद्ध ने ध्यान के महत्व पर शिक्षण देना शुरू कर दिया था ।

शास्त्रीय योग

योग सूत्र में शास्त्रीय योग का प्रमाणीकरण किया गया था और पतंजलि ने दूसरी शताब्दी के आसपास शास्त्रीय योग के निर्माण के प्रतीक का व्याख्यान किया था । सूत्र शब्द का अर्थ “धागा” होता है, लेकिन यहाँ पर इसका अर्थ “स्मृति का धागा” है, जिसमें पतंजलि के छात्र पतंजलि के ज्ञान और बुद्धिमत्ता को बरकरार रखते हैं । १९५ वचन या सूत्र योग के आठ अंग – यम (नैतिक मूल्य), नियम (शुद्धता का व्यक्तिगत रूप से पालन), आसन (शारीरिक व्यायाम), प्रत्याहार (ध्यान के साधन की रचना), धारणा (एकाग्रता), ध्यान (चिंतन) और समाधि (विमुक्ति) हैं ।
पतंजलि का मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति का निर्माण तत्व (प्रकृति) और आत्मा (पुरुष) से मिलकर होता है । योग के माध्यम से, इन दोनों को पृथक करके आत्मा का शुद्ध रूप में नवीनीकरण किया जा सकता है ।

पूर्व–शास्त्रीय योग

पूर्व शास्त्रीय योग का ध्यान वर्तमान पर केंद्रित था । इसमें पतंजलि योग–सूत्र के बाद, अस्तित्व में आने वाले योग के सभी अनुभाग निहित होते हैं । शास्त्रीय योग से विपरीत, पूर्व शास्त्रीय योग में सब कुछ कठोर एकाग्रता पर केंद्रित होता है । इस अवधि के दौरान योग ने एक दिलचस्प मोड़ ले लिया था, क्योंकि इस अवधि के योग शरीर के अंदर छिपी क्षमता की जाँच करने में सक्षम थे । इसलिए, शरीर का नवीनीकरण करने के लिए योग गुरुओं द्वारा साधनाओं की एक प्रणाली का निर्माण किया गया था । इससे परिणामस्वरूप वर्तमान योग के एक शौकिया प्रारूप हठ–योग की रचना हुई ।

आधुनिक योग

माना जाता है कि वर्ष १८९३ में शिकागो में आयोजित धर्मों की संसद में आधुनिक योग की उत्पत्ति हुई थी । स्वामी विवेकानंद ने धर्मों की संसद में, अमेरिकी जनता पर स्थायित्व से परिपूर्ण प्रभाव डाला था । उसके फलस्वरूप वह योग और वेदांत की ओर छात्रों को आकर्षित करने में काफी सफल हुए । उसके बाद, दूसरे योगगुरू परमहंस योगानन्द को माना जाता है । वर्तमान समय में, पतंजली योग पीठ ट्रस्ट के स्वामी रामदेव ने भारत के प्रत्येक घर में और यहाँ तक विदेशों में भी योग का प्रसार करने में कामयाबी हासिल की है ।
भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्रीत्व काल में गुजरात के अहमदाबाद में, लकुलीश योग विश्वविद्यालय में उद्घाटन के साथ, योग को लोगों का अभिन्न अंग मानते हुए इसे अपनाने पर जोर दिया । यह स्व–वित्तपोषित गैर–सरकारी विश्वविद्यालय अहमदाबाद के जिले सुरेंद्रनगर में लाइफ मिशन ट्रस्ट द्वारा स्थापित किया गया है । अष्टांग योग, कर्म, ज्ञान, भक्ति योग, दर्शन, मनोविज्ञान, शरीर रचना विज्ञान, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा में पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्रों को तीन वर्ष की डिग्री से सम्मानित किया जाता है ।

योग का संक्षिप्त इतिहास ः

योग का उपदेश सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ने सनकादिकों को, उसके पश्चात विवस्वान (सूर्य) को दिया । बाद में यह दो शाखाओं में विभक्त हो गया । एक ब्रह्मयोग और दूसरा कर्मयोग । ब्रह्मयोग की परम्परा सनक, सनन्दन, सनातन, कपिल, आसुरि, वोढु और पच्चंशिख नारद–शुकादिकों ने शुरू की थी । यह ब्रह्मयोग लोगों के बीच में ज्ञान, अध्यात्म और सांख्य योग नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
दूसरी कर्मयोग की परम्परा विवस्वान की है । विवस्वान ने मनु को, मनु ने इक्ष्वाकु को, इक्ष्वाकु ने राजर्षियों एवं प्रजाओं को योग का उपदेश दिया । उक्त सभी बातों का वेद और पुराणों में उल्लेख मिलता है । वेद को संसार की प्रथम पुस्तक माना जाता है जिसका उत्पत्ति काल लगभग १०००० वर्ष पूर्व का माना जाता है । पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार योग की उत्पत्ति ५००० ई.पू. में हुई । गुरु–शिष्य परम्परा के द्वारा योग का ज्ञान परम्परागत तौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलता रहा ।
योग ग्रंथ योग सूत्र (थ्यनब क्गतचबक द्यययपक) ः वेद, उपनिषद्, भगवद गीता, हठ योग प्रदीपिका, योग दर्शन, शिव संहिता और विभिन्न तंत्र ग्रंथों में योग विद्या का उल्लेख मिलता है । सभी को आधार बनाकर पतंजलि ने योग सूत्र लिखा । योग पर लिखा गया सर्वप्रथम सुव्यव्यवस्थित ग्रंथ है— योगसूत्र । योगसूत्र को पांतजलि ने २०० ई.पूर्व लिखा था । इस ग्रंथ पर अब तक हजारों भाष्य लिखे गए हैं, लेकिन कुछ खास भाष्यों का यहां उल्लेख किया जा रहा  है ।
व्यास भाष्य ः व्यास भाष्य का रचना काल २००–४०० ईसा पूर्व का माना जाता है । महर्षि पतंजलि का ग्रंथ योग सूत्र योग की सभी विद्याओं का ठीक–ठीक संग्रह माना जाता है । इसी रचना पर व्यासजी के ‘व्यास भाष्य’ को योग सूत्र पर लिखा प्रथम प्रामाणिक भाष्य माना जाता है ।
तत्त्ववैशारदी ः पतंजलि योगसूत्र के व्यास भाष्य के प्रामाणिक व्याख्याकार के रूप में वाचस्पति मिश्र का ‘तत्त्ववैशारदी’ प्रमुख ग्रंथ माना जाता है । वाचस्पति मिश्र ने योगसूत्र एवं व्यास भाष्य दोनों पर ही अपनी व्याख्या दी है । तत्त्ववैशारदी का रचना काल ८४१ ईसा पश्चात माना जाता है ।
योगवार्तिक ः विज्ञानभिक्षु का समय विद्वानों के द्वारा १६वीं शताब्दी के मध्य में माना जाता है । योगसूत्र पर महत्वपूर्ण व्याख्या विज्ञानभिक्षु की प्राप्त होती है जिसका नाम ‘योगवार्तिक’ है ।
भोजवृत्ति ः भोज के राज्य का समय १०७५–१११० विक्रम संवत माना जाता है । धरेश्वर भोज के नाम से प्रसिद्ध व्यक्ति ने योग सूत्र पर जो ‘भोजवृत्ति’ नामक ग्रंथ लिखा है वह भोजवृत्ति योगविद्वजनों के बीच समादरणीय एवं प्रसिद्ध माना जाता है । कुछ इतिहासकार इसे १६वीं सदी का ग्रंथ मानते हैं ।
योग का वर्णन वेदों में, फिर उपनिषदों में और फिर गीता में मिलता है, लेकिन पतंजलि और गुरु गोरखनाथ ने योग के बिखरे हुए ज्ञान को व्यवस्थित रूप से लिपिबद्ध किया ।
योग हिन्दू धर्म के छह दर्शनों में से एक है । ये छह दर्शन हैं— १.न्याय २.वैशेषिक ३.मीमांसा ४.सांख्य ५.वेदांत और ६.योग ।
योग के मुख्य अंग ः यम, नियम, अंग संचालन, आसन, क्रिया, बंध, मुद्रा, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि । इसके अलावा योग के प्रकार, योगाभ्यास की बाधाएं,

योग का इतिहास, योग के प्रमुख ग्रंथ ।

योग के प्रकार ः १.राजयोग, २.हठयोग, ३.लययोग, ४. ज्ञानयोग, ५.कर्मयोग और ६. भक्तियोग । इसके अलावा बहिरंग योग, नाद योग, मंत्र योग, तंत्र योग, कुंडलिनी योग, साधना योग, क्रिया योग, सहज योग, मुद्रायोग, और स्वरयोग आदि योग के अनेक आयामों की चर्चा की जाती है । लेकिन सभी उक्त छह में समाहित हैं ।
१.पंच यम ः १.अहिंसा, २.सत्य, ३.अस्तेय,
४.ब्रह्मचर्य और ५.अपरिग्रह ।
२.पंच नियम ः १.शौच, २.संतोष, ३.तप, ४.स्वाध्याय
और ५.ईश्वर प्राणिधान ।
३.अंग संचालन ः १.शवासन, २.मकरासन, ३.दंडासन और
४. नमस्कार मुद्रा में अंग संचालन किया जाता है जिसे सूक्ष्म व्यायाम कहते हैं ।
इसके अंतर्गत आंखें, कोहनी, घुटने, कमर, अंगुलियां, पंजे, मुंह आदि अंगों का व्यायाम किया जाता है ।
५.प्रमुख बंध ः १.महाबंध, २.मूलबंध, ३.जालन्धरबंध
और ४.उड्डियान।
६.प्रमुख आसन ः किसी भी आसन की शुरुआत लेटकर अर्थात शवासन (चित्त लेटकर) और मकरासन (औंधा लेटकर) में और बैठकर अर्थात दंडासन और वज्रासन में, खड़े होकर अर्थात सावधान मुद्रा या नमस्कार मुद्रा से होती है । यहां सभी तरह के आसन के नाम दिए गए हैं ।
१.सूर्यनमस्कार, २.आकर्णधनुष्टंकारासन, ३.उत्कटासन, ४.उत्तान कुक्कुटासन, ५.उत्तानपादासन, ६.उपधानासन, ७.ऊर्ध्वताड़ासन, ८.एकपाद ग्रीवासन, ९.कटि उत्तानासन १०.कन्धरासन, ११.कर्ण पीड़ासन, १२.कुक्कुटासन, १३.कुर्मासन, १४.कोणासन, १५.गरुड़ासन १६.गर्भासन, १७.गोमुखासन, १८.गोरक्षासन,१९.चक्रासन, २०.जानुशिरासन, २१.तोलांगुलासन २२.त्रिकोणासन, २३.दीर्घ नौकासन, २४.द्विचक्रिकासन, २५.द्विपादग्रीवासन, २६.ध्रुवासन २७.नटराजासन, २८.पक्ष्यासन, २९.पर्वतासन, ३०.पशुविश्रामासन, ३१.पादवृत्तासन ३२.पादांगुष्टासन, ३३.पादांगुष्ठनासास्पर्शासन, ३४.पूर्ण मत्स्येन्द्रासन, ३५.पककष्ठतानासन ३६.प्रसृतहस्त वृश्चिकासन, ३७.बकासन, ३८.बध्दपद्मासन, ३९.बालासन, ४०.ब्रह्मचर्यासन ४१.भूनमनासन, ४२.मंडूकासन, ४३.मर्कटासन, ४४.मार्जारासन, ४५.योगनिद्रा, ४६.योगमुद्रासन, ४७.वातायनासन, ४८.वृक्षासन, ४९.वृश्चिकासन, ५०.शंखासन, ५१.शशकासन ५२.सिंहासन, ५३.सिद्धासन, ५४.सुप्त गर्भासन, ५५.सेतुबंधासन, ५६.स्कंधपादासन, ५७.हस्तपादांगुष्ठासन, ५८.भद्रासन, ५९.शीर्षासन, ६०.सूर्य नमस्कार, ६१.कटिचक्रासन, ६२.पादहस्तासन, ६३.अर्धचन्द्रासन, ६४.ताड़ासन, ६५.पूर्णधनुरासन, ६६.अर्धधनुरासन, ६७.विपरीत नौकासन, ६८.शलभासन, ६९.भुजंगासन, ७०.मकरासन, ७१.पवन मुक्तासन, ७२.नौकासन, ७३.हलासन, ७४.सर्वांगासन, ७५.विपरीतकर्णी आसन, ७६.शवासन, ७७.मयूरासन, ७८.ब्रह्म मुद्रा, ७९.पश्चिमोत्तनासन, ८०.उष्ट्रासन, ८१.वक्रासन, ८२.अर्ध–मत्स्येन्द्रासन, ८३.मत्स्यासन, ८४.सुप्त वज्रासन, ८५.वज्रासन, ८६.पद्मासन आदि ।

अन्य धर्म और योग

यहूदी धर्म और योग ः  हजरत मूसा ने कुछ यम–नियमों के पालन पर जोर दिया था । मूसा की दस आज्ञाएं यहूदी संप्रदाय का आधार हैं । यह वेद और योग से ही प्रेरित हैं । यहूदी, ईसाई और इस्लाम की मूल आध्यात्मिक उपासना में योग ही है ।
जैन धर्म और योग ः जैन धर्म का योग से गहरा नाता है । उपरोक्त लिखे में योग के अंग यम और नियम ही जैन धर्म के आधार स्तंभ है । जैन धर्म में पंच महाव्रतों का बहुत महत्व है ः १.अहिंसा (हिंसा न करना), २.सत्य, ३.अस्तेय (चोरी न करना), ४.ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (धन का संग्रह न करना)। गृहस्थ अणुव्रती होते हैं, मुनि महाव्रती ।
पारसी धर्म और योग ः महात्मा जरथुस्त्र भी एक योगी ही थे । पारसी धर्म का वेद और आर्यों से गहरा नाता है । अत्यंत प्राचीन युग के पारसियों और वैदिक आर्यों की प्रार्थना, उपासना और कर्मकांड में कोई भेद नजर नहीं आता । वे अग्नि, सूर्य, वायु आदि प्रकृति तत्वों की उपासना और अग्निहोत्र कर्म करते थे ।
बौद्ध धर्म और योग ः बुद्ध की हठयोग संबंधी साधनाओं एवं क्रियाओं की पहल ‘गुहासमाज’ नामक तंत्र ग्रंथ से मिलती है और यह ग्रंथ ईस्वी सन् की तीसरी शताब्दी में लिखा गया है । उक्त ग्रंथ का अट्ठारहवां अध्याय बड़े महत्व का है जिसमें बौद्ध धर्म में प्रचलित योग साधनाओं तथा उनके उद्देश्य एवं प्रयोजन का वास्तविक परिचय मिलता है । योग के छह अंगों के नाम इसी ग्रंथ में मिलते हैं, प्रत्याहार, ध्यान, प्राणायम, धारणा, अनुस्मृति और समाधि ।
इसके अलावा बौद्ध धर्म ने योग को बहुत अच्छे से आष्टांगिक मार्ग में व्यस्थित रूप दिया है । इसी से प्रेरित होकर संभवत पतंजलि ने अष्टांग योग को लिखा होगा । ध्यान और समाधि योग के ही अंग है । चित्तवृत्ति का निरोध आष्टांगिक मार्ग के द्वारा भी हो सकता है । भगवान बुद्ध ने उनके काल में सत्य को जानने के लिए योग और साधना की संपूर्ण प्रचलित विधि को अपनाया था अंत में उन्होंने ध्यान की एक विशेष विधि द्वारा बुद्धत्व को प्राप्त किया था ।
ईसाई धर्म और योग ः ईसाई धर्म के लोग चंगाई सभा करके लोगों को ठीक करने का दावा करते हैं । दरअसल ये योग की प्राणविद्या, कुंडलिनी योग और रेकी का ही कार्य है । ईसा मसीह इसी विद्या द्वारा लोगों को ठीक कर देते थे । बपस्तिमा देना, सामूहिक सस्वर प्रार्थना करना यह योग का ही एक प्रकार है ।
इस्लाम धर्म और योग ः हजरत. मुहम्मद स.अलै. ने प्रार्थना और प्रेम इन मुद्दों को और परिष्कृत करते हुए परमात्मा को संपूर्ण शरणशीलता और उसकी सामूहिक प्रार्थना पर जोर दिया । इस्लाम इस अरबी शब्द का अर्थ ही परमात्मा को संपूर्ण शरणागत होना है । योग में ईश्वर प्राणिधान का बहुत महत्व है ।
अशरफ एफ निजामी ने एक किताब लिखी थी जिसमें उन्होंने योगासन और नमाज को एक ही बताया था । जब नमाज कायम के रूप में अदा की जाती है तो वह ‘वज्रासन’ होता है । सजदा करने के लिए जिस तरह नमाजी झुकता है तो उसे शंशकासन कहते हैं । जिस तरह नमाज पढ़ने से पहले वजू की प्रथा है उसी तरह योग करने से पहले शौच, आचमन आदि किया जाता है । नमाज से पहले इंसान नियत करता है तो योग से पहले ‘संकल्प’ करता है ।
सिख धर्म और योग ः सिख धर्म में कीर्तन, जप, अरदास आदि अनेक बातें योग की ही देन है । सभी गुरु एक महानयोगी ही थे । साहस, शुचिता और सत्य् की सीख देने वाला महान सिख धर्म संपूर्ण योग ही है । ‘सिख’ नाम दरअसल संस्कृत के ‘शिष्य’ शब्द से ही निकला है ।

योग और धर्म ः

धर्म के सत्य, मनोविज्ञान और विज्ञान का सुव्यवस्थित रूप है योग ।  योग की धारणा ईश्वयर के प्रति आपमें भय उत्पन्न नहीं करती और जब आप दुःखी होते हैं तो उसके कारण को समझकर उसके निदान की चर्चा करती है । योग पूरी तरह आपके जीवन को स्वस्थ और शांतिपूर्ण बनाए रखने का एक सरल मार्ग है । यदि आप स्वस्थ और शांतिपूर्ण रहेंगे तो आपके जीवन में धर्म की बेवकूफियों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी ।
योग ईश्वरवाद और अनिश्वर वाद की तार्किक बहस में नहीं पड़ता वह इसे विकल्प ज्ञान मानता है, अर्थात मिथ्याज्ञान । योग को ईश्वर के होने या नहीं होने से कोई मतलब नहीं किंतु यदि किसी काल्पनिक ईश्वर की प्रार्थना करने से मन और शरीर में शांति मिलती है तो इसमें क्या बुराई है । योग एक ऐसा मार्ग है जो विज्ञान और धर्म के बीच से निकलता है वह दोनों में ही संतुलन बनाकर चलता है । योग के लिए महत्वपूर्ण है मनुष्य और मोक्ष। मनुष्य को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखना विज्ञान और मनोविज्ञान का कार्य है और मनुष्य के लिए मोक्ष का मार्ग बताना धर्म का कार्य है किंतु योग यह दोनों ही कार्य अच्छे से करना जानता है इसलिए योग एक विज्ञान भी है और धर्म भी ।
कल्याण के दसवें वर्ष का विशेषांक योगांक और अन्य स्रोतों के आधार पर

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