Fri. Nov 22nd, 2019

विचारों के प्रवाह और कलम की ताकत पर अंकुश : डा. श्वेता दीप्ति

क्या सचमुच नेपाल लोकतंत्र में साँस ले रहा है ?

सवाल चाहे घोटालों का हो, बलात्कार का हो, योजनाओं का हो या विकास का हो सभी प्रश्न निरूत्तर हैं । ऐसे में इस तरह का विधेयक लाना क्या कलम और जुबान को खामोश करने के लिए है ?


हिमालिनी, अंक मई 2019 |वर्तमान परिवेश में नेपाल में कानून बना कर पत्रकारों और प्रेस पर जो नकेल कसने की कोशिश की जा रही है, उसने संचार जगत में एक नकारात्मक वातावरण बना दिया है । मीडिया काउन्सिल सम्बन्धी विधेयक संसद में पंजीकृत होने के बाद से ही पत्रकारिता जगत इसके विरोध में खड़ा हो गया है । पत्रकारों की साझा संस्था नेपाल पत्रकार महासंघ ने आन्दोलन की घोषणा की है ।
वर्तमान में पत्रकारिता में दो दशक से अधिक समय बिताए हुए गोकुल बास्कोटा सञ्चारमन्त्री हैं । उनके कार्यकाल में सरकार द्वारा प्रेस को नियमन करने के ढंग से लाया जा रहा विधेयक प्रारम्भ से ही आलोचित बना हुआ है । आम संचार–सम्बन्धी छाता ऐन के विधेयक में कतिपय आपत्तिजनक प्रावधान रखा गया है ।

अब तक सामाजिक संजाल में कुछ विकृति और स्वच्छन्दता होने पर भी नेपाली नागरिक अपने विचारों को भयमुक्त होकर व्यक्त करते आ रहे थे । नेताओं के कार्यशैली की आलोचना कर सकते थे । किन्तु आज जिस विधेयक को जारी करने के लिए सरकार प्रयत्नशील है उससे तो यही लगता है कि भविष्य में सामाजिक संजाल से आबद्ध व्यक्ति से ही जेल भरे जाएँगे । सरकार द्वारा संसद में पंजीकृत सूचना प्रविधि ऐन में सामाजिक सञ्जाल पंजीकरण किए बिना चलाए जाने पर, किसी की आलोचना किए जाने पर या कमेन्ट किए जाने पर सजा देने का प्रावधान रखा गया है । प्रस्तावित ऐन के दफा ९४ में फेसबुक आदि सामाजिक सञ्जाल में सम्प्रेषण नही. किए जाने वाले बातों का उल्लेख किया गया है । युट्युब या बेवसाइट भी अगर सरकार को पसंद नहीं है तो उसे भी तत्काल बंद किया जा सकता है । यहाँ तक की सजा का प्रावधान भी काउंसिल के मातहत होगी । मीडिया काउन्सिल को नेपाल सरकारले निर्देशन दे सकती है और नेपाल सरकार के दिए निर्देशन का पालन करना काउन्सिल का कर्तव्य होगा यह विधेयक के दफा २९ में उल्लेखित है ।

विगत में छापाखाना तथा प्रकाशन ऐन समाचार लिखने पर ही सञ्चारमाध्यम का पंजीयन खारिज नही किया जा सकता था । किन्तु आज सरकार अपने हाथों में यह अधिकार ले रही है । कई वेवसाइट को बंद करवाने की प्रक्रिया भी जारी है । सरकार द्वारा लाए जा रहे कानून संसद से पारित होने के बाद फेसबुक, ट्विटर आदि सामाजिक संजाल में मनमौजी पोस्ट करने पर ५ वर्ष तक की कैद और १५ लाख रूपया तक के जुरमाना की व्यवस्था सूचना प्रविधि सम्बन्धी विधेयक में उल्लेखित है । सरकार द्वारा लाए जा रहे इस विधेयक को लेकर कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि यह प्रस्ताव गलत है । संविधान की प्रस्तावना में पूर्ण प्रेस स्वतन्त्रता को प्रत्याभूत किया गया है । प्रेस स्वतन्त्रता के आगे पूर्ण शब्द है, उसके बाद सरकार द्वारा यह विधेयक लाने का नैतिक औचित्य नहीं है । संविधान की प्रस्तावना में इस विषय को समेटना उदाहरणीय है बावजूद इसके आमसञ्चार सम्बन्धी छाता ऐन और नेपाल मीडिया काउन्सिल सम्बन्धी कानून को संशोधन और एकीकरण करने के नाम पर विधेयक मेंं किया गया प्रस्ताव व्यवस्था खतरनाक है । यह मीडिया ही नहीं नागरिक की अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के विपक्ष में है ।

अप्रत्यासित रूप में लाई जा रही यह व्यवस्था निर्दलीय पञ्चायत कालें भी नहीं थी । देखा जाय तोे यह पंचायतकाल से भी अधिक पश्चगामी है । विश्व परिदृश्य में भी अगर आकलन करें तो ऐसी सजा की व्यवस्था बेलायत, अमेरिका, जर्मनी आदि देशों में भी नहीं है ।

आज के समय में सरकार द्वारा उठाया जा रहा यह कदम कई प्रश्नों को जन्म देता है । क्या सचमुच नेपाल लोकतंत्र में साँस ले रहा है ? सरकार कहती है कि किसी भी व्यक्ति या नेताओं के चरित्र हनन करने वाली आलोचना दडनीय है पर यह भी संचार जगत का सच है कि आरोप जब लगते हैं तभी प्रशासन या तो उस पक्ष का बचाव करती है या सिद्ध करती है । अगर जनता या संचार माधयम सवाल नही करेगी तो क्या उन्हें सरकार की ओर से सच की जानकारी मिलेगी ? वर्तमान में कई घटनाएँ ऐसी हुई हैं जिस सवाल का जवाब सरकार न तो देना चाह रही है और न ही कोई सकारात्मक पहल हो रही है । सवाल चाहे घोटालों का हो, बलात्कार का हो, योजनाओं का हो या विकास का हो सभी प्रश्न निरूत्तर हैं । ऐसे में इस तरह का विधेयक लाना क्या कलम और जुबान को खामोश करने के लिए है ?

हाँ प्रेस और मीडिया या सोशल मीडिया की भी जिम्मेदारी बनती है कि वो संयमित रहे क्योंकि वर्तमान समय में मीडिया की अहमियत किसी से छिपी हुई नहीं है । ऐसा कहना अनुचित न होगा कि आज हम मीडिया युग में जी रहे हैं । जीवन के प्रत्येक क्षेत्र और प्रत्येक रंग में मीडिया ने अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया है । मीडिया यानि मीडियम या माध्यम । मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है । इसी से मीडिया के महत्तव का अंदाजा लगाया जा सकता है । समाज में मीडिया की भूमिका संवादवहन की होती है । वह समाज के विभिन्न वर्गों, सत्ता केन्द्रों,व्यक्तियों और संस्थाओं के बीच पुल का कार्य करता है । मीडिया को लोकतंत्र के तीन स्तंभों (कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका) के बाद चौथा स्तंभ कहा जाता रहा है और आम आदमी को पाँचवां स्तंभ । इस पाँचवें स्तंभ पर ही चारों स्तंभ आश्रित हैं ।
किसी भी लोकतांत्रिक देश में अभिव्यक्ति या बोलने की आजादी काफी मायने रखती है क्योंकिं यदि आजÞादी बनीे रहे तो व्यक्तियों के बाकी के अधिकार भी बने रहते हैं । यदि देखा जाये तो अभिनय,मुद्रित शब्द,बोले गए शब्द और व्यंग्य चित्र आदि के द्वारा मिली अभिव्यक्ति की आजÞादी बाकी के सभी आजÞादियों का मूल है । इसीलिए व्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यक्ति का मूल आधार माना गया है ।
आधुनिक युग में प्रेस को विभिन्न प्रकार के कार्यो को सम्पन्न करने का दायित्व सौंपा गया है । प्रेस का सबसे प्रमुख कार्य विश्व में घटित हो रही प्रत्येक प्रकार की घटनाओं से हमें अवगत कराना है ।

समाचारपत्र राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षिक तथा धार्मिक और अन्य विभिन्न विषयों पर अपने दृष्टिकोण तथा विचारों को अभिव्यक्त करते हैं । इस प्रकार ये लोकमत की सर्जना, संरचना तथा लोकमत को निर्देशित करते है ।

जनता के अधिकारों तथा स्वतंत्रताओं के हनन के किसी भी प्रकार के प्रयत्न के विरूद्ध अपनी शक्तिशाली आवाज बुलन्द करके समाचार–पत्र सर्वसाधारण के लिए सर्वदा सजग, सचेत संरक्षक की भूमिका अदा करते हैं । ये जनता की माँगों तथा आकांक्षाओं को उजागर करते हैं । लोगों की शिकायतों, कठिनाइयों को प्रकाश में लाने का दायित्व इनका होता है । समाचारपत्र अच्छे तथा पवित्र कारणों तथा उनके उपायों को सुझाने का काम करते हैं । समाज और देश में समाचारपत्र एक शिक्षक की भूमिका भी अदा करते हैं । अपने पाठकों को विश्व में प्रचलित विचारधाराओं तथा ज्ञान की विभिन्न शाखाओं से अवगत करा कर ज्ञान बढ़ाते हैं ।
इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि समाचारपत्र को विश्वस्त प्रकृति के कार्यो के कारण अधिक मात्रा में स्वतंत्रता का दिया जाना आवश्यक सा हो जाता है । लेकिन समाचारपत्रों को प्रायः मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा जाता है । ग्रेट ब्रिटेन में गृह–युद्ध के दौरान विजयी सांसदों ने प्रेस पर प्रतिबन्ध लगाना प्रारम्भ कर दिया था । प्रेस पर लगाए इस सैंसर के प्रतिरोध में जॉन मिल्टन ने अपनी विश्व विख्यात पुस्तक ऐरोपेजीटिका (ब्भचयउबिनष्तष्अब) में विचार प्रतिपादित किया है । मिल्टन ने एक जगह उद्धृत किया है, मुझे सब स्वतंत्रताओं से सर्वोच्च अपने अन्तर्विवेक के अनुसार सोचने, समझने, चिन्तन की, विश्वास करने तथा निर्भीक रूप से बोलने की स्वतंत्रता दी जाए ।
अन्य देशों में भी समय–समय पर प्रेस पर नियन्त्रण लगाए जाते रहे हैं । १७४१ में हिकी (ज्ष्अपभथ) के बंगाल गजट नामक भारत के प्रथम समाचारपत्र पर भी वारेन हेस्टिंग्स द्वारा प्रतिबंध लगाया गया था । और इस प्रकार भारतीय समाचारपत्रों पर वह सरकारी सैंसरशिप (प्रतिबंध) निरीक्षण और कठोरता पूर्वक उस समय तक लगी रही जब तक १८३५ में लार्ड मैटकाफ ने भारतीय प्रेस को सरकारी प्रतिबंध से मुक्त नहीं कर दिया । तथापि प्रेस पर राज्य का हस्तक्षेप एकदम समाप्त नहीं किया जा सकता है ।
बंगाल विभाजन तथा राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान ब्रिटिश सरकार ने प्रेस पर एक बार फिर सख्ती से प्रतिबंध थोप दिया । स्वतंत्रता के पश्चात् भी भारत में १९७५ के दौरान सरकार ने संकटकाल की घोषणा करके समाचारपत्रों पर कड़े तथा कठोर सरकारी निर्देश और प्रतिबंध लगा दिए गए थे । प्रेस पर सरकार द्वारा सबसे कड़ा तथा तानाशाही प्रतिबंध नाजीवादी जर्मनी तथा फासीवादी इटली में पाया गया है ।
जर्मनी में डॉ. गोयेबल्स ने प्रेस की पूर्णरूपेण मुखबन्दी, जबानबन्दी कर दी थी । इटली में भी ठीक उसी प्रकार प्रेस की दुर्दशा हुई । रूस में भी प्रेस स्वतंत्र नहीं है । यद्यपि रूसी समाचारपत्र प्रावदा का विश्व भर में सबसे अधिक वितरण, प्रसार बताया जाता है । तानाशाही शासन के अन्तर्गत प्रेस सरकार की दास मात्र रह जाती है । सम्पादक, पत्रकार तथा अखबारनवीस सरकारी निर्देश के अनुरूप ही लिखते हैं । संक्षेपतया हम यह कहें कि प्रेस अपने प्रमुख कार्य जो कि लोकमत का दर्पण है को प्रतिपादित नहीं कर सकती है । पर जब बात लोकतंत्रात्मक शासन पद्धति की हो तो यहाँ जनता एक अलग परिवेश में साँस लेने की आदी होती है ।
प्रेस अथवा समाचारपत्र प्रजातांत्रीय शासन के अन्तर्गत स्वतंत्रता से कार्य करते हैं । उदाहरणतः ब्रिटेन में प्रेस ने बड़े पैमाने पर स्वतंत्रता का पान किया है, इसलिए ब्रिटेनवासी उच्चश्रेणी की पत्रकारिता को प्राप्त कर सके हैं । अमेरिका प्रेस को सर्वाधिक स्वतंत्रता प्रदान करता है । अमेरिकी प्रेस को स्वतंत्रता संविधान द्वारा प्रदत्त है तथा सुरक्षित है । समाचारपत्रों की स्वतंत्रता भारतीय संविधान के अंतर्गत प्रेस अथवा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में निहित है जो कि नागरिकों को दिए गए मूलभूत अधिकारों में से एक है ।
अब प्रश्न उठता है कि “क्या प्रेस पूर्णरूप से स्वतंत्र हो सकती है” , इसके उत्तर में सबसे बड़ा प्रजातान्त्रिक व्यक्ति भी अबाधित ‘हाँ’ या ‘नहीं’ में अपनी राय व्यक्त नहीं करेगा । सोचने–विचारने, चिन्तन करने की पूर्ण रूप से स्वतंत्रता हो सकती है, लेकिन उन विचारों को अभिव्यक्ति करने की स्वतंत्रता निश्चित रूप से कुछ सीमाओं से बंधी हुई है ।
यदि प्रत्येक व्यक्ति को जो भी वह सोचता है अथवा अनुभव करता है उसे कहने, अभिव्यक्ति करने तथा छापने की स्वतंत्रता दे दी जाए तो संसार भर में स्पष्टतः अराजकता फैल जाएगी । ईश्वर, धर्म तथा धार्मिक व्याख्याएं, धार्मिक मत तथा व्यक्तिगत आत्म–सम्मान ऐसे पवित्र विषय हैं जो कि आलोचना के दायरे से बाहर है ।
वाद–विवाद की स्वतंत्रता को स्पष्ट रूप से गाली–गलौच की स्वतंत्रता में परिणत होने की आज्ञा नहीं दी जा सकती । प्रत्येक देश धर्म निन्दा, धर्म विरूद्ध विचार, ईश्वर निन्दा तथा व्यक्तिगत मानहानि, अपमानजनक लेख को दंडित मानता है ।
प्रेस की स्वतंत्रता एक पवित्र विशेषाधिकार है लेकिन इसका सुचारू रूप से उपयोग करने के लिए बड़े धैर्य और व्यवहारकुशलता की आवश्यकता है । मानव सामान्य रूप से तीव्र मनोभावों तथा पक्षपातपूर्ण पूर्वाग्रहों के द्वारा प्रेरित तथा निर्देशित होता है इस कारण समाचारपत्र लोकमत की संरचना करने में इन त्रुटियों से स्वतंत्र नहीं हैं ।
सामान्यतः समाचारपत्र राजनैतिक दलों से संबंधित होते हैं अथवा विशाल व्यवसायिक संगठनों के द्वारा निर्देशित अथवा इनके स्वामित्वाधीन होते है तथा अन्य स्वार्थी हितों से संचालित होते हैं । समाचारपत्रों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह समाचारों, विचारों तथा अन्य विषयों को दल की नीतियों के अनुरूप अथवा उन व्यक्तियों के हितों के अनुरूप, जिनके वे अधीन है, तोड़–मरोड़ कर प्रकाशित करें । दलों तथा स्वार्थी गुटों की इस वकालत में अन्य बड़े संकट संशय निहित होते हैं । इसके कारण अस्वस्थ आलोचनाएं व संघर्षो की परंपरा विकसित हो जाती है । सत्यता को विभिन्न प्रकार से तोड़–मरोड़ कर पेश किया जाता है तथा निकृष्ट कारणों को सद्‌कारणों के परिधान में प्रस्तुत किया जाता है ।
प्रेस की स्वतंत्रता भी अन्य स्वतंत्रताओं की भांति एक औपचारिक सीमा में बंधी रहती है । अन्य सीमाएँ, सरकार की पक्षपातपूर्ण निन्दा से तथा अश्लील, असंयमित, अपमानजनक लेखों को छापने से अपने आपको अलग रखना तथा इनका बहिष्कार करना है । प्रमुख उद्देश्य यह है कि समाचारों की स्वतंत्रता की हम रक्षा करें तथा निष्पक्ष रूप से जनता तक सभी खबर पहुँचाए ।
प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में स्वतंत्र प्रेस को एक पावन उत्तरदायित्व निभाना होता है । प्रजातंत्र से तात्पर्य जनता के लिए, जनता द्वारा निर्मित, जनता की सरकार है । प्रजातंत्र में जनता को अपनी सरकार चुनने का अधिकार होता है । चुनाव द्वारा जनता अपने प्रतिनिधियों का चयन करती है । चुनाव प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निर्भर करते है ।
स्वतंत्र प्रेस की अनुपस्थिति से शासन में विरोधी दल की भूमिका कुछ भी शेष नहीं रहेगी, इससे तानाशाही को बढ़ावा मिलेगा । स्वतंत्र प्रेस भ्रष्टाचार और सत्ताधारियों द्वारा सत्ता के गलत प्रयोग पर नियंत्रण रखती है । स्वतंत्र प्रेस का मुख्य दायित्व जनता के अधिकारों की रक्षा है ।
जनता के अधिकारों तथा स्वतंत्रता के हनन के किसी भी प्रयत्न के विरुद्ध अपनी शक्तिशाली आवाज बुलन्द करके समाचारपत्र जनसाधारण को प्रेरित करते है और सजग बनाते हैं । प्रेस सरकार, विरोधी दल और भ्रष्ट अधिकारियों के जनहित विरोधी कार्यो का भंडाफोड़ करती है । इस प्रकार यह देश में स्वच्छ नैतिक वातावरण तैयार करने की ओर सदैव प्रयत्नशील रहती है ।
देश में सही दृष्टिकोण उत्पन्न करने और राष्ट्रीय एकता के संबंध में स्वतंत्र प्रेस का योगदान बहुत अधिक होता है । इससे बंधुत्व और औद्योगिक शांति को नई राहें मिलती हैं । लेकिन सस्ती और भावनाओं पर आधारित पत्रकारिता राष्ट्रहित को हानि पहुँचाती है । इससे देश में वर्ग–संघर्ष और साम्प्रदायिक झगड़े हो सकते हैं । इसलिए प्रेस पर कुछ नियंत्रण की आवश्यकता महसूस की गई है, ताकि यह देश और मानव कल्याण में बाधक न बने । महात्मा गाँधी के विचार में प्रेस पर थोड़ा बहुत नियंत्रण आवश्यक है । उनके शब्दों में “क्योंकि प्रेस की प्रभाव क्षमता अद्‌भुत होती है, इसलिए यह अनियंत्रित नहीं होनी चाहिए । जैसे नदी में आने वाला अनियंत्रित पानी आस पास के क्षेत्र और फसल को नष्ट कर देता है उसी प्रकार अनियंत्रित कलम भी विनाश उत्पन्न कर सकती है ।
सुव्यवस्थित रूप से लगाया गया नियंत्रण प्रभावकारी और शुभ परिणामदायक सिद्ध हो सकता है ।” प्रेस को स्वच्छ विचारों के प्रचार तक ही सीमित रहना चाहिए । प्रजातंत्र में प्रेस सदैव सद्‌भावनाओं सद्‌विचारों द्वारा संचालित होना चाहिए । पिछले कुछ वर्षो से प्रेस समसामयिक और ज्वलंत विषयों पर जो दृष्टिकोण अपना रही है, वह प्रशंसनीय है । भारतीय प्रेस परिषद् इस दिशा में सराहनीय प्रयास कर रही है । स्वतंत्र प्रेस का एक अन्य दायित्व प्रकाशित खबर या सूचना के पीछे की सच्चाई से अवगत कराना और विश्व की घटनाओं के संबंध में निष्पक्ष और तटस्थ विचार अभिव्यक्त करना है । प्रजातंत्र में जनमत को तैयार करने के लिए इस बात की बहुत आवश्यकता होती है । इस प्रकार प्रजातंत्र में स्वतंत्र प्रेस की सशक्त भूमिका होती है
मीडिया, प्रेस का ही और विस्तारित स्वरूप है इसलिए हम मीडिया की आजÞादी को प्रेस की आजाÞदी के समरूप मान सकते हैं । मीडिया की स्वतंत्रता हमेशा विवाद का विषय रहा है बावजूद इसके यह तो कहना ही होगा कि मीडिया पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगाना अनुचित है ।

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