Sun. Jul 21st, 2019

किसान : मतदाता या अन्नदाता ?- चन्दा चौधरी

चन्दा चौधरी,संघीय सांसद तथा राजपा नेपाल की नेतृ

हिमालिनी, अंक मई 2019 । पिछले समय प्रदेश २ के बारा जिले मे आए टोर्नाडो तूफान ने कहर ढाते हुवे २८ लोगो की जान ले ली । वैसे ही २ हजार ६ सौ सैतिस लोगों के घरो मे क्षति पहुँची थी । मेरे स्मरण मे तूफान के कारण इतने तादाद पे मानवीय क्षति पहली बार दुःख के साथ देखने को मिला है । लोगो ने मानवता दिखाते हुए निजी तौर पर सहायता के लिए तत्परता दिखाई तथा अपने मानव होने का धर्म भी निर्वाह किया था । विभिन्न निकायो से आर्थिक एवं आवश्यक सहयोग किया गया । बेघर लोगो की अवस्था अभी भी नाजुक ही है । वैसे सरकार ने उन लोगो के लिए आवास निर्माण के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए तत्पर है । परंतु हमारे देश मे प्राकृतिक प्रकोप से लड़ने के लिए एवं उसके बाद किए जाने वाली आवश्यक व्यवस्थापन के लिए पूर्व तैयारी की कमी सदैव रही है । घटना पश्चात व्यवस्थापन के कार्यो मे ढीलेपन, भ्रष्टाचार, घुसखोरी भी आम बात हो चुकी है । जिसको प्रमाणित करता है पिछले भूकम्प के बाद पीडि़तों की अवस्था । कितने मौनसून बीत गए परंतु भूकम्प पीडि़तो को अभी भी खुले आकाश और टेन्ट के सहारे जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है ।

इन मुद्दों के बीच एक अहम मुद्दा है जो सदैव अप्रकटित रह जाता है । वह है किसानों का मुद्दा । बाढ़ हो या तूफान, सबसे ज्यादा मार में अगर कोई पड़ता है तो वह है किसान । हम कृषि प्रधान देश की वकालत करते हैं परंतु कृषक की चर्चा क्यों नही कर पाते हंै ? क्या यह सवाल अहम नहीं है ?

बारा में आए तूफान के कारण वहाँ की बाली पूर्णतः नष्ट हो गई है । वह किसान जो पूर्णतया कृषि पर आधारित थे उनकी अवस्था कैसा है ? क्या उनको नुकसान का मुआवजा दिया गया सरकार की तरफ से ? किसान दिनभर खेत मे पसीना बहाते हैं । मेहनत कर के अन्न उपजाते हैं, अपना घर चलाने के लिए और दुनिया को अन्न प्रदान करने के लिए । हम कल्पना कर सकते हैं कि अगर देश मे किसान अन्न उपजाना छोड़ दे तो क्या होगा ? दुनिया के किसान अगर अन्न उपजाना छोड़ दे तो क्या होगा ? क्या इस जीवित ग्रह के लोग भूखे नहीं मर जाएंगे ? किसानो की इस अहमियत को भला कैसे कोई अनदेखा कर सकता है ? बारा टोर्नाडो के बाद हुए किसानों के अन्न क्षति को सरकार की ओर से विशेष राहत की घोषणा नही की गयी है ।

किसानो पर ऐसी ही प्रकृति का कहर अगर भारत मे ढा जाय तो वहाँ की राजनीति मे तरंग पैदा हो जाता है । किसान का मुद्दा भारत मे सदैव अहमियत रखता है । किसान को पहुँचने वाली कोई भी क्षति हो उसका उचित मूल्याङकन कर उन्हे मुआबजा दिया जाता है । भारत मे सन् २०१८ मे ६३९ किसानों ने आत्महत्या की थी । आत्महत्या एक डरावना दुख है परंतु ऐसी घटना इस बात को भी दर्साती है कि भारत जैसे देश मे कृषि की अहमियत कितनी है । वैसे ग्लोबल स्तर पर देखा जाय तो श्रीलंका, अमेरिका, क्यानाडा और अष्ट्रेलिया जैसे देशों मे भी किसान का मुद्दा उच्चतम स्तर पर ही रहता है । इन देशो मे भी किसान आत्महत्या करते हैं । शायद नेपाल सरकार इसी इन्तजार मे होगी कि नेपाल मे अभी किसान आत्म हत्या नही कर रहे हैं तो किसान को अहमियत क्यों दिया जाय ? बहुत ही चिन्ता और खेद जनक अवस्था है नेपाली किसानो की ।

नेपाल के प्रदेश नं २ की आर्थिक सम्भावना की बात की जाती है तो कृषि को सम्भावना से परिपूर्ण बताया जाता है । परंतु कृषि में व्याप्त चुनौतियों के बारे में विमर्श नहीं किया जाता है, सरकारी स्तर पर । वैसे पंचसितारा होटल मे किए जाने बाली विमर्शो से कुछ तात्विक असर नही पड़ता है । मधेश में कृषि पहले से धरोहर के रूप में रही है । सन् १९६० के दशक में ही मधेश नेपाल का आर्थिक मेरुदण्ड हो चुका था । मधेश मे कुल ११ मुख्य बाली है जो कि नेपाल के कुल कृषि उत्पादन का ४८ प्रतिशत हिस्सा है । यह कोई सामान्य आँकड़ा नहीं है । अगर सरकार राजनीति से उठकर किसानों के लिए अपनी ईमानदारी नहीं दिखाएगी तो जल्द ही नेपाल को पूर्णरूप में पर निर्भर होना पडेÞगा । किसान को निराश करने का मतलब है अपने जीवन मे प्रयोग होने वाली आक्सीजन रूपी अन्न के बारे मे गंभीर न होना । यह अपने आप मे खेद और चिन्ता जनक, दोनो है ।

मई ३ को लाई गई सरकार की नीति और कार्यक्रम में भी किसानो के लिए कोई भी उपयोगी और आकर्षित करने वाली योजना नहीं देखी गयी है । किसानों के लिए न कोई फसल बीमा है न तो कोई स्पेसल सबसिडी की व्यवस्था ही । इस से भी पता चलता है कि हम किसानो को ले कर कितने चिन्तीत हैं । २१८ बुंदे और ४६ पृष्ठ के नीति और कार्यक्रम वाली दस्तावेज में सरकार ने अपने पिछले उपलब्धियों को गिनाया है । जिसमें कहा गया है कि आंधी तूफान के कारण हुए पीडि़तों को राहत दी गयी । मानो सरकार ने अपने करदाताओं पर कोई एहसान किया हो । परंतु प्राकृतिक विपदा के कारण तड़प रहे किसानो के लिए क्या किया, उल्लेख नहीं है । भारत और वियतनाम का चावल का स्वाद चखने बाली सरकार अब विश्व के दूसरे देशो सें सारा खाद्यान सामग्री आयात करने की योजना में तो नही है ? कृषि को जिस तरह नारों में समेटने में सरकार लगी है उससे तो यही पता चलता है ।

सवाल उठता है कि क्या किसान को भी सिर्फ मतदाता के रूप मे देखा जा रहा है ? यह भूलना बिल्कुल गलत होगा कि किसान हमारे अन्नदाता हैं । बारा जिला में टोर्नाडो तूफान के कारण क्षति का सामना कर रहे किसानो को यथा सम्भव क्षतिपुर्ति मुहैया कराना चाहिए । केन्द्रीय सरकार का तो सदियाें से सौतेला ब्यवहार रहा ही है मोफसल के लिए । परंतु अब देश मे स्थानीय और प्रादेशिक सरकारे भी है । इन बदलती व्यवस्थाओ में भी अगर कृषि को सार्थक मुद्दा नहीं बनाया गया और किसान का सम्मान नही हुआ तो देश प्रगति के राह पर कभी भी आगे नही बढ़ पाएगी । अन्त मे, किसान महज मतदाता नहीं हैं । इस सच्चाई को सदैब अपने जहन मे रखना होगा हमें ।

(लेखकः संघीय सांसद तथा राजपा नेपाल की नेतृ हैं ।)

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