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मधेशी के नसीब में ही लिखा है कि वो नेपाली नहीं है : युग पाठक

दिमाग में पहले से ही यह मानसिकता बनी हुई है कि मधेशी चेहरे नेपाली नहीं भारतीय हैं


सिक्किमीकरण और लेन्डुप दोर्जे को गाली करते हुए कितनी जवानी बीत गई, जिन्दगी बीत गई । सिक्किम का तथ्य परिवर्तन हो चुका । वहाँ सिक्किमीकरण नहीं, नेपालीकरण हुआ ।

विडम्बना यही है कि मधेशी के नसीब में ही यह लिखा हुआ है कि वो नेपाली नही. हैं और पहाडी चेहरे वाले चाहे कहीं के हों वो नसीब में नेपाली लिखवाकर ही लाए हैं



हिमालिनी, अंक मई 2019 | नेपाल में नागरिकता की समस्या है परन्तु यह समस्या किसकी तरफ से यह प्रशन रोचक है । किसके लिए समस्या है ? शासकों की समस्या है या जिन्हें नागरिकता नहीं मिल रही है उस आम जनता की समस्या है ?

जिस समय से नेपाल में नागरिकता देने की बात उठी है उसी समय से यह मुद्दा के रूप में भी विकसित होता चला गया है । नागरिकता बाँटने का काम २००७ साल से शुरु हुआ जिसकी कार्यवाही अच्छी तरह से ०२०–०२२ से हुआ है । हमारे पास नागरिकता के विषय में बहुत पुराना इतिहास नहीं है । नागरिकता का प्रमाण देने की बात रुलिंग क्लास की बात है । रुलिंग क्लास खुद शासन करने के लिए तुम मेरे नागरिक हो यह अभिव्यक्ति देता है । पारिजात ने भी नागरिकता लेने की कोशिश की थी । लम्बे समय तक नेपाल में रहकर उन्होंने सिर्फ साहित्य नहीं लिखा था बल्कि नेपाल की राजनीतिक, सांस्कृतिक आन्दोलन में भी महत्तवपूर्ण भूमिका उनकी थी परन्तु उन्हें नेपाल की नागरिकता नहीं मिली । तेन्जिंग को भी नागरिकता नहीं मिली क्योंकि वो भारतीय नागरिक थे ।

नागरिकता की जो बात सामने आ रही है मुझे उसमें ऐतिहासिक कारण दिखता है । खासकर यह शासकों द्वारा निर्मित एक मिथक पर आधारित है, जो मिथक पृथ्वीनारायण शाह से शुरु होता है । काठमान्डौ कब्जा करने के बाद पृथ्वीनारायण शाह ने पहली बार दरबार खड़ा किया । उस समय से लेकर आज तक यह डर है कि “कहीं देश को कोई और ना खा जाय ।”यह डर २००७ से लेकर आज तक और भी जटिल बनता जा रहा है । पंचायत काल में यह और भी जटिल बनता चला गया । उसके बाद नेहरु डक्ट्रिन, सिक्किमीकरण की बात शुरु हो गई । उसके बाद सिक्किमीकरण तक ही यह डर कायम नहीं रहा । फिजी में पूर्वभारतीयों की संख्या ज्यादा होने के कारण वहाँ हुए चुनाव से वो फिजी खा जाएँगे का हौवा शुरु हो गया । वही डिस्कोर्स नेपाल में आया ।

एक महिला वीरगन्ज जिला प्रशासन के आगे खड़ी मधेशी चेहरे वाले को दिखाते हुए एक दुकानदार से कहती है कि देखिए ये सभी भारतीय हैं और नेपाल की नागरिकता लेने के लिए लाइन में खड़े हैं । दुकानदार कहता है कि ये सभी नेपाली बोलना नहीं जानतेहै और न ही लिखना जानते हैं इसलिए ये सभी भारतीय हैं और नेपाली नागरिकता लेने के लिए आए हुए हैं । वह विडीयो भाइरल हो जाता है । क्यों भाइरल होता है क्योंकि दिमाग में पहले से ही यह मानसिकता बनी हुई है कि मधेशी चेहरे नेपाली नहीं भारतीय हैं । प्रमाणपत्र और कानून से भी पहले इस मानसिकता का निर्माण हो चुका है । इस मानसिकता के लोग यह मानते हैं कि जो मेरे जैसे हैं और मुझ जैसी नेपाली बोलते हैं वही नेपाली हैं । यह मानसिकता पृथ्वीनारायण शाह द्वारा जीते जाने के बाद से आज तक विस्तारित होता जा रहा है । इतना ही नहीं शासक भी इसे अपने अनुसार विस्तृत ही करते जा रहे हैं ।

एक गुरुंग जाति का व्यक्ति झापा में नेपाली नागरिकता लेने की कोशिश करता है जो भारतीय है । यह पता लगने मे दिक्कत हुई क्योंकि वह मधेशी चेहरे वाला नहीं था अगर होता तो आसानी से पता चल जाता । यह समाचार काठमान्डौ पोस्ट में आया उस समाचार में फोटो वह रखा गया था जिसमें मधेशी लाइन में लगे हुए थे नागरिकता लेने के लिए यहाँ सम्पादक के दिमाग में भी यही था कि यह फ्राड और कहीं नहीं मधेश में हुआ है । विडम्बना यही है कि मधेशी के नसीब में ही यह लिखा हुआ है कि वो नेपाली नही. हैं और पहाडी चेहरे वाले चाहे कहीं के हों वो नसीब में नेपाली लिखवाकर ही लाए हैं ।

पञ्चायत काल में हर्क गुरुङ का एक प्रतिवेदन आया था । उस प्रतिवेदन में कहा गया था कि सभी मधेसी भारतीय आप्रवासी हैं । २०१५ साल से पहले मधेश में पहाड़ी नहीं जाते थे । वे वहाँ जाने से डरते थे । पृथ्वीनारायण शाह से पहले ‘रेभिन्यु एल्डिङ एरिया’ (राजस्व आय होने वाला क्षेत्र) मधेस को कहा जाता था । उस समय कौन था वहाँ ? उस समय हाथी गैँडा धान उत्पादन कर के नहीं भेजते थे । उन हाथियों को भारत ने ट्रेनिंग देकर तो नहीं भेजा होगा ।

हम में जिस विचार ने घर कर लिया है उसी के कारण हम आज तक मधेशी को नेपाली नहीं मान रहे है. । मैंने जब मधेश के विषय में अनुसन्धान किया तो यह जाना कि मधेश में काफी संख्या में जमीन लुटने, भूमिसुधार के नाम पर जमीन हथियाना, जमीन से बेदखल करने का काम २००७ साल से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तरीके से सम्पन्न हुआ । वहीं का पैसा लाकर राणा के लोगों ने दरबार बनाया । भारत में भी बंगला बनाया । राष्ट्रीयता का प्रशन उनसे है जिसने मेहनत की । नागरिकता और राष्ट्रीयता का प्रश्न किसकी और से ज्यादा देखना चाहते है ? शासक की ओर से देखना चाहते हैं ? सभी शासक के चेहरे एक जैसे हैं । आज तक हमारे दिमाग में यह सोच भर दी गई है या यह आइडिया डाल दिया गया है कि भारत हमें खा गया है, या खा रहा है
सिक्किमीकरण और लेन्डुप दोर्जे को गाली करते हुए कितनी जवानी बीत गई, जिन्दगी बीत गई । सिक्किम का तथ्य परिवर्तन हो चुका । वहाँ सिक्किमीकरण नहीं, नेपालीकरण हुआ ।

सिक्किम में लेप्चा कोई नहीं है । सभी नेपाली मूल के लोग हैं । मन्त्री, मुख्य मन्त्री से लेकर पुलिस के अधिकारी भी नेपाली हैं । वहाँ सभी नेपालीकरण हो चुका है । दार्जिलिंग में भी नेपालीकरण हो चुका है । लेप्चा कहाँ हैं वहाँ ? क्या वो लेप्चा की जगह नहीं है ? हम लेन्डुप दोर्जे को गाली देते आ रहे हैं । क्या यही फिजीकरण नही है ? पर हम विगत के तथ्य में ही जी रहे हैं । विगत के डर से हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं । वही डर आज इस रूप में सामने आ रहा है कि अगर महिलाओं को नागरिकता दी गई तो वो विदेशियों को लेकर आएगी ।

क्या आपको लगता है कि बेटे बेटियाँ एक हैं ? क्या आपको लगता है कि महिला और पुरुष कैसे एक हो सकते हैं ? नागरिकता में वंशज कहने के साथ ही पुरुष का ही सिर्फ होना चाहिए ? पिता ही चाहिए ? पिता नही हो तो ? हमारे सभी नेता ‘डेड आइडिया’ लेकर चल रहे हैं । राष्ट्रीयता का जो आइडिया हमारे अन्दर चल रहा है वह ‘डेड आइडिया’ है । नेपाल को भारत खा रहा है तो, कैसे खा रहा है यह देखना चाहिए । क्या बड़ी मछली छोटी को नहीं खाती ? खाती है पर वो नहीं खाए इसके लिए हमने क्या प्रयास किया है ?

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हमारी जमीन बँजर हो रही है, हमारे जर्नेल, सचिव अमेरिका और बेलायत की नागरिकता ले रहे हैं हम क्या कर रहे है. ? वो नेपाली हैं या विदेशी ? सोचने का विषय तो यह है । युवा विदेश जा रहे हैं जमीन बँजर हो रही है । पचास साठ प्रतिशत जमीन बँजर हो चुकी है । साग लेकर आएँ भारत से,सब्जी भारत से लाएँ, नाका खुला है और समस्या भी हो रही है क्योंकि हमारे पास शक्ति नहीं है । हमारे नेताओं के पास जो अब वृद्ध हो चुके हैं उनके पास कोई धारणा नहीं है । कैसे हमारे किसान मजबूत हों ? कैसे हमारी खेती अच्छी हो उपज अच्छी हो ? उद्योग कैसे शुरु हो इन सबके लिए कोई नीति नियम या विचार इनके पास नहीं है । यह इन्फ्राइस्ट्रक्चर सात साल से शूरु है कब खत्म होगा ? इन्फ्राइन्स्ट्रक्चर के नाम पर काठममाडौँ में सिर्फ धूल है । कबत क यह मरी हुई चीजें हम पर शासन करेंगी ? यही कारण है कि ये महिला पुरुष को समान नहीं मान सकते ?
कमल थापा २० लाख लोग नेपाली नागरिकता ले चुके हैं यह ट्विट करते हैं । वह २० लाख कौन है ? कहाँ के हैं ? सही बात तो सामने आनी ही चाहिए । आखिर वो कहना क्या चाहते हैं ? क्या सभी मधेशी विदेशी हैं? हमारी सोच में समस्या है । हम जिस जमीन पर हैं और जहाँ दरबारी हाकिम रह रहे हैं वह सब मधेशी के पसीने से बनी जमीन है । उसको लूटने वाले और उसकी सम्पत्ति लेकर विदेश और भारत तक जा चुके और और यह आज भी जारी है ।
अराष्ट्रवादी कौन हैं ? नेपाल को भारत अगर खा जाएगा, तो ऐसा नहीं हो इसके लिए हम क्या कर रहे हैं ? नागरिकता के नाम में महिलाओं और मधेशियों का सिर्फ तिरस्कृत करना ही हमारा काम है ? हम विगत में जी रहे हैं । हमें विगत से वर्तमान में आना कठिन लग रहा है इसलिए भविष्य तो हम देख ही नहीं रहे हैं ।

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