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नेपाल–भारत सम्बन्ध : रिश्तों को पुनर्भाषित करने की आवश्यकता : डा. श्वेता दीप्ति

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हिमालिनी अंक जुन २०१९ |(सम्पादकीय) मित्र राष्ट्र भारत में एक बार फिर से भाजपा की सरकार बन चुकी है । प्रचंड बहुमत के साथ भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी ने अपनी बागडोर संभाल ली है । इसके साथ ही विदेशी राजनीति में मोदी सरकार की विदेश नीति पर चर्चा भी जोर शोर से चल रही है । सभी जानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मामलों से निपटना आसान नहीं होता है । कई बार किन्हीं दो देशों से आपके संबंध इस बात पर निर्भर करते हैं कि उनके आपस में संबंध कैसे हैं ? विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी सरकार ने चुनाव जीतने के बाद ही काम करना शुरू कर दिया है । भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने मालदीव और श्रीलंका की यात्रा की । इसके साथ ही विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी पिछले हफÞ्ते भूटान का दौरा किया ।

मोदी ने पहली विदेश यात्रा के लिए मालदीव और श्रीलंका को चुनकर ये साबित कर दिया है कि वो अपनी ‘नेबरहुड फÞर्स्ट पालिसी’ यानी पड़ोसी देशों को विदेश नीति में तरजीह देने की नीति के प्रति समर्पित हैं । खÞास बात ये है कि मोदी उस समय इस नीति के प्रति अपने समर्पण को दर्शा रहे हैं जब चीन ने दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में अपने दखÞल को गंभीर रूप से बढ़ाया है । मोदी की विदेश नीति एक ऐसे वक्त में आकार ले रही है जब अमरीका और चीन के बीच बढ़ता हुआ तनाव विश्व व्यवस्था में एक असंतुलन पैदा कर रहा है । इस विषय पर नेपाल की राजनीति में भी सरगर्मी है खास कर भारत के विदेश मंत्री के रूप में पूर्व विदेश सचिव एस. जयशंकर के बनने पर क्योंकि संविधान बनने के क्रम में जो कड़वाहट पूर्व विदेश सचिव के रूप में एस. जयशंकर के काठमान्डू आने पर पैदा हुई थी वो सर्वज्ञात है ।

फिर भी नेपाल यह उम्मीद कर रहा है कि नेपाल भारत के सम्बन्धों पर पूर्व की कड़वाहटों का असर ना पड़े । वैसे भारत विदेश नीति के तहत एक नई शुरुआत कर चुका है । मोदी ने पिछले महीने अपने शपथ ग्रहण समारोह में बिम्सटेक (बे ऑफÞ बंगाल इनिशिएटिव मल्टी–सेक्टोरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन) के सदस्य देशों को बुलाया था । इस संगठन में नेपाल के साथ ही बांग्लादेश, भारत, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड, और भूटान शामिल हैं । बीते कुछ सालों से भारत सरकार अपनी विदेश नीति में इस संगठन को प्रमुखता दे रही है ।
साल २०१४ में नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क संगठन के देशों को आमंत्रित किया था । ऐसे में मोदी सरकार का सार्क संगठन से हटकर बिम्सटेक की ओर ध्यान देना ये बताता है कि नरेंद्र मोदी की सरकार फिलहाल पाकिस्तान को किनारे रख कर चल रही है ।
बंगाल की खाड़ी भारत को दक्षिण एशियाई देश जैसे बांग्लादेश, भूटान, नेपाल और श्रीलंका के साथ ही नहीं जोड़ती है. ये म्यांमार और थाइलैंड के साथ भी भारत को जुड़ने का मौकÞा देती है । इस तरह मोदी ने भारत की रणनीतिक परिधि को नई शक्ल देने और भारत के पड़ोस को ज्यादा अनुकूल शर्तों पर परिभाषित करने की कोशिश की है ।
प्रधानमंत्री मोदी अपने पहले कार्यकाल में लंबे समय तक तर्क देते रहे कि वैश्विक तंत्र में भारत ने सक्रिय रूप से दुनिया के नियम बनाने वाली ताकÞत की जगह एक संतुलन बनाने वाली शक्ति के रूप में काम किया है ।  लेकिन इस चुनाव में उनको जो बहुमत मिला है इसके बाद वह भारत की विदेश नीति में मूल बदलाव कर सकते हैं ।

बावजूद इसके हम यह कह सकते हैं कि  वर्ष २०१८ नेपाल–भारत रिश्तों के लिए बेहद अहम साल रहा । इस साल दोनों देशों के नेताओं की यात्राओं ने हाल के कुछ वर्षों में पनपे आपसी अविश्वास को खत्म करने में मदद की । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत नेपाल को कामयाबी की चोटियों पर पहुंचाने के लिए शेरपा बनने के लिए तैयार हैं । नेपाल का भारत के लिए सामरिक महत्व बहुत अधिक है ऐसे में दोनों देशों के बीच आपसी सौहार्द बहुत अहम है । नेपाल यह उम्मीद करता है कि रिश्तों में आई यह गर्मी आगामी समय में भी निरन्तरता हासिल करे और आपसी सम्बन्धों को एक नई ऊँचाई दे ।

राजनीतिक स्तर के साथ ही, सामाजिक स्तर पर भी दोनों देशों के बीच का आवागमन सहज हो, नेपाली नागरिकों को भारत में होने वाली असुविधाओं पर भारत सरकार ध्यान दें एक स्पष्ट नीति बनाएँ और इसकी पुनव्र्याख्या करे । सदियों के इस रिश्ते को सुदृढ करने के लिए कई मजबूत कदम उठाने की आवश्यकता है ।

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