पत्रकारिता में आदिवासी जनजाति महिला पत्रकार, अवस्था और चुनौती : मीरा राजभण्डारी अमात्य
हिमालिनी अंक जुन २०१९ |सन् १८०० से लेकर सन् १९०० तक अमेरिका में महिला पत्रकारों को सिर्फ फैशन और नए नए भोजन बनाने के विषय तक ही सीमित रखा गया था । जबकि सामाजिक विषय वस्तु पर लिखने तथा समाचार संकलन करने पर प्रतिबन्ध लगाया गया था । परन्तु द्वितीय विश्वयुद्ध तक पहुंचने पर म्यारी मार्विन ब्रेकिन रिज तथा मार्गरेट बुर्के ह्वाईट जैसी साहसी महिला पत्रकारों का पदार्पण हुआ । जिन्होंने दूसरे विश्वयुद्ध के समय में युद्ध क्षेत्र में जाकर फोटो पत्रकारिता द्वारा संसार को सूचना पड़ोसी । भारत की विद्यामुन्सी प्रथम महिला पत्रकार थी । जिसने व्लिज साप्ताहिक मार्फत बहुचर्चित क्यानेडाली पाइलटों द्वारा कलकत्ता में हुई सोना तस्करी तथा चिनाखुरी स्थित कोईला खान में हुई प्राकृतिक प्रकोप में मरे हुये कामदारों के बारे में खोजमूलक रिपोर्ट प्रस्तुत की । और उन्होंने विश्व के समक्ष यह उजागर किया कि खोज पत्रकारिता में भी महिला उस समय से ही सक्षम रही है ।
पत्रकारिता के इतिहास में नेपाल का पदार्पण विक्रम संवत १९५५ में हुआ । सुधासागर पत्रिका से शुरु होकर नेपाली पत्रकारिता को प्रजातंत्र के पूर्ण बहाली तक गोरखापत्र ने साप्ताहिक तथा दैनिक निरन्तरता दिया । इस बीच में शारदा दैनिक के साथ ही अन्य विभिन्न पत्रिका निकलने के बाबजूद भी पत्रकारिता में महिला की भूमिका कुछ खास नहीं रही । परन्तु २००७ साल के क्रान्ति में महिलाएँ भी सहभागी हुई थी जिससे महिला नेतृ के पहल में ही उत्साह और उमंग के रूप में वि. सं । २००८ में प्रथम महिला पत्रिका ( महिला ) मासिक प्रकाशित हुयी । महिलाओं ने पहली बार मतदान का अधिकार प्राप्त होने की खुशी में यह महिला पत्रिका साधना प्रधान के संपादकत्व में प्रकाशित किया जो कालान्तर में बन्द हो गया । जो भी हो पर नेपाली पत्रकारिता के इतिहास में महिला पत्रकारों का जन्म महिला मासिक से ही शुरु हुई । जिसने कालान्तर में महिलाओं में इस क्षेत्र को पेशा बनाने के लिये ऐतिहासिक प्रेरणा दी ।
परिवार समाज तथा राष्ट्र विकास के लिये महिला विकास अनिवार्य है । वैदिक काल में भी महिला विकास के लिये नीति तथा व्यवहारों का निर्माण हुआ था । वर्तमान विश्व में विश्व शांति तथा विकास के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ ने महिला विकास को आधार स्तम्भ माना है । मानव विकास के लिये महिला विकास अपरिहार्य पक्ष है तो महिला विकास के लिये एक पक्षधर के रूप में महिला पत्रकार के अस्तित्व को स्वीकार करना आवश्यक है । क्योंकि विकास के आधारभूत पक्ष के रूप में शिक्षा का महत्व है तो महिला विकास के लिये आवश्यक शिक्षा तथा सूचना के संबंध में प्रत्याभुति दिलाने के लिये महिला पत्रकारों की भूमिका सहजकर्ता के रूप में है । परन्तु जनसंख्या के हिसाब से ५१ प्रतिशत स्थान में महिला वर्ग की उपस्थिति राज्य के अन्य निकायों की तरह महिला पत्रकारिता में भी अत्यन्त न्यून है । और इसमें तुलनात्मक रूप से आदिवासी तथा जनजाति महिला पत्रकार की संख्या तो और भी कम है ।
नेपाल में आदिवासी जनजाति तथा आदिवासी जनजाति महिला पत्रकार
विश्व में आदिवासी जनजाति समुदाय की संख्या ३७ करोड़ है । यह जनसंख्या विश्व के कुल जनसंख्या का ४.४ प्रतिशत है । नेपाल में कुल आदिवासी जनजाति की जनसंख्या ३७.२ प्रतिशत है जिसमें पुरुषों की संख्या ५२.२ प्रतिशत और महिलाओं की संख्या ३६.२६ प्रतिशत है । आदिवासी जनजातियों के समुदाय में जमा ५९ समुदाय है जिसमें और १६ समुदायों को समावेश करने की पहल हो रही है । परन्तु सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक तथा शैक्षिक क्षेत्र में पीछे होने के कारण इन समुदायों की उपस्थिति राज्यसंयन्त्र के नीति निर्णय में अत्यन्त न्यून है । उसी प्रकार राज्य के चतुर्थ अंग पत्रकारिता में भी इस समुदाय की उपस्थिति नहीं के बराबर है । नेपाल पत्रकार महासंघ के श्रोत अनुसार नेपाल में ९ हजार ८ सौ ५५ पत्रकार में जमा १ हजार पांच सौ आदिवासी जनजाति पत्रकार हैं । जिसमें महिलाओं की संख्या तो और ही कम सिर्फ २७७ है । इसी प्रकार नेपाल आदिवासी जनजाति पत्रकार महासंघ के श्रोत अनुसार आदिवासी जनजाति पुरुष पत्रकार की संख्या १००७ है और महिला पत्रकार की संख्या ४८३ है । आदिवासी जनजाति पत्रकार महासंघ की यह संख्या प्रतिशत के हिसाब से ३२ प्रतिशत महिला पत्रारों की संख्या है जिसकी सराहना करनी चाहिये । परन्तु नेपाल में पत्रकारों राष्ट्रीय छाता संगठन पत्रकार महासंघ के वर्तमान कार्य समिति में आदिवासी जनजाति महिला पत्रकार उपस्थित नहीं है । दूसरे तरफ कुल आदिवासी जनजाति महिला पत्रकारों की उपस्थिति न्यून होने के कारण भविष्य में कार्य समिति के साथ ही संचार संबद्ध राज्य संयन्त्र निर्णायक तह में भी आदिवासी जनजाति महिला पत्रकारों की उपस्थिति न्यून रहने की संभावना है ।
अखण्ड शान्ति तथा आदिवासी जनजाति महिला पत्रकार की भूमिका
सूचना ऐसी शक्ति है जो व्यक्ति के अन्तर्मन और भावना को सचेत तथा परिवर्तन करती है । सूचना की विशेषता यह है कि मानव अधिकार की आधारभूत मान्यता लोकतांत्रिक अभ्यास के लिये कार्यान्वयन कराती है । अखण्ड शांति के बिना लोकतन्त्र संस्थागत नहीं हो सकता है । सूचना के संवाहक में पत्रकारिता की भूमिका महत्वपूर्ण है । अखण्ड शांति के साथ–साथ मानव अधिकार के अवयवों तथा आदिवासी जनजाति के हक अधिकार प्रत्याभूति के लिये महिला पत्रकार का भूमिका अर्थपूर्ण है । क्योंकि आदिवासी, जनजाति, महिला तथा बालबालिकाएं समाज के सबसे पीडि़त वर्ग में आते हैं । इसलिये उनलोगों को विशेष संरक्षण की आवश्यक्ता है ।
इन पीडि़तों के लिये अर्थात आवाजविहीन का आवाज बनकर समाज और राष्ट्र को सही दिशा निर्देशित करना चाहिये । इस अर्थ में महिला आदिवासी जनजाति पत्रकारों की उपस्थिति तथा प्रस्तुति अत्यन्त आवश्यक है । क्योंकि मानवीय संवेग तथा मनोविज्ञान अनुरूप महिला अपने ऊपर अन्याय तथा हिंसा एक महिला को बताने में सहज महसूस करती है । इसमें भी आदिवासी जनजाति महिलाएँ जो कि निरीह है, आवाजविहीन है उसके लिये आवाज उठाने की आवश्यक्ता है जो कि आदिवासी जनजाति महिला पत्रकार सरकार तथा सरोकार वाला के पास एक पुल का काम कर सकती है ।
वास्तव में परम्परागत रूप में महिलाओं का सामाजिक एवं पारिवारीक शांति में विशेष भूमिका रही है । इसी तथ्य के आधार में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी अखण्ड शान्ति के लिये महिलाओं की आवश्यक्ता को सम्बोधन और कार्यान्वयन किया है । खास करके शान्ति निर्माण के क्षेत्र में किए गए अध्ययनों के निष्कर्ष तथा संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा शान्ति के लिये आवश्यक तीन मुख्य आधार स्तम्भ आर्थिक पुनरुत्थान तथा सामंजस्यता, सामाजिक मेलमिलाप, विकास एवं राजनीतिक वैधता तथा सुरक्षा और सुशासन में महिलाओं की अग्रगामी भूमिका को उजागर किया है । इस अर्थ में राज्य व्यवस्था तथा अन्र्तराष्ट्रीय स्तर में अखण्ड शान्ति स्थापना के लिये महिलाओं के अग्रगामी अस्तित्व को स्वीकार किया है । जिसके प्रारम्भ बिन्दु के रूप में आदिवासी जनजाति महिला के ऊपर होने वाला हिंसा, उनलोगों के अधिकारों का हनन तथा उनलोगों के विकास के बाधक तत्व के विषय में आदिवासी जनजाति महिला पत्रकार राज्य संयन्त्र तथा सरोकार वाला के समक्ष पहुंचा सकती है । दूसरी तरफ नेपाल में विविध भाषिक समुदाय होने के कारण नेपाली भाषा समझने या बोलने बहुत सारी महिलाएँ असमर्थ होती है, उसके साथ आदिवासी जनजाति महिला पत्रकार संवद्ध होकर उनके भावना के आवाज को बुलन्द कर आदिवासी जनजाति महिला पत्रकार एक सहजकर्ता की भूमिका निर्वाह कर सकती है ।
निष्कर्ष
पत्रकारिता में आदिवासी जनजाति महिला का अधिकार एवं मानव अधिकार को प्रत्याभुति दिलाने में विशेष योगदान है । फिर भी आदिवासी जनजाति महिला पत्रकारों की न्युन उपस्थिति के कारण उसके अधिकारों की सचेतना की समस्या है । विशेष रूप से आदिवासी जनजाति महिलाओं की सहभागिता कृषिजन्य उत्पादन, जीविकोपार्जन तथा घरेलु कामों में ही व्यस्त रहने की बाध्यता है । भाषिक समस्या तथा शिक्षा से वंचितिकरण के कारण पत्रकारिता को पेशा के रूप में अपनाने की संख्या बहुत कम है । दूसरा कारण चेतना तथा आर्थिक अभाव भी है जिसके फलस्वरूप महिलायें इस पेशा की तरफ आकर्षित नहीं हो रही है । तसर्थ आदिवासी जनजाति महिला पत्रकारों की संख्या बढ़ाने के लिये सरकार तथा सरोकार वालों की पहल की आवश्यक्ता है । इस क्षेत्र में आकर्षित कराने के लिये आवश्यक सचेतनामूलक कार्यक्रम, तालिम की व्यवस्था तथा आर्थिक अनुदान जैसे विकासमूलक कार्यक्रम की अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन योजना बनाकर उसका कार्यान्वयन करना अपरिहार्य है । इसके प्रभाव से आदिवासी जनजाति महिलाओं को पत्रकारिता के क्षेत्र को व्यवसायिक पेशा बनाने के लिये प्रेरणा मिल सकती है । और आदिवासी जनजाति महिला पत्रकारों की उपस्थिति से ग्रामीण क्षेत्र की कम पढ़ी लिखी महिलाएं अपने अधिकार के प्रति सचेत हो सकती है इसके लिये पत्रकारिता के द्वारा प्रस्तुति तथा वकालती पहल अत्यधिक लाभप्रद हो सकता है । इससे हिंसा रहित समाज की परिकल्पना साकार हो सकती है साथ ही सुशासन के अन्तर्गत विधि की शासन की भी प्रत्याभुति हो सकती है । इससे समाज एवं राष्ट्र के विकास में अत्यधिक योगदान मिल सकता है । विश्व में अखण्ड शांति के लिये पहचान किए गए आधारस्तम्भों का आर्थिक पुनरुत्थान तथा सामंजस्यता के अवयवों को कार्यान्वयन कराने में आदिवासी जनजाति महिला पत्रकारों की भूमिका सकारात्मक परिणाम दे सकती है ।
(राजधानी दैीनक से)
–अनुवादकः अंशु झा

