Mon. Sep 16th, 2019

सभी को छोड़ के खुद पर भरोसा कर लिया मैंने, वह जो मुझमें मरने को था जिंदा कर लिया मैंने

वसीम बरेलवी

हद से बड़ी उड़ान की ख्वाहिश तो यूँ लगा

जैसे कोई परों को कतरता चला गया |

मंज़िल समझ के बैठ गये जिनको चंद लोग

मैं एैसे रास्तों से गुज़रता चला गया ||

 

सभी को छोड़ के खुद पर भरोसा कर लिया मैंने,
वह जो मुझमें मरने को था जिंदा कर लिया मैंने

मुझे उस पार उतर जाने की जल्दी ही कुछ ऐसी थी की
जो कश्ती मिली उस पर भरोसा कर लिया मैंने ।।

 

ये कैसा ख्वाब है आँखों का हिस्सा क्यों नहीं होता
दिये हम भी जलाते है उजाला क्यूं नहीं होता

मुझे सबसे अलग रखना ही उसका शौक था वरना
वो दुनिया भर का हो सकता था मेरा क्यूं नहीं होता

हम ही सोचे ज़माने की हम ही माने ज़माने की
हमारे साथ कुछ देर जमाना क्यूँ नहीं होता ।।

 

ज़रा सा क़तरा कहीं आज गर उभरता है
समन्दरों ही के लहजे में बात करता है

ख़ुली छतों के दिये कब के बुझ गये होते
कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है

शराफ़तों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं
किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है ।।

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