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जनकपुर का सन्त साहित्य : डा. पुष्पज राय चमन

हिमालिनी  अंक जुलाई २०१९ | प्राचीन मिथिला की राजधानी जनकपुर धाम का ऐतिहासिक अध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से विशिष्ट महत्व है । जनकपुरधाम का कला साहित्य और संस्कृति अपनी मौलिक विशिष्टता के कारण ही विश्व के समक्ष खोेज एवं अन्वेषण का विषय बन रहा है । विदेह राजर्षि जनक, याज्ञवल्क्य और मैत्रीय की कर्मभूमि जनकपुरधाम के  सिद्ध सन्त का हिन्दी और संस्कृत के विकास में असीम सहयोग रहा है । प्राचीन काल से ही नेपाल–भारत मैत्री के प्रतीक जनकपुरधाम का साहित्य, कला, संस्कृति के संरक्षण संवद्र्धण में असीम योगदान रहा है ।

हिन्दी के सिद्ध कवि कुकरीपा का जन्म सन ८४० ई. मे पश्चिम नेपाल के तौलिहवा में हुवा था । सवा ६ सौ वर्ष पूर्व नेपाल के दांग मे जन्मे राजा रतन सेन का दांग के रतननाथ मठ से ६ सौ वर्ष पूर्व में रतनबोध नामक कृति प्राप्त है । साढे ग्याहर सौ वर्ष पहले नेपाल के सिद्ध सन्त एवं  नाथ योगियों द्वारा अपभ्रंश भाषा में रचित रचनाएँ आज भी काठमाडौं उपत्यका में चर्यागीत के नाम से प्रसिद्ध है । करीब ६५० वर्ष पूर्व दांग के घाँटी मे प्राप्त एक शिलालेख में राजा रतनसेन की एक दंगीशरण कथा नामक रचना भी मिलती हैं । आधुनिक जनकपुर के अन्वेषक सिद्ध सन्त सूरकिशोर दास जी द्वारा साढे तीन सौ वर्ष पूर्व रचित मिथिला विलास एक विशिष्ट कृति है । इस कृति में जनकपुर का तत्कालीन सामाजिक एवं ऐतिहासिक अवस्था का भी चित्रण किया गया है । मिथिला विलास मे वात्सल्य भावों से ओतप्रोत कवित, छप्पय, सवैया तथा गीतों के रूप में रचित रचनाएँ संग्रहित की गई है । अपने मिथिला आने का उद्देश्य उन्होने मिथिला विलास में स्पष्ट उल्लेख किया है ।

कलि काल बडो दल साजि चढो, सव वेद पुरान भये शिथिला ।
साधु कि ठौर असाधु बवे, सुथिला जेहि ठौर भए कथिला ।
वरणाश्रम धर्म विचार गये, द्विज तीरथ देव भये मिथिला ।
रहि और न ढौर कछु जगमें, तब सूरकिशोर मिथिला ।
मिथिला कलि काल ग्रसी सगरी, तब जानकी जू झट है उधरी ।
सत्सङ्ग विलास कथा चरचा, नित आनन्द मङ्गल होत झरी ।।
अन सों धन सी पट भूषण सौं सुख सम्पति मन्दिर आनि धरी ।
कह सूरकिशोर कृपा सिय की, इक बारहि बात सबै सुधारी ।।
सत्त कवि सूरकिशोर दास ने रामजानकी विवाहका कितना सून्दर चित्रण किया हैं–
रघूवर दूलह दुलहिन जानकी । नीलपीत जलजात सुभग अङ्ग ।
अगंन अति सुख मान की ।
कनक महामनि मोर मनोहर ।
चन्द्रवदन सुख खान की ।। जनु श्रङ्गाल सख्य गिरी उपर,
उग्यो ज्योति पर भावन की जावक चित्र पदन मेहदी कर, अञ्जन द्वगन अंजान की । देत भामरी कनक क्लश कहु, संग लिये मन प्रान की ।
महात्मा सूरकिशोर दास के शिष्य प्रयाग दास भी अपनी सरस रचना द्वारा सन्त साहित्य की धारा को प्रवाहमान रखा । प्रयाग दास सीता को बहन के रूप में मानते थे इसलिए इन्हें मामा प्रयाग दास कहकर भी सम्बोधित किया जाता था । इनकी रचना में विनोद और सरस सन्देश अन्र्तनिहित है–

परागदास जो पिपर हाते, राधो होते भुतवारे ।
आठ पहर छतीपर रहते, वे दशरथ के पुतवारे ।
धुनि धुनिके सेवा कहै महेसवा, पार नपावै सेसवा ।
परागदास पहल दवाके कारन, रघवा होइगे बधवा ।
उसी परम्परा मे हुए सन्त रामप्रिशरण की ६ खण्डों मे विभक्त सीतायन कृति विशिष्ट ग्रन्थ है । सन्त जनकराज किशोरी शरण रसिक अलि ने सीताराम प्रणय लीला सम्बन्धी श्रृंगार रस में अनेकों रचनाएं की है । इनकी १) अमर रामायण २) अनन्य रस तरंगिणी ३) अनुराग रत्नमाला ४) अष्टयाम पदावली ५) आन्दोलन रहस्य ६) आत्म सम्बन्ध दर्पण ७) कवितावली ८) जनकी करुणा भरण नामक कृति प्रकाशित है तथा १) जिज्ञासा पंचक २) जिज्ञासा बृद्धद ३) तुलसी जी का चरित्र ४) दोहावली रहस्य ५) बषोत्सव पदावली ६) बारह खडी ७) विवेक सार चन्द्रिका ८) वेदान्त सार श्रृति दीपिका ९) मिथिला विलास १०) रघुवर करुणा भरण ११) रस चन्द्रोदय १२) रास दीपिका १३) ललित श्रृंगार दीपिका १४) सिद्धान्त चौतीसा १५) सिद्धान्त भक्तावली १६) सीताराम रहस्य और १७) होलिका दहन अप्रकाशित कृति है करिव दो दर्जन ग्रन्थ के रचयिता सिद्ध सन्त रसिक अलि सन १९०९ मार्ग पूर्णिमा के दिन परलोक गमण कर गयें ।

पं. श्री राम दुलारी शरण रूपलता की निम्न विशिष्ट कृतियाँ है – १) रुप रस तरंगणी २) रुप रस मालिका ३) सखेश्वरी चन्द्रकला ४) परत्व प्रकाशिका ५) सखेसरी चन्दैकला ६) श्री सम्बन्ध पत्रम । इनका जन्म वि.सं. १९६१ में महोत्तरी के कट्टी मे हुवा और मृत्यु २०४६ साल फागुन मे हुआ । जनकपुर युगल किशोर कुंज के श्री बैदही शरण जी की दो कृति हैं – १) श्री मिथिला महात्म २) मिथिला महंथ परिचय । इनके साथ ही इन्होने ही जनकपुर के प्राचीन कुंड तलाव कूप आदि का खोज कर परिचयात्मक पत्थर के स्तंभ गडवाया था । अग्नि कुन्ड जनकपुर के सन्त गुप्त राम जी की दो पुस्तकें अप्रकाशित हैं जिन्हे खोज कर प्रकाशित करने की आवश्यकता हैं । विहारकुंड जनकपुरधाम के महात्मा राम सनेही दास की निम्न कृति है ।

१) श्री जानकी चरितामृतम २) श्री किशोर सुमगलम ३) श्री सीताराम कृपा कटाक्ष स्तोत्र ४) श्री किशोर जी की अदभुत लीला ५) श्री सदगुरु मंगल स्तोत्र आदि । इसी तरह विहार कुंड के ही महात्मा रामचरित्र दास श्री निधि की निम्न प्रकार की कृति उपलब्ध हैं – १) श्री मैथली प्रेम प्रकाश २) श्री मैथिली प्रेम विनोद पदावली ३) तुलसी की राम कथा ४) श्री राम केवट संवाद  ५) श्री शवरी चरित्र ६) होली बहार । आप भगवान राम को दुलहा के वेष में उपासना करते हैं । अग्नि कुंड झुलनकुंज जनकपुरधाम के महात्मा रामकृपालु शरणजी की निम्न कृति उपलब्ध हैं – १) श्री सीताराम भक्तिसार सिद्धान्त २) श्री वाल्मिकाभ्य उपनिषद ३) बाल्मिकाभ्य उपनिषद भाषाटीका तथा प्रणव रामायाण । रामानन्द आश्रम जनकपुरधाम के सन्त एवं ज्योतिष पं. उर्मिलाकान्त शरण की १) अथ संक्षिप्त रामायाण (एवं सत्संग महिमा) २) जप यज्ञ एवं मंत्रराज महिमा) ३) श्री राम चरित्र मानस में जनकपुरधाम और महाराज जनक ४) श्री सीतराम विवाह पदावली ५) श्री राम मंत्रार्थ ६) श्री सीता मंत्र्राथ ७) श्री हनुमत उपासना ८) श्री सीता सुक्तम ९) श्री रामार्चा माहात्म्य (पूजा पद्धति) १०) श्री वैष्णव धर्म सनातन धर्म आदि लगायत २० ग्रंथ उपलब्ध हैं ।
रामानंद आश्रम जनकपुर के संस्थापक पं. अवधकिशोर दास प्रेम निधि जी सिद्ध महात्मा थें । उनका जन्म वि.सं. १९७२ मे हुवा था । नेपाल में हिन्दी भाषा विकास में इनका असीप सहयोग रहा हैं । ये वेद, उपनिषद, साहित्य, व्याकरण, आर्युवेद के प्रकाण्ड ज्ञाता थें । इनकी १) प्रेम रस माधुरी २) श्री मिथिला नवरत्न स्तोत्रम ३) प्रेमप्रभा ४) श्री सीतामही रहस्य ५) श्री सीता मंत्र रहस्य ६) भागवत धर्म ७) भजन प्रेम लहरी ८) दीक्षा पद्धती ९) साकेत महिमा १०) मनप्रबोध माला लगायत १२४ ग्रन्थ प्राप्त हैं । कुआ स्थान के महंथ गोकुल गिरी का १) मिथिला में  राम २) श्री राम बाल विलास खण्ड काव्य प्रकाशित हैं । पं. रमाकान्त झा की मैथिली महाकाव्य व्यथा और हिन्दी खण्ड काव्य वनकन्या प्रकाशित है । यह दोनो कृति अति विशिष्ट धरोहर है । प्रेमलता तथा पदमलता जी ने भी यहा अनेकौ रचनाए की है । प्रेमलता श्रृंगार रस के सिद्ध सन्त थें । इनकी १) बृहद उपसना रहस्य २) प्रेमलता पदावली ३) चैतन्य चालीसा ४) सीताराम रहस्य दर्पन ५) नाम रहस्य त्रयी ६) नाम तत्व सिद्धान्त ७) जानकी स्तुति ८) षट ऋतु विमल विहार ९) सीताराम नामरुप वर्णन १०) सीतराम नामजापक महात्म्य ११) ज्ञान पचासा १२) मिथिला विभूती प्रकाशिका १३) वैराग्य प्रवोधक वहतरी १४) हितोपदेश शतक १५) प्रेमलता वाराखडी १६) नाम वैभव प्रकाश चालिसा १७) नाम सम्बन्ध बहतरी १८) जानकी विनय नामादि १९) नाम द्रष्टान्तावली २०) सतगुरु पदार्थ प्रवोधिका २१) सन्त प्रसाद महात्म्य २२) अनन्य शतक २३) निजात्म शतक २४) अपेल सिद्धान्त २५) षोडस भक्ति २६) सन्त महिमा २७) उपदेश पेटिका २८) पंच संस्कार २९) अष्टयाम ३०) जानकी बधाई ३१) सार सिधान्त प्रकाश ३२) नित्य प्रार्थना ३३) विश्व बिलास बीस का कृति प्राप्त हैं । मोदलता जी की अनेकौ कृतियां प्राप्त हैं । इन्होने हिन्दी, मैथिली, भोजपूरी आदि भाषामे रचनाए की हैं । देखे उनका एक पद जिनमे नामोपदेश दिया गया है ।

सव सारन को सार,
नाम रटन निर्धार हैं ।
मोद कोटि धिक्कार ओठ
पटापट जो नकर ।।
अरे मन रट रट सिया
राम रटिया ।।
रटे विना सवही भठीया ।।

पं. श्रीरामदास जी विहार कुँड में साधनामय जीवन व्यतीत करते हुए श्री विष्णु सहस्त्र तथा अन्य ग्रन्थो का भाष्य किया जीसे खोज कर प्रकाश मे लाने की आवश्क्ता है । रामानन्द आश्रम जनकपुर के वर्तमान महन्थ अनन्त रामशरण रसमोद निधि की निम्न प्रकार की कृति है – १) रसमोद माधुरी २) मिथिला रहस्य माधुरी ३) श्री सदगुरु चालीसा ४) परम्परा चालीसा ५) श्री रामानन्दाचार्य चालीसा ६) आचार्य परिचर्या ७) विवाह माधुरी ८) श्री मिथिला माधुरी ९) श्री धाम यशावली आदि । कल्याणेश्वर के रामगुलामदास मधुकर अभी भी साहित्य सृजनमे साधनारत है । इनकी निम्न कृति उपलब्ध है – १) दिव्य श्री साकेत धाम की झाँकी २) परम सिद्ध बाबापरमहंस चरितामृत चालीसा ३) सदगुरु चरितामृत चालिसा ४) मानस प्रेम यज्ञ षोडषी ५) प्रतिद्वन्द मिमांसा चालिसा ६) परमहंस रामायण ७) मिथिला चालिसा आदि । ये परमहंस प्रभा नामक पत्रिका भी पहले निकालते थें । लक्ष्मण मन्दिर जनकपुर के महन्थ राम टहल शरण शास्त्री गहन साहित्य के सर्जक है । इनकी श्री हनुमद् वैभव की टीका लगायत अनेको ग्रन्थ की पाण्डुलिपियां प्राप्त है । अवध कुमार दास उमंग की अनेकौ हिन्दी रचनाएं पत्रपत्रिका में प्रकाशित है । सिया राघव शरण की अनेकौं प्रकाशित एवम् अप्रकाशित रचनाएं उपलब्ध है । नेपाल के हिन्दी विकास में जनकपुर कें सन्तोंका अजस्र अनुदान रहा  है । जनकपुर का सन्त साहितय हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि  एवम् हमारे लिए राष्ट्रिय सांस्कृतिक धरोहर है । इन सन्तों की कृति का खोज अन्वेषणकर प्रकाश मे लाने की आवश्यकक्त है । संरक्षण के अभाव मे कई महत्वपूर्ण कृति की पाण्डुलिपियां काल कवलित हो चुकी है । अभी भी जनकपुर में अनेकौ ऐसे सन्त है जो साहित्य सृजनमे साधनारत है । आवश्यक्ता है इन्हे प्रोत्साहित कर प्रकाश में लाने की ।

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