Fri. Oct 4th, 2019

श्रीलंका और मालदीव में असफल होने के बाद चीन का सारा ध्यान नेपाल के मधेस पर : ललित झा

चीन की मधेस नीति

ललित झा, जयनगर । चीन अपनी भारत विरोधी नीति को दक्षिण एशिया मे बड़ी चालाकी से अंजाम दे रहा है, एक तरफ जहाँ वह अपनी आर्थिक शक्ति का प्रयोग कर छोटे, गरीब लेकिन सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण देशों को अपने कर्ज के जाल में फंसाता है, फिर वहाँ अपनी सैनिक उपस्थिति बढ़ाकर अपने प्रभाव को फैलाता है, तो दूसरी तरफ दक्षिण एशिया के कमजोर देशों को भारत का डर दिखा कर तथा सैनिक सहायता देकर अपने प्रभाव में लाने का प्रयास करता है। दक्षिण एशिया में चीन के इसी रननीति का केंद्र बन रहा है नेपाल। पूर्व में श्रीलंका और मालदीव में ऐसी ही परिस्थितियाँ थी, चीन अपनी आर्थिक शक्ति के दम पर, उक्त दोनों देशों में भारत विरोधी राजनीति को हवा देकर, चीन समर्थक सरकार के माध्यम से अपने अनुकूल फैसले करवा रहा था,। लेकिन श्रीलंका और मालदीव की जनता को चीन के बढ़ते कर्ज के बोझ से देश की अर्थव्यवस्था को हो रहे नुकशान का पता चला और वहाँ राजनीतिक परिवर्तन के बाद चीन समर्थक सरकार की बिदाई हुई, और आज इन दोनों देशों में चीन हाशिये पर आ गया है। भारत की मोदी सरकार की act east policy का नतीजा कहें या कुछ और लेकिन आज पूरे दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों में भी चीन का प्रभाव काफी सीमित हुआ है। श्रीलंका और मालदीव में भी चीन हाशिये पर चला गया है। इन दोनों देशों में असफल होने के बाद चीन का सारा ध्यान नेपाल पर आकर टिक गया है।श्रीलंका और मालदीव की तरह नेपाल को भी चीन आर्थिक विकास का झासा देकर अपने कर्ज के जाल में फंसाने जा रहा है, उसके लिए अपने अनुकूल राजनीतिक स्थिति का निर्माण करने में चीन सफल हो चुका है, आज नेपाल में चीन समर्थक कम्युनिस्ट सरकार है जो चीन के इशारे पर राजनीतिक फैसले ले रही है। जिसका परिणाम आज सबके सामने है। नेपाल में चीन के बढ़ते दखल का कुछ बानगी देखीये– चीन के विदेश मंत्री के आगमन पर एयरपोर्ट पर लेने उसे नेपाल के मंत्री जाते हैं लेकिन भारतीय विदेश मंत्री को वह प्रोटोकॉल नही मिलता, चीन के विदेश मंत्री वांग यी से प्रधामन्त्री ओली की भेंट और भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ भेंट की भाग भंगिमायें अलग अलग थी, नेपाल चीन की बी. आर. आई. में शामिल हैं लेकिन indo- Pacific रननीति से परहेज है, नेपाल में खुलकर हिन्दी भाषा का बिरोध होता है लेकिन नेपाल की सरकार चीन की भाषा नेपाल में पढ़ाने के लिए चीन के साथ समझौता किया है

नेपाल जहाँ एक तरफ वन चीन नीति के तहत तिब्बत संबंधी किसी भी मुद्दा पर चीन के समर्थन में खड़ा रहता है लेकिन कश्मीर मामले को लेकर नेपाल खुलकर भारत के साथ नही खड़ी होती है और रननीतिक चुप्पी साधे रहती हैं
कूटनीति में इसके कई निहितार्थ हो सकते हैं वह भी तब जब नेपाल की विदेश नीति के बारे में ट्वीट Beijing से हो रहा हो तब।
चीन द्वारा नेपाल का राजनीतिक प्रबंधन करने के लिए, राजनीति में निवेश की नीति अपनाई गयी है, जिसके तहत कम्युनिस्ट एकीकरण से लेकर मधेसी राजनीतिक पार्टियों के साथ संबंधों को बढाने का सफल प्रयास हो रहा है। नेकपा के दोनों अध्यक्ष से लेकर द्वितीये और तृतीय पंक्ति के नेताओ को चीन अपना मोहरा बना रहा है,। इसके अतिरिक्त नेपाली कांग्रेस और मधेस के राजनीतिक पार्टी जिसमे समाजवादी पार्टी और राजपा के कई नेता भी शामिल है को भी अपनी तरफ खींचने के प्रयास में है और कुछ हद तक सफल भी हो रहा है। इसी का परिणाम है कि आज चीन मधेस में भी अपना पैठ मजबुत कर रहा है। चाहे चीन भ्रमण के नाम पर हो या फिर विकास के नाम पर, चीन की दूतावास द्वारा एक साथ कई प्रयोग किया जा रहा है। बीगत कुछ महीनों में चीन जानेवालों की सूची जिसमे सामजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, नेता, व्यापारि, संस्कृती कर्मी शामिल हैं, को देखकर यह सहज ही समझा जा सकता हैं कि चीन मधेस में किस ततपड़ता से कार्य कर रहा है।


चीन की मधेस नीति को सफलता पूर्वक अंजाम दे रहे हैं एक मधेसी डा. राजीव झा, जिन्हें चीन की सरकार ने चीन नेपाल फ्रेन्डशिप मेडिकल रिसर्च सेंटर का निर्देशक बनाया है और इनको ही चीन ने मधेस के साथ राजनीतिक रिश्ता मजबुत करने का भार सौपा है, इसी सबका परिणाम है कि आज चीन मधेस मे पैसा भी बांटता है और विकास परियोजनाओं में भी खुलकर दिलचस्पी दिखा रहा है।
बात चाहे आन्तरिक मामला मे हस्तक्षेप का हो या द्विपक्षीय समझौते का, भारत की भूमिका पर बिना मतलब सन्देह उत्तपन्न किया जाता है लेकिन आज चीन खुलेआम सब कुछ कर रहा है फिर भी कोई समीक्षा या सन्देह नही
चीन द्वारा नेपाल का मीडिया प्रबंधन- राजनीतिक प्रबंधन के साथ साथ चीन ने नेपाल के मीडिया जगत में भी अपना गहरा पैठ बना लिया है। आज नेपाली मीडिया में भारत संबंधी झूठी और मनगढंत खबरों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता हैं लेकिन चीन विरोधी खबरें गायब रहती हैं। पूरे इतिहास में भारत ने कभी किसी देश का सीमा अतिक्रमण नही किया है, जबकि चीन का इतिहास ही सीमा अतिक्रमण का है, फिर भी नेपाल की मीडिया भारत को अतिक्रमण कारी की तरह पेश करता है जबकि चीन को नही। नेपाल का चीन और भारत दोनों के साथ सीमा बिबाद है लेकिन मीडिया के निशाने पर हमेशा भारत होता है चीन नही। यह महज सयोग नही अपितु सोची समझी साज़िश के तहत हो रहा है ताकि सीमा बिबाद के नाम पर भारत नेपाल संबंध में तनाव उत्तपन्न किया जा सके,
भारत के साथ विप्पा समझौते का बिरोध करने वाले मीडिया और लोग आज चीन के साथ बी. आर. आई. समझौते का बिरोध क्यों नही कर रहे हैं? B.R.I. नेपाल के लिए अच्छा है भी की नही? नेपाल की सरकार और मीडिया के लिए आज यह गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि जो श्रीलंका और मालदीव के लिए अच्छा नही हुआ वह नेपाल के लिए अच्छा कैसे हो सकता है? चीन का कर्ज जब श्रीलंका और मालदीव की अर्थव्यवस्था को बर्वाद कर सकता है तो फिर यह नेपाल की अर्थव्यवस्था को बर्वाद नही करेगी, इसकी क्या गारंटी है??
आज नेपाल को पड़ोसी देश श्रीलंका के अनुभवों से सीखने की जरूरत है साथ ही यह सोचने की यदि श्रीलंका की सरकार को हमबनटोटा बंदरगाह निर्माण के लिए चीन से 1.12 बिलियन डॉलर कर्ज के समय पर नही चुका सकने की स्थिति में, उस बंदरगाह को 99 वर्ष की लीज़ पर चीन को देना पड़ा है फिर नेपाल को यदि केरुंग काठमांडू रेल निर्माण के लिए कर्ज देता है तो नेपाल के साथ श्रीलंका जैसा बयबहार नही होगा, यह कथमपी नही कहा जा सकता

ललित झा बिहार भारत के लेखक तथा पत्रकार है।

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