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मधेश का हर भूभाग त्रास में जी रहा है ऐसे में तीन दिनों की दीवाली का औचित्य ! श्वेता दीप्ति

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अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिए जाते हैं
जिन्दगी क्या किसी मुफलिस की कबा है जिसमें
हर घड़ी दर्द के पैबन्द लगे जाते हैं । (फैज)

डा. श्वेता दीप्ति, काठमांडू, आश्विन ३ गते | सत्ता का खेल भी अजीब होता है । कभी तो जनता की उम्मीदों को जगाकर सत्ता तक पहुँचने की सीढ़ी नेता तैयार करते हैं और कभी उन्हीं उम्मीदों की कफन तैयार कर के सत्ता को अपने हक में बचाने की कोशिश करते हैं । संविधान, संघीयता, सीमांकन, पहचान, अधिकार, नागरिकता कल तक इन सारे शब्दों ने जनता के अन्दर जिस चाहत को जगाया था, जिसे पाने की उम्मीद वो पिछले कई वर्षों से सरकार से करती आ रही थी, आज जब इन्हें यथार्थ में ढालने का वक्त आया तो देश की दशा ही बदल गई ।

देश ने नए संविधान को पाया है । निःसन्देह यह एक अविस्मरणीय क्षण होता है, किसी भी देश के लिए जब उसका अपना संविधान होता है । गणतंत्र में जीने का तात्पर्य होता है, अपने मौलिक अधिकारों के साथ जीना । संविधान, एक ऐसा जीवित दस्तावेज जिस पर देश और देश की जनता अभिमान करती है, उसमें अपने अधिकारों को सुरक्षित देखती है और उम्मीद से भरी निगाहें विकास की राह देखतीं हैं । बहुमत के द्वारा लाया गया संविधान निश्चय ही निर्विवाद हो सकता था, अगर उसमें सम्पूर्ण देशवासियों को सम्बोधन किया गया होता । मसौदे से लेकर संविधान जारी होने तक और आज भी, वर्षों से शोषित देश का एक पक्ष निरन्तर संघर्षरत है ।

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देश की आधी से अधिक आबादी आज भी असंतोष की आग में जल रही है । कई घरों के चिराग बुझे । पर उन्हीं लाशों के ढेर पर संविधान बना और दीवाली भी मनाई गई । आज तो फरमान ही जारी है कि एक दिन नहीं तीन दिनों तक दीवाली मनाई जाय । यह फरमान जारी करना अच्छी तरह यह जता रहा है कि सत्ता किसे चिढाना चाह रही है या किसे उसक ीऔकात बता रही है । पर अफसोस तो उन दावेदारों के लिए होता है जो मधेश के मसीहा बनने का दावा करते रहे और आज मिट्टी के माधो बने हुए हैं ।

मधेश के नेताओं ने नारा दिया था ‘एक मधेश एक प्रदेश’ । मधेशी जनता उत्साहित थी कि अब उन्हें और उनके अस्तित्व को पहचान मिलेगी । उनकी मेहनत का फल भी उन्हें ही मिलेगा और शासन के हर क्षेत्र में उन्हें स्थान मिलेगा । फलस्वरूप अपने प्रतिनिधियों को उन्होंने चुना । किन्तु जिनके हाथों मधेश की पतवार थी उन्होंने ही कश्ती को डुबोया । एक मधेश और एक प्रदेश की माँग करने वाले खुद ना जाने कितने टुकड़ों में बँट गए । इनके धनमोह, परिवारमोह और जातिमोह ने मधेशमोह को कहीं परे ढकेल दिया । मधेश खुद से ठगा गया । अवसरवादी नेता आज भी इससे निकल नहीं पा रहे और इसकी पीड़ा मधेश की जनता आज तक भुगत रही है । मधेश को आज भी कुछ हासिल नहीं होने वाला है यह लगभग तय हो चुका है । कल तक एक मधेश एक प्रदेश की माँग आज एक मधेश दो प्रदेश में बदल चुका है और सत्तासीन तो मधेश की स्थिति को और भी लचर बनाने के लिए तैयार बैठे हुए हैं । मधेश की स्थिति आगामी दिनों में क्या होगी यह तो आन्दोलन के पश्चात् ही कायम हो चुका था । मधेशी जनता अपने ऊपर हुए विभेद के कारण ही अलग प्रान्त चाहती थी किन्तु आन्दोलन के बाद राज्य ने ही यह तय किया था कि मधेश को स्वायत्त प्रदेश की मान्यता दी जाएगी । किन्तु नेताओं ने ऐसी नीति अपनाई कि बात जातीयता, पहचान आदि मुद्दों में उलझती चली गई ।

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आज भी जनता की भावनाओं को उकसाकर राजनीति की खिचड़ी पकाई जा रही है । पहचान, संस्कृति, भाषा ये कुछ ऐसे भावुक शब्द हैं जिसमें किसी भी समुदाय विशेष को उलझाकर नेतागण अपनी स्वार्थसिद्धि करते रहे हैं । किन्तु किसी भी क्षेत्र का विकास उसकी समृद्धि और सामथ्र्य पर निर्भर करता है । अगर आपके पास वही नहीं है तो आपकी पहचान और संस्कृति तो स्वयं मिट जाएगी । समृद्धि और सामथ्र्य के लिए एकजुटता की आवश्यकता होती है । सोचने वाली बात तो यह है कि आजतक मधेश जिस विभेद और शोषण का शिकार होता आया है क्या वह जाति विशेष था, क्षेत्र विशेष था या वर्ग विशेष था ? नहीं यह शोषण समग्र में था । जब जब अधिकार की बात हुई किसी ना किसी तरह फूट डालकर उसे रोका गया । मधेश के विकास में आज वही नेता बाधा बने हुए हैं जिन्हें मधेश के विकास के लिए के लिए चुना गया था । उनकी मौकापरस्ती और सत्ता मोह ने मधेश को बर्बादी के कगार पर ला खड़ा किया है । आज भी वो इससे बाज नहीं आ रहे हैं । मधेशवादी दलों को जिस विभेद ने जन्म दिया था आज उनकी अवसरवादिता, सत्तामोह और परिवारमोह ने उन्हें पतन की ओर धकेल दिया है । मधेश का हर भूभाग त्रास में जी रहा है ।
अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिए जाते हैं
जिन्दगी क्या किसी मुफलिस की कबा है जिसमें
हर घड़ी दर्द के पैबन्द लगे जाते हैं । (फैज)

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