Mon. Nov 18th, 2019

यह प्याज की पुरानी आदत है : योगेश मोहनजी गुप्ता

इस भौतिक संसार में ईश्वर प्रदत्त अनेकों प्राकृतिक सम्पदाएं हैं, जो मनुष्य के जीवन में महत्वपूर्ण हैं। इसी तरह ईश्वर प्रदत्त कुछ ऐसी स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ हैं, जिनमें मनुष्य कोई परिवर्तन नहीं कर सकता है, यथा – सूरज हमेशा पूर्व से ही उदय होगा, धरती कभी भी घूमना नहीं छोड़ सकती, कुत्ते की पूँछ को यदि सीधा करना चाहो तो वह नहीं हो सकती। इसी प्रकार से प्याज एक ऐसी शाक है, जिसे काटने पर आँसू निकलना स्वाभाविक ही है। प्याज की महत्ता इतनी अधिक है कि इसके बिना अधिकांश घर की रसोई का भोजन अधूरा माना जाता है तथा सलाद के रूप में भी प्याज का अधिकाधिक प्रयोग होता है। भारत में जब भी प्याज की कीमत ने आसमान को छुआ है, उसने जनता को रूलाया है और इसका प्रभाव हमारे पड़ौसी देशों को भी भुगतना पड़ा है। जब उनके लिए प्याज का निर्यात बंद हो जाता है तब हमारे पड़ौसी देश हमसे ज्यादा प्याज को याद करके रोते हैं।
विश्व में नीदरलैंड, चीन और भारत ही ऐसे देश हैं, जो अधिकांश मात्रा में प्याज का उत्पादन करते हैं। चीन जहाँ 20 मिलियन मैट्रिक टन, वहीं भारत 13 मिलियन मैट्रिक टन प्याज का उत्पादन करता है, परन्तु चीन की तुलना में भारत की प्याज अधिक श्रेष्ठ मानी जाती है। नीदरलैंड एक छोटा देश है, परन्तु वह विश्व की 20 प्रतिशत प्याज की मांग को पूरा करता है। अमेरिका, मेक्सिको आदि देशों में भी प्याज का उत्पादन होता है, परन्तु विश्व बाजार में भारत, नीदरलैंड एवं चीन की अपेक्षा उन देशों में उत्पादन अत्यधिक कम मात्रा में।
नीदरलैंड और केरल क्षेत्रफल के आधार पर समकक्ष है। नीदरलैंड की आर्थिक दृढ़ता कृषि पर निर्भर करती है, वह प्याज के साथ ट्यूलिप फूल, टमाटर, काली मिर्च, खीरा एवं अनानास का सबसे बड़ा निर्यातक है। दूध और मदिरा के निर्यात में उसका विश्व में बहुत बड़ा योगदान हैं।
यदि नीदरलैंड जैसा एक छोटा देश कृषि पर निर्भर रहकर विकसित देश बन सकता है, तो भारत जैसा एक विशालदेश, जिसकी अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, तो वह भारत देश क्यों सम्पन्न नहीं हो सकता? यहाँ कृषि उत्पादन के नई तकनीकी से युक्त प्रचुर साधन उपलब्ध हैं। यहाँ की मिट्ठी नीदरलैंड से ज्यादा उपजाऊ है, परन्तु नीदरलैंड की श्रेष्ठ खेती वहाँ के उन्नत किस्म के बीजों एवं उन्नत मशीनों पर निर्भर है, इसके विपरीत भारत में सब प्रयासों के बाद भी उन्नत यन्त्रों से खेती नहीं की जा सकी है। वर्तमान स्थिति में सुधार करने के लिए व्यापक स्तर पर परिवर्तन की आवश्यकता है। इसमें सरकार अहम भूमिका निभा सकती है। भारत के किसान को यदि सशक्त कर दिया जाए, तो देश स्वयं सशक्त हो जायेगा। यदि किसान को बीज, खाद आदि उपलब्ध करा दिया जाएं तथा खेती के उन्नत यन्त्र उपलब्ध हों, तो उत्पादन में निश्चित ही वृद्धि होगी और जब उत्पादन में वृद्धि होगी तो किसान के आंसू आने स्वतः ही बन्द हो जायेगे।
फसलों के भण्डारण की उचित व्यवस्था भी विकास की माँग कर रही है, क्योंकि प्याज तथा अन्य फसलों के उचित भण्डारण की व्यवस्था हमारे देश में नहीं है। इसलिए जब फसल अच्छी होती है तो किसान को उपयुक्त कीमत नहीं मिल पाती है। जब अच्छी फसल होने पर भी निराशा मिलती है तो वह अगले वर्ष कम फसल का उत्पादन करता है, तो जनता के आंसू आना स्वाभाविक ही है। भारत में कृषि व्यवस्था ऐसी हो कि दोनो के ही आंसू नहीं आयें।
भारत सरकार अपनी ओर से प्याज के उत्पादन में होने वाले ह्रास को रोकने के लिए बहुत ही सामायिक कदम उठा रही है। उसने अविलम्ब प्याज का निर्यात रोककर, स्थानीय व्यापारियों के लिए भण्डारण सीमा निश्चित कर दी है, परन्तु इस कार्य की उपयुक्त परिणिती करने में केवल मात्र सरकार का दायित्व ही नहीं है। जनता को भी अपना दायित्व समझना होगा।
हम भारतीय अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं। यहाँ धर्म का अत्यधिक महत्व है और जो हमारे सुसंस्कृतवान घर-परिवार हैं, वे नित्-प्रतिदिन ईश्वर को भोजन अर्पित करने के पश्चात स्वयं भोजन गृहण करते हैं। वास्तविकता यह है कि जिस भोजन को हम तामसिक मानकर ईश्वर को समर्पित नहीं कर सकते, वह भोजन परिवार के लिए कैसे उपयुक्त हो सकता है। यदि सुसंस्कृतवान परिवार इस तथ्य को समझ ले तो प्याज की समस्या क्षण भर में समाप्त हो जाएगी। दूसरा, जिन परिवारों में प्रतिदिन माँसाहार और प्याज से बना भोजन गृहण किया जाता है, वे यदि नवम्बर माह में नासिक से प्याज की नई फसल के उत्पादन से पूर्व सप्ताह तीन दिन यदि प्याज गृहण करना बंद कर दे तो, प्याज की समस्या का निदान शीघ्र ही हो जाएगा।
देश में उत्पन्न कोई भी समस्या केवल सरकार की समस्या नहीं है, उसके निदान में जनता के सक्रिय सहयोग की आवश्यकता होती है। सरकार का सहयोग करना देशहित में हम सबका कर्तव्य बन जाता है। मैं सम्पूर्ण नागरिकों से आह्वान करता हूँ कि प्याज की समस्या देश की समस्या है, प्रत्येक नागरिक की समस्या है। अतः इस समस्या का समाधान करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। *योगेश मोहनजी गुप्ता*
कुलाधिपति
आई आई एम टी यूनिवर्सिटी
मेरठ, भारत

 

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