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‘साग’ से सरकार का सरोकार : अंशु झा

 

अंशु झा,हिमालिनी, अंक- दिसंबर 2019 । हाल ही में नेपाल में राष्ट्रीय खेलकूद परिषद् द्वारा दक्षिण एसियाली देशों के बीच खेल अर्थात् साग सम्मेलन सम्पन्न हुआ । यह १३ वां साग सम्मेलन था जो नेपाल की राजधानी काठमांडू के दशरथ रंगशाला तथा जनकपुर और पोखरा में सम्पन्न हुआ । ७२ साल के भुकम्प से क्षतिग्रस्त दशरथ रंगशाला को पुनर्निर्माण के बाद इस अवसर पर दुल्हन क ितरह सजाया गया था । नेपाली जनता में इस खेल के प्रति बड़ी ही उत्सुकता थी । इस उत्सुकता को नेपाली खिलाडि़यों ने बरकरार रखा । इस खेल में वैसे तो सहभागी सभी देशों ने अच्छा खेला परन्तु नेपाल के खिलाडि़यों की प्रस्तुति देखकर समग्र नेपाली हर्षविभोर हो गये । नेपाली खिलाडि़यों ने उम्मीद से ज्यादा उम्दा प्रस्तुति दी । वैसे तो एसिया के अन्य देशों की तुलना में नेपाल की यथास्थिति सभी प्रकार से दयनीय ही दृष्टिगोचर हो रही है क्योंकि नेपाल का नेतृत्व ही दयनीय है । मानती हूं नेपाल छोटा है पर यहां की जनता में आत्मबल काफी है, जो इस खेल के माध्यम से स्पष्ट होने में कोई सन्देह नहीं है । इस प्रकार के बहुत से ऐसे असम्भव कार्य हंै जो यहां के लोग आसानी से कर सकते हैं । पर इसके लिये सरकार को भी अपनी पूर्ण रुचि इन खिलाडि़यों तथा खेल प्रति रखना आवश्यक है । जो यहां नहीं के बराबर है ।

यहां के नेतागण कुर्सी पर बैठने से पहले लम्बा–लम्बा भाषण देते हैं पर जब कुर्सी मिल जाती है तो देश को खोखला बनाने पर लग जाते हैं । यह बात यहां के लिये आम है । क्योंकि सदियों से यही होता आ रहा है । खुद कुर्सी पर बैठ गए और चाचा, भतीजा, बेटा, गर्लफ्रैन्ड, पत्नी, समधन सबको आस–पास रख लिया । यहां का रिवाज यही है । जनता को बहला–फुसलाकर विजयी हो जाते हैं और उसी भोली–भाली जनता को उल्लु बनाते हैं जिसके सहारे वो कुर्सी पर बैठा होता है । मुझे इस विषय के सम्बन्ध में शायद ज्यादा लिखने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह जो हमारे देश की राजनीति तथा शासन करने का रवैया है वह सर्वविदित है । अधिकांश जनता इस बात को जान चुकी है ।
दक्षिण एसियाली खेलकुद(साग) में खिलाड़ी, प्रशिक्षक, सहभागी राष्ट्र से आयोजक सभी अवसर के रूप में आते हैं । इसी अवसर को नेपाल ने सदुपयोग कर दक्षिण एसिया का ओलम्पिक माना गया साग के १३ वां संस्करण को भव्य रूप से सफल बनाया । खेल का आयोजन भी बड़े ही अच्छे ढंग से किया और खेल में भी सफलता हासिल की । नेपाल ने इस संस्करण में तैरना, साइक्लिंग, गल्फ, ट्रायथल, कुस्ती, एथलेटिक्स के साथ साथ ऐतिहासिक ५१ स्वर्ण पदक प्राप्त किया । जो नेपाल के लिये एक गौरव का विषय है । इससे पहले नेपाल में ही आयोजित ८वां संस्करण में ३१ स्वर्ण पदक प्राप्त किया था । समय सापेक्ष यहां के खिलाड़ी में बहुत विकास हुआ है । अब बात उठती है कि इन खिलाडि़यों में विकास होने का तो ये लोग स्वयं से ही इस विकास का सजृनहार हैं । सरकार के तरफ से इन खिलाडि़यों के लिये कुछ खास नहीं हुआ है । विडम्बना तो देखिये अब इतना करने के बाद स्वर्णपदक जीतने वाले खिलाडि़यों को ९–९ लाख पुरस्कार स्वरूप दिया जायेगा । जो अशोभनीय लग रहा है । अगर सरकार इनके ऊपर निवेश करे तो यह विश्व के किसी भी कोने में अपने सामथ्र्य का प्रदर्शन कर सकते हैं जो देश के लिये एक गौरव का विषय होगा ।

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साग के इस संस्करण में गौरिका की सफलता कुछ विशेष ही है । उन्होंने ४ स्वर्ण पदक हासिल किया और ३ कास्य भी । इससे पहले साग के १२ वां संस्करण में नेपाल के कोई भी खिलाड़ी ने २ स्वर्ण पदक नहीं जीता था । कराटे का मण्डेकाजी श्रेष्ठ, तेकवान्दो की आयशा शाक्य और गोल्फ के सुभाष तामांग ने भी इसी संस्करण में २–२ स्वर्ण जीता और गौरिका ने चार स्वर्ण जीतकर इतिहास ही रच डाला । इसी प्रकार विभिन्न खिलाडि़यों ने अपना–अपना करतब दिखाकर नेपाल का सर गौरव से ऊंचा कर दिया ।

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नेपाल की शक्ति यहां के नर–नारी, बाल–बालिका में नीहित है, यह बात स्पष्ट हो गयी है । इस खेल के माध्यम से हम इनके आन्तरिक गतिशीलता को समझ पाये । परन्तु नेपाल का प्रशासन, सरकार, राजनीति दल इससे बहुत दूर–दूर रहते हैं । इस साग खेल में किसी की कोई तत्परता नहीं दिखी है । ५१ स्वर्ण पदक तथा १ सौ ९८ अन्य पदक जीतने वाले नेपाली खिलाडि़यों का सामथ्र्य उनका निजी सृजनशील सामथ्र्य है । विषद परिस्थिति में भी सृजनशील नेपाली अपनी शक्ति बरकरार रख सकते हैं यह एक उदाहरण है । गौरिका सिंह के साथ–साथ सभी मेडल जीतने वालों में एक साझा चरित्र देखा गया है जो सृजनशीलता है । खुद से खुद की प्रतिज्ञा और सृजन का प्रयोग कर खेलने वाले सभी नेपाली नरनारी में अवस्थित शक्ति का प्रतिक है यह ।

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समग्र में हम यह कह सकते हैं कि नेपाल अपनी मौलिकता तथा प्राकृतिक सम्पदाओं से परिपूर्ण है । यहां लोक संस्कृति, चलन, कला, लोकचेतना और साहित्य की बहुलता है । यहां के लोग भी बहुत ही प्रतिभावान तथा साहसी हैं । किसी भी कार्य को अगर ठान ले तो उसे पूरा करके ही छोड़ते हैं । पर यहां की जो सरकार, प्रशासन तथा राजनीतिक दलों का क्रियाकलाप है वह कुछ सही नहीं है । वे लोग उक्त खेल तथा खिलाडि़यों पर ध्यान रखने के बजाय उसे नजरअन्दाज कर रहे हैं । सही मायने में अगर नेपाली खिलाडि़यों के लिये आवश्यक समाग्री, उपयुक्त खेल का मैदान, तथा खेल में आवश्यक आर्थिक सहयोग मिले तो ये लोग भी विश्व के किसी भी देशों के खिलाडि़यों से प्रतिस्पद्र्धा करने में सक्षम है । विभिन्न विषयों के साथ–साथ खेल का विषय भी अनिवार्य रूप से सभी विद्यालयों तथा कालेजों में रखा जाय तो बच्चों में खेल के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न होगी और उसके अन्दर की इच्छा पूरी हो सकती है । क्योंकि खेल मनुष्य के अन्दर की सृजनशील शक्ति के साथ जुड़ा हुआ है । हमारे जीवन में यह एक महत्वपूर्ण विषय है । इस पर सरकार को विशेष ध्यान देना चाहिये ताकि विश्वपटल पर नेपाल को भी एक नयी पहचान मिले और नेपाली जनता का मनोबल बढेÞ ।

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