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जीवन में आनंद तुम्हीं से क्यों समझूँ वृंदावन क्या है: अयोध्यानाथ चौधरी

 

अयोध्यानाथ चौधरी

हिमालिनी, अंक- दिसंबर 2019 

कभी हम झुकते हैं
कभी तुम
कोई बुरा तो नहीं
हमेशा सर उठा के रखना
ना संभव, ना सुन्दर ।
झुकी हुई पलकें
झुका हुआ आसमां
फलों से झुकी हुई शाखाएं
फूलों से लदी–झुकी डालियां
झुककर शिष्टाचार प्रर्दशन करते लोग
प्रेम के आगोश में झुकते समर्पित वे
जरा सोचें एक पल के लिए
क्या बयां करते हैं, क्य ।..क्य ।..??
अहं का खो जाना
समान भाव से सम्मान प्रगट करना
मानवता के करुण धारा में विलय होना
विश्व–बन्धुत्व के आगे नतमस्तक होना
जाति–भेद–लिंग के दिवार को ढलते देखना
बिना झुके संभव है क्या ???

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मैं क्या जानूँ सावन क्या है
ममता शर्मा आँचल
मैं क्या जानूँ सावन क्या है
प्रिय तुमसे मनभावन क्या है
सपनों में छिपकर आते हो
जाने क्या क्या कह जाते हो
नर्म–नर्म अहसासों में तुम
इससे सुखद बिछावन क्या है
मैं मछली तुम सागर जैसे
प्रीत भरी इक गागर जैसे
प्रश्न लिए नित भटक रहे थे
तुमसे समझा पावन क्या है
तुम मुरली की धुन हो प्रियतम
निधिवनऔर रास का संगम
जीवन में आनंद तुम्हीं से
क्यों समझूँ वृंदावन क्या है

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अयोध्यानाथ चौधरी
जनकपुर

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