Wed. Dec 12th, 2018

भारत वर्ष के दिव्य त्यौहार सामा चकेवा : अजयकुमार झा

जलेश्वर। धार्मिक और सांस्कृतिक संपदाओं तथा धरोहरों से परिपूर्ण यह मिथिला भूमि इस विश्व में अद्वितीय भूमि के रूप में स्थापित है। यह वही मिथिला भूमि है जहां शुक्ल यजुर्वेद लेकर के याज्ञवल्क्य झूमते थे, जहां द्रष्टा का ज्ञान देने हेतु अष्टावक्र नाचते थे, जहां राजर्षि हो कर महर्षि वेदव्यास के संतान शुकदेव को साक्षी का ज्ञान राजा जनक ने दिया था, यह वही भूमि है जहां विश्व को शालीनता सिखाने के लिए माता सीता ने पदार्पण किया था, जहां करुणा, ध्यान और प्रेम के प्रतीक भगवान बुद्ध का अवतरण हुआ था। धार्मिक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और प्रज्ञा के क्षेत्र में विश्व में अपना अस्तित्व रखने के कारण मिथिला आज भी सम्मानित है।आज फिर से अपने सांस्कृतिक विरासत को निरंतरता देने हेतु भाई और बहन के बीच अटूट प्रेम आस्था और समर्पण का त्यौहार, प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन का त्यौहार, सामाजिक शालीनता और सदभाव का त्यौहार,आनंद उमंग और हार्दिकता का त्यौहार सामा चकेवा मिथिला के घर आंगन गलियारों और चौक चौराहों पर मनमोहक साज सज्जा के साथ बाँस का डाला लिए यहां की लड़कियां नाचते, गाते, झूमते हुए नजर आएंगी।

 

 

जिस मनोरम दृश्य का दर्शन लाभ लेने अप्सराएँ और देवताएँ भी प्रतीक्षारत रहते हैं। द्वापर युग से कलयुग तक अक्षुण्ण रूप में मनाते आ रहे इस पर्व का अपना ही मौलिकता है। कहा जाता है की श्री कृष्ण और जाम्बती की दस लडकों में बड़ा लड़का साम्ब और एक बेटी साम्बा (सामा) थी। साम्ब और साम्बा दोनों अति सुन्दर थे। और दोनों भाई बहनों में अटूट प्रेम भी था। प्रकृति प्रेमी साम्बा प्राय: घूमने-फिरने जंगल जाया करती थी। जहाँ मुनि कुमार चारुवक्य से उसे प्रेम हो गया। वह प्रत्येक दिन जंगल में चारुवक्य से मिला करती थी। इधर कृष्ण का सामंत चुड़क भी अंदर ही अंदर साम्बा को चाहता था। उसे साम्बा का चारुवक्य से इस तरह मिलना जुलना अच्छा नहीं लगता था। इर्ष्या बस एक दिन उसने साम्बा और चारुवक्य के संबंध की खबर पिता श्री कृष्ण को बढ़ा चढ़ा कर कह सुनाया। इतना सुनते ही कृष्ण क्रुद्ध हो गए। साथ ही अपनी प्यारी बेटी साम्बा को श्राप दे दिया – “तुम चकबी पक्षी (एक प्रकार की चिड़िया) बन जाओ और जंगल में ही विचरती रहो”। श्राप के साथ ही साम्बा चकबी बन गई, पर, उसने भी चूड़क को श्राप दे ही दी – “जिस मुँह से तुमने हमारी चुगली (शिकायत) की है, कलियुग में हमरी बहनें तुम्हारे उसी मुँह को झड़काएगी (जलाएगी)”। इस श्राप से चुड़क तिलमिला उठा।
इधर साम्बा के वियोग में चारुवक्य बहुत दुःखी रहने लगा। साम्बा से पुनरमिलन के सारे रास्ते बंद देखकर चारुवक्य ने औढ़रदानी गोपेश्वर महादेव के तपस्या में लीन हो गया। तपस्या से महादेव प्रसन्न होकर
चारुवक्य से वरदान माँगने को कहे। वरदान में
चारुवक्य ने अपने को चकबा बना देने को कहा। भगवान महादेव के एवमस्तु के परिणाम स्वरूप
चारुवक्य मुनिकुमार से चकबा पक्षी बन गया तथा
साम्बा के साथ चकबा-चकबी के रूप में वृन्दावन में रहने लगा। आज के प्रेमियों के लिए यह एक जबरदस्त उदाहरण है,त्याग और समर्पण का।
यह जान कर की साम्बा और चारुवक्य दोनों जंगल में फिर से एक साथ चकबा-चकबी के रूप में रहने लगा है चुड़क को यह अच्छा नहीं लगा उसने वृन्दावन जैसे सुन्दर जंगल में ही आग लगा दिया ताकि आग के साथ दोनों ही जल कर मर जाय। पर, अचानक ही बारिश शुरु हो गई और आग बूझ गई। जा को राखे साइयां मार सके न कोय।
इधर साम्बा का भाई साम्ब, जब अपनी शिक्षा पुरी कर गुरुकुल से लौटा तो अपनी बहन के
चकबी बन जाने के कारण उदास रहने लगा। पिता से श्राप वापस लेने के लिए प्रार्थना करने लगा।
इस प्रकार प्रिय पुत्र के अनुनय विनय को स्वीकार कर श्रीकृष्ण ने बताया की जब समस्त ब्रजबासी महिलाएँ गोपेश्वर महादेव के प्रांगण में मिट्टी के सामा और चकेवा के रुपमे रहे चारुवाक का मूर्ति बनाकर कार्तिक शुक्ल पंचमी से पूर्णिमा तक गीत नृत्य के साथ महादेव से अराधना करेंगी और चूगली लगाने बाला चुड़क के मुहको झड़काया जाएगा तब महादेव के कृपा से वे दोनों मानव रूप में आ जाएंगे। बस उसी दिन से भाई साम्ब के प्रयास से यह कार्य सुरु किया गया और पूर्णिमा के दिन दोनों मानव रूप में उपस्थित हुए। तब से यह पर्व मिथिलानी आजतक मनाती आ रही हैं।
पद्मपुराण में उल्लेख है:-

* नास्ति भ्रातृसमो बन्धुर्नास्ति भ्रातृसमं सुखम्।
धन्यास्ता: कृत कृत्याश्च यासाभ्भ्रता सहोदरे॥

अर्थात्, भाई जैसा वन्धु दूसरा नहीं होता है । ऎसे ही भाई जैसा सुख भी दूसरा नहीं । वह धन्य तथा कृत-कृत होता है, जिसको सहोदर भाई होता है ।

*यत्प्रसादा दहं मुक्ता सभ्राता मम जीवतु।
पद्म पुराण
अर्थात्, जिनके (भाई) कृपा से मैं मुक्त हुई हूँ मेरा वह भाई सदा जीवित रहे।


लगभग पन्द्रह दिनों तक चलने वाला पूजनोत्सव
सामा-चकेबा सम्पूर्ण भारत वर्ष का एक मात्र ऎसा पर्व है, जो भाई-बहन के बीच के संबंध के प्रगाढ़ता को दर्शाता है। मैंने बचपन में अपने गांव और कुटुंब के यहां जहां मेरी बहने और दीदी रहा करती थी। मैं जाता था सामा चकेवा के उत्सव में शामिल होने जिसे फाड़ भड़ाना भी कहते हैं। और मैंने देखा कि गांव गांव के अपने अपने शैली होते हैं। अलग अलग रूप में सामा चकेवा के उत्सव को मनाने का प्रक्रिया देखा। कहीं सैकड़ों बालाएं अपनी डालाओं को गोल रखकर नाचते गाते झूमते दिखाई दिए तो कहीं छोटे-छोटे समूहों में इस उत्सव को मनाते हुए मैंने देखा। आज पाश्चात्य आकर्षण और प्रभाव के कारण उत्साह की कमी दिखाई दे रही है। पढ़े लिखे लोग ही अपनी इस दिव्य सांस्कृतिक त्यौहार को अपनी खुद के प्रतिष्ठा का विषय बना कर इससे दूर होते नजर आ रहे हैं। जब की गाँव में यह पूर्ण रुपेण जिन्दा है।
आज भी यहाँ की महिलाएँ शिर पे सामा के डालाओं को लेकर मधुर संगीत बिखेरते हुए जब घर से निकलती हैं,तो कुछ पल के लिए गाँव स्वर्ग में तबदील होते नजर आता है।अपनी गीतों के जरिए पोखरी खनाना,बगीचे लगाना, जंगल लगाना तथा जंगल को बचाने की संदेस देने की बात करतीं हैं। प्रेम और त्याग के प्रतिक सामा चकेवा को भगवान की तरह पूजा जाता है वही दुष्टता विध्वंस के प्रतिक चुगला चुड़क को गाली देते हुए मुह काला कर दिया जाता है।
अंतिम दिन सामा का भसान होता है। इसे बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है। मैं अपनी वाल्यावस्था में इस दिन डाला को सजाने में बहुत ही सक्रीय रहा करता था।इसी दिन सामा श्राप मुक्त हुई थी। इस समय समूचे गाँव की युवतियाँ नए-नए/सुन्दर वस्त्र पहन, सज-धज कर एक खाली खेत या मैदान में जमा होती हैं। गीतों की गूँज वातावरण को मोहित बना देती है। सभी डाला को गोल में रखा जाता है। कुछ युवतियाँ मोहक गीत गाती रहती है और उसके लय पर बाकी युवतियाँ कदम-ताल मिलाकर नृत्य करती हैं। यह एक लोक नृत्य का रूप धारण कर लेता है। युवतियों की अलग-अलग टोलियाँ होती हैं और गीत तथा नृत्य का अघोषित प्रतियोगिता-सी चलने लगती है। देर रात को युवतियाँ पूर्णिमा के उजाले में सामा का विसर्जन करती है। पुन: अपने-अपने भाइयों को नए धान का चूरा तथा नए ईख से बने गुड़ उनके गमछी या फाँड़ा में देती हैं।
तथा भाई उसमे से एक मुठी बहन को देता है। साथहि ऊपर से उपहार भी दिया करते हैं। इस प्रकार बड़े ही उत्साह उमंग और हृदयस्पर्शी वातावरण में सामा चकेवा का यह मनोरम त्योहार पूर्ण होता है। एक मधुर मुस्कान स्नेहिल वातावरण तथा हृदयस्पर्शी माहौल के बीच यह अद्भुत त्योहार वास्तव में मानव जाति के लिए उनके जीवन में प्रेम, आनंद, करुणा और सहिष्णुता के सागर को उमारने के लिए परमात्मा का अद्भुत उपहार है।

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