Sat. Apr 20th, 2019

धर्मान्तरण की बढ़ती परम्परा स्वेच्छा या विवशता ! – डा. श्वेता दीप्ति

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हिमालिनी, अंक फेब्रुअरी 2019 |किसी भी पंथ विशेष या संप्रदाय को मानने वाले लोगों को एक साथ जोड़ कर रखने में धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका होती है । साथ ही, यह भी सर्वविदित है कि दुनिया के सभी धर्म कौमी एकता का संदेश देते हैं । विश्व के प्राचीनतम धर्मों से ही प्रेरणा लेकर कई नए धर्मों की स्थापना हुई है । जैसे कि हिंदू धर्म जिसे सत्य सनातन धर्म भी कहा जाता है, से कई धर्म, पंथ एवं विचारधाराओं का अविर्भाव हुआ है लेकिन अलग–अलग पंथों ने अपनी एकल इकाईयां तैयार की है जो कालांतर में पंथ विशेष में परिवर्तित होते चले गए । पूरी दुनिया में सभ्यता के विकास के साथ ही विभिन्न धर्मों की स्थापना हुई और हरेक धर्म मनुष्य जीवन को नैतिकता, ईमानदारी एवं सच्चाई का साथ देते हुए जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं । विश्व के लगभग सभी धर्म हमें दूसरों की भलाई करना एवं एक संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं । साथ ही, हर धर्म की पूजा पद्धति भी अलग–अलग होती है लेकिन वे सभी अलग–अलग तरीकों से लोगों को एक साथ जुड़े रहने की प्रेरणा देते हैं । अर्थात् सभी धर्मों के मूल में कौमी एकता को प्रोत्साहित करने की भावना का समावेश होता है । दूसरे शब्दों में अगर कहा जाए तो हर धर्म की स्थापना के पीछे एकमात्र उद्देश्य पारस्परिक एकता को बढ़ाना है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी । हर धर्म लोगों को एक साथ मिलकर समाज को बेहतरी के रास्ते पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं ।
मुख्यतः विश्व में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई एवं पारसी आदि प्रमुख धर्म हैं और इन सभी धर्मों का विकास लोगों को एकजुट रखने के लिए ही हुआ है । यह भी सर्वविदित है कि एक धर्म के लोगों के वर्चस्व से जनमत भी तैयार होता है । यही कारण है कि विश्व के कई प्रमुख धर्मों के धर्म प्रचारक भी हैं जो अपने धर्म के प्रचार में लगे रहते हैं । खुलकर तो लोग धर्म परिवर्तन आदि के मद्दों पर बात नहीं करते लेकिन कहीं न कहीं ज्यादा से ज्यादा लोगों का धर्मंतरण कराना और किसी एक धर्म के लोगों की संख्या बढ़ाना भी इन धर्म प्रचारकों का उद्देश्य होता है । ऐसा मानना है कि एक धर्म के लोगों के बीच एक समान विचारधारा पनपती है और फिर इस समान विचारधारा का प्रयोग राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए किया जाता है । इस एक समान विचारधारा के पीछे भी एकता की भावना ही है । जब एक धर्म विशेष के लोग एक जगह पर इकट्ठा होते हैं तो उनके बीच में वैचारिक एकता सीधे तौर पर परिलक्षित होती है ।

इन सभी पंथों को मानने वाले लोगों में व्यापक स्तर पर विभिन्न मद्दों पर एकजुटता परिलक्षित होती है । धार्मिक एकजुटता की वजह से ही कोई भी समाज प्रगति की राह पर चल सकने में समर्थ होता है । यही वजह है कि हर राष्ट्र अपने सीमाओं के भीतर कौमी एकता को प्रोत्साहित करते हैं । लोगों के बीच अगर एकता एवं सामंजस्य न हो तो धर्म की परिकल्पना ही बेमानी हो जाती है । हिंदू धर्म की तरह ही मुस्लिम, सिख एवं इसाई धर्मों में भी एक विचारधारा की वजह से लोगों में एकजुटता की भावना का विकास हुआ है ।
इस आदर्श आचार संहिता अर्थात् धर्म का उद्देश्य मनुष्य को सही तरीके से जीवन जीने के लिए प्रेरित करना है । धार्मिक एकता एवं समभाव की वजह से ही एक समुदाय बनता है जिससे अपने नागरिकों के प्रगति के लिए सामूहिक रूप से किए गए प्रयासों की अपेक्षा होती है । धार्मिक समरसता एवं एकता की वजह से ही समाज के सभी लोगों में साझा संस्कृति का विकास होता है । ऐसी स्थिति को ही दूसरे शब्दों में सामाजिक एकता भी कहते हैं । इस प्रकार निश्चित रूप से धर्म एकता का माध्यम है ।

यह बहुत ही दुखद तथ्य है कि अधिकतर धर्म या पंथ बाहरी दिखावे पर ही टिके हुए हैं । वह भी कट्टर धर्म–प्रचारकों की इस कल्पना पर कि भगवान केवल उनके ही हैं और भगवान की कृपा केवल वे ही लोग बाँट रहे हैं । ईसाई धर्म के सर्वोच्च गुरु पोप जान पाल जब भारत यात्रा पर गए थे तो उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा को धार्मिक यात्रा बना दी थी और खुलकर कहा था कि समूचे एशिया में ईसाइयत को फैला दिया जाय । आशय स्पष्ट था कि एशिया के तमाम देशों में धर्म परिवर्तन के प्रबल प्रयत्न किए जाय । और वहाँ रह रहे हिन्दू, बौद्धों मुस्लिमों को ईसाइयत में दीक्षित किया जाय । परम्परा से प्राप्त उनके धर्म को छोड़ने लिए कहा जाय, मनाया जाय, तैयार किया जाय और अंततः मत परिवर्तन कराया जाय ।

पोप जान पाल की इस आह्वान की व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी और व्यापक विरोध भी, बावजूद इसके इसका असर आज भी देखा जा रहा है । जहाँ सेवा भाव को दिखा कर उसकी आड़ में मजे से धर्मान्तरण हो रहा है । जहाँ अशिक्षा है, अपने धर्म के प्रति सही ज्ञान नहीं है, गरीबी है बेरोजगारी है और चेतना का अभाव है वही क्षेत्र धर्म परिवर्तन के लिए चुना जाता है और उन्हें इसमें कामयाबी भी मिलती है ।
धर्मांन्तरण हमेशा से विवादित विषय रहा है और इस पर खुलकर चर्चा करने से भी लोग हिचकते हैं । बड़े पैमाने पर यह हो रहा है जिसकी वजह से लोग अपनी जीवन पद्धति से भी अलग हो रहे हैं । धर्म परिवर्तन के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव भी हुए हैं । धर्मांन्तरण के प्रभाव चाहे जो भी हों पर हमारी परम्परा मानती है कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह अनुचित कर्म है । महात्मा गाँधी मानते थे कि धर्म बदलने का अर्थ है, व्यक्ति की अन्तरात्मा को बदलना और अन्तरात्मा कोई वस्त्र या आभूषण नहीं है कि इसे पहना या उतारा जाय या फिर बदला जाय । वह पिछले जन्मों के संस्कारों का समुच्चय है । महात्मा गाँधी ने लिखा है कि, माता पिता की भाँति ही धर्म भी व्यक्ति को जन्म के साथ ही मिलता है । जनक जननी को जैसे नहीं बदला जाता वैसे ही धर्म भी नहीं बदला जा सकता है । यदि कोई यह प्रयास करता है तो वह प्रकृति के विरुद्ध जाता है ।

बौद्ध धर्म के प्रसिद्ध विद्वान और तिब्बत की निर्वासित संसद के अध्यक्ष प्रो. सामदेग रिनपोचे ने भी माना है कि किसी को धर्म की शिक्षा देना अलग बात है पर किसी को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाना अपने मार्ग से भ्रष्ट करने की तरह अपराध है । बौद्ध परम्परा तो यहाँ तक कहती है कि जब तक कोई व्यक्ति याचना न करे तब तक धर्म की शिक्षा भी नहीं देनी चाहिए । प्रो । सामदेग मानते है । कि बौद्ध धर्म हिन्दूपरम्परा की ही एक घटना थी । बुद्ध ने अपने उपदेशों मे कहीं भी ब्राह्मणों की निन्दा नहीं की है । पिटक ग्रंथ में बुद्ध के कई वचन संग्रहित हैं जिनमें यह मार्ग वेद सम्मत अथवा वेदवाणी का ही विस्तार है ।

अपने धर्म के प्रचार प्रसार में लगे लोग लोभ को बढावा देकर और अपने धर्म की सर्वोच्चता को दिखाकर लोगों को दिग्भ्रमित करते हैं । अक्सर इस बाहरी दिखावे वाली धार्मिक अनुभूति के कारण, उन्हें अपनी भक्ति से अधिक इस बात में सफलता और सुरक्षा का एहसास होता है कि हमने कितने लोगों को अपने पंथ से जोड़ दिया, जो कि एकमात्र सच्चा पंथ है । इस कारण वे लोगों को विभिन्न तरीकों से अपने पंथ में लाने के लिए लुभाते हैं, जो अंततः उन्हें आतंरिक रूप से संरक्षित भावना एवं बाहरी रूप से राजनैतिक बल प्रदान करता है । जबकि वास्तविक आध्यात्मिक प्रगति तब होती है जब लोग भौतिकतावादी से परिवर्तित होकर अध्यात्मवादी बन जाएँ, वे सांसारिक वस्तुओं से आसक्ति छोड़कर भगवान की भक्ति में लग जाएँ । यह वास्तविक परिवर्तन होता है । परन्तु जब लोग भौतिक लाभ के लिए धर्म–परिवर्तन करते हैं तो यह मूर्खतापूर्ण है ।

धर्म परिवर्तन के पहले भी वे भौतिक–आसक्ति से परिपूर्ण थे और धर्म–परिवर्तन के बाद भी वे वैसे ही रहे, मात्र धर्म का पट्टा बदल गया, बस । ये बिल्कुल ऐसा ही है कि इस ब्रांड की चीजें पसन्द नहीं हैं तो कोई और ब्रान्ड का सामान ले लो ।
इस प्रकार एक ब्रांड की भौतिक आसक्ति से परिवर्तित होकर दूसरे ब्रांड की आसक्ति अपना लेने से, न तो परिवर्तन करने वाले का आध्यात्मिक रूप से कुछ भला होता है न परिवर्तित होने वाले का । वास्तव में इस प्रकार से परिवर्तित किये गए लोगों में अपने पूर्व धर्म के प्रति द्वेष की भावना भर दी जाती है, जो अंततः सामाजिक एवं पारिवारिक समरसता को अस्त–व्यस्त कर देती है । धर्म–परिवर्तन द्वारा लोगों के मन में दूसरे धर्मों के प्रति द्वेष भरकर उनसे अपना राजनैतिक प्रयोजन साधना एक आम बात हो गयी है । धर्म–परिवर्तन की यह कड़ी किस हद तक जा सकती यह समझ पाना साधारण भोले–भाले लोगों की समझ के परे होता है । उन्हें तो मात्र सुलभ जीवन और सरल भौतिक–इन्द्रियतृप्ति से बढ़कर कुछ नहीं चाहिए होता । दूसरी ओर यदि लोगों में भगवान और धार्मिक धरोहर के प्रति प्रेम और ज्ञान ही न हो तो वे न तो स्वयं उसका पालन करेंगे और न ही प्रलोभनों द्वारा धर्म–परिवर्तन करने वाले धर्मोपदेशकों का विरोध करेंगे ।
इस प्रकार के धर्म–परिवर्तन करने वालों की तुलना में ऐसे भी धर्मनिष्ट व्यक्ति हैं जो दूसरे धर्म के सच्चे अनुयायियों से प्रेरणा लेते हैं । उन्नीसवीं सदी के वैष्णव संत शास्त्रज्ञ, श्रील भक्तिविनोद ठाकुर अपनी उदार–प्रवृत्ति इस प्रकार व्यक्त करते हैं ः ‘जब हम किसी दूसरे धर्म के पूजास्थल पर उनकी पूजा के समय पहुंचें तो हमें यह विचार करते हुए आदरपूर्वक वहां रुकना चाहिए ः ‘मेरी पूजा–पद्धति से भिन्न रूप में मेरे सर्वोच्च भगवान यहाँ पूजे जा रहे हैं । इस भिन्न पूजा–पद्धति को मैं पूर्णतया समझ नहीं पा रहा, परन्तु इसे देखकर अपनी पूजा–पद्धति के प्रति मेरा आकर्षण बढ़ गया है । भगवान एक ही हैं । मैं उनके प्रतीक–चिन्ह के समक्ष यह समझकर नतमस्तक होता हूँ कि वे इस रूप में मेरी प्रार्थना स्वीकार कर लें ताकि मेरा प्रेम उनके उस स्वरुप के लिए अधिक बढ़ जाये जिस स्वरुप से मुझे लगाव है । ’ इसलिए श्रील प्रभुपाद कहा करते थे, ‘हम यदि भगवान के पास दैनिक भरण–पोषण के लिए जाते हैं तो यह हमारा उस भरण–पोषण से प्रेम दर्शाता है, नाकि भगवान से । ’ वैदिक शास्त्रों के अनुसार भगवान को सही मायने में समझने और पाने के लिए हमें उनके नाम का जप करना चाहिए, जिस से हम तुच्छ भौतिक प्रलोभनों से बच जायेंगे । श्रील प्रभुपाद ने इसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व में अकेले घूम–घूमकर शुद्ध भक्ति का प्रचार किया तथा अनेक लोगों को भगवान से प्रेम करना सिखाया । आजकल हर धर्म के लोगों के वास्तविक आनंद रूपी धन को लूटने वाला एकमात्र शत्रु है ः नास्तिक भौतिकतावाद । श्रील प्रभुपाद कहते हैं, ‘धर्म का सार है भगवान को समर्पण करना । आप किसी भी धर्म का पालन कीजिये परन्तु सार यही है कि उन्हें समर्पण करना है । यदि आप केवल इन्द्रियतृप्ति के विषय में ही विचार करेंगे तो धर्म कहाँ है ? आजकल स्थिति ऐसी ही है । इन्द्रियतृप्ति में लिप्त होने के कारण किसी को वास्तविक धर्म का ज्ञान ही नहीं है । धर्म का सार है भगवान को समर्पण । अब यदि आप को यही नहीं पता की भगवान कौन हैं तो आप समर्पण किसे करेंगे ? इसलिए पहले उन्हें जानने का प्रयास करना चाहिए । इस प्रकार धीरे–धीरे हम उन्हें जानकर समर्पित हो सकते हैं । और यही धर्म का मूल आधार है
धर्म–परिवर्तन होता आया है । यह एक नितांत व्यक्तिगत मसला हो सकता है पर धर्म परिवर्तन का आधार प्रलोभन या दवाब नहीं होना चाहिए । किन्तु ऐसा होता नहीं है, इसकी जड़ कहीं ना कहीं लालच पर ही टिकी हुई है । धर्मपरिवर्तन कर सकते हैं परन्तु उनकी आस्था भगवान की भक्ति एवं समर्पण रूपी वास्तविक आनंद के आस्वादन में होना चाहिए । इसलिए सभी धर्मावलंबियों को सबसे पहले अंदर झांककर अपने धर्म में वर्णित आध्यात्मिक सार को समझना चाहिए । इस प्रकार जब वे स्वयं को परिवर्तित कर चुके होंगे तो वही आध्यात्मिक सार वे बाहर भी साझा करेंगे और अंततः स्वयं तथा संसार का भला हो सकेगा ।
जिहादी ‘लव जिहाद’के माध्यम से ये करते हैं, तो एक ओर ईसाई धर्म–परिवर्तन के द्वारा हिंदू धर्म को खोखला बना रहे हैं तथा धर्म शिक्षा न मिलने के कारण धर्माभिमानशून्य हिंदू समाज बड़ी मात्रा में इसका बलि बन रहा है । धर्म–परिवर्तन को रोकने हेतु प्रभावी उपाय करने आवश्यक है जिसमें कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक है– हिंदुओं का धर्म–परिवर्तन होने का मुख्य कारण है, धर्म के विषय में अनभिज्ञता । यह अनभिज्ञता दूर करने के लिए सर्वत्र के हिंदुओं को धर्मशिक्षा देने की व्यवस्था प्रत्येक नगर, देवालय और विद्यालय में की जानी चाहिए । धर्मशिक्षा मिलने से हिंदु स्वधर्म के अनुसार आचरण करेंगे और उन्हें स्वधर्म की श्रेष्ठता की अनुभूति होगी । अनुभूति होने पर धर्माभिमानी हिंदू, धर्म–परिवर्तन की बलिवेदी पर नहीं चढ़ेंगे ।
हिंदुओं को अपने बच्चों पर बचपन से ही प्रतिदिन नियमित रूप से रामरक्षास्तोत्र, हनुमानचालीसा तथा ‘कराग्रे वसते लक्ष्मी..’, ‘शुभं करोती’ इत्यादि आचारपालन से संबंधित श्लोक सिखाने चाहिए । उन्हें रामायण एवं महाभारत धर्मग्रंथों की कथा सुनाकर धर्मप्रेमी बनाना चाहिए ।
धर्म–परिवर्तन का कृत्य समाजविरोधी, राष्ट्रविरोधी एवं धर्मविरोधी है । इसका सर्वत्र के हिंदुओं को संगठित होकर वैध मार्ग से विरोध करना चाहिए । अन्य धर्मीय विद्यालय–महाविद्यालय हिंदू छात्रों को स्वधर्म से दूर करते हैं और परधर्म के अनुसार आचरण करना सिखाते हैं । इसीलिए ऐसे विद्यालय–महाविद्यालयों से हिंदुओं की भावी पीढ़ी के लिए धर्मांतरण का बड़ा संकट खड़ा हो गया है । ऐसे में हर राष्ट्र को इस कुप्रथा से बचाव के रास्ते भी ढूँढना चाहिए और उसे कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए ।
आज नेपाल में भी धर्मान्तरण की परम्परा जोर शोर से चल रही है । हम सभी जानते हैं कि नेपाल में गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी चरम सीमा पर है । यही कारण है कि यहाँ लोग ईसाई धर्म की ओर जबरन झुक रहे हैं । तीव्र गति से फैलते धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए नेपाल सरकार ने कड़ा कानून बनाया है । २०६२÷२०६३ के जन आन्दोलन पश्चात धर्म निरपेक्ष की आड़ में नेपाल के अन्दर भयावह तौर से बढ़ता धर्म परिवर्तन को अब संगीन अपराध माना जायेगा और इस में संलग्न अपराधियों को कड़ी सजा का भागीदार बनना होगा । नेपाल सरकार ने धर्मपरिवर्तन को फौजदारी अपराध बनाने के पश्चात कानून के एक दफा के मुताबिक कोई भी व्यक्ति÷संगठन धर्मान्तरण में संलग्न अथवा प्रोत्साहन नहीं कर सकता । हाल फौजदारी कसूर सम्बन्धी प्रचलित कानून का संशोधन और एकीकरण करने के लिए बने विधेयक २०७१ के परिच्छेद ९, धर्म सम्बन्धी कसूर अन्तर्गत दफा १५६ में धर्म परिवर्तन को दण्डनीय बनाने वाली धारा–१५६) में उल्‍लेख किया गया है कि धर्म परिवर्तन नहीं कराया जा सकता (१) कोई भी किसी का जबरन धर्म परिवर्तन नहीं करा सकता और न ही उसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए । (२) कोई भी किसी भी जात, जाति या सम्प्रदाय में सनातन से चले आ रहे धर्म, मत या आस्था में खलल डालना या व्यवहार करना या प्रलोभन देना गलत होगा और प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराने के लिए उसका प्रचार या प्रसार किया जाना गलत होगा । (३) उपदफा (१) वा (२) बमोजिम कसूर करने वाले व्यक्ति को पाँच वर्ष कैद और पचास हजार रुपया तक का जुर्माना हो सकता है । (४) उपदफा (१) वा (२) बमोजिम कसूर करने वाला अगर व्यक्ति विदेशी है तो उस व्यक्ति को इस दफा बमोजिम कैद और सात दिन के भीतर नेपाल छोड़ना होगा । सरकार द्वारा बनाए गए इस कानून का ईसाई समुदाय द्वारा काफी विरोध भी जताया गया है ।
लम्बे समय तक हिन्दू अधिराज्य के रूप में रहे नेपाल को धर्मनिरपेक्षता घोषणा करने के एक दशक बाद नया संविधान बना । नये संविधान की घोषणा के दो बर्ष बाद इस तरह का कानून बनाया गया है । अनियन्त्रित एवं बढ़ते धर्मान्तरण से नेपाली मूल संस्कृति और सभ्यता का विनाश कर देश में धार्मिक उपनिवेश का खतरा बढ़ा हुआ था । यह कोई एक धर्म, जात या समुदाय विशेष की समस्या नही बल्कि सम्पूर्ण देश समस्या थी । इस कानून से धर्मान्तर कुछ हद तक रूकने की आस है ।
धर्म परिवर्तन आज से नहीं हो रहा है । सदियों से हो रहा है । एक समय में पड़ोसी राष्ट्र में कश्मीर पूरा हिंदू ही था । किन्तु आज का कश्मीर सबके सामने है । आखिर धर्म परिवर्तन होता क्यों है ? तो सीधी सी बात इसका मूल कारण गरीबी और जात–पांत है । लोग धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून बनाने की मांग कर रहे हैं, पर अगर हिंदू संगठन चाहते हैं कि कोई हिंदुओं का धर्म परिवर्तन न कराए तो वे यह सोचें कि इसके लिए वे क्या कर रहे हैं ? जात–पांत की दीवार तोड़ने में उनकी क्या भूमिका है ? तमाम योजनाओं के बावजूद गरीबी क्यों बढ़ती ही जाती है ? जब तक ये दोनों कारक मौजूद हैं, किसी कानून से धर्म परिवर्तन को रोकना मुश्किल है । वैसे भी धर्म निजी आस्था और पसंद का सवाल है । जबरिया कोई किसी को अपने यहां बनाए नहीं रख सकता ।
मूलतः सभी धर्मों का प्रादुर्भाव लोगों में एकता की भावना को बढ़ाने के लिए ही हुआ है । लोगों के बीच अगर एकता एवं सामंजस्य न हो तो वे किसी एक धर्म विशेष को नहीं अपना सकते । सभी धर्मों की स्थापना के पीछे एक प्रकार की जीवनशैली एवं वैचारिक सामंजस्य ही होता है जो सामूहिक एकता के रूप में प्रखर होकर समाज की स्थापना करते हैं । समाज में एकता को बनाए रखने मे धर्म अहम भूमिका निभाता है । धर्मपरायणता का पालन किसी भी समाज के विकास एवं उसेक नागरिकों के कल्याण के लिए अनिवार्य है । जैसे–जैसे दुनिया में सभ्यता का विकास हुआ है धर्म की आवश्यकता महसूस होने लगी, क्योंकि हर समाज को संचालित करने के लिए एक आदर्श आचार संहिता का पालन किया जाना जरूरी था ।

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