Thu. Jan 17th, 2019

व्यापारी घराने का साहित्यिक चिराग ‘बसन्त चौधरी’ : रमण घिमिरे

बसन्त चौधरी

हिमालिनी, दिसम्बर अंक २०१८ में प्रकाशित | विनम्र स्वभाव, भावुक मन और व्यवहार कवि बसन्त चौधरी के व्यक्तित्व की विशेषताएं हैं । उनसे हुए प्रथम साक्षात्कार से ही किसी भी व्यक्ति में उनके ये गुण संचारित होते हुए क्रमशः प्रगाढ़ होते चले जाते हैं । इसके साथ ही आप के स्वभाव में मिलनसार, परोपकारी और सहयोगी भावना जैसे विशिष्ट गुण शामिल हैं । ये इनकी अपनी माँ आदरणीय गंगादेवी चौधरी से सीखे दिव्य पाठ हैं । इनकी माँ गंगादेवी चौधरी परोपकारी भावना से ओतप्रोत महिला थीं ।

बसन्त चौधरी का जन्म एक मध्यम परिवार में दिनांक ३ अप्रिल १९५७ बुधबार के दिन काठमांडू खिचापोखरी में माँ गंगादेवी और पिता लूनकरणदास चौधरी के मझले पुत्र के रूप में हुआ । इनका वो जन्मघर आज भी बाल्यकाल की स्मृतियां लिए खड़ा है ।
पिता लूनकरणदास अपनी सन्तानों का लालन–पालन और शिक्षा में एक सामान्य आम नागरिक के बच्चों जैसा ही व्यवहार करना चाहते थे । जिसके पीछे उनका उद्देश्य अपनी सन्तान को नेपाली जनजीवन और परिवेश का धरातलीय यथार्थ बोध रहे बस यही था । इसी आधार भूमि पर उन्होंने अपनी सन्तान की देखरेख और पालन–पोषण की । इसी वजह से उन्होंने बसन्त चौधरी को भी काठमांडू क्षेत्रपाटी के सामान्य स्कूल आदर्श विद्या मन्दिर में भर्ती करवा दिया । मगर कुछ समय बाद शायद उन्होंने महसूस किया–इससे कुछ स्तरीय विद्यालय में अध्ययन कराना उचित होना । अतः उसके बाद उन्होंने सानोठीमी, भक्तपुर के आदर्श बहुउद्देश्यीय विद्यालय में पढ़ाना शुरु करा दिया । वहीं से बसन्त चौधरी ने प्रवेशिका परीक्षा उत्तीर्ण की और क्षेत्रपाटी के पब्लिक युथ कैंपस में प्रवेश कर वहीं से स्नातक श्रेणी की शिक्षा हासिल की ।
बसन्त चौधरी के व्यक्तिगत परिवार की बात करें तो, मीना चौधरी के साथ दाम्पत्य जीवन की शुरुवात हुई । जिसके पाँच वर्ष पश्चात् उनके परिवार में बेटी मेघा का आगमन हुआ । जिसके बाद उन्होंने दूसरी सन्तान की कल्पना भी नहीं की । सामान्यतया उस समय में आम लोगों की धारणा रहती थी कि पुत्र बिना परम्पराओं को निरन्तरता नहीं मिलती, ऐसी रुढि़वादी सोच पाई जाती थी । उस पर एक व्यवसायिक घराना तो बेटी को पुश्तैनी हकदार ही नहीं मानता था । मगर इस दम्पत्ति ने वो तमाम जड़सूत्रवादी मान्यताओं का बहिष्कार करते हुए अपनी पुत्री मेघा को भरपूर प्यार और स्नेह का सिंचन करके बढ़ाया और पढ़ाया । अब वो मेघा को अपने उद्योग–व्यापार को परम्पारगत बागडोर सम्हालने हेतु योग्य बना चुके हैं ।

रुढि़ग्रस्त, पुरातनवादी परम्पराओं को तोड़कर नयी परम्परा की शुरुवात करने में इस दम्पत्ति ने ना सिर्फ एकमात्र पुत्री सन्तान स्वीकार की वरन (बल्कि) इस दम्पत्ति ने रुढिवाद से ग्रस्त अपने समुदाय के लिए ही एक क्रान्तिकारी काम किया, जब मेघा चौधरी का विवाह मारवाडी समुदाय से एकदम ही अलग नेवार सम्प्रदाय के परिवार के वर पारस शाक्य के साथ सम्पन्न करने का निर्णय लिया ।

एक व्यक्ति बहुआयामिक प्रतिभा हो सकता है । मगर सभी में ये विशेषता नहीं होती है । ऐसे ही कुछ बहुआयामिक प्रतिभावान व्यक्तियों में आते हैं बसन्त चौधरी । ये प्रतिभा सर्वप्रथम समाजसेवी भावना से अंकुरित हुई । माता गंगादेवी बताती थी–‘बसन्त ने बहुत दफा अपनी फीस जमा कराने के पैसों से अपने आर्थिक अभाव से जूझ रहे सहपाठियों को मदद की । यानि दुःखी और अभावग्रस्त व्यक्ति देखते ही उनके मन में करुणा जाग्रत हो जाती थी । होने को तो उस समय उनके खुद की जेब में भी यथेष्ठ पैसे नहीं हुआ करते थे । मगर मन तो सब के पास होता ही है और मन धनी हो तो मनुष्य स्वतः उदार हो जाता है । इसी उदार मन की वजह से मां के दिए जेब खर्च से कटौती कर के औरों को सहयोग कर पाते थे । उन्हें किसी को सहयोग करके आत्मसन्तुष्टि मिलती थी, चाहे वो निकट आत्मीय हो या अपरिचित ही, क्यों न हो ।
वे बाल्यकाल से ही सम्वेदनशील और भावुक प्रकृति के व्यक्ति थे । बाद में वही गुण विकसित हो कर समाजसेवा के क्षेत्र में रूपान्तरित हुआ । संस्थागत रूप से समाज सेवा की शुरुवात हुई और उसी समय ये लियो क्लब ऑफ काठमांडू के साथ आबद्ध हुए । इसके तीन वर्ष पश्चात् अपनी सक्रीयता और लगनशीलता के कारण सर्वोच्च पद ‘अध्यक्ष के लिए मनोनीत हुए ।

आपने इस क्लब के साथ आवद्ध होने के बाद राजधानी के आसपास रह रहे पिछड़े ग्रामीणबासियों को लक्षित कर शिवरात्री के अवसर पर अनेकों स्वास्थ्य शिविर संचालन किया । इसी आधार भूमि पर खड़े हो कर अपने सुनसरी के दुहबी नामक स्थान पर ‘श्री लूनकरणदास–गंगादेवी चौधरी चैरिटी अस्पताल’ की स्थापना हुई ।

इस समय तक इनकी सामाजिक सेवा के क्षेत्र में किए गए योगदान की महक राजधानी के प्रतिष्ठित व्यक्तियों से लेकर दरबार के लोगों तक पहुँच चुकी थी । लगभग उसी समय तत्कालीन बडामहारानी ऐश्वर्य की अध्यक्षता में सामाजिक सेवा समन्वय परिषद् की स्थापना हुई । और बसन्त चौधरी के इन्ही योगदान की कद्र करते हुए महारानी ने उन्हें उक्त संस्था के कोषाध्यक्ष जैसे प्रतिष्ठित पद के लिए मनोनीत किया ।
बसन्त चौधरी के सामाजिक सेवा के क्षेत्र में की गई योगदान इतने में सीमित नहीं हुई, बल्कि वे तो पद के लिए काम करने को इच्छुक व्यक्ति ही नहीं थे । उपलब्धिपूर्ण और परिणाममुखी काम करना चाहते थे । तत्कालीन अधिराजकुमारी हेलन शाह नेपाल रेडक्रस सोसाइटी की अध्यक्षता में उन्होंने बसन्त का द्वार खोल स्वागत किया । इसके बाद वे भी समाज सेवा की विभिन्न गतिविधियों में मन, कर्म, वचन से सम्मिलित हुए और यथेष्ठ योगदान करने गए । बसन्त की अगुवाई और प्रयास से राजधानी में रेडक्रस के सहयोगार्थ पाकिस्तान के महान गजल गायक द्वय मेहन्दी हसन और हस्तियां जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने भी इसी प्रयोजन के लिए राजधानी में एकल गायन प्रस्तुत किए थे । ये आयोजनाएं नेपाल के लिए अपने आप में उम्दा और प्रशंसनीय रहीं । बसन्त नेपाल अर्बुद निवारण संस्था द्वारा उस समय एक और अपूर्व आयोजना हुई । उन्होंने स्वर–सम्राट नारायण गोपाल जैसे अद्वितीय गायक के एकल गायन ‘स्वर्णिम संध्या का आयोजन किया । स्वर सम्राट के गायन का पहला और एक मात्र कार्यक्रम अपने आप में एक इतिहास बन गया ।

इस समय तक ये समाज सेवा के विज्ञ ही बन चुके थे । इस कारण उस समय उन्हें एक और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई । बसन्त चौधरी को बड़ामहारानी एश्वर्य ने पशुपति विकास कोष का सदस्य सचिव मनोनीत किया । बसन्त चौधरी ने भी अपने इस कार्यकाल में इस क्षेत्र के सर्वांणीण विकास की गुरु योजना बनाकर उसे लागू भी किया । आज इस मन्दिर के परिसर का विस्तार, जीर्णोद्वार से लेकर स्वच्छता बसन्त की उन्ही योगदान का परिणाम है, कहने में कुछ अतियुक्ति नहीं होगी ।

पशुपति क्षेत्र विकास कोष के सदस्य सचिव पद पर रहते हुए उन द्वारा स्थापित अवधारणा हो या वहां से निवृत्त होने के बाद ‘बसन्त चौधरी फाउण्डेशन’ को स्थापना कर उसके द्वारा दूरदराज के गाँवों में समाज सेवा, शिक्षा ओर स्वास्थ्य के क्षेत्र में पहुँचाए गए योगदान हैं । ऐसी गतिविधियाँ बसन्त चौधरी को बहुआयामिक व्यक्तित्व और राष्ट्र और जनता प्रति के अक्षुण्ण निष्ठावान और समर्पण का अनुकरणीय व्यक्तित्व बना ली है ।
आप ने शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज सेवा के क्षेत्र में दिए योगदान आज ना सिर्फ उन क्षेत्रों में बल्कि समग्र नेपाल के सेवा क्षेत्र में अनुकरणीय बन चुके हैं । इस पर २०७२ के महाभूकंप से पीडित जनसाधारण के उद्धार और पुनस्र्थापन के लिए उक्त फाउण्डेशन ने प्रधानमन्त्री राहत कोष द्वारा पहुँचाया गया आर्थिक योगदान और भी सान्दर्भिक और समय सापेक्ष है । इनके अतिरिक्त उनके व्यक्तिगत प्रयास से हुए सम्पूर्ण योगदान का लेखाजोखा तो इस सीमित आलेख में असम्भव ही होगा ।
इनके नर्भिक इन्टरनेशनल हॉस्पिटल ने दुर्गम स्थानों पर संचालन किए गए वृहत्त निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर अपना इतिहास स्वयं बोलते हैं । सुनसरी के दुहबी में स्थापित लूनकरणदास गंगादेवी चौधरी चैरिटी अस्पताल ने उस क्षेत्र के करीब एक लाख जनता को पहुँचायी गयी निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा निजी तौर पर स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान माना जाता है । ऐसे अनेकों क्रियाकलाप के कारण बसन्त चौधरी एक विशुद्ध व्यापारी या उद्योगपति मात्र न होकर उदारमना समाजसेवी नया निष्काम मानववादी चरित्र के रूप में राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय परिवेश में परिचित, सम्मानित और स्थापित हुए हैं ।
ये तो हुए बसन्त के सभी द्वारा देखे गए सामाजिक कार्य, मगर प्रकाश में जो नहीं आ सकीं, ऐसी असंख्य गतिविधियां है, जिनके विवरणात्मक विश्लेषण करना चाहे तो इन सीमित पंक्तियों में सम्भव नहीं है । शिक्षा के हक में उनके कार्य और भी गहन और गरिमायुक्त हैं । व्यक्तिगत तौर पर शिक्षा और उच्च शिक्षा चाहनेवाले मेधावी मगर आर्थिक असक्षम विद्यार्थियों को उन्होंने छात्रवृत्ति प्रदान की है जिनके संख्या शायद उन्हें स्वयं भी याद नहीं । समष्टि में उनसे सहयोग मांगने आए सभी को यथासम्भव सहयोग करना उनका स्वभाव रहा है । परहित और परोपकार के मामले में उन्होंने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी । परोपकार इनके स्वभाव बन चुका है और उनकी नसों में बहते रक्त कणिकाओं के साथ ये भावना उनकी नसों में बह रही है और बहती ही रहेगी–सतत् ।
बसन्त चौधरी के पत्रकारिता क्षेत्र में दिए गए योगदान भी नकारे नहीं जा सकते हैं । उर्वसी मासिक जैसी अपने समय की एकल मैगजीन का प्रकाशन एक अलग ही उदाहरण है । उनके द्वारा प्रकाशित ‘दी इन्डिपेन्डेन्ट’ साप्ताहिक मार्फत पहुँचाए गए योगदान हों या उस समय कल्पना भी ना की गई विज्ञापन एजेन्सी ‘सुब थ्री एडवरटाइजिंग’ एजेन्सी की स्थापना हो या या रेकर्डिग्ग स्टूडियो संचालन हो ये स्वयं में युग के माइलस्टोन थे, मार्गदर्शक कार्य थे और अग्रगामी परिकल्पनाएं थीं । और थे समय से गतिशील कल्पना से बुने गए कार्य । आज उन्ही मार्ग पर चलते हुए दर्जनों विज्ञापन संस्थाएं खुली हैं, सैकड़ों स्टूडियो संचालन किए जा रहे हैं ।
बसन्त चौधरी जीवन वृत्ति का दृष्टि से एक उद्योगी व्यापारी ही है । अपने परिवार और उन पर आश्रित वर्ग के लिए उद्योग–व्यापार करना उनका मूल कर्तव्य है, पर सच्चे अर्थों में वे किसी भी छलकपट या भ्रम से परे सीधा सच्च, व्यवासय करने का अभिष्ट रखते हैं ।
आपकी व्यवसायिक यात्रा का आरम्भ १९७४ में हुआ जब वे अपनी १८ साल की उम्र कदम रख रहे थे । खिचापोखरी में खुले उस समय के प्रसिद्ध अरुण इम्पोरियम के विक्रेता के रूप में कार्य करते थे । वहीं काम करते हुए शनै शनै उद्योग–व्यापार के महासागर में गोते लगाने लगे । जब पिताजी ने महसूस किया कि अब तीनों पुत्र (विनोद चौधरी, बसन्त चौधरी और अरुण चौधरी) अपनी जिम्मेदारियां स्वयं वहन कर सकते हैं और उनके बनाए गए उद्योग रूपी बाग का मलजल से व्यापक बिस्तार कर सकते हैं, तब बसन्त ने दुहबी सुनसरी को पशुपति बिस्कुट संस्था रूपी वृक्ष को मलजल करने का निर्णय लिया । साथ महालक्ष्मी मैदा मिल संचालन का ध्येय लिया । ये उद्योग चयन के पीछे भी उनका स्वभावगत भावनात्मक कारण था । यद्यपि ये दोनों उद्योग उतना ज्यादा मुनाफा कमाउने वाले उद्योग नहीं थे मगर पिता के शुभारम्भ किए गए चौधरी ग्रुप की जन्मदात्री संस्थाएं थी, पिताजी द्वारा उद्योग का बीजारोपण किया गया पहला बीज था–पशुपति बिस्कुट ।
१९७१ में पशुपति बिस्कुट और १९७४ में महालक्ष्मी मैदा मिल की स्थापना हुई । उस समय तक चौधरी ग्रुप की औद्योगिक शाख का विस्तार उतना नहीं हो सका था । विशेष रूप से कृषिजन्य उद्योग के संचालक में अभिरुचि रखनेवाले बसन्त ने उसके बाद सर्वोत्तम लिटो, हेटौंडा डेरी जैसे प्रकृति के उद्योग संचालन किए ।
बसन्त का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष है–साहित्य सृजन । जिस पक्ष को आज यहां विशेष रूप से चर्चा की जानेवाली है ।
पहले ही उल्लेख किया गया है कि बसन्त विनम्र, भावुक और सहृदयी व्यक्ति हैं । इसी लिए उनके अधिकांश गीत और कविताओं में अभिव्यक्त सन्दर्भ और भावों में कवि बसन्त के अन्तर की सुकोमल मानवीय भावनाएं उजागर करती हैं । उनके मन में प्रेम है, प्रेम के साथ स्नेह और सद्भाव हैं, राष्ट्रीयता के लिए अक्षुण्ण समर्पण है । उनके गीत और कविताएँ नेपाली जन–जन में यही स्नेहिल सद्भाव और सहिष्णुता और समर्पण के बीज बिखेरते रहना चाहते हैं ।
जब व्यापार और व्यवसाय की व्यस्त दिनचर्या से उनका मस्तिष्क कुछ विश्राम लेता है तो उनका मन यानि हृदय सक्रिय होने लगता है । उनके भीतर का सृजन चक्र जागृत हो उठता है । हृदय भावना और अनुभूति के साथ वार्तालाप करने लगता है । उसके बाद इनकी कलम से जीवन और जगत को समझने और व्यक्त करने का ‘दूसरा आयाम शुरु हो जाता है । सृजन का अद्भुत और अनुभूतिपूर्ण आयाम काव्य सृजन ।
१९०७ में उर्वसी मासिक मार्फत ‘तुषारोलाई पिउँदै’ गीत के साथ दिखाई देने के बाद १९९१ में कृतिगत रूप में पहला गीति एलबम ‘माया बल्झेछ’ लेकर सांगीतिक संसार में प्रवेश किया । उसके बाद वे पाठक ओर श्रोताओं के मन में निरन्तर गीत और कविता से स्नेह छलकाते ही जा रहे हैं । आज यह क्रम और भी गतिशील और गम्भीर सृजनाओं मे दिखाई दे रहा है ।
यही क्रम अविरल गति में बहते हुए इन्होंने गद्य और पद्य दोनों विधाओं में बराबर कलम चलाते हुए सृजना को मूलधार में प्रवाहित किया । और नेपाली वाङमय में ही एक सशक्त हस्ताक्षर के रूप में स्थापित हो गए । काव्य से लेखन की शुरुआत हुई तथापि ये पुस्तककार के रूप में सर्वाधिक गद्य मार्फत ही हुए । उसी समय से इनकी दो पुस्तके प्रबन्ध संग्रह–‘राष्ट्रियता नदुखोस्’ (२००७) और संवाद (२००८) प्रकाशन में आई । फिर भी बसन्त चौधरी ने खुद को पहले गीतकार के रूप में स्थापित किया । इसी क्रम में इनके दर्जनों गीत सुरबद्ध और स्वारंकित हुए । इनके हृदय से निकले गीत लोगों के अन्तःकरण को छूकर लोकप्रिय हो गए ।
इसी क्रम में उनके आठ एलबम क्रमशः ‘माया बल्झेछ, तिम्रो सम्झाना, रिफ्लेक्सन ऑ लव, ओन्ली लव–लव फॉर एवर, बसन्त बेला नामक छ नेपाली और हिन्दी भाषा में मोमेन्टस ऑफ लव और कुछ ख्वाहिशें कुछ बन्दिशें कुल आठ एकल एल्बम प्रकाशित हो चुके हैं ।
इसके अलावा पिछले कुछ समय से नेपाली और हिन्दी दोनों ही भाषाओं में कलम चलाने वाले स्रष्टा बसंत की पहली काव्य कृति ‘मेघा’ दोनों ही भाषाओं में प्रकाशित हुई । उसके बाद ‘मेरा कविताहरु’ (२०१४० में प्रकाशित हुई । इसके बाद हिन्दी में पहली काव्य कृति ‘आँसुओं की सियाही से’ (२०१५) में प्रकाशित हुई ।
इसके बाद उन्होंने एक ही बार नौ काव्य कृतियों को पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया । ये कृति नेपाली मूल भाषा में है–‘कविता संग्रह बसन्त’ । इसके अलावा अंग्रेजी, हिन्दी, नेवारी, तामाङ, मैथिली, भोजपुरी, मारवाडी और बंगाली भाषाओं में अनुवाद करके पाठक समक्ष पहुँची । इसी वर्ष इनकी एक और कृति ‘चाहतों के साये में’ हिन्दी और अंग्रेजी में प्रकाशित कविता संग्रह है ।
होने को तो इन्हे कविता में प्रणयभाव अभिव्यक्त करने वाले कवि के रूप में परिचित कराया गया मगर ‘थोपा पसिना’ ‘देश रोएको बेला’, ‘काव्य मुहुर्त’, ‘मेरो काठमाडौं’, ‘पानी’, ‘हिलो’, ‘मेरो देश’, ‘म चङ्गा’, ‘बुबा म तिम्रो स्मृतिले हास्दै रहूँ’, ‘कापुरुष’, ‘मान्छे भित्रका मान्छे’, ‘मेरो बोधिवृक्ष’ जैसी कविताओं ने उनकी प्रेम से पृथक समकालीन चेतना से युक्त कविता सृजना में भी उतना ही सशक्त और सिद्धहस्त प्रमाणित कर दिया ।
साहित्य प्रति की यही अगाध श्रद्धा और स्नेह के कारण आप ने अपने माता–पिता लूनकरणदास माँ गगादेवी चौधरी साहित्य कला मन्दिर की स्थापना की, जिसके संरक्षक स्वयं माता–पिता रहे । इस संस्था की गतिविधियों ने इन्हें समग्र नेपाली वाङमय के चिन्तित और क्रियाशील एक समर्पित स्रष्टा के रूप में परिचित कराया । इस संस्था से अब तक कला और संस्कृति में पाँच दर्जन से अधिक हस्तियों का सम्मानित किया गया है । जो स्वयं में स्तुत्य कार्य माना जाता है, इस क्षेत्र में और बसन्त चौधरी की सृजना–यात्रा के साथ–साथ साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र को प्रतिष्ठित और समुन्नत बनाना होगा, इस धारणा को भी पुष्ट किया है ।
एकल विश्व काव्य यात्रा इनका एक और उदाहरणीय पहलु है । नेपाली भाषा, साहित्य एवं संस्कृति को विश्वव्यापी रूप में प्रचार–प्रसार करना तथा प्रवास में रह रहे नवोदित पीढियों को अपनी भाषा संस्कृति के बारे में सूचित कराने के पवित्र उद्देश्य से सन् २०१२ अगस्त १२ में अमेरिका के न्यूयोर्क से शुरु हुई बसन्त की एकल ‘विश्व काव्ययात्रा’ अब तक विश्व के ग्यारह देश के सत्रह शहरों तक पहुँच चुकी है । इन स्थानों पर ये अपनी कविताएं प्रस्तुत कर नेपाली कविता को समकालीन धार में प्रस्तुत और परिचित करा रहे हैं । साथ ही देश में भी इनकी एकल काव्य यात्रा बड़ी संख्या में होने लगी है ।
साहित्य कला मन्दिर मार्फत आप ने उल्लेखनीय योगदान दिया है–‘हामी कवि र कविता’ । सर्वनाम नाट्य संस्था के साथ सहकार्य में २०१३ में आरम्भ की गई इस श्रृंखला में पुरानी और नयी पीढ़ी के कवियों ने अपनी भावना अभिव्यक्त करने का मञ्च पाया है । पृथक महीने के एक तारीख में सर्वनाम नाट्यशाला में वो कवि अपनी कविता वाचन करते हैं, जो आज तक निरन्तर है । इसके अलावा नवोदित कवियों को प्रोत्साहित करने हेतु सांस्कृतिक संस्थान के साथ सहयात्रा में प्रत्येक महीने के मध्य १५ तारीख को ‘अंकुर’ नामक काव्य प्रस्तुति का कार्यक्रम भी शुरु हो चुका है ।
इसी तरह व्यापार के साथ समाज सेवा, साहित्य सृजना में लीन हैं बसन्त चौधरी । आप व्यापार–व्यवसाय में जितने सक्रिय हैं, समाज सेवा और सृजनाओं में भी उतने ही गतिशील हैं । समय सब के लिए २४ घण्टे का हुआ करता है मगर आश्चर्य की बात तो यह है कि २४ घण्टों में बसन्त चौधरी एक साथ उद्यमी, समाजसेवी, और सर्जक के रूप में प्रस्तुत हो रहे हैं ।

रमण घिमिरे

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of