Mon. Nov 19th, 2018

नेपाल भारत रिश्तों में एक नई तरंग – बसन्त चौधरी

नेपाल की एकमात्र आवश्यकता है विकास और इसके लिए इसे हर दिशा से प्रयास करना ही होगा । इस दृष्टिकोण से प्रधान मंत्री ओली का उपर्युक्त बयान प्रशंसनीय है ।


क्या यह विचित्र नहीं की एक घनघोर वामपंथी, नास्तिक कम्युनिस्ट प्रधान मंत्री के काल में एक पडोसी देश का धर्म प्रतिज्ञ प्रधान मंत्री नेपाल आकर धार्मिक स्थलों पर माथा टेक कर स्नेह और सौहार्द को नया जीवन देना चाहता है, जो निश्चय ही अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धो में दोनों देशों की ओर से एक नई पहल है

यथार्थ बहुदा कथा, कल्पना व उपन्यास से भी विचित्र होता है । उसको समझना सहज नहीं होता । ऐसा संभवतः इसलिए कि यथार्थ परत दर परत तथ्यों पर टिका होता है और यह तथ्य समय की अतल गहराईयों में दबे रहते हैं । जन मानस की स्मृति अंतहीन नहीं होती । अतः पुराने तथ्य खो जाते हैं और परिपेक्ष्य के अभाव में नवीन तथ्य भी अजीब जान पड़ते हैं ।

बसन्त चौधरी

ऐसा ही कुछ भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की विगत नेपाल यात्रा के विषय में अनुभव हो रहा है । नेपाल के प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली की मानें तो मोदी की यात्रा ने नेपाल–भारत की प्राचीन मैत्री को नयी ऊंचाइयों तक पहुँचाया है । ओली का मानना है कि इस यात्रा एवं बातचीत के परिणाम स्वरूप अनेक लंबित परियोजनाएं नेपाल में समयबद्ध तरीके से पूरी हो सकेंगी । ठोस बात करें तो ९०० मेगा वाट की अरुण तीन जल विद्युत् परियोजना पर सहमति नयी आशा का संचार करती है भले ही यह नेपाल के विकास के लिए सम्पूर्ण रूप से पर्याप्त नहीं है । भारत को नेपाल के विकास के लिए अधिक अहम् भागीदार के रूप में उभरना होगा । पर आज जो शुरूआत हुई है, इस शुरुआत का अभिवादन तो हमें करना ही चाहिए । आपसी सौहार्द को बल देने के लिए यह हमेशा से आवश्यक है ।

इस सन्दर्भ में यह समझना होगा की चीन हमारे यहाँ ६ बिलियन डॉलर से अधिक निवेश के लिए प्रतिबद्ध है । भारत की ओर से निवेश आधा बिलियन डॉलर से भी कम है । साथ ही, भारत द्वारा घोषित परियोजनाओं का रिकॉर्ड भी संतोषजनक नहीं रहा है । कितनी ही योजनाएं लंबित हैं । यद्यपि इसमें नेपाल की पूर्व सरकारों और नौकरशाही का भी कम दोष नहीं ।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि नेपाल और भारत में रोटी, बेटी, जीवन–शैली और संस्कृति का सम्बन्ध अनंतकाल से है । कई धरातल पर ये दोनों देश एक जैसे हैं । १९४७ में अंग्रेजÞों से स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत एक प्रजातान्त्रिक देश रहा है । वहां के राजनेता जन भावना की उपेक्षा नहीं कर सकते और भारत के प्रबुद्ध वोटर सजगता से पड़ोसी देशों की भावना और प्रतिक्रियाओं को नापते तोलते रहते हैं । भारतीय राजनैतिक दल एवं नेता इस वास्तविकता को नहीं नकार सकते । अतः नेपाल जैसे पड़ोसी देश व उसके जिम्मेदार समाचार मीडिया को भी पड़ोसी की जन–अपेक्षा का ध्यान रखना होगा । हम यह नहीं भूल सकते कि एक स्वयंभू एवं स्वतंत्र देश होने के बावजूद हम आज भी बाहरी देशों की सहायता पर निर्भर हैं । और यह तब जबकि नेपाल सदा एक स्वतंत्र देश रहा है । हमें पराधीनता की त्रासदी नहीं झेलनी पड़ी है । यह विचारणीय विषय है कि ऐसे अतीत के वंशज होने के बाद भी नेपाल आज भी गÞरीब देशों की श्रेणी में रखा जाता है । नेपाल की एकमात्र आवश्यकता है विकास और इसके लिए इसे हर दिशा से प्रयास करना ही होगा । इस दृष्टिकोण से प्रधान मंत्री ओली का उपर्युक्त बयान प्रशंसनीय है । उन्होंने मात्र राजनेता के बजाय अपना परिचय एक राजनीति विशारद के रूप में दिया और यह स्पष्ट किया कि राष्ट्र के प्रति दायित्व ही उनके लिए प्रमुखतम हैं ।

जनकपुर, मुक्तिनाथ एवं पशुपतिनाथ में पूजापाठ एक सोची समझी नीति का अंग थीं
अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में राष्ट्रीय हित में अनेक परस्पर विरोधी देशों से रिश्ते रखना एक सामान्य बात है । हाँ, उन विरोधी रिश्तों का लाभ उठाकर विरोध की आग को बढ़ाना उचित नहीं । अतः, यदि आज नेपाल, भारत और चीन से संबंधों को प्रगाढ़ बनाकर देश को विकसित कर रहा है तो किसी को ऐतराजÞ नहीं होना चाहिए । वस्तुतः पड़ोसी देशों का संपन्न, आत्मनिर्भर और विकसित होना सबके लिए उत्तम स्थिति है । भले ही विश्व के कुछ हिस्सों जैसे कि खाड़ी क्षेत्र में सैन्य संघर्ष हो रहा हो, अधिकतर देश अब एक व्यापार–केंद्रित जगत की रचना में जुटे हैं । नेपाल को भी इस दिशा में अग्रसर होना चाहिए ।
इस सन्दर्भ में यह समझना होगा की चीन हमारे यहाँ ६ बिलियन डॉलर से अधिक निवेश के लिए प्रतिबद्ध है । भारत की ओर से निवेश आधा बिलियन डॉलर से भी कम है । साथ ही, भारत द्वारा घोषित परियोजनाओं का रिकॉर्ड भी संतोषजनक नहीं रहा है । कितनी ही योजनाएं लंबित हैं । यद्यपि इसमें नेपाल की पूर्व सरकारों और नौकरशाही का भी कम दोष नहीं ।
तथापि नेपाली जनमानस में, विशेषकर पहाड़ी इलाकों, में भारत की छवि एक दखलन्दाजÞ बड़े भाई की रही है जो नेपाल की अंदरूनी राजनीति में हस्तक्षेप करता रहा है । भारत की सरकारी एवं निजी टीवी चैनलों और प्रिंट मीडिया में अनेक सेवानिवृत्त नौकरशाह और बुद्धिजीवी उपर्युक्त भावना को उजागर करते दिखते हैं । २०१५–१६ की मधेसी नाकेबंदी ने तो भारत के प्रति आम नेपाली के मन में विष घोल दिया । आखिरकार उन्हें अकथनीय कष्ट प्रतिदिन उठाने पड़े । भले ही यह नाकाबंदी मधेशी दलों के अनुसार की गई थी पर इसका सारा आक्रोश भारत पर निकला और आज भी कमोवेश बरकरार है ।
आज के परिप्रेक्ष्य में यद्यपि प्रधान मंत्री मोदी ने रेलवे लाइन, जल यातायात, आदि में भारत द्वारा सहायता का आश्वासन दिया, पर चीन की भारी मदद के मुकाबले यह प्रयास बौने जान पड़ते हैं । आम नेपाली के मन में तो ऐसी ही भावना जान पड़ती हैं । एक अविकसित देश में ऐसी सोच होना कोई अजीब बात नहीं है ।
किन्तु ओली और मोदी ने इस अवसर पर सराहनीय राजनैतिक परिपक्वता का प्रदर्शन किया । ओली ने बीती बातों को बिसार दिया और उनका किंचित मात्र स्मरण भी कम से कम किसी सार्वजानिक मंच पर नहीं किया । यह तब जबकि उनके सहयोगी प्रचंड के दल ने मोदी की एक सभा का बहिष्कार भी किया । दूसरी ओर, मोदी ने जÞमीनी वस्तुस्थिति को समझते हुए अपने संबोधन में भारत और नेपाल के सांस्कृतिक संबंधों को उजागर किया । जनकपुर, मुक्तिनाथ एवं पशुपतिनाथ में पूजापाठ एक सोची समझी नीति का अंग थीं । उद्देश्य आम नेपाली से दिल के तार को जोड़ना तो था ही साथ ही साथ भारत में भगवा भक्त जन साधारण को भी लुभाना था । क्योंकि भारत में बहुत जल्द चुनाव होने वाले हैं और एक राजनेता भले ही देश में हो या विदेश में उसकी दृष्टि आगामी कल पर टिकी होती है । पर मेरे कहने का यह तात्पर्य कदापि नहीं कि मोदी का धार्मिक भ्रमण मात्र दिखावा था क्योंकि राजनीति की बातों से अधिक देवता दर्शन ही उनकी इस दो दिन की यात्रा के मुख्य बिंदु के तौर पर उभरते हैं । लेकिन जैसा मैंने प्रारम्भ में कहा इस सब में विचित्र क्या है ? क्या यह विचित्र नहीं की एक घनघोर वामपंथी, नास्तिक कम्युनिस्ट प्रधान मंत्री के काल में एक पडोसी देश का धर्म प्रतिज्ञ प्रधान मंत्री नेपाल आकर धार्मिक स्थलों पर माथा टेक कर स्नेह और सौहार्द को नया जीवन देना चाहता है, जो निश्चय ही अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धो में दोनों देशों की ओर से एक नई पहल है ।ं ंंं

लेखक कवि, साहित्यकार, समाजसेवी और विश्लेषक हैं ।

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