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पर्वतों से सुशोभित देश–नेपाल

हिमालिनी,अंक जून २०१८ | पिछले अंक में मैने नेपाल को अलौकिक सुंदरता प्रदान करने वाले पर्वत और पर्वतारोहियों को आकर्षित करने वाली पर्वत श्रृखलाओं की चर्चा की थी। काठमांडू के निकट के जिलों में अवस्थित लाङ्गटाङ्ग, लिरुङ्ग और गणेश हिमाल के अलावा विभिन्न भागों में विद्यमान पर्वत श्रृंखलाएँ, जिनमें विश्व का सर्वोच्च शिखर माउण्ट एवरेष्ट से  लेकर अन्नपूर्ण, धौलागिरी, निलगिरी, गौरीशंकर प्रमुख रूप से सुविदित हैंं, नेपाल को राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध बनाने में सदैव सहायक रहे हैं । २८मई सन् १९५३ की रात तक अविजित माउण्ट एवरेष्ट पर एक नेपाली शेर्पा तेन्जिंग नोर्गे के साथ जब एडमण्ड हिलारी २९ मई के दिन पैर रखने में सफल हुए तब सारा संसार इस सुखद समाचार से भूmम उठा और नेपाल के जनकवि धर्मराज थापा खुशी से नाचते हुए गाने लगे– ‘हाम्रो तेन्जिंङ्ग शेर्पा ले चढ्यो हिमाल चुचुरा।’
उसके बाद भी कई वर्ष तक माउण्ट एवरेष्ट अविजित रहा । अनेक अंतर्राष्ट्रीय पर्वतारोही दल अपने अभियान में असफल रहे, पर अंततः पर्वतारोहियों के अदम्य साहस और शौर्य रंग लाने लगे और माउण्ट एवरेष्ट, जो नेपाल में सगरमाथा के नाम से जाना  जाता है, विभिन्न पर्वतारोहियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनने लगा । हिमशिखरों का आकर्षण और माउण्ट एवरेष्ट के हिमशिखरों पर आरोहण के जुनून का ताजा दृष्टांत हमें पिछले महीने उस वक्त मिला जब दोनों पैरों से अपंग एक ७०वर्षीय चीनी पर्वतारोही झिया माउण्ट एरेष्ट के हिमशिखरों को चूमने में सफल हुआ । अदम्य साहस से भरे इस पर्वतारोही ने इस प्रकार अपने सपनों को साकार ही नही किया माउण्ट एवरेष्ट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाला दोनों पैरों से अपंग विश्व का पहला पर्वतारोही के रूप में भी पर्वतारोहण के इतिहास में सुप्रसिद्ध हुआ ।  ंइसके अतिरिक्त  नेपाल के एक ४८वर्षीय कामी रिटा शेर्पा पिछले ही महीने २२वीं बार विश्व के इस सर्वोच्च शिखर पर अपने पैर रखने में सफल होकर अपने दो पूर्व आरोही अप्पा शेर्पा और फुर्बा ताशी शेर्पा द्वारा स्थापित कीर्तिमान को तोड़ने में सफल रहा । इन दोनों शेर्पाओं ने माउण्ट उवरेष्ट पर २१ बार सफल आरोहण करते हुए र्कीिर्तमान स्थापित की थी ।
जैसे कि पहले लिखा जा चुका है, प्रकृति ने नेपाल को छोटे–बड़े पर्वत श्रृंखलाओं के अलावा कई बड़ी–बड़ी नदियों से सजाने और सँवारने में उदारता दिखाई है । अतःनेपाल के विभिन्न अंचल ९शयलभक० का नाम उन पहाड़ों और नदियों के नाम पर रखा गया है । पूर्वी नेपाल, जो सगरमाथा अंचल के नाम से जाना जाता है, को ८,८४८  मीटर ऊँचा सगरमाथा के अलावा ल्होत्से, नुप्त्से, पुमोरी, चो ओयू, और मकालू के अलावा अन्य हिमश्रृंखलाएँ एक गरिमामय स्थान प्रदान करते हैं । ८,४६३ मीटर ऊँचा मकालू हिमाल विश्व के सबसे ऊँचे हिमशिखरों में पाँचवाँ माना जाता है । पूर्वी नेपाल की यात्रा में अंदर–अंदर तक जाने वाले पर्यटक हों या तीर्थयात्री, सभीं को विभिन्न हिमशिखरों के लुभावने दृश्य से सराबो रहोने का अवसर मिलता है । ताप्लेजुंग जिले में अवस्थित पाथीभरा मंदिर जाने वाले तीर्थयात्रियों का साथ पाने वाले विदेशी पर्यटक को तो नेपाली धार्मिक रीति–रिवाज से भी अवगत होने का अवसर मिल जाता है ।
देश के मध्यभाग में अवस्थित पर्यटकीय नगरी पोखरा की सुंदरता तो वर्णनातीत है । विभिन्न तालों(झीलें), गुफाएँ, दर्शनीय स्थल, मठ–मंदिर और गिर्जाघर एवं मनोहर मौसम इसे विभिन्न वर्गों के पर्यटकों के लिए एकमनोरम पर्यटन क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करते हैं । अन्नपूर्ण पर्वत की हिमश्रृंखलाएँ और फेवाताल पर पड़ती माछापुच्छ्रे पर्वत की छाया हर पर्यटक को सम्मोहित कर लेती है । पर्वतीय क्षेत्र की पदयात्रा का आनंद उठाने की चाह रखने वाले पर्यटकों के लिए अन्नपूर्ण पर्वत के आधार शिविर के साथ निर्मित पदयात्रा मार्ग की सुविधा उपलब्ध है, जो १,०७० मीटर की ऊँचाई से लेकर ४,१५० मीटर तक की ऊँचाई त कविस्तारित है । राह में विश्राम करने और रात बिताने के लिए लॉज आदि की सुविधा उपलब्ध है ।
धौलागिरीपर्वत के नाम पर रखी गयी धौलागिरी अंचल को यदि अलौकिक सुंदरता का साक्षात स्वरूप कहा जाय तो अत्युक्ति नही होनी चाहिए । यहाँ से निलगिरी और अन्नपूर्ण पर्वतो की हिमश्रृंखलाओं का अवलोकन मन को मोह लेता है । भगवान विष्णु और देवीलक्ष्मी को समर्पित मुक्तिनाथ का मंदिर इसी अंचल के मुस्तांग जिले में में अवस्थित है, जो हिंदू, बौद्ध, जैन और वैष्णव संप्रदाय के धर्मावलंवियों के लिए एक पावनधाम है ।
एक बार हमें भी इस पावन स्थल की यात्रा करने का अवसर मिला । मुक्तिनाथ की सड़क–मार्ग की यात्रा प्रकृति की सुंदरता को निहारने का अवसर प्रदान करती है, जो पोखरा से शुरु होती है । ं बेनी होते हुए जोमसोम तक की ७६कि.मी. की यात्रा एक ओर ऊँचे चट्टानी पर्वत और दूसरी ओर कालीनदी और उसके बगल में गर्व से सीनाताने खड़े हरियाली भरी पहाड़ाेंं पर पड़ती धूप से उत्पन्न परिवेश के कारण हमलोगों के लिए रोमांचकारी हो रही थी । जोमसोम से पहले एक स्थान पर हमलोग चायपान के लिए रुके । सूर्यास्त का समय था । धौलागिरीपर्वत (८,१७६ मीटर) पर अठखेलियाँ करती हुई सूर्य की हलकी किरणें वातावरण में जो मनमोहक दृश्य प्रस्तुत कर रहीं थी उसे शब्दों में उतारना कठिन हो रहा है । प्रकृति के इस नजारे को अधिक देर तक निहारने से इसलिए वंचित होना पड़ा कि जोमसोम अँधेरा होने से पहले पहुँचने की जल्दी थी । फिर भी होटल पहुँचते–पहुँचते ८ बज गए । सुबह मुक्तिनाथ के लिए रवाना होने का कार्यक्रम था । नहा–धोकर हमलोग चाय की प्रतिक्षा करते हुए छज्जे पर धूप सेकने क्या गए वहाँ से हिमालय के चमकते सुनहरे स्वरुप ने हमलोगों को पुनःमंत्रमुग्ध कर दिया । मुक्तिनाथजल्दी पहुँचने और संभव हो तो उसी दिन जोमसोम से निकलने की सोच थी । अतःवहाँ से चाय पीते ही निकल पड़े बस स्टॉप की ओर । जाते हुए काली गंडक के पुल होकर गुजरना पड़ा । म्क्तिनाथ मंदिर में प्रवेश करने से पहले नहाना आवश्यक होता है । पर हमलोग नहाकर आए थे, अतःनहाने के फुहारे से सिर पर जल सेचन करते हुए मंदिर के अंदर दाखिल हुए । मंदिर के अंदर भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मीऔर उनके वाहन गरुड़ विराजमान थे । माथा टेकते हुए बाहर निकले । बाहर का परिवेश स्वच्छ और मनमोहक था । यहाँ भी पर्वतमालाओं की सुंदरता निहारने का अवसर मिला । कई तीर्थयात्री यहाँ आने पर २–४दिन रुककर यहाँ के पावन, स्वच्छ और प्राकृतिक वातावरण का आनंद उठाते हैं । ऐसे पर्यटकों के लिए यहाँ रुकने के लिए लॉज आदि हैं । निकट ही चिकित्सालय की भी व्यवस्था ह,ै ताकि यात्रा की अवधि में वहाँप हुँचने पर यदि कोई बीमार पड़ जाय तो उसकी प्रारंभिक चिकित्सा हो सके ।
सुदूरपश्चिम का क्षेत्र, जो कर्णाली अंचल के नाम से प्रसिद्ध है, देश का दुर्गम क्षेत्र माना जाता ह,ै पर यह भी है नैसर्गिक सुंदरता से भरा क्षेत्र । यहाँ भी प्रकृति अपनी उदारता का परिचय देने में पीछे नही रही है । सैपल हिमाल (७,०३१मीटर), और आपी हिमाल (७,१३२मीटर) वातावरण में नैसर्गिक सुंदरता बिखेरने से नही चुकते । कान्जीरोवा दक्षिण (६,८८६मीटर), सिकाल्पो खाङ (६,५५६मीटर) और वेच चुचुरो (७,१३९)जैसे हिमश्रृंखलाएँ और कर्णाली और महाकाली जैसी विशाल नदियाँ इस अंचल की शान हैं । शिव सेना नेपाल के अध्यक्ष अरुण सुवेदी के अनुसार यह मानसरोबर से उतरी हुर्ई नदी है जिसकी एक जलधारा विभाजित होकर भारत में पहुँची और वहाँ यह ब्रह्मपुत्र कहलाती है । यहाँ इसे गंगा नदी के समान पावन माना जाता है । अतः निकटवर्ती इलाके के लोग यहाँ के जल को पूजादि के लिए अपने–अपने घरों में ले जाया करते हैं । इसके शीतलजल को स्पर्श करने पर मुझे यह महसूस करने में देर नही लगी कि यहाँ का जलनिश्चित रूप से मानसरोबर की हिमनदी से पिघला हुआ जल ही होना चाहिए । वहीं उपस्थित धनगढ़ी के उपेन्द्र बम भी कहने लगे–‘यह नेपाल की सबसे लंबी नदी है। ५०७ कि.मी. लंबी इसी नदी के नाम पर इस क्षेत्र का नामकरण कर्णाली अँचल हुआ है । वर्षा काल में इसके विकराल स्वरूप और विनाशलीला का बयान कर पाना मुश्किल होता है ।’
संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि प्रकृति प्रेमी पर्यटकों के लिए नेपाल पृथ्वी में स्वर्ग का आनंद प्राप्त करने का अनुपमस्थल है । जहाँ पर्यटकों को अवश्य आना चाहिए और इस नैर्गिक सुख की अनुभूति करनी चाहिए ।

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