Thu. Apr 25th, 2019

मानव होने की जिम्मेदारी पूरी कर रही हूँ : भद्र कुमारी घले

 

Bhadra Kumari Ghale 2
भद्र कुमारी घले, पूर्व राज्य मंत्री तथा समाजसेवी

 

हिमालिनी, अंक डिसेम्वर 2018,पंचायती शासकाल के लिए एक चर्चित राजनीतिक कर्मी और समाजसेवी हैं– भद्र कुमारी घले । अपने समय में एक महिला होकर आप ने जो साहसिक काम किया, वह सिर्फ उस समय के लिए ही नहीं, आज भी प्रशंसनीय है । पूर्व मन्त्री के रूप में भी परिचित आप कुछ लोग के लिए राजनीतिक योद्धा हैं तो कुछ लोग के लिए समाजसेवी, नर्स, साहित्यकार, चित्रकार, इतिहासकार आदि हैं । जो कुछ भी हो, आपने नेपाली समाज रूपान्तरण के लिए महत्वपूर्ण योगदान किया है, विशेषतः महिलाओं को ऊर्जाशील जीवन जीने के लिए आप ने हरदम प्रेरित किया । आज भी आप काठमांडू (अनामनगर) स्थित ‘भद्रकुमारी घले सेवा सदन’ की संस्थापिका और अध्यक्ष हैं । सदन के भीतर वाचनालय, पुस्तकाल, संग्रहालय, आर्ट गैलरी, योग करने का स्थान आदि है । आपने अपनी सारी सम्पत्ति उसी सामाजिक संस्था के नाम कर दी है । सदन के भीतर २५ से अधिक निम्न आर्थिक अवस्था के परिवार आश्रित हैं । आपका जन्म जन्म वि.सं. १९८८ फल्गुन १९ गते काठमांडू (मैतिदेवी) में हुआ है । आप के पिता कृष्णबहादुर घले और माता भक्त कुमारी घले हैं । आपकी १३९ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है । उम्र की दृष्टिकोण से आज आप ८७ वर्षीया हैं, लेकिन आपका लेखन कार्य उतना ही सक्रिय है, जो कल था । संघर्षशील और जुझारु महिला भद्र कुमारी घले का जीवन–सन्दर्भ आप के समक्ष प्रस्तुत है–

पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा
तत्कालीन समय में मैंने जो सामाजिक कार्य किया, उसको पढ़नेवाले आज की नयी पीढ़ी सोचती है कि मेरा पारिवारिक पृष्ठभूमि और मैं सक्रिय राजनीति से जुड़ी हुई हूं । लेकिन यह शत–प्रतिशत गलत है । मेरे पिता और दादा नेपाली सेना में थे । आज आप डिल्लीबाजार (पीपल बोट) में जो पीपल का पेड़ देखते हैं, वह मेरे दादा जी नैनसिंह घले (कर्णेल) ने लगाया था । आज आप जो सैनिक मंच टुँडिखेल देखते हैं, वह भी मेरे दादाजी नैनसिंह ने ही बनाया है उस समय ‘घले परिवार’ कहने से नैनसिंह घले अर्थात् हम लोगों के परिवार को जाना जाता था । लगभग ५ सौ लोग एक ही परिवार में रहते थे । जब मैं २ साल की थी, उसी समय मेरे माता–पिता ने मुझे ओखलढुंगा भेज दिया । ओखलढुंगा में मेरे दादा जी (पिता के माता–पिता) का घर था । लगभग १२–१३ साल तक मैं वही रही । लगभग ७ साल की उम्र में मैं अपने नाना जी (मां के पिता) के घर दोलखा गई थी । मेरे नाना जी नरबहादुर गुरुंग संस्कृत के महान् विद्वान के रूप में परिचित थे । मैं उन से प्रभावित हो गई । न जाने कैसे ! ७ साल के उम्र में ही मैं दक्ष संस्कृत वाचकों की तरह बुद्धि–चानक और दुर्गा– कवच पढ़ लेती थी । रामायण और महाभारत भी वाचन करती थी । १३ साल की उम्र में मेरे पिता जी के छोटे भाई मुझे गोरखपुर ले गए, गोरखपुर स्थित आर्मी स्कुल में पहली बार मुझे औपचारिक अध्ययन के लिए अवसर मिला ।

 

गोरखपुर से वापस होने के बाद मैंने कहा कि मुझे मेरी मां के पास जाना है । मेरी मां विधवा थी, २५ साल के उम्र में ही वह विधवा हो गई थी । २५ साल के उम्र में ही उन्होंने ३ बेटी और १ बेटा को जन्म दिया था । मैं मझली सन्तान हूं । मुझ से बड़ी एक दीदी है और बाकी सब मेरे बहन और भाई । उस समय मेरी मां जनकपुर अंचल, सिन्धुली जिला स्थित अम्बोटे में रहती थी । अम्बोटे में मां ने १३ सौ रुपया में एक छोटा–सा मौजा लिया था । जब मैं गोरखपुर से अम्बोटे पहुँची तो मैं आश्चर्य चकित हो गई । एक विधवा महिला होते हुए भी उन्होंने उस जगह में प्रशंसनीय काम किया था । मैंने देखा कि गांव–समाज में होनेवाला परम्परागत पूजा–पाठ, शादी–विवाह, पास्नी, वर्तबंध जैसे हर धार्मिक कार्यों के लिए वह आगे आती थी । इतना ही नहीं खेतीबारी के सब काम के लिए गांव के लोग मेरी मां से ही सहायता लेते थे । इसतरह उन्होंने अपनी जगह अपना नाम रौशन किया । वि.सं. २०१२ साल में ही मेरी मां ने अम्बोटे में प्रा.वि. स्कूल शुरु किया था । उनका जीवन देखकर मैंने भी सोचा की मैं भी एक समाजसेवी बनुंगी ।
वि.सं. २००३ साल में काठमांडू स्थित दरबार हाईस्कुल में कन्या पाठशाला संचालन में आया था । उसमें मैं कक्षा ३ में भर्ती हो गई । उस समय मेरी उम्र १६–१७ साल हो चुकी थी । उस स्कुल से मैंने कक्षा ४ उत्तीर्ण किया और पद्मकन्या स्कूल में आ गई । लेकिन कहा गया कि अब मुझे मैट्रिक की परीक्षा देनी है । मैं भी मानसिक रूप से तैयार हो गई । परिवार में चर्चा–परिचर्चा होने लगी कि अब मैं सरकारी छात्रवृत्ति लेकर पढ़ाई के लिए भारत जा रही हूं । मैं खूब उत्साहित हो गई, मेरे साथ भुनेश्वरी सत्याल भी जा रही थी । वह मेरी ही क्लासमेट थी । यहां से हम लोगों को भारतीय गान्धी आश्रम में ले गया, आज की जो ‘भद्रा घले’ है, उसमें गान्धी आश्रम का ही योगदान है । अगर मैं गान्धी आश्रम में नहीं गई होती तो शायद ही ‘भद्रा घले’ बन पाती थी । वहां हम लोग ५ साल तक रहे । ५ साल में ‘विनिता’ कोर्स पूरा किया । बाद में उक्त कोर्स को काशी विद्यापीठ ने मैट्रिक स्तर की मान्यता प्रदान की । उसके वाद भारत में ही मैंने नर्सिङ की पढ़ाई शुरु की । लगभग दो साल की नर्सिङ पढ़ाई खत्म होने के वाद मैं वि.सं. २०१३ साल में जनकपुर (नेपाल) आ गई । उसी समय जनकपुर में जानकी पब्लिक ह‘ास्पिटल (आज का जनकपुर अंचल अस्पताल) संचालन हो रहा था । सच कहें तो उक्त हॉस्पिटल हम लोगों ने ही शुरु किया है । मुखेश्वर सिंह ने दो–चार कुिर्सयाँ और टेबल इकठ्ठा किया, उसको खुले मैदान में रख दिया और हम लोगों ने कहा कि हॉस्पिटल शुरु हो गया । उस समय डाक्टर के रूप में थे जय बल्लभ और नर्स के रूप में थी मैं । और टुन्ना बाबु नाम के एक युवा कंपाउण्डर थे । उक्त अस्पताल में शायद मैंने ४ साल तक काम किया । उसक बाद उच्च शिक्षा के लिए मैं फिर भारत वाराणसी स्थित काशी विद्यापीठ चली गई ।
आकस्मिक राजनीतिक यात्रा
काशी विद्यापीठ के लिए मैं एक इतिहास भी हूं । उक्त विद्यापीठ में महिलाओं को नहीं पढ़ाया जाता था । मैं ही उक्त विद्यापीठ के लिए पहली महिला विद्यार्थी हूं । मैं गान्धी विचारधारा से उस समय अति प्रभावित थी, आज भी हूं । उस समय वाराणसी में गांधी के अनुयायियों ने एक बड़ा सेमिनार आयोजन किया था । मैं वहां पहुँच गई और टेबल ठोक कर काशी विद्यापीठ में अध्ययन करने के लिए दावा किया । मेरी बात मान ली गई, मेरे साथ ही गांधी विचारधारा से प्रभावित अन्य भारतीय नागरिक तथा विद्यार्थी डेलिगेसन अध्ययन के लिए काशी विद्यापीठ में पहुँच गए । हम लोगों को भर्ती लेने के लिए काशी विद्यापीठ भी सहमत हो गया । इसतरह मैं वहां की प्रथम महिला विद्यार्थी बन गई और शास्त्री की पढ़ाई शुरु की । यह समाचार चारों ओर फैल गया । आसपास के वर्दा, नागपुर, गांधी आश्रम आदि से ‘विनिता’ कोर्स पूरा करनेवाली सारी महिलाएं खुशी–खुशी काशी विद्यापीठ आने लगी । वहां के प्रिन्सिपल से लेकर सभी प्राफेसर और विद्यार्थी मुझे ‘भद्रा दीदी’ के नाम से पुकारते थे । अधिकांश प्रोफेसर तथा सम्पूर्ण विद्यार्थी उम्र की दृृष्टिकोण से मुझ से छोटे ही थे, उस समय मैं लगभग ३२ साल की थी । इसतरह काम और नाम दोनों हिसाब से मैं वहां सब के लिए ‘भद्रा दीदी’ बन गई ।
वि.सं. २०१८ साल की बात है, शास्त्री पूरा होना बाकी था । थिसीस तो लिखी थी, लेकिन देना बाकी ही था । मैं नेपाल आई थी । यहां आने के बाद अप्रत्यासित घटना हो गई, राष्ट्रीय पंचायत अन्तर्गत जनकपुर से महिला संगठनों का नेतृत्व मुझे लेना पड़ा । उस समय दिल बहादुर श्रेष्ठ जनकपुर के अञ्चलाधीश थे । जनकपुर में नर्स रहते वक्त मैंने जो काम किया था, उस को देखकर प्रशंसा करनेवालों में से किसी ने अञ्चालाधीश श्रेष्ठ को कहा था कि महिला संगठनों के लिए भद्र कुमारी घले जैसी योग्य महिलाएं अन्य कोई भी नहीं है । यही कारण श्रेष्ठ ने मेरी मां और मुझे जनकपुर आने के लिए कहा था । मां के साथ मैं अञ्चालाधीश कार्यालय जनकपुर पहुँच गई । उसी वक्त श्रेष्ठ ने अप्रत्यासित रूप में मुझे अबीर लगाया और हाथ में महिला संगठनों की नियमावली देकर कहा–‘आज से तुम महिला संगठन जनकपुर के लिए अंचल सभापति बन गई । नियमावली अध्ययन के बाद पता चला कि मुझे जनकपुर अञ्चल अन्तर्गत रहे ११ जिलों में गांव पञ्चायत कमिटी गठन करनी है । तत्काल मैंने सर्लाही से अपना काम शुरु किया । ३ दिनों में सर्लाही, धनुषा, महोत्तरी में महिला संगठन निर्माण किया और उसकी रिपोर्ट मैंने अञ्चालाधीश के समक्ष पेश किया । अञ्चलाधीश श्रेष्ठ तो आश्चर्यचकित हो गए और कहने लगे–यह कैसे सम्भव हो गया ! १ महीने की छुट्टी में नेपाल आई थी, उस अवधि में मैंने अपने मातहत रहे सभी जिलों में महिला नेतृत्व चयन करते हुए संगठन निर्माण किया । संगठन नाम मात्र के लिए नहीं था, अन्य अञ्चलों की तुलना में सबसे शक्तिशाली भी था, जिसको मैंने बाद में प्रमाणित भी किया । संगठन निर्माण होने के बाद मैं थिसीस जमा करने के लिए वापस बनारस चली गई । वहां पहुँचते ही अञ्चालाधीश कार्यालय से फोन आने लगा । टेलिफोन में ही सूचना मिली कि मुझे जल्द ही वापस आकर ‘माननीय’ का चुनाव लड़ना है । उस समय ‘माननीय’ क्या है ? उनकी जिम्मेदारी क्या होती ? कितने पावरफूल होते हैं ? इसके बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं था । मैं समझ रही थी कि यह कोई अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिनिधि है !
मैं नेपाल आ गई, माननीय के लिए नाम नोमिनेसन करना था । उसके लिए जावलाखेल पहुँच गई, सूर्यबहादुर श्रेष्ठ चुनाव आयोग के लिए सेक्सन ऑफिसर थे । नाम नोमिनेसन के लिए उन्होंने २ सौ रुपया माँग लिया । मैं तो विद्यार्थी थी, कहां से लाऊँ २ सौ रुपया ! मेरे पास नहीं था । भुवनेश्वरी सत्याल मेरी दोस्त थी, उसके पिता बद्रीप्रसाद थपलिया भक्तपुर जिला के कमिशनर थे । मैं भी उनको ‘बाबा’ कहती थी । एक दिन शाम मैं उनके घर में पूरे रात रहने के उद्देश्य सहित पहुँची । और बाबा से ५ सौ रुपया वापस करने की शर्त पर मांग लिया । वही रुपयों से २ सौ रुपया लेकर मैंने माननीय के लिए नोमिनेसन किया । यह वि.सं. २०१८ साल की बात है । इसतरह मुझे आकस्मिक रूप में राजनीति में आना पड़ा ।
सिर्फ नोमिनेसन ही नहीं, पंचायती व्यवस्था में प्रथम माननीय के रूप में मैंने चुनाव जीत लिया । उसके बाद ४ बार मैं राष्ट्रीय पंचायत में निर्वाचित जनप्रतिनिधि के रूप में रही और एक बार श्रम तथा समाज कल्याण राज्य मन्त्री भी बनी । मैंने जीवन में कभी भी नहीं सोचा था कि मैं राजनीति करुंगी । राजनीति मुझे थोड़ा–सा भी पसन्द नहीं था, मैं चाहती थी कि समाजसेवी बनूं । लेकिन मेरा सामाजिक कार्य ही मुझे राजनीति की ओर खींच रहा था ।
सन्त विनोबाजी जी का प्रस्ताव
जिस वक्त मैं वाराणसी में शास्त्री अध्ययन कर रही थी, उस वक्त भारत के महान् सन्त विनोबाजी भूदान के महान् अभियान में थे । वह गान्धीवादी नेता थे । विनोबाजी जी को लोग गान्धी जी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी भी समझते थे । उनका कहना था कि कम से कम १ लाख बीघा जमीन इकठ्ठा कर भूमिहीन को दिया जाए, इस तरह के महान् अभियान में वह थे, मैं भी उनकी अभियान से प्रभावित हो गई, अभियान में शामिल होने लगी । बिनोबाजी जी पाकिस्तान पदयात्रा में जा रहे थे । उन्होंने मुझसे कहा–तुम भी चलो पदयात्रा में । लेकिन मैंने सोचा–मुझे तो अपने ही देश के लिए कुछ करना है । इसीलिए उनसे विनम्र अनुरोध किया–‘मुझे आप के साथ पदयात्रा में नहीं जाना है, मुझे तो आपका आशिर्वाद चाहिए, ताकि मैं भी अपने देश में जाकर आपकी तरह ही गरीब और दीन–हीन जनता के लिए कुछ सकारात्मक काम कर सकूं ।’ इसतरह मैं विनोबाजी जी का प्रस्ताव अस्वीकार करते हुए नेपाल वापस हो गई थी ।
जीवन की सक्रियता
मेरी जन्मभूमि काठमांडू है, लेकिन राजनीतिक कर्मभूमि जनकपुर अंचल अन्तर्गत रहे विभिन्न जिला रहा । मुख्यतः सिन्धुली जिला मेरे लिए राजनीतिक और सामाजिक कर्मभूमि है । मैंने जो भी किया है, राष्ट्र, समाज और मानवता के लिए ही किया । अपना मूल्यांकन खुद करना तो ठीक नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए मैंने किसी भी पद और शक्ति का दुरुपयोग नहीं किया है । माननीय होकर मैंने अधिकांश काम सिन्धुली जिला के लिए किया है । यहां तक कि आज की राजनीतिक विरासत की हस्ती कोइराला परिवार के पुख्र्यौली गांव दुम्जा (सिन्धुली) और आज के सांसद् गणेश पहाडी के गांव खाङ्साङ (सिन्धुली) में पहली बार पीने के पानी का धारा पहुँचानेवाली मैं ही हूं । भीमान से पश्चिम कमलाखोंज तक ३०–४० जगहों में इनार बनवानेवाली मैं ही हूं । सिन्धुली सदरमुकाम से अम्बोटे तक मोटर गाड़ी ले जानेवाली मैं ही हूं । उस समय सड़क बनाने के लिए मैंने सिन्धुली वासियों को अनिवार्य ५ दिनों के श्रमदान के लिए आह्वान किया था । मैंने कहा था कि अगर कोई व्यक्ति सड़क निर्माण के लिए नहीं आते हैं तो उसको ५ रुपया जुरमाना लगेगा । उस समय सर्वसाधारण के लिए ५ रुपये की रकम बहुत बड़ी थी । सभी लोग अपने साथ खाने और नास्ते का सामान लेकर सड़क निर्माण के लिए आ गए, मेरा अभियान सफल हो गया । लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे, जो मुझसे नाराज थे । विशेषतः जिन लोगों के खेत और बारी में सड़क निर्माण हो रहे थे, वे लोग नाराज होते थे । उस वक्त की एक अविस्मरणीय घटना भी है । एक दिन मैं अपने गांव की ओर जा रही थी । ऊँचे पहाड़ से एक बड़ा–सा पत्थर मेरे नजदीक आ रहा था । उक्त पत्थर किसी ने मुझे ही लक्षित करके गिरा दिया था । पर मैं बच गई । मैंने अनुमान किया कि वे लोग मुझे मारना चाहते हैं ।
खैर ! सिर्फ सड़क ही नहीं, शिक्षा भी मेरी प्राथमिकता में रही । मेरा अभियान ही रहा कि हर गांव में प्रा.वि. स्कूल अनिवार्य होना चाहिए । ५वें कार्यकाल तक माननीय रहते वक्त मैंने देश के अधिकांश जिलों में भ्रमण किया है । उस समय आज की तरह सवारी साधनों की सुविधा नहीं थी, कई जिलों के गांव–गांव में मैंने पैदल ही भ्रमण किया है । कुल ७५ जिलों में मैंने हुम्ला, जुम्ला, रुकुम जैसे विकट जिला सहित ७० जिला भ्रमण किया है । इसीलिए गांव में रहनेवाले लोगों की जिन्दगी को नजदीक से देखा है, उन लोगों की पीड़ा महसूस की है ।
मैं तो बचपन से ही विद्रोही स्वभाव की थी । लोग कहते थे कि राजा द्वारा लालमोहर से प्रमाणित किसी भी कानून का विरोध करना अपनी ही मौत को निमन्त्रण देना है । लेकिन मैंने तत्कालीन मुलुकी ऐन को इन्कार किया और फेक दिया । और कहा कि महिला–पुरुष समान हैं, कानुनी तौर पर कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होना चाहिए । मैंने उस समय स्पष्ट कहा–‘मेरी दृष्टिकोण में मुलुकी ऐन महिलाओं के लिए विभेदकारी है ।’ यह बात राजा महेन्द्र तक पहुँच गयी, चारो ओर हल्ला होने लगा कि अब भद्र कुमारी घले के ऊपर कारवाही करनी चाहिए । लेकिन बाद में सुनने को मिला कि तत्कालीन मझली महारानी प्रिन्सेस शाह ने राजा महेन्द्र को कहा–‘भद्रकुमारी घले राजतन्त्र विरोधी नहीं है, वह पढी–लिखी महिला है, समान न्याय की बात कर रही है । ऐन में अन्तरनिहित गलत प्रावधान का विरोध कर रही है, जो स्वाभाविक है ।’ मेरी इस तरह की साहस और क्रियाशीलता को देखकर एक बार भारतीय राजनेता डा. के.आई. सिंह ने भी मुझे कहा था–‘आपकी साहस और प्रयास प्रशंसनीय है, लेकिन आप अपनी अडान में कितने दिन तक रह पाती हैं, यह देखना है ।’
मेरी साहित्यिक यात्रा
इस तरह न चाहते हुए भी मेरी राजनीतिक पहचान बन गयी । राजनीति में रहते वक्त भी मैंने लिखने का काम नहीं छोड़ा । आज प्रदेश नं. १ के मुख्यमन्त्री हैं–शेरधन राई । जिस वक्त वह सूचना तथा संचार मन्त्री थे, उस वक्त मैंने राई को ही प्रमुख अतिथि बनाकर एक ही दिन में ४९ किताब विमोचन किया है । मेरे खयाल से यह विश्व इतिहास में ही दुर्लभ घटना है । क्योंकि एक ही लेखक द्वारा रचित ४९ पुस्तकें एक ही समय में इस तरह विमोचन शायद ही किसी देश में तथा राइटर ने किया होगा । मेरी कुल १३९ किताबें प्रकाशित हैं । जनजातियों का इतिहास समेटकर मैंने ८१२ पृष्ठ की किताब भी लिखी है । ‘जनजातियों का वेद’ के बारे में अनुसंधान कर किताव प्रकाशित किया हूं । मैंने जो भी किताब प्रकाशित किया, आज तक पैसे लेकर किसी को भी वह किताबें नहीं बेची हूं । पढ़नेवालों को खुद जाकर देती थी । आज भी लिख रही हूं । मेरी जो किताब प्रकाशित होने जा रही है, मुझे लगता है कि वह सबसे अधिक महत्वपूर्ण होनेवाली है । क्योंकि किताब का विषयवस्तु वृद्धा–वोध है अर्थात् ‘बुढापा की अनुभूति’ । आप जैसे युवाओं को बुढापा क्या होती है, उसकी अनुभूति मेरी किताब दे सकती है । और किताब आप को यह भी कहती है कि आप अपने वृद्धावस्था की तैयारी आज से ही शुरु करें । वैसे तो आज मेरी हालात ऐसी हो गई है कि अगर आप तत्काल अपने कपड़े बदल कर पुनः मेरे सामने आते हैं तो मुझे पहचानने में मुश्किल हो जाती है । इसी तरह जो लिखती हू, कुछ देर बाद उसको पढ़ने में खुद असमर्थ हो जाती हूं, आंखों की कमजोरी से ।
मैं चित्रकार भी हूं । एक समय तो ऐसा भी था कि हर साल मेरी एकल चित्रकला प्रदर्शनी होती थी । राजनीतिज्ञ, समाजसेवी, साहित्यकार, इतिहासकार, चित्रकार न जाने मेरे नाम के पीछे क्या जोड़ा जाए, मैं नहीं जानती । लेकिन मैंने जो भी किया, मानव हित को केन्द्रबिन्दु में रख कर किया । मेरी हर विचार, सोच और क्रिया मानवतावादी दृष्टिकोण से ही अभिप्रेरित रही ।
ब्राह्मणों की राज्य–सत्ता
मैं जनजाति से हूं । आज तक मैंने जाति की दृष्टिकोण से किसी के ऊपर भी भेदभाव नहीं किया है । लेकिन हम जैसे जनजातियों के प्रति राज्य का दृष्टिकोण सकारात्मक नहीं है । सच कहें तो जनजाति राजनीतिक अधिकारविहीन है । दूसरा सच यह भी है कि जनजाति भी अपने अधिकार नहीं मांग रहे हैं । आज जो शासन–सत्ता है, वह ब्राह्मणों का है । मैं एक इतिहासकार भी हूं, इसीलिए एक सच और भी सुनिए–आप जैसे ब्राह्मण–क्षत्रि तो भारत से नेपाल प्रवेश करनेवालों में से हैं । अर्थात् नेपाल के अधिकांश ब्राह्मणों का इतिहास भारत के साथ ही जुड़ा हुआ है । लेकिन जनजाति यहां के मूल वासी हैं । आज शासन–सत्ता में उन लोगों का कोई भी लेना–देना नहीं है । हां, जनजाति और मधेश के नाम में आप ने जो भी आन्दोलन देखा, वह तो कुछ लोगों के इन्ट्रेस्ट में संचालित एक राजनीतिक खेल है । खेल में सहभागी लोग मांस–मदिरा और मनोरंजन के लिए लालायित लोग थे । अर्थात् आत्मा से जागृत होकर आन्दोलन शुरु नहीं की गई थी । सच तो यह है कि जनजातियों की आत्मा अभी तक जागृत हुई ही नहीं है । आत्मा की जागृति बिना किया गया कोई भी आन्दोलन सफल नहीं हो सकता । मांस और मदिरा में मस्त रहने से आत्म–जागृति सम्भव भी नहीं है । अगर सच में ही आत्मजागृति के साथ जनजाति अपने अधिकार के लिए लड़ते है तो आज नेपाल का जो ‘स्वतन्त्र’ अस्तित्व है, वह भी खतरे में पड़ सकता है । अधिकार प्राप्ति के दौरान खून की नदियां भी बह सकती है । खैर ! अब ऐसी बातें करना ठीक नहीं है । पहचान और अधिकार के नाम में जो मांग आगे आया है, उसको सही सम्बोधन होना चाहिए । इसी में सब की भलाई है ।
 अब नहीं तो कब ?
नेपाल में राजनीतिक दलों की शासन अवधि ५० साल से अधिक हो गयी है । लगभग ५० साल के बाद ही हम लोगों को स्थिर सरकार देखने को मिल रहा है, इसीलिए आम जनता आशावादी भी हैं । राजनीतिक आधारशीला निर्माण के लिए केपीशर्मा ओली ने जो प्रयास किया, वह प्रशंसनीय है । ओली एक दूरदृष्टिवाले नेता भी हैं, अब सबको मिलकर उनको साथ देना चाहिए और देश को समृद्धि की राह पर आगे बढ़ाना चाहिए । आज भी विभिन्न बहाने बनाकर मुंह मोड़ लेते हैं तो हमारे दुर्भाग्य को कोई नहीं टाल सकता । अर्थात् अब ५ साल के लिए बिना बाधा–अड़चन ओली को सत्ता की चाबी देनी चाहिए । सभी राजनीतिक दलों को अब यह प्रमाणित करना है कि दलीय व्यवस्था से भी कुछ हो सकता है । नहीं तो हमारी दलीय व्यवस्था के प्रति ही गम्भीर प्रश्न–चिन्ह खड़ा होनेवाला है । राजा महेन्द्र द्वारा निर्मित भौतिक संरचना, राजा महेन्द्र द्वारा ही सम्पन्न विकास–निर्माण संबंधी कार्य को दिखाकर आज तक हम लोग जी रहे हैं । आप ही जवाब दीजिए– वि.सं. २०४६ साल के बाद हमारे राजनीतिक दलों ने ऐसा क्या किया, जो दुनियां को दिखाने के लिए लायक है ? इसीलिए विकास निर्माण में अब उस युग का अन्त होना चाहिए । हम भी कुछ कर सकते हैं, देश निर्माण का वीजन हमारे पास भी है, इस कथन को प्रमाणित करते हुए दिखाने की जिम्मेदारी आज के सभी राजनीतिक दल और नेताओं पर है । इसके लिए प्रधानमन्त्री ओली और पुष्पकमल दाहाल को साथ देना ही एक मात्र विकल्प है । अगर आप नेपाली हैं, अपने देश को थोड़ा–सा भी प्रेम करते हैं और देश में समृद्धि चाहते हैं तो कम से कम ५ साल इन दोनों का साथ देना ही बुद्धिमानी है । कब तक हम लोग नैतिकहीन होकर हरदम विरोध ही करते रहेंगे  ? कब तक हमारे युवाओं को विदेश में भेज कर रेमिट्यान्स से देश संचालन करते रहेंगे ? युवाआें को विदेश भेजकर क्या हम लोग अपनी खेतीबारी हरदम अशक्त महिला और वृद्ध–वृद्धा द्वारा ही संचालन करना चाहते है ? आज गांव में खेत–बारी बंजर होता जा रहा है, काम करनेवाले युवा नहीं हैं । यहां तक कि आज कई गांव में मुर्दो को कंधे देनेवाले पुरुष नहीं है, महिलाआें कंधे देना पड़ रहा है । क्या अब भी हम लोग यही चाहते हैं ? अगर आप चाहते हैं कि ऐसी अवस्था को अन्त हो, तब तो ५ वर्षीय सरकार को स्थिर बनाना ही चाहिए, बेकार का लडाई–झगड़ा अब बंद होना चाहिए ।
मानव धर्म निर्वाह कर रही हूं
मैं अपने बारे में इतना ही जानती हूं कि मैं एक मानव हूं और नेपाली नागरिक हूं । मानव और नेपाली नागरिक होने के नाते मैं मानवता और नेपाल देश के लिए ही अपनी भूमिका निर्वाह करती आ रही हूं । जब तक हम लोग खुद को नहीं समझते हैं, तब तक हमारे जीवन में खुशी और शान्ति आनेवाली नहीं है । मैं कौन हूं, मेरा कर्तव्य और जिम्मेदारी क्या है ? मेरा समाज और राष्ट्र क्या है, इसके प्रति मेरी जिम्मेदारी क्या है ? उस जिम्मेदारी को निर्वाह करने के लिए मैं योग्य हूं या नहीं ? जब आप इन सारे प्रश्न को खुद से पुछते हैं तो आप अपने जीवन के लिए कुछ लक्ष्य निर्धारण कर सकते हैं । उस लक्ष्य प्राप्ति के लिए किया गया संघर्ष ही आप को खुशी और शान्ति प्रदान कर सकती है । दूसरों की हरदम आलोचना करनेवाले व्यक्ति, अपनेजन की प्रगति देखकर अन्तर हृदय से जलनेवाले व्यक्ति, दूसरे को भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण से दिखनेवाले व्यक्ति, हरदम नकारात्मक सोच लेकर चलनेवाले व्यक्ति, कभी भी शान्त और सुखी नहीं रह सकता है ।
कोई भी पश्चाताप नहीं है
खास तो मैंने महत्वपूर्ण और अग्रिम योजना बनाकर कोई भी बड़ा–सा काम शुरु नहीं किया है । सामने जो आता था, उसको अपनी बुद्धि, विवेक और क्षमता के अनुसार सकारात्मक बनाने का कोशीश किया । हां, सामान्य विचार और चाहत को मैंने जरुर पूरा किया हूं । आज कोई भी ऐसी चाहत और पश्चताप नहीं है, जो कि मैंने पूरा नहीं कर पाया । वैसे तो आज मैं खूद वृद्धा अवस्था में हूं । मेरी एक चाहत है–‘जेष्ठ नागरिक पाहुना घर’ (जेष्ठ नागरिकों के लिए निवासस्थान) बनाने की, जो बन रहा है । मैं चाहती हूं कि उक्त पाहुना घर में एक अस्पताल भी हो, जहां आर्थिक अवस्था कमजोर रहे वृद्ध–वृद्धाओं को स्वास्थ्य सेवा प्रदान कर सकें । ‘भद्र कुमारी घले सेवा सदन’ ऐसी संस्था है, जिसने आज तक राज्य से एक रुपयां भी प्राप्त नहीं किया है और ना ही कोई प्राइभेट संघ–संस्था तथा व्यक्तियों की ओर से सहयोग लिया है । संस्था संचालन के खातिर जो भी खर्च आवश्यक पड़ता था, वह खूद मैंने इकठ्ठा किया । हां, अस्पताल निर्माण के खातिर तत्कालीन भारतीय राजदूत रंजीत रॉय ने ५ करोड़ देने का घोषणा किया था, लेकिन आज वह नेपाल में नहीं हैं । अस्पताल निर्माण के खातिर नक्सा पास की काम हो रहा है । खैर ! आज के लिए मेरी चाहत है कि ‘भद्र कुमारी घले सेवा सदन’ में वृद्ध–वृद्धाओं के लिए अस्पताल के साथ जेष्ठ नागरिक अतिथि गृह बनें ।
प्रस्तुतीः लिलानाथ गौतम

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