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नेपाली भाषा के आदिकवि भानुभक्त आचार्य : प्रियम्बदा काफ्ले

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हिमालिनी, अंक डिसेम्वर 2018,नेपाली काव्य जगत् में भानुभक्त आचार्य को आदिकवि के रूप में जाना जाता हैं । नेपाल के साहित्यिक इतिहास में भानु भक्त दैदिव्यमान नक्षत्र हैं । नेपाली भाषा में रामायण की रचना करने वाले भानुभक्त ने नेपाली साहित्य को एक अमूल्य कृति दी है । भानुभक्त ने काव्य की भाषा में नहीं जन भाषा में पूरी जाति के लिएरामायण की रचना की है । उनके रामायण के आदर्श ने तत्कालीन राजतंत्र को हिला हिला दिया था । नेपाल के राजनीतिक जीवन में धर्म ही अंतिम बात है, पर भानुभक्त ने अनुशासन की इस श्रृंखला को तोड़कर लोकजीवन की चेतना में रामकथा को संयोजित कर पूरी जाति को जागृत किया है ।

भानुभक्त का वंश और उनका जन्म
तनहूँ जिला के चूँदी तामाकोट गाँव में वैक्रमाब्द के उन्नीसवी शताब्दी में श्रीकृष्ण आचार्य (जोखुपाध्या) रहते थे । उनका अनुमानित समय १८११–१८८८ है । श्रीकृष्ण बहुत विद्वान् संस्कारी बह्मण थे ये बात भानुभक्त द्वारा अपने परिचय देने के प्रसङ्ग में कही गई हैं ।

पाहाड्को अतिवेशदेश् तनहुँमाश्रीकृष्ण ब्रह्मण्थिया ।
खुप्उच्चाकुलआर्य वंशीहुन गै सत्कर्ममा मन्दिया ।
विद्यामापनि जो धुरन्धरभई शिक्षामलाई दिया ।
तिन्को नाति म भानुभक्तभनिहुम् यो जानिचिन्हीलिया ।

श्रीकृष्ण के छः पुत्र हुए धनञ्जय, काशिनाथ, पद्मनाथ (शेखर), तुलसीराम, गङ्गादत्त, इन्द्रविलास । और रुद्रप्रिया और रमा दो बेटियाँ भी थी । इन छः पुत्रों में सबसे बडे धनञ्जय के पुत्र के रूप में भानुभक्त जी को जाना जाता है । इनके कुल में कुल परम्परा से ही कर्मकाण्ड ज्योतिष आदि विविध शास्त्र का कतिपय हस्तलिखित पुस्तक प्राप्त होने से विद्या परम्परा अच्छी थी ये ज्ञान मिलता है ।
भानुभक्त के पिता धनञ्जय सरकारी नोकरी करते थें । अभी नेपाल के गण्डकी क्षेत्र के तनहुँ जिला इन के कारण सम्पूर्ण नेपालियों में सुविख्यात है । भानुभक्त के घर में बहुत सारे संस्कृत ग्रन्थ मिलने की बात शिवराज आचार्य कौण्डिन्न्यायन द्वारा सम्पादित भानुभक्त कृत भाषा रामायण की भूमिका में उल्लेख किया गया है । इस से भानुभक्त की वंश परम्परा बहुत विद्वत्ता से पूर्ण होने का प्रमाण मिलता है ।
उनके वंश में जन्म १८७१ विक्रम संवत् आषाढ २९ के दिन कृष्ण पक्ष के अष्टमी के रविवार वर्षाऋतु में माता धर्मावती के गर्भ से खरीदार धनञ्जय आचार्य के पुत्र के रूप में नेपाली भाषा के अद्वितीय सर्जक भानुभक्त आचार्य का जन्म हुआ था । ‘आदिकवि भानुभक्त आचार्य को सच्चजीवनचरित्र’ नामक ग्रन्थ में अनेक विवाद का खण्डन कर के प्रमाण पुष्ट जन्म विवरण दिया है । भानुभक्त ने स्वयं अपने जन्म के विषय में भी लिखा है ।

भानुभक्त के जन्मस्थल के विषय में कोई निश्चितता नही हैं । उनके पिता सरकारी अधिकारी होने के कारण उनका किराये का घर में जन्म होना भी सम्भव हैं । चूँदी रम्घा के गाँव में यदि जन्म हुआ होगा तो श्रीकृष्ण आचार्य के घर में हुआ होगा । इस विषय में भी लोगों का अनेक तर्क वितर्क दिखता है । भानुभक्त के विषय में चलचित्र भी बना उस में जो भानुभक्त का जन्म स्थान दिखाया गया वह स्थान परिवेश परिधान आदि में स्वाभाविकता नहीं दिखती है । भानुभक्त के गाँव में जाने के लिए काठमाण्डु पोखरा राजमार्ग में डुम्रे नामक स्थान से शाखामार्ग होकर भन्सार, नारेश्वरटार फुस्रेटार बाङ्गिरह सेपाऽबँगैचा होकर स्थलमार्ग है ।
भानुभक्त की शिक्षा, विवाह
भानुभक्त आचार्य एक सम्पन्न ब्रह्मण कुल के थे । अतःउनका बाल्यजीवन सुखमय ही होगा ऐसा अनुमान कर सकते हैं । भानुभक्त ने अपने पितामह श्रीकृष्ण आचार्य से शिक्षा ग्रहण किया था । उनके लेखन से ही पताचलता हंै कि भानुभक्त विद्वान् थे ।
भानुभक्त के दो विवाह का जिक्र किया गया है । पहली पत्नी के देहावसान होने के कारण उनकी १३ वर्ष की उम्र में दूसरी विवाह तनहुँमानुङ के सम्पन्न ब्राह्मण विद्याधर खनाल की १० साल की पुत्री चन्द्रकला के साथ हुआ था । इसके बाद भानुभक्त काशीबास में रहनेवाले अपने दादा श्रीकृष्ण आचार्य से अध्ययन हेतु वाराणसी चले गए थे । भानुभक्त वाराणसी में विद्वत्सभा में शास्त्रार्थ प्रतियोगिता में जाते थे । मेरे पितामह पण्डित कविराज नरनाथशर्मा आचार्य ने(१९६२–२०४५) ‘आदिकविकवि सम्राट् भानुभक्त आचार्य को सच्चाजीवनचरित्र’ में विस्तार से भानुभक्त के बारे में लिखा हैं । इसी के आधार पर लोगों ने इस विषय में लिखना शुरु किया हैं ।
भानुभक्त की कृति और काव्यगत प्रवृत्ति
भानुभक्त में स्वाभाविक रूप में काव्य रचना की प्रतिभा थी । उन्होंने घाँसी की प्रेरणा से यश के लिए कविता लिखना शुरु किया था ये बात कही जाती है । पर ‘आदिकवि भानुभक्त आचार्यको सच्चा जीवनचरित्र’ में इस बात का खण्डन किया गया हैं । विविध समय में अपने आनन्द के लिए भानुभक्त ने विविध प्रकार की कविताएँ लिखी है । काशीवास में रहे पितामह से उनको वैराग्य विषय में बहुत कुछ सुनने को मिला था । उस समय उन्होंने प्रश्नोत्तरमालिका कण्ठ किया वाद में अनुवाद भी कर डाला । घर में अनेक व्यवहार में रहते हुए उन्होंने व्यवहारिक कविताएँ लिखी । मूलतः व्यवहारिक और भक्तिभाव से युक्त वेदान्त दर्शन से प्रभावित वैराग्य आदि के प्रभाव में कविता लिखा । भानुभक्त जहाँ जाते थे वही उसी विषय को लेकर कविता लिखते थे । भानुभक्त की रचना अत्यन्त सरल यथार्थ लालित्यपूर्ण और हृदयस्पर्शी होने के कारण जो भी सुनता था लिखकर कण्ठस्थ करता था इस प्रकार से इनकी सारी रचनाएँ लोकप्रिय तथा प्रसिद्ध होने लगी थी ।
इस बात से भानुभक्त और उत्साहित होकर कविताएँ लिखने लगे उन्होंने फुटकर कविता के साथ में अनेक काव्य लिखे जिनमें भक्तमाला प्रश्नोत्तर वधूशिक्षा के साथ साथ उन्होने रामगीता का और अध्यात्म रामायण का अनुवाद किया । अनुवाद में भी मौलिकता का अनुभव दिलाना उनकी काव्यगत विशेषता है ।
नेपाली साहित्य में भानुभक्त कृत रामायण को सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है । यद्यपि भानुभक्त के पूर्व भी नेपाली राम काव्य परंपरा में गुमनी पंत और रघुनाथ भट्ट का नाम उल्लेखनीय है । रघुनाथ भट्ट कृत रामायण सुंदर कांड की रचना उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुआ था । इसका प्रकाशन नेपाली साहित्य सम्मेलन, दार्जिलिंग द्वारा कविराज दीनानाथ सापकोटा की विस्तृत भूमिका के साथ १९३२ में हुआ ।
नेपाली साहित्य के क्षेत्र में प्रथम महाकाव्य रामायण के रचनाकार भानुभक्त का उदय सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना है । पूर्व से पश्चिम तक नेपाल का कोई ऐसा गाँव अथवा कस्वा नहीं है जहाँ उनकी रामायण की पहुँच नहीं हो । भानुभक्त कृत रामायण वस्तुतः नेपाल का ’राम चरित मानस’ है ।
भानुभक्त कृत रामायण की कथा अध्यात्म रामायण पर आधारित है । इसमें उसी की तरह सात कांड हैं, बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किंधा, सुंदर, युद्ध और उत्तरकांड ।
इनकी रचना के बारे में टिप्पणी करते हुए ‘आदिकवि भानुभक्त आचार्यको सच्चा जीवनचरित्र’के रचनाकार ने कहा है कि लड्डु में से किस भाग में मीठा कम होता है ? इसी प्रकार इनकी हर पंक्ति मीठी है सुन्दर है उत्कृष्ट है । भानुभक्त के रचना के माध्यम से नेपाली भाषा का भाषिक एकता भी हुआ है । इनके रामायण पढने के लिए गैर नेपालीभाषी भी नेपाली भाषा सीखा करते थे ।
इनसे पहले इतना सुन्दर सर्वाङ्गीण महाकाव्य समकक्षी रचना किसी ने नही लिखा था । अतः इनको नेपाली भाषा के आदिकवि का सम्मान मिला है । नेपाली रामायण धार्मिक दार्शनिक साँस्कृतिक भाषिक साहित्यिक तथा विशिष्ट राष्ट्रीय महत्त्वयुक्त आदिकाव्य दिव्यकाव्य के रूप में आज भी नेपालियों के बीच में शोभायमान हैं । अध्यात्म रामायण का अनुवाद होने पर भी भानुभक्त का नेपाली रामायण अनुवाद जैसा प्रतीत नही होता है पढने में मौलिक कृति की तरह ही आनन्दप्रद है । अतःआज भी हिन्दी में तुलसीदासकृत रामचरितमानस को जो आदर प्राप्त हैं वही आदर नेपाल में भानुभक्तीय रामायण को प्राप्त है, ऐसा कहा जा सकता हैं । भानुभक्त के बारे में सर्वप्रथम मोतीराम भट्ट ने लिखा । बाद में भानुभक्त के बारे में विविध लोगों ने लिखना शुरु किया किन्तु पण्डित कविराज नरनाथ कृत आदिकविको सच्चा जीवनचरित्र को विशेष प्रामाणिक माना जाता है । भानुभक्त के रामायण के पाठ समीक्षात्मक और लोकप्रिय संस्करण करके शिवराजआचार्य कौण्डिन्न्यायन द्वारा सम्पादित भानुभक्तीय रामायण इन दिनों में बहुत महत्तवपूर्ण माने जाते है । किन्तु इस रामायण के कई संस्करण प्रकाशित मिलते है ।

प्रियम्बदा काफ्ले

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