Thu. Jan 17th, 2019

नेता और कर्मचारियों के खून में ही भ्रष्टाचार है – भरत जंगम

 

Bharat Jangam
भरत जंगम, भ्रष्टाचार विरोधी अभियन्ता

भरत जंगम भ्रष्टाचार विरोधी अभियन्ता हैं । ४८ सालों से अर्थात् वि.सं. २०२७ से ही आप इस अभियान में हैं । अभियान के दौरान कभी आप पत्रकार बने तो कभी साहित्यकार । आज आपने एक नयी मंजिल हासिल कर ली है । अर्थात् जंगम द्वारा प्रतिपादित ‘भ्रष्टाचार विरोधी शास्त्र’ ने मूर्त रूप लिया है, इसके संबंध में उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी है । अब यह विषय त्रिभुवन विश्वविद्यालय में पढाई होनेवाला है । नेपाल में व्याप्त भ्रष्टाचार और अभियान के प्रति ही केन्द्रित रह कर हिमालिनी के लिए लिलानाथ गौतम ने जंगम के साथ बातचीत किया है । प्रस्तुत है बातचीत का सम्पादित अंश–

 

 

 

० भ्रष्टाचार विरुद्ध आपने ने जो अभियान शुरु किया था, वह कहां तक पहुँच गया है ?
– हां, मैं विगत ४८ सालों से भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में क्रियाशील हूँ । अभियान के दौरान ही मुझे लगा कि अब सिर्फ विरोध करने से भ्रष्टाचार नियन्त्रित समाज सृजन होने वाला नहीं है । मुझ लगा कि भ्रष्टाचार मुक्त समाज के लिए एक महत्वपूर्ण वातावरण की आवश्यकता है । उसके लिए लोगों को शिक्षित होना जरुरी है, नेता और प्रशासकों में उत्तरदायित्व की भावना होनी चाहिए, बेईमान लोगों को सजा मिलनी चाहिए । ऐसे ही वातावरण निर्माण के लिए मैं आज लग रहा हूँ । मेरी मान्यता है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध शैक्षिक प्रणाली विकास होनी चाहिए । इसी बहस को लेकर मैं इंस्टिच्युट और एकेडेमी में जाकर विचार–विमर्श किया । खुद संलग्न होकर अनुसंधान किया, दूसरों को भी अनुसंधान में संलग्न करवाया । इसी बीच में मैंने भ्रष्टाचार विरोधी शास्त्र (साइन्स आफ एन्टिकरप्सन) को विकास किया है, जो एक पुस्तक के रूप में सार्वजनिक है । इस साइन्स को मैंने नेपाल के अलावा अमेरिका, युके और भारत में कॉपी राइट के रूप में रजिष्ट्रर कर चुका हूँ । अर्थात् आज भ्रष्टाचार विरोधी शास्त्र (साइन्स ऑफ एन्टिकरप्सन) एक अध्ययन का विषय बन चुका है ।
० अभियान के संबंध में लोगों की प्रतिक्रिया केसी है ?
– प्रतिक्रिया तो उत्साहप्रद है । क्योंकि यह एक सामान्य अभियान भी नहीं है, जो मैं अकेले ही कर सकूं । आम लोगों का साथ और समर्थन नहीं रहता तो मैं कुछ भी नहीं कर पाता । इसलिए मुझे प्रशस्त सहयोग प्राप्त है । समाजशास्त्र से जुड़े हुए  लगभग २२ हजार प्रोफेसर आज मेरे सम्पर्क में हैं, जो विभिन्न देशों से प्रतिनिधित्व करते हैं हाल ही में (वि.सं. २०७४ चैत्र २४ गते) त्रिभुवन विश्वविद्यालय ने नीतिगत रूप में ही ‘भ्रष्टाचार विरोधी शास्त्र’ को पाठ्यक्रम में समावेश करने का निर्णय लिया है । अर्थात् अब भ्रष्टाचार विरोधी शास्त्र मास्टर डिग्री के विद्यार्थियाें के लिए एक अध्ययन का विषय बना है । अभी उस का कोर्स डिजाइन हो रहा है, जो मेरे ही निर्देशन में हो रहा है । अर्थात् २५ लोगों की एक समूह कोर्स डिजाइन के लिए काम कर रहे हैं । इसके साथ–साथ अब जल्द ही त्रिभुवन विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार विरोधी शास्त्र के लिए एक अलग ही डिपार्टमेन्ट खुलनेवाला है ।
०  इस नया विषय में कब से अध्ययन–अध्यापन शुरु होनेवाला है ?
– जल्द ही होनेवाला है । हमारी प्रतिबद्धता है कि सन् २०१९ से ही एमए के क्लास में उक्त विषय को रखा जाएगा । अगर त्रिभुवन विश्वविद्यालय में इस विषय में कक्षा सञ्चालन होगा तो पूरे विश्व में ही त्रिभुवन विश्वविद्यालय प्रथम विश्वविद्यालय होगा, जहां भ्रष्टाचार विरोधी साइन्स का अध्ययन–अध्यापन होगा । आज भ्रष्टाचार विरोधी शास्त्र में कुछ विद्यार्थी विद्यावारिधी भी कर रहे हैं, उसमें से मेरे पुत्र अनुप जंगम भी एक है ।
० आप की जानकारी में नेपाल में अधिक भ्रष्टाचार होनेवाला क्षेत्र कौन–कौन हैं ?
– सबसे अधिक भ्रष्टाचार होनेवाला जगह सरकार ही है । अर्थात् राजनीतिक पार्टी और कर्मचारीतन्त्र में ज्यादा भ्रष्टाचार है । तुलनात्मक रूप में कर्मचारी से ज्यादा नेता भ्रष्ट हैं । सच कहे तो नेताआें के संरक्षण में ही कर्मचारी भ्रष्टाचार करते हैं । अर्थात् राजनीतिक नेताओं के लिए कर्मचारीतन्त्र भ्रष्टाचार करने के लिए बाध्य हैं । हां, कहीं–कहीं कर्मचारीतन्त्र ने भी राजनीतिक नेताओं को भ्रष्टाचार करने के लिए सिखाया है । लेकिन ऐसी अवस्था बहुत कम जगहों में मिलती है । जहाँ राजनीतिक नेता और कर्मचारीतन्त्र ही भ्रष्टाचार में शामिल होते है तो अन्य क्षेत्र भ्रष्टाचार से मुक्त कैसे हो सकता है ? हर जगहों में भ्रष्टाचार है ।
चर्चा में रहे शब्द ‘सिण्डिकेट’ को ही एक उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है । सिण्डिकेट कैसे करना है, उसका नीति–नियम अर्थात् प्रणाली सरकार की ओर से बनाया जाता है । वही सिण्डिकेट वैधानिक रूप में भ्रष्टाचार का कारण बन जाता है । सरकार का मतलब राजनीतिक पार्टी तथा कर्मचारियों का साझा स्वरूप है । प्रत्यक्ष रूप में सिण्डिकेट चलानेवाली संस्था सरकार नहीं है, यहां प्रत्यक्ष भ्रष्टाचार भी नहीं दिखाई देता है । लेकिन सिण्डिकेट प्रणाली ही ऐसी प्रणाली है, जहां मनचाहा भ्रष्टाचार होता है । उसी भ्रष्टाचार से प्राप्त कमीशन नेता तथा कर्मचारीतन्त्र तक पहुँच जाता है । आज सिण्डिकेट तो हर क्षेत्र में है– तरकारी के ब्रोकर, बस तथा ट्याक्सी के संचालक अथवा अन्य सेवा संचालन ही क्यों न हो, हर क्षेत्र में सिण्डिकेट है । जहाँ सिण्डिकेट है, वहां भ्रष्टाचार है । आप स्कूल में जाइए, नौकरी की तलाश में निकल जाइए, तबादला के लिए जाइए, आप हर जगहों में भ्रष्टाचार देख सकते हैं । आप के पास रुपयों से भरा सुटकेश है तो कल ही मन्त्री भी बन सकते हैं, जो देश और जनता के लिए स्वस्थकर नहीं है ।
० भ्रष्टाचार किस तरह होती है ?
विशेषतः भ्रष्टाचार दो तरीके से होती है । पहला, प्रत्यक्ष भ्रष्टाचार । प्रत्यक्ष भ्रष्टाचार में प्रत्यक्ष रूप ही में घूस लेने और देने की बाते होती है । अर्थात प्रत्यक्ष भ्रष्टाचार ‘भ्रष्टाचार’ के रूप में दिखाई देता है और कुछ हद तक उसका प्रमाण भी होता है । लेकिन दूसरा है– अप्रत्यक्ष भ्रष्टाचार अर्थात् नीतिगत भ्रष्टाचार । हमारे यहां नीतिगत भ्रष्टाचार सबसे शक्तिशाली है, जिसमें राजनीतिक पार्टी एवं नेता तथा कर्मचारीतन्त्र का बुलावा है । मन्त्री परिषद् से निर्णय भी नीतिगत भ्रष्टाचार किया जाता है ।
चाहे पहाड़ के नेता हो, चाहे तराई के, चाहे कांग्रेस के नेता हो, चाहे कम्युनिष्ट के, कोई भी नेता अपनी पार्टीगत नीति को ध्यान नहीं देते हैं । सब का सब अवसरवादी होते हैं । उन लोगों को एक ही ध्यान रहता है कि कैसे और कहां से पैसा कमाया जा सकता है । राजनीति में व्याप्त इसतरह की मानसिकता के कारण ही आज समाज विकृत बनता जा रहा है ।
० नेता ही क्यों भ्रष्टाचार में ज्यादा दिखाई देते हैं ?
– उन लोगों का मूल उद्देश्य चुनाव में विजयी होना है । चुनाव के लिए पैसो की जरूरत पड़ती है । उन लोगों को लगता है कि अगर चुनाव में वोट खरीद नहीं करेंगे तो चुनाव जीतने की सम्भावना नहीं है । दूसरी बात, परिवारिक खर्च भी चाहिए । लेकिन अर्थोपार्जन के लिए अन्य व्यवसाय उनके पास नहीं होता है । इसीलिए वे लोग दो नम्बरी धन्दा करते हैं और करवाते हैं । चुनाव को ही लक्षित कर कोई व्यक्ति भारत से पैसा लाते हैं तो कोई चीन से और कोई युरोपीयन युनियन से । कोई एनजीओ–आइएनजीओ संचालन कर नेपाल ही अवैध रूप में कमाते हैं । कोई खुद भ्रष्टाचार करते या दूसरे से भ्रष्टाचार करवा कर कमीशन लेते हैं । ऐसी क्रियाकलाप आज हमारे समाज में संस्कार के रूप में विकासित हो रहा है, जो हमारे लिए घातक बनता जा रहा है ।
० यह तो राजनीतिज्ञ और कर्मचारियाें के ऊपर गम्भीर आरोप है, इस बात को पुष्टि करने के लिए आप के पास कोई प्रमाण है ?
– पहले ही कह चुका हूँ कि नीतिगत भ्रष्टाचार का कोई ठोस प्रमाण नहीं होता है । लेकिन आप देख सकते हैं कि हमारे यहां मन्त्रिपरिषद् द्वारा किए गए कई निर्णय हैं, जो अवैधानिक हैं । और राजनीतिक रूप में भी इस तरह का उदाहरण देख सकते हैं । पिछले उदाहरण के रूप में हम लोग पप्पु कन्ट्रक्सन संबंधी प्रकरण को ले सकते हैं, अनियमितता होने के बावजूद सरकार नजरअंदाज कर रही है क्योंकि उसे डर है कि उसकी सरकार न गिर जाय । इस कथन का मतलब क्या है ? सरकार और सांसद कानुन से ऊपर हैं, उन लोगों के ऊपर कोई भी कारवाही स्वीकार्य नहीं है । सांसद्, मन्त्री, प्रधानमन्त्री सभी अपने को  कानून से ऊपर समझकर व्यावहार प्रस्तुत करते हैं । अर्थात् हमारा राजनीतिक नेतृत्व ही पूर्ण भ्रष्ट है, नेताओं के खून में ही भ्रष्टाचार है । सब पार्टी और नेताओं की हांलत ऐसी ही है ।
० भ्रष्टाचार क्यों होता है, इसके पीछे का मनोविज्ञान क्या है ?
– मनोविज्ञान तो साफ है, पैसे कमाना । जो भी काम करें, आप को अधिक से अधिक पैसा चाहिए, सभी में यही मनोविज्ञान है । जब राजनीति में इस तरह का मनोविज्ञान हावी हो जाता है तो स्वाभाविक है, सामाजिक मनोविज्ञान में भी वही रहेगा ।
० हमारे यहां जो राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक मनोविज्ञान हैं, उसी के कारण भ्रष्टचार में बढ़ोत्तरी हो रही है, शायद आप का कहना यही है ?
– हां । हमारे यहां जो राजनीतिक वातावरण और संस्कार है, उसी के कारण भ्रष्टाचारों में बढ़ोत्तरी हो रही है, सामाजिक तथा आर्थिक मनोविज्ञान विकृत बनता जा रहा है । और भ्रष्टाचार संस्कृति के रूप मेें विकसित हो रही है ।
० भ्रष्टाचार नियन्त्रण के लिए क्या कर सकते हैं ?
– भ्रष्टाचार करना अपराध है, अगर कोई करता है तो उन के ऊपर कारवाही होगी, लोगों में ऐसा मनोविज्ञान विकास होना चाहिए, तब ही भ्रष्टाचार में कमी आएगी । लेकिन हमारे यहां ऐसी वातावरण नहीं है । जो व्यक्ति भ्रष्टाचार करते हुए असीमित आमदानी करते हैं, उन्हीं का जीवन समाज में सम्मानित होता है, राजनीतिक शक्तियों के संरक्षण में काला–धन वैध बनाया जाता है । हम लोग हमारे नेताओं का उदाहरण पेश कर करते हैं । आज समाज में जिस को हम लोग बड़े नेता के रूप में जानते हैं, उन लोगों की पारिवारिक आर्थिक हैसियत ३०–४० साल से पहले कैसी थी ? और आज उन लोगों की हैसियत क्या है ? वे लोग राजनीति के अलावा अन्य कुछ भी नहीं किया हैं, ना ही कोई व्यापार–व्यवसाय है । लेकिन वे लोग आज करोड़ों के मालिक बन गए हैं, लाखों की गाड़ी चढ़ते है, अपने सन्तानों को महंगे–महंगे स्कूलों में पढ़ाते हैं । अर्थात् आम आदमी की तुलना में उन लोगों का खर्च इतने अधिक है, जो कहां से आता है, पता नहीं । इस तरह का भ्रष्टाचार अन्त करना है तो नीतिगत रूप में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है । क्योंकि हमारे यहां तो नीतिगत रूप में ही भ्रष्टाचार को संस्थागत किया जाता है । दूसरी बात, भ्रष्टाचारियों के ऊपर कारवाही होती है, आम जनता में इस की पुष्टि होनी चाहिए । अर्थात् भ्रष्टाचार में दण्डहीनता स्वीकार्य नहीं होना चाहिए ।
दुखः की बात तो यह है कि हमारे यहां तो निर्वाचन प्रणाली के कारण ही भ्रष्टाचार हो रही है । विशेषतः भ्रष्टाचार करनेवाले व्यक्ति नेता होते हैं । क्योंकि उन को चुनाव लड़ना है और जितना है, उसके लिए पैसे की जरुरत है । आमदनी का अन्य स्रोत कुछ भी नहीं है तो असीमित खर्च के लिए भ्रष्टाचार ही करना पड़ता है
० अगर ऐसा है तो चुनाव प्रणाली को कैसे सुधार किया जा सकता है ?
– उपर्युक्त चुनाव प्रणाली को अपनाना चाहिए, जो चुनावी आचार–संहिता बनाई जाती है, उसको ईमानदारीपूर्वक कार्यान्वयन करनी चाहिए । हमारी तरह विकासोन्मुख और अर्ध–शिक्षित देशों में प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली ठीक नहीं है । जहां बहुसंख्यक जनता गरीब है, जहां के बहुसंख्यक जनता साक्षर भी नहीं हैं, वहां के स्थानीय निकाय में राजनीतिक पार्टी और उम्मीदवारों की प्रत्यक्ष संलग्नता पाई जाती है, भ्रष्टाचार का मूल जड़ एक यह भी है । अगर स्थानीय स्तरों में भ्रष्टाचार और राजनीतिक अराजकता अन्त करना है तो स्थानीय तहों में किसी भी पार्टियों की संलग्नता नहीं होनी चाहिए, स्वतन्त्र उम्मीदवार रहना चाहिए । राजनीतिक पार्टी की आवश्यकता केन्द्र में नीतिगत निर्णय के लिए है, स्थानीय तहों में नहीं । अगर स्थानीय तहों पार्टी के प्रतिनिधि चुनाव जीत जाते हैं तो वह जनता का हित देखकर नहीं, अपनी पार्टी का हित को देखकर काम करेंगे । वह अपने पार्टी समर्थक कार्यकर्ता के पक्ष में होते हैं, विरोधी पार्टी के कार्यकर्ता के पक्ष में नहीं । ऐसी अवस्था में वहां भ्रष्टाचार और अराजकता सामान्य बन जाती है । संक्षेप में इतना ही है कि स्थानीय तह राजनीतिक पार्टी से मुक्त होना भी जरुरी है ।
० राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार के लिए कितनी जिम्मेदार है ?
– बहुत हद तक जिम्मेदार है । राजनीतिक अस्थिरता के कारण भी भ्रष्टाचार बढ़ जाता है और भ्रष्टाचार के कारण भी राजनीतिक अस्थिरता हो जाती है । यह दोनों आपस में अन्तर संबन्धित विषय है ।
० सार्वजनिक महत्व के पद पर रहनेवाले व्यक्ति को कैसे भ्रष्टाचारी होने से बचाया जा सकता है ?
– प्रथमतः जो सार्वजनिक पद पर है, उसी को अन्तर हृदय से ही एहसास होनी चाहिए कि भ्रष्टाचार एक अपराध है, अगर अपराध करते हैं तो मुझे कारवाही हो सकती है । लेकिन हमारे यहां भ्रष्टाचारी के ऊपर कारवाही होती है, ऐसा डर किसी के मन में भी नहीं है । समाज में भी यही दिखाई देती है कि  जो भ्रष्टाचार कर के असीमित कमाते हैं, उसी की मान, सम्मान और प्रतिष्ठा बढ़ जाती है, और यह भ्रष्टाचार करने के लिए प्रेरित कर रहा है ।
० वर्तमान सरकार का कहना है कि अब देश में शान्ति और सुशासन कायम की जाएगी, देश को समृद्धि की राह पर ले जाएंगे । आप के दृष्टिकोण में क्या यह सम्भव है ?
– शान्ति का मतलब क्या है ? समृद्धि का मतलब क्या है ? जो नेता अथवा राज्य की ओर से हो रहे अत्याचार को चुपचाप सहता रहे, वही शान्ति है ? समाज में अपराध बढ़ रहा है, महंगाई बढ़ रही है, ऐसी अवस्था में भी अगर जनता चुपचाप रहती है तो नेताओं के लिए वही शान्ति है । समृद्धि का मतलब क्या है ? नेताओं की आर्थिक हैसियत में जो बढ़ोत्तरी हो रही है, क्या वही है समृद्धि ? आर्थिक समृद्धि सिर्फ नेताओं में होने से होगा या जनता में भी होनी चाहिए ? आज एक वडाध्यक्ष करोड़ो की गाड़ी चढ़ने का सपना देखते हैं, हां, यह तो नेताओं के लिए समृद्धि ही है । लेकिन जनता के ऊपर उनकी क्षमता से ज्यादा जो कर लगाया गया है, वह किस लिए ? क्या नेताओं को गाड़ी चढ़ने के लिए जनता से कर वसूल करना ही समृद्धि है ? या नेताओं की समृद्धि देखना ही जनता के लिए समृद्धि है ? इसीलिए हम लोग किस तरह की समृद्धि की बात कर रहे हैं, उसमें स्पष्ट होना जरुरी है ।
० मतलब वर्तमान नेतृत्व से सुशासन और समृद्धि सम्भव नहीं है ?
– शतप्रतिशत नहीं है । वर्तमान राजनीतिक संस्कार, संरचना तथा शासन प्रणाली के कारण ही हम लोग समृद्ध नहीं बन सकते हैं ।
० ऐसा है तो अब क्या कर सकते हैं ?
– नेपाल में ‘संघीयता’ नाम का ‘विष–वृक्ष’ का बीजारोपण किया गया है, जो आम जनता के लिए अभिशाप बनता जा रहा है । जितना जल्दी हो सके, इसमें पुनर्विचार करनी चाहिए । एक उदाहरण पेश करता हूँ– स्थानीय, प्रातीय और संघीय चुनावों का एक साल हो गया है । अभी तक कानुन नहीं बना है, लेकिन स्थानीय सरकार अपना मनचाहा कर वसूल कर रहा है । कारण स्पष्ट है– स्थानीय नेताओं को गाड़ी की आवश्यकता हो रही है । जहां की जनता दो शाम की रोटी पेट भर के नहीं खा पाते हैं, वहीं के नेताओं के लिए जनता अपनी क्षमता से बढ़ कर राजश्व देने के लिए बाध्य हो रहे हैं । संघीयता इसीलिए थी ? दूसरा तथ्य देखिए–प्रदेश के सांसद् और मन्त्रियों का काम कुछ भी नहीं है । लेकिन वे लोग लाखों–करोड़ों की गाड़ी में झण्डा रख कर घूम रहे हैं । हमारे छोटी–सी देश में १०० के बराबरी मन्त्री हैं, उन लोगों के लिए सेक्रेटरी, वाचमैन, सुरक्षाकर्मी आदियों की व्यवस्था की हैं, इसमें जो भी खर्च आता है, वह राज्य की ओर से दिया जाता है । इस तरह का अनावश्यक खर्च के लिए अब पैसा कहाँ से लाया जाए ? अपने हृदय में हाथ रखकर आप ही कहिए– क्या नेपाल की आर्थिक हैसियत इस तरह का खर्च के लिए समक्ष है ?
० प्रदेश सरकार को काम विहीन बनाना, कानून नहीं देना, यह सब तो केन्द्र सरकार की ओर से ही रही लाचारीपन है, इसमे संघीयता को कैसे दोषारोपण कर सकते हैं ?
– ऐसा नहीं है । हमारी जो आर्थिक हैसियत है, संघीय संरचना में जाने के लिए सक्षम नहीं है । दूसरी बात, संघीयता के सवाल में जनता भी निरक्षर हैं । संघीयता क्या है, उन लोगों को कुछ भी पता नहीं है । लेकिन गलत भ्रम फैला कर जनता को संघीयता के पक्ष में भावनात्मक रूप में भड़काया गया है, जिसके चलते आज कई समस्या दिखाई दे रही है । हमारे यहां के कई जनता की आर्थिक हैसियत ऐसी दयनीय है, जो बीमार होते वक्त एक सिटामोल भी नहीं खरीद सकते हैं । रेमिट्यान्स से देश की अर्थ व्यवस्था चल रही है, आन्तरिक उत्पादन और आय–आर्जन के स्रोत में बढ़ोत्तरी नहीं की गई है । ऐसी अवस्था में कुछ नेताओं की स्वार्थ पूर्ति की खातिर आम जनता जबर्दस्ती संघीयता को क्यों स्वीकार करें ? नेताओं को गाड़ी चढ़ाने के लिए आम जनता क्यों अपने पेट में लात मारे ? इसीलिए नेपाल में जो संघीयता लायी गयी है, इसमे पर्याप्त बहस नहीं की गई है ।
० संघीयता तो लागू हो चुका है, अब क्या कर सकते हैं ?
– क्या आप कह सकते हैं कि वर्तमान संघीय संचरना के प्रति सभी सन्तुष्ट हैं ? नहीं । प्रदेश नं. २ कह रहा है कि हम ८ जिलों को लेकर नहीं बैठेंगे । लिम्बुवान अपना ही राज्य मांग रहा है । असन्तुष्ट पक्ष का कहना है कि पुनर्संंरचना होनी चाहिए । लेकिन मधेशी को जो ठीक लगेगा, वह लिम्बुवान के विपरीत है । जो लिम्बुवान को ठीक लगेगा, वह प्रदेश २ में रहनेवालों की मांग के विपरीत है । प्रदेश नं. ७ की हालत भी कुछ ऐसी ही है । प्रदेशों के नाम और स्थायी राजधानी के विषय में भी विवाद कायम है । लेकिन संघीयता को लागू किया गया है । प्रदेश सांसद् और मन्त्रियों का काम कुछ भी नहीं है, लेकिन वे लोग खर्च कर रहे हैं । क्या इस तरह खर्च करना ठीक है ? मुझे लगता है कि गरीबों के पेट में लात मार कर नेताओं का पालन–पोषण करनेवाली संघीयता आवश्यक नहीं है ।
० भ्रष्टाचार नियन्त्रण के लिए अख्तियार दुरुपयोग अनुसंधान आयोग है, उसके प्रति आप का दृष्टिकोण ?
– खरीदार और नासु को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार करने से भ्रष्टाचार नियन्त्रण होनेवाला नहीं है । उक्त संस्था बिल्कुल प्रभावहीन है । क्योंकि उक्त संस्था में जो पदाधिकारी नियुक्त होते हैं, वह प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रभाव में रहता है । अर्थात् वहां राजनीतिक नियुक्ति की जाती है । विडम्बना ! आज तो अदालत के न्यायाधीश भी राजनीतिक आस्था के आधार पर ही नियुक्ति की जाती है ।
० अख्तियार में आज जो नया नेतृत्व है, आप का मतलब उसके प्रति भी कुछ अपेक्षा नहीं की जा सकती ?
– शतप्रतिशत नहीं । अब नया सिरे से ही सोचने की जरूरत है ।
० ऐसा है तो राजनीतिक नेतृत्व में ही परिवर्तन की आवश्यकता है !
– हां ! अब अधिकांश पुरानी पार्टी और नेताओं से सकारात्मक परिवर्तन सम्भव नहीं है । आज देश में कम्युनिष्ट के नाम में साम्राज्यवादी व्यवस्था चल रही है । नए प्रकार का सामन्तवाद आ रहा है । आप देख ही रहे हैं कि मन्त्रिपरिषद् निर्णय द्वारा करोड़ों खर्च की जाती है । मन्त्रिपरिषद् को इस तरह का अधिकार कहां से प्राप्त हुआ है । यहां तो रकमान्तर कर अरबों खर्च किया जाता है, यही है– नीतिगत भ्रष्टाचार । उन लोगों की प्राथमिकता जनता की सेवा नहीं, पैसा है ।
० वर्तमान राजनीतिक दलों को हम लोग जितनी भी गाली दें, लेकिन सत्ता चलानेवाले तो वही हैं ! अगले चुनाव में भी शायद इन्हीं लोग चुनाव जीत कर आएंगे !
– इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि जनता में जागरण आना चाहिए । वि.सं. २०७० साल की चुनाव में एक व्यक्ति का चुनावी मूल्य ३ हजार रुपया था । ०७४ साल के चुनाव में उसी व्यक्ति का मूल्य ७–८ हजार हो गया । अब आनेवाला चुनाव में एक व्यक्ति बराबर १२ हजार खर्च हो सकता है । क्या हम लोग हरदम इसीतरह चलते रहेंगे ?
० अन्त में कुछ कहना चाहेंगे ?
– भ्रष्टाचार सिर्फ नेपाल के लिए ही नहीं, सार्क मुल्कों के लिए ही एक बड़ी समस्या है । हाल ही में बंगलादेश की पूर्व प्रधानमन्त्री बेगम खालिदा जिया को ७ साल के लिए सजा मिली है । अर्थात् भ्रष्टाचार के आरोप में वह सजा भुगतने वाली  है । भ्रष्टाचार की ही पृष्ठभूमि में श्रीलंका में भी सत्ता परिवर्तन हो गई है । पाकिस्तान के पूर्व सरकार प्रमुख नवाज शरीफ के भ्रष्टाचार–काण्ड आप सभी को पता है, जहां एक प्रधानमन्त्री के पास ५४ गाड़ी, ४५० सहयोगी, आलिशान महल दिखाई दिया है ।  मन्त्रियों की रवाफ भी उससे कम नहीं है । लेकिन नये प्रधानमन्त्री इमरान खान ने ठीक उलटा किया है । जिसके संबंध में चारो ओर प्रशंसा भी हो रही है । वह एक सामान्य तीन कोठे के मकान में रह रहे हैं । एक स्मरणीय बात यह है कि पाकिस्तान में ८० प्रतिशत नागरिक साक्षर हैं । जहां, इतनी बड़ी संख्या में साक्षर नागरिक रहते हैं, वहां भी इस तरह का भ्रष्टाचार होता है तो हमारे जैसे देशों की हांलात कैसी होगी ?

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