Mon. Dec 10th, 2018

जीवन में जो प्राप्त है, वह पर्याप्त है : वीरेन्द्रप्रसाद मिश्र

Dr Birendra Prasad Mishra 1
वीरेन्द्रप्रसाद मिश्र

हिमालिनी, अंक नोभेम्बर 2018,( जीवन–सन्दर्भ )   आप प्रा. डॉ. वीरेन्द्र प्रसाद मिश्र से पहली बार मिलते हैं तो आप को लगता है कि वह एक आम साधारण व्यक्ति है, उन्होंने जीवन में कुछ भी नहीं किया । अपने जीवन के महत्वपूर्ण पक्ष और योगदान के बारे में आप ज्यादा चर्चा–परिचर्चा करना भी नहीं चाहते हैं । विशेषतः सामाजिक कार्यों की चर्चा आप को ठीक नहीं लगती । लेकिन प्रा.डॉ. मिश्र वह शख्स हैं, जिन्होंने राष्ट्र के लिए भी कई महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है । डा. मिश्र का जन्म सन् १ दिसम्बर १९४० में वर्तमान महोत्तरी जिला स्थित पिपरा में हुआ है । उनके पिता रामानन्द मिश्र और माता उत्तमदेवी मिश्र हैं । महेन्द्र विद्या भूषण, गोरखा दक्षिण बाहू (दूसरा) जैसे सम्मानों से सम्मानित डॉ. मिश्र के जीवन के महत्वपूर्ण चार पार्ट है– एक प्रोफेसर के रूप में, दो निर्वाचन आयुक्त के रूप में, तीन शान्ति प्रक्रिया अनुगमनकर्ता के रूप में और चार लेखक के रूप में । प्रस्तुत है डॉ. मिश्र का जीवन–सन्दर्भ आपके समक्ष–
पारिवारिक पृष्ठभूमि
हमारे समय में जमीनदारी प्रथा थी । हमारे परिवार भी जमींदार परिवार के रूप में जाने जाते थे । महोत्तरी तथा पिपरा में मिश्र परिवार कहने पर जो भी पहचान लेता था । थोड़ा बहुत राजनीति से जुड़ा हुआ परिवार भी हैं । संयोग की बात यह है कि १९५५ (ई.) में मेरे पितामह, जिनको मै ‘बाबा’ कहता था, उनका स्वर्गवास हो गया । जमीन मेरे पिताजी के नाम में थी । इसीलिए जमीनदारी मेरे नाम से कर दी गई, कहने का अर्थ मैं जमीनदार भी रहा हूँ ।
जमीनदारी रहते वक्त खानेपीने की समस्या नहीं थी, लेकिन घर की स्थिति बहुत ही अच्छी थी, ऐसा नहीं है । एक सामान्य परिवार था, मन चाहा खर्च करने के लिए हम लोग स्वतन्त्र नहीं थे । हां, हम लोग नेपाल–भारत सीमा क्षेत्र के वासी हैं । सीमा क्षेत्र में रहनेवाले कई लोगों को ऐसा लगता था कि यह दो अलग देश नहीं है । इसीलिए वहां रहनेवाले कई लोगों की जमीन दोनों देशों में रहती थी । हम लोगों की भी कुछ जमीन भारत में थी । हमारे पूर्वजों ने भारत में जमीनदारी ली थी । जब नेपाल में राणा शासन आया, भारतं भी जमीनदारी ली गई । मेरे खयाल से नेपाल में अर्थात् पिपरा में १२–१५ बीघा जमीन रही होगी और करीब १५–२० बीघा जमीन भारत में रही थी । आज की तुलना में उक्त जमीन कुछ ज्यादा ही दिखाई देती है । आज के समय में अगर किसी के पास इतनी ज्यादा जमीन होती है तो उसको धनी कहा जा सकता है । लेकिन उस समय जमीन का मूल्य कम था, ज्यादा जमीन होने के कारण गाँव–समाज के अन्य लोग, हमारे मिश्र परिवार को ‘अमीर’ के रूप में तो देखते थे, लेकिन हम लोग मनचाहा खर्च नहीं कर पाते थे, आज की तरह अर्थोपार्जन (नगद आमदनी) के लिए अन्य क्षेत्र तथा व्यवसाय भी नहीं था, जमीन में जो कुछ उत्पादन होता था, उससे पारिवारिक भरण–पोषण और शिक्षा–दीक्षा हो जाती थी । अर्थात् हमारा जीवन, सुविधा–सम्पन्न नहीं था, कुछ हद तक लिमिटेसन ही रहा । परिवार के भीतर अगर किसी की शादी हुई तो जमीन ही बेचना पड़ती थी, श्राद्ध तथा कोई शुभकार्य किया जाता था तो जमीन ही बेचनी पड़ती थी । ऐसी अवस्था में मौजा का मौजा ही जमीन बिक जाती थी । इसी तरह हमारी जमीन भी घटती गयी ।
आज मेरे लिए दो गांव और समाज है । एक पिपरा, दूसार काठमांडू  । पिपरा, जिस गांव में मेरा जन्म हुआ है । काठमांडू, जहां मैं आज रहता हूँ । मैं सन् १९७६ से लगातार काठमांडू में रहता आया हूँ, करीब–करीब ४२ साल हो गए । सच पूछिए तो १३–१४ साल तक ही मैं अपने गांव में रहा हूँ । उसके बाद मैं भारत में ही रहा ।
मैंने ६–७ क्लास तक पिपरा में पढ़ाई की, उसके बाद भारत में, जहां से मैंने मैट्रिक, आईए, बीए अनर्स, एमए, कानून और पीएच.डी. किया । जहां (भारत) से मैंने मैट्रिक पास किया, वहां मेरी जमीन थी । आज भारत में कुछ भी जमीन नहीं है । पिता जी के समय से ही हम लोग बेचते चले गए । कानुनी तौर पर भी दो देशों में जमीन नहीं रख सकते थे । नेपाल में रह कर उधर खेतीबारी करना भी सम्भव नहीं था । इसी तरह हम लोग सिकुड़ते–सिकुड़ते आ गए । अब २–४ बीघे की अवस्था में पहुँच गए हैं ।
लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है । जमीनदारी छोड़ कर हम लोग सर्भिस में आ गए । जब महंगाई शुरु होने लगी, धान–चावल बिकने लगा, पैसा हाथ में आने लगा । उसके बाद घर के आर्थिक अवस्था सुधरती गई । नौकरी शुरु करते वक्त मुझे लगा कि खर्च करना आसान हो गया । वि.सं. २०३३ साल से काठमांडू में हूँ, यहां छोटा–सा एक घर है । बेटी अनुपमा मिश्र डाक्टर है, बेटा मुकुल मिश्र इन्जीनियर है । धर्मपत्नी श्यामा मिश्र पहले अंग्रेजी की टीचर थी, अब घर में ही रहती है । आर्थिक रूप से मैं तो पेन्सन होल्डर हूँ । पेन्सन के सहारे जी रहा हूँ ।
औपचारिक शिक्षा और प्रोफसर की यात्रा
मैं दर्शनशास्त्र का विद्यार्थी हूँ । दर्शनशास्त्र में ही मैंने सन् १९६८ साल में कोलम्बो प्लान के अन्तर्गत पटना युनिवर्सिटी से पीएचडी किया है । आईए, एम.ए और कानून की पढ़ाई बिहार युनिवर्सिटी से है । ई.स. १९५७ में मैंने मैट्रिक किया । उस समय मैट्रिक में ११ क्लास होते थे । इसके बाद ५९ साल में आईए, ६१ में बीए (आनर्स) किया । बीए आनर्स इस अर्थ में कि उसमें ३ पेपर अधिक पढ़ना पढ़ता था । उस समय १३ सौ पूर्णाक की पढाई थी । एमए दर्शनशास्त्र में किया । कानून की पढ़ाई सन् १९६४ में किया । जब लॉ (कानून) की परीक्षा हो रही थी, उसी समय काठमांडू (गोरखापत्र) में पीएचडी करनेवालों के लिए सूचना निकली । मैं सन् १९६४ साल के अगस्त के अन्त में काठमांडू आया । ५ सितम्बर एप्लिकेशन के लिए अंतिम दिन था, सिंहदरबार में जाकर फॉर्म भरा । सन् १९६४ में ही मेरा सेलेक्सन हुआ हो गया था पर मुझे जाने के लिए कुछ टाइम लगा । १३ फरवरी १९६५ में मैं यहाँ से पटना गया था, अध्ययन के लिए
मैं नहीं तो तेज विद्यार्थी रहा, ना ही बहुत मन्द । पढ़ाई के लिए मैं साल भर तनाव में नहीं रहता था । जब परीक्षा नजदीक आती थी, तब ही मैं कुछ ज्यादा अध्ययन कर लेता था । तब भी मैं कहीं असफल नहीं रहा । जीवन में मैं प्रोफेसर ही बनूंगा, ऐसा मैंने नहीं सोचा था ।
मैं कॉलेज जीवन में सन् १९५७ से लेकर ६३–६४ तक रहा । उस समय, जब मैं प्रोफेसरों को देखता था तो लगता कि यह एक आदर्श और महान् व्यक्ति हैं । शायद मेरी इसी मानसिकता के कारण ही मैंने भी प्रोफेसर बनने की ठान ली । जब मैंने स्कॉलरशीप पाने के लिए अप्लाई किया, उसमें मेरे कई दोस्त भी थे, जो एम.ए करके आए थे । उस समय वे लोग नौकरी की तलाश कर रहे थे । लेकिन मैने पीएचडी करने का निर्णय किया । पता नहीं क्यो, पीएचडी करने के बाद मुझे लगा कि मैं भी टीचिङ प्रोफेशन में आउंगा, प्रोफेसर बनूंगा । अन्य नौकरी के लिए मैंने कोई प्रयास नहीं किया ।
पीएचडी के बाद अन्य रास्ता नहीं था, मैं काठमांडू आ गया । लेकिन नौकरी नहीं मिली । मैंने शिक्षा मन्त्रालय को सूचीत किया कि मैं पीएचडी करके आया हूँ । मन्त्रालय ने त्रिचन्द्र कॉलेज को एक चिठ्ठी लिख दिया । कॉलेज ने कहा कि अभी सीट खाली नहीं है । उस समय कीर्तिनिधि विष्ट प्रधानमन्त्री थे, मैं प्रधानमन्त्री और शिक्षा मन्त्री ज्ञानेन्द्र बहादुर कार्की से भी मिला, लेकिन नौकरी नहीं मिली । १९६८ से लेकर दो साल तक मैंने नौकरी (टिचिङ) के लिए प्रयास किया, लेकिन नहीं मिल सका ।
मेरा ससुराल इण्डिया में है, मेरे ससूर रामवली सिंह दक्षिण भारत में काम करते थे । उन्होंने मुझे वहीं बुला लिया, जहां जाकर मैंने ६ साल तक नौकरी की । सन् १९७० नवम्बर से मैंने नौकरी शुरु की थी । वहां मैंने प्रचेज का काम किया, जो मेरी पढाई–लिखाई से अलग का विषय था । एक कहावत थी– पढ़े फारसी देखों तेल ! देख भाई किस्मत का खेल !! और मैं उस वक्त कहता था– ‘पढ़े फारसी, बेचे तेल ! देख भाई किस्मत का खेल ।
जैसे भी हो, मुझे नेपाल आना था । उस वक्त यहां नई शिक्षा प्रणाली लागू की गई थी । नए शिक्षक और प्राध्यापकों की मांग हो रही थी । शायद सन् १९७४ में मैं नेपाल आया और नौकरी के लिए त्रिवि (त्रिभूवन विश्वविद्यालय) शिक्षा आयोग में एप्लिकेसन दिया, जिसके बारे में मैंने किसी से भी नहीं कहा था । यहां तक कि मेरे ससुर को भी इस बात का पता नहीं था, जबकि उनके सहयोग से ही मैं इण्डिया में नौकरी कर रहा था । एप्लिकेशन देने के बाद मैं फिर इण्डिया ही वापस हो गया ।
गर्मी के मौसम में मैं आम खाने की बहाने से हर साल नेपाल आता था । नेपाल आते–जाते वक्त मैंने शिक्षा आयोग में परीक्षा और इन्टरभ्यू सब दिया, जो किसी को पता नहीं था । इस अवधि में मेरे दो बच्चे भी हो चुके थे । कभी पत्नी के साथ तो कभी बच्चे को भी लेकर या कभी अकेले ही नेपाल आता था मैं । नौकरी के लिए मैंने जो एप्लिेकसन और परीक्षा दी थी, उसका रिजल्ट आने में दो साल लग गया । सन् १९७६ की बात है, उस वक्त मैं नेपाल आया था, सुना की रिजल्ट होनेवाला है । कुछ दिनों तक इंतजार किया, लेकिन रिजल्ट नहीं आया । सोचा की फिर लौट जाता हूँ । मैं कल वापस होनेवाला था, उसके एक दिन पहले अर्थात् आज के दिन में ही रिजल्ट आ गया, जहां मेरा नाम भी था । उप–प्राध्यापक (सेकेण्ड क्लास शिक्षक) के रूप में मेरा सेलेक्सन हो गया था । खुशी–खुशी नौकरी के लिए मैं गया । उस वक्त जो डीन थे, उन्होंने कहा– ‘अभी कहीं भी सिट खाली नहीं है, आप भारत में ही जा कर काम करते रहिए, मैं पोस्टिक लेटर वही भेज देता हूँ । बाद में आकर ज्वान कर सकते हैं ।’ जो मेरे लिए अनस्पेक्टेड था ।
बाद में पता चला कि पदास्थापन की जिम्मेदारी डीन को नहीं, रजिष्ट्रार के हाथ में है । मैं उनसे मिलने गया । उस वक्त त्रिचन्द्र कॉलेज के प्रोफेसर गोदत्तमान श्रेष्ठ का निधन हो गया था । कुछ दिनों से वहां एक सीट खाली थी । उसी जगह में मेरी दरबन्दी तय हो गई । वि.सं. २०३३ साल आषाढ़ २९ गते मैं उप–प्राध्यापक के रूप में नियुक्त हो गया और मेरी प्रोफेसर जीवन की शुरुआत हो गई ।
पीएचडी करने के दौरान और प्राध्यापक होने के बाद भी मैं कुछ न कुछ लिखता ही रहा हूँ । शुरु–शुरु में अनुसंधानमूलक किताबों को लिखा, कुछ किताबें दर्शनशास्त्र की भी हैं । इसके अलावा मेरी फुटकर लेख–रचना अधिक हैं । मुझे तो वास्तविक संख्या याद नहीं है, लेकिन मेरे बारे में जो जानकार हैं, उन लोगों का कहना है कि मेरे द्वारा लिखे गए ६ सौ से अधिक फुटकर लेख÷रचना है, जो विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं । मेरे ८ पुस्तकें प्रकाशित है, जो दर्शनशास्त्र, निर्वाचन प्रणाली और शान्ति प्रक्रिया के ऊपर है । उन में से ५ पुस्तकें अंग्रेजी में है और ३ नेपाली भाषा में ।
मेरा असफल प्रयास
प्रोफेसर चयन के लिए हमारे यहां उच्च शिक्षा आयोग गठन किया गया था । मेरी मान्यता थी कि जब तक उच्च शिक्षा के विषयों को लोकसेवा आयोग से नहीं जोड़ेगे, तब तक स्नातकोत्तर की पढ़ाई का कोई अर्थ नहीं है । लेकिन मेरी बात की सुनवाई नहीं हो सकी । इसीतरह हमारे यहां शिक्षक तथा प्राध्यापक होने के बाद कोई भी अध्ययन नहीं करते हैं । टीचर तथा प्राध्यापकों को पढ़ने की आदत नहीं है । विद्यार्थी को नई–नई बात सिखानी हैं तो टीचर तथा प्राध्यापक को भी पढ़ना चाहिए, हर बात की अपड़ेट रहनी चाहिए । मैं ऐसी मान्यता रखता हूँ । इसीलिए भी शिक्षा आयोग को लोकसेवा आयोग से जुड़ाने की बात मैं कर कर था ।
उप–प्राध्यापक नियुक्त होने के ३–४ साल बाद ही मैं विभागाध्यक्ष बन गया । कोर्ष में परिवर्तन किया, किताबें लिखीं, अनुसंधान किया । फिर भी कहता हूँ– आजकल टीचर किताब नहीं पढ़ते हैं । मैंने लिखित रूप में भी यह बात कही है । जो शिक्षकों को पढ़ाना है, उनको भी पढ़ना चाहिए । इसी मान्यता के साथ मैंने कहा था कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जहां टीचर भी पढ़ने के लिए बाध्य हों । शायद वि.सं. २०३६–३७ साल की बात है । दर्शनशास्त्र तथा विषय समिति का मैं अध्यक्ष था । मैंने लिखित रूप में कहा कि सहायक उप–सहप्राध्यापक को ५ सौ, सेकेण्ड क्लास अफिसर को १ हजार और जो प्रोफेसर हैं, उन को २ हजार रूपयां हर साल पुस्तक खरीद के लिए मिलनी चाहिए । मेरे कहने का मतलब है कि अतिरिक्त रूप से प्राप्त उक्त रूपयों से टीचर तथा प्राध्यापक अच्छी–अच्छी किताब खरीद कर पढ़े । इतना ही नहीं, मैंने यह भी कहा कि उक्त किताब पढ़ने के बाद शिक्षक तथा प्राध्यापक उस किताब का सारांश तथा समीक्षा लिखें और डीन कार्यालय में दें, जो संग्रह के रूप में रखा जाए । अगर हम लोग ऐसी व्यवस्था करते हैं तो हर शिक्षकों को पढ़ने की आदत होगी । लेकिन मेरी बात किसी ने नहीं सुनी । परिणाम यही है कि जो सब के सामने हैं । अर्थात् आज भी अधिकांश प्राध्यापक नहीं पढ़ते हैं । स्कूल और कॉलेज जीवन में उन्होंने जो पढ़ा, जो लिखा, उनका ज्ञान उसी में सीमित है । आज भी कहता हूँ कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए ।
किताब खरीद के लिए टीचर तथा प्रोफेसरों को अलग से रूपया मिलना चाहिए, मैंने यही कहा था । क्योंकि जब मैं पहली बार उप–प्रध्यापक में नियुक्त हुआ तो उस समय मेरी तनख्वा मासिक ७२० रूपया था । ७२० रूपयों से प्राध्यापक क्या कर सकता है ? घर भाड़ा, बच्चे की फीस, सुबह–शाम का खानापीना, अन्य परिवारिक खर्च ! मेरे जैसी ही हालात अन्य प्रोफेसरों की भी थी । इसीलिए मैंने ऐसा कहा । आज प्रोफेसरोंका वेतन कुछ ज्यादा तो है, लेकिन महंगाई के कारण हालात तो वैसी ही होगी ! मुझे ज्यादा पता नहीं । मेरे कहने का मतलब है– हर टीचर और प्राध्यापक को पढ़ने की जरुरत हैं । लेकिन जो प्राध्यापक अपने पारिश्रमिक से परिवार नहीं चला पा रहे हैं, वह कैसे किताब खरीद सकते हैं ? अर्थात् जब तक आर्थिक रूप में टीचरों को थोड़ी सी सुविधा नहीं दी जाएगी, टीचर पढ़ेगें नहीं, जब तक टीचर नहीं पढ़ेगे, तब तक शिक्षण का जो स्तर है, वह ऊंचा नहीं हो पाएगा । मैंने अपना यह सुझाव अपने डिपार्टमेन्ट, डीन कार्यालय से लेकर उच्च आयोग तक को दिया, लेकिन सुनवाई नहीं हो पाई ।
आज तो हर विश्वविद्यालय में राजनीति ज्यादा होने लगी है । हर नियुक्ति राजनीतिक आस्था के आधार में की जाती है । जहां योग्य और दक्ष व्यक्ति प्राध्यापक होने चाहिए, वहां पार्टी कार्यकर्ता को नियुक्त किया जाता है तो कैसे गुणस्तरीय शिक्षा प्राप्त हो पाएगी ? आज जो व्यक्ति स्वतन्त्र रूप में आयोग पास करते हुए टीचर होते हैं, वह भी बाद में विभिन्न पार्टी संबंध संगठनों में आबद्ध होकर राजनीति करने लगते हैं । ऐसे लोगों की प्राथमिकता शिक्षा और शिक्षण नहीं, राजनीति हो जाती है । ऐसी अवस्था में गुणस्तरीय शिक्षा की परिकल्पना नहीं कर सकते हैं । शिक्षक और प्राध्यापकों को तो शिक्षा क्षेत्र में ही क्रियाशील रहना चाहिए । नयी–नयी पुस्तकों का अध्ययन और अनुसंधान निरन्तर जारी रहनी चाहिए । तब ही हम लोग नयी पीढ़ी के लिए गुणस्तरीय शिक्षा प्रदान कर सकते हैं ।
निर्वाचन आयुक्त के रूप में
सन् १९९३ में मैं प्राध्यापक हो गया था । सन् १९९४ जुलाई में अचानक मुझे निर्वाचन आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया । ‘अचानक’ इस अर्थ में कि उस समय मेरे लिए निर्वाचन आयुक्त होना, मेरी समझ और कल्पना से बाहर की घटना थी । मैंने कभी भी नहीं सोचा था कि मैं निर्वाचन आयुक्त के रूप में नियुक्त हो जाऊंगा । क्योंकि निर्वाचन आयुक्त बनने के लिए मैंने कोई भी प्रयास नहीं किया था, बाहर चर्चा भी नहीं हो रही थी– मैं निर्वाचन आयुक्त बन रहा हूँ । लेकिन बाद में पता चला कि मुझे कैसे निर्वाचन आयुक्त के रूप में चयन किया ।
उस समय गिरिजाप्रसाद कोइराला प्रधानमन्त्री थे । मैं नियमित रूप से कॉलेज जा रहा था । कॉलेज–घर, घर–कॉलेज ऐसी ही थी– जिन्दगी । मेरी धर्मपत्नी श्यामा मिश्र मोर्डन इण्डिन स्कूल में पढ़ाती थी । उक्त स्कूल के लिए वह प्रिन्सिपल और अध्यक्ष दोनों रह चूकी है । मेरा क्लास ११ बजे से शुरु होता था । हम लोग साढे १० बजे तथा उससे पहले ही खाना खाके स्कूल और कॉलेज के लिए निकलते थे । उस समय घर में मैं और मेरी पत्नी, सिर्फ दो व्यक्ति ही था । मेरे पुत्र मुकुल कोलम्बो प्लान में इन्जीनियरिङ कर रहा था और बेटी अनुपमा लखनऊ में डाक्टरी कर रही थी । उस वक्त हमारे ही जिला महोत्तरी के एक मन्त्री थे– महेश्वरप्रसाद सिंह । वह सामान्य प्रशासन तथा कानून मन्त्री थे । एक दिन की बात है, उन्होंने मुझे टेलिफोन किया । मेरे खयाल से उक्त दिन वि.सं. २०५१ श्रावण ४ गते है । मन्त्री सिंह ने टेलिफोन में ही पूछा कि क्या आप निर्वाचन आयुक्त बनेंगे ? मैंने कहा– ‘जी नहीं, मैं तो प्रोफेसर बन गया हूँ । अब मुझे कही जाना नहीं है ।’ उन्होंने कुछ नहीं कहा, टेलिफोन रख दिया । उसके बाद मैंने स्नान किया, खाना खाया । कॉलेज के लिए निकलनेवाला था ।  फिर टेलिफोन की घण्टी बजी । मन्त्री सिंह ही थे, पूछा कि क्या आप के पास समय है ? मैंने कहा– मैं तो कॉलेज जा रहा हूँ । उन्होंने फिर कहा कि १०–१५ मिनट का समय निकाल कर आज ही मुझसे मिल लीजिएगा । मैं घर से निकल गया । टैक्सी लेकर कॉलेज नहीं, १० मिनट में बबरमहल पहुँच गया । मन्त्री नहीं आए थे । कुछ देर इन्तजार किया । मुझसे मिलने के तुरन्त बाद मन्त्री जी ने कहा– ‘आप का नाम निर्वाचन आयुक्त के रूप में दरबार चला गया है ।’ मैं आश्चर्यचकित हो गया । मुझे ऐसा लगा मुझे झंझट में फंसा दिया गया । मैंने कहा– ‘कम से कम नाम भेजने से पहले पूछ लेना चाहिए था, कुछ विचार–विमर्श करनी चाहिए थी ।’ उन्होंने फिर कहा– ‘आप का नाम मैंने प्रधानमन्त्री को नहीं कहा था, संवैधानिक परिषद् ने सिफारिश किया है । परिषद् बैंठक से ही प्रधानमन्त्री ने मुझसे पूछा था कि महोत्तरी जिला के पिपरा ग्राम के कौन से प्रोफेसर हैं, जो त्रिचन्द्र कैम्पस में कार्यरत है ? मैंने कहा– डा. वीरेन्द्र प्रसाद मिश्र ।’ कुछ महीनों के बाद मुझे सर्वोच्च अदालत के तत्कालीन न्यायाधीश सुरेन्द्र प्रसाद सिन्हा ने कहा था कि मेरा नाम तत्कालीन प्रधानन्यायाधीश विश्वनाथ उपाध्याय ने संवैधानिक परिषद् की बैठक में लाए थे, लेकिन मेरा नाम भूल गए थे । उन्होंने मेरा नाम मन्त्री सिंह से ही पूछा था । मेरा नाम का समर्थन तत्कालीन सभामुख दमननाथ ढुंगाना ने किया, जिसके कारण मेरा नाम सिफारिश हो सका, मुझे ऐसा लगता है ।
सन् १९९२ में ही लोकसेवा आयोग के मेम्बर बनने के लिए मेरे समक्ष प्रस्ताव आया था । उस समय मैंने कहा था– ‘मुझे प्रोफेसर बनना है । मेरा अन्तरवार्ता दो साल से पेन्डिङ है । अभी कही नहीं जाना है ।’ दो साल के बाद फिर निर्वाचन आयुक्त बनने के लिए मेरे सामने दूसरा प्रस्ताव आया । उस समय मेरे दिमाग में दो  खयाल आया– एक मन्त्री जी अब मुझे ‘भागनेवाले’ अथवा ‘जिम्मेवारी नहीं लेनेवाले’ समझते हैं, क्योंकि लोकसेवा आयोग में मेम्बर बनने के लिए २ साल पहले किए गए प्रस्ताव को मैंने इन्कार कर दिया था । दूसरी बात दिमाग में आयी कि मैं १८ साल से प्राध्यापक हूँ, दो साल के बाद मैं पेन्सन के हकदार बन जाता हूँ, अगर निर्वाचन आयुक्त बनुंगा तो पेन्सन नहीं भी हो सकती है । इसलिए ५ मिनट के बाद मैंने कहा– ‘मन्त्री जी, मैं निर्वाचन आयुक्त बनूंगा लेकिन एक शर्त पर ।’ मेरी शर्त थी– प्रोफेसर की नौकरी कायम रहना चाहिए । अर्थात् मैं चाहता था कि निर्वाचन खतम होने के बाद मैं पुनः प्रोफेसर के रूप में काम कर सकूं और मेरी पेन्सन हों ।
मन्त्री ने तत्कालीन मुख्यसचिव मधुसुदन गोर्खाली को टोलिफोन किया । उन्होंने टेलिफोन में ही कहा कि आप को राजा से नियुक्त किया जाएगा और प्रोफेसर की नौकरी नहीं जाएगी । गोर्खाली जी ने उनसे मिलने के लिए भी कहा, मैं मिलने के लिए उनके समक्ष पहुँच गया । वहां जाकर भी मैंने वही बात कही कि अगर मेरी प्रोफसर की नौकरी नहीं रहेगी तो मैं निर्वाचन आयुक्त नहीं बनूंगा । उनसे मिलने के बाद भी उन्होंने यही कहा कि आप निश्चित रहिए, आपकी नौकरी नहीं जाएगी । उसके बाद ही मैंने निर्वाचन आयुक्त बनने का स्वीकार किया । उन्होंने मेरे बायोडाटा मांग लिया, जो मैंने दूसरे दिन उनको दिया था । मुख्यसचिव से मिलने के बाद मैं चुपचाप कॉलेज चला गया । जो भी हुआ, इसके संबंध में कॉलेज में किसी को कुछ भी पता नहीं था । मैं कहना भी नहीं चाहता था । शायद उसी शाम या दूसरे दिन सूचना लीक हो गई । मेरे एक मित्र थे– कौलशराज रेग्मी, जो नेपाली कांग्रेस के पार्टी सचिव भी थे । उन्होंने कैम्पस में कहा कि मिश्र जी तो निर्वाचन आयुक्त बन गए हैं । मैंने कहा कि सिर्फ नाम सिफारिश हुआ है, घोषणा नहीं है । अगले ही दिन अर्थात् ५ तारीख दरबार के मुख्यसचिव ने टोलिफोन किया और पूछा कि आप की स्वीकृति बिना हम लोग राजा के समक्ष आप का नाम जाहिर नहीं कर सकते हैं । उन्होंने पूछा कि आप क्या निर्वाचन आयुक्त बनने के लिए तैयार हैं ? मैंने वही बात दुहराई । उन्हौंने भी नौकरी नहीं जाने की बात कई और मैंने अपने स्वीकृति दे दी । कल सुबह होते ही समाचारों में आने लगा कि डॉ. वीरेन्द्र मिश्र को निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया गया ।
लेकिन आज तो किस को आयुक्त बनाना है, किस को प्रमुख आयुक्त बनाना है ? इस में बहुत पहले ही विचार–विमर्श होता है । आज लोगों का आरोप रहता है कि राजनीतिक भागबंडा के आधार पर हर नियुक्ति होती है । लेकिन मेरे समय में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था । आयुक्त होकर मैंने जो किया, वह सब के सामने है । आज तो लोग यह भी आरोप लगाते हैं कि निर्वाचन आयोग के ऊपर राजनीतिक प्रभाव हावी है । लेकिन आयोग राजनीतिक प्रभाव में पड़नेवाली संस्था नहीं है, अगर वहां रहनेवाले व्यक्ति (आयुक्त) राजनीतिक प्रभाव से नियुक्त किए जाते हंै तो लोगों में शंका होना स्वभाविक है । जब मैं निर्वाचन आयोग में आयुक्त के रूप में काम कर रहा था, मैंने कहीं से भी कोई राजनीतिक दबाव महसूस नहीं किया, हम लोग अपने काम में स्वतन्त्र थे । मेरे कार्यकाल में वि.सं. २०५१ का संसदीय चुनाव, ०५४ का स्थानीय चुनाव और ०५६ का संसदीय चुनाव सम्पन्न हुआ । उसके बाद वि.सं. २०५७ साल श्रावण ६ गते मैंने निर्वाचन आयोग से विदाई ली । मैंने ठान लिया कि मेरी जिम्मेदारी पूरी हो गई, राष्ट्र के लिए मेरी योगदान अब इतना ही है । लेकिन…
शान्ति प्रक्रिया के संयोजक
देश में संसदीय व्यवस्था अभ्यास में आने के कुछ साल बाद (वि.सं. २०५२, फल्गुन ३ गते) से माओवादी का सशस्त्र युद्ध शुरु हो चुका था । निर्वाचन आयुक्त से रिटायर्ड होने के बाद मैं नागरिक समाज के एक अभियन्ता के रूप में सक्रिय रहने लगा । उस समय कृष्णजंग रायमाझी के नेतृत्व में एक शान्ति आयोग का गठन हुआ था, उसमें मैं भी एक सदस्य के रूप में रहा । सन् २००५ में माओवादी द्वारा की गई युद्ध बिराम अनुगमन के लिए अनुगमन समिति की गठन की गई थी । उक्त समिति में कृष्णजंग रायमाझी, पद्मरत्न तुलाधर, दमननाथ ढुंगाना, लक्ष्मण अर्याल, निलम्बर आचार्य लगायत २४ लोग थे, जहां मैं भी था । उसी वर्ष नवम्बर में दिल्ली में तत्कालीन माओवादी तथा सात दालों के बीच १२ सूत्रीय सम्झौता हुआ, सन् २००६ में दूसरा जनआन्दोलन हुआ और लोकतन्त्र की वापसी हुई ओर दोनों तरफ से युद्ध बिराम का घोषणा हुआ । युद्ध–विराम आचार–संहिता अनुगमन के लिए राष्ट्रीय अनुमगन समिति बना, उस समिति के संयोजक में मुझे चयन किया गया । समिति की जिम्मेदारी युद्ध विराम तथा शान्ति प्रक्रिया संबंधी नियमों की परिपालना ठीक से हो रही है या नहीं, उस को देखना था । शान्ति सम्झौता होने तक समिति ने काम किया ।
मुझे लगता है कि मेरे जीवन का चार महत्वपूर्ण पार्ट है– १. प्रोफेसर के रूप में, २. निर्वाचन आयुक्त के रूप में, ३. शान्ति प्रक्रिया के सहयोगी के रूप में और ४. लेखक के रूप में । मैं समझता हूँ कि इन चारों भूमिका में मैंने अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी के साथ निर्वाह किया है । माओवादी युद्ध, समसामयिक राजनीति तथा शान्ति प्रक्रिया संबंधी विषयों को समेटकर मैंने दो पुस्तक भी लिखा है, जहां यह सारी बातें उल्लेख है । माओवादी युद्ध और शान्ति प्रक्रिया संबंधी विषयों को लेकर यहां खूब बहस होती है । लेकिन इसमें मेरा अपना अलग दृष्टिकोण है । मेरा दृष्टिकोण तो यह है कि वह शान्ति प्रक्रिया थी ही नहीं । यह तो सत्ता प्राप्ति के लिए की गई प्रक्रिया थी ।
आज जो अवस्था है, उसको देखकर मैंने एक दृष्टिकोण बनाया है– माओवादी युद्ध और युद्ध बिराम ‘पीस प्रोसेस’ नहीं, ‘पावर प्रोसेस’ है, कई घटना के कारण स्पष्ट होता रहा है । आप लोग देख रहे हैं कि हर साल सरकार बदल रही है, चुनाव हो रही है । जो युद्ध में पीडि़त हो गए थे, उनकी आवाज आज भी कोई नहीं सुनता, पीडि़तों की आवाज की सुनवाई नहीं होती । शान्ति प्रक्रिया में तीन पक्ष है– १. माओवादी, २. तत्कालीन सरकार तथा राजनीतिक पार्टी अथवा शाही सेना । यह दोनों पक्ष कहीं पीडि़त हैं तो कहीं पीड़क । तीसरा पक्ष है– जनता, जो पीडि़त है । माओवादी युद्ध से आज किसी को फायदा है तो वह माओवादी को ही है या अन्य राजनीतिक पार्टी को । जो पीडि़त जनता है, वह आज भी पीडि़त ही हैं । उन लोगों को कुछ भी मिला नहीं है । हां, लोकतंत्र तो मिला, लेकिन जो युद्ध में प्रत्यक्ष पीडि़त हो रहे थे, उन लोगों को क्या मिला ? तत्कालीन युद्ध के कमाण्डर अर्थात् पुष्पकमल दाहाल (प्रचण्ड) और डा. बाबुराम भट्टराई प्रधानमन्त्री हो चुके हैं । प्रचण्ड जी तो दो–दो बार प्रधानमन्त्री बन चुके हैं । लेकिन युद्ध में जिन्होंने अपने पति, पत्नी, बेटा–बेटी तथा अपनेजन खो दिया, उन लोगों को क्या मिला ? आज भी इन प्रश्नों का उत्तर नहीं है । शान्ति प्रक्रिया को पूर्णता देने के लिए जो आयोग बनाया, उसकी हालांत क्या है ? इसीलिए मैं कह रहा हूँ– यह शान्ति प्रक्रिया नहीं, सत्ता–प्राप्ति की प्रक्रिया है । ऐसी अवस्था में पूर्ण शान्ति की परिकल्पना नहीं कर सकते हैं । शान्ति प्रक्रिया के शुरु से ही पीडि़त को अनदेखा किया गया, जिसके चलते यह सब हो रहा है ।
जीवन अर्थहीन यात्रा !
हाल ही मैंने अंग्रेजी में एक पुस्तक लिखा है– मिनिङफुलनेस ऑफ लाइफ, अर्थात् जीवन की अर्थपूर्णता । उसमें एक च्याप्टर है– फिलोसॉफी ऑफ लाईफ । दर्शनशास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते जीवन की हर चीज और घटना में कारण खोजता हूँ । बिना कारण के कोई चीज की व्याख्या नहीं की जा सकती । जीवन एक ऐसी किताब है, जिसके शुरु का पृष्ठ और अन्त का पृष्ठ नहीं होता है, यह मेरा कथन नहीं है । बहुत बड़े–बडेÞ विद्वानों ने यह कहा है । अर्थात् जीवन क्या है ? हम लोग पूर्णतः व्याख्या नहीं कर सकते हैं । जिसका शुरु का पृष्ठ और अन्त का पृष्ठ ही नहीं है तो हम लोग कैसे पूर्ण व्याख्या कर सकते है ? मानव जीवन प्राप्त करने से पहले हम लोग क्या थे और कहां थे ? मानव जीवन खत्म होने के बाद हम लोग कहां और कैसे रहेंगे ? यह कोई भी नहीं जनता । अर्थात् हमारे जीवन की शुरुआत और अन्त के बीच में जो है, वही जीवन है, मैं इतना ही जानता हूँ । जो बीच का जीवन है, वह भी सम्पूर्ण रूप में हमारे बस में नहीं हैं । हम लोग कब क्या करेंगे, हमारे जीवन में कौन चीज कैसे प्राप्त होनेवाली है, जीवन कबतक रहेगी और कहां तक यात्रा करनी है, यह सब चीज हम लोगों में से कोई भी नहीं जानता है । इसीलिए जीवन एक अर्थहीन यात्रा भी है । जन्म कौन लेता है और कौन मरता है ? जन्म आता है तो क्यों आता है ? खुद मेरे लिए और आप सबके लिए यह एक प्रश्न है । आज के भौतिकवादी जीवन में जो कुछ हमारे सामने दिखाई देता है, उसी को हम लोग सच मानते हैं । जो दिखाई देता है, वही सब कुछ है और सच है, ऐसा नहीं है । कोई भी घटना अकारण नहीं होती है । विज्ञान भी कहता है कि कोई भी घटना अकारण नहीं घट सकती है । यह विश्व जगत और सृष्टि भी एक कारण है । लेकिन कारण क्या है ? हमारी कमजोरी यही है कि हम लोग उस कारण को नहीं खोजते हैं । मैं यह भी कहता हूँ कि जीवन एक पहेली है, जो सीमित है । इसको कैसे उपयोेग किया जाता है, उसी से मनुष्यत्व प्राप्त हो सकती है ।
अर्थपूर्ण जीवन के लिए ४ सूत्र
जीवन को कैसे उपयोग करना है ? इसके संबंध में मैंने चार बुंदों में कुछ सूत्र निर्धारण किया है, जिसमें जीवन का अर्थ कुछ हद तक निकल सकता है । अर्थात् जीवन को अर्थपूर्ण बनाने के लिए यह सूत्र काम आ सकता है । लेकिन उक्त सूत्र आप अस्वीकार भी कर सकते हैं, क्योंकि आप को यह सूत्र अनुपयुक्त भी लग सकता है । पहला सूत्र है– अगर आप कोई भी निर्णय कर रहे हैं तो आप अपने स्वार्थ और अपने हित को कभी भी आगे मत आने दीजिए । हां, अगर हर व्यक्ति अपने जीवन में यह सूत्र लागू करते हैं तो देश और दुनियां का स्वरूप भी बदल जाता है । दुनियां आज इतना कुरूप क्यों होता जा रहा है, क्योंकि हर चीज हम लोग अपने स्वार्थ के अनुसार देख रहे हैं । दूसरा सूत्र है– आप किसी को भी बड़ा और छोटा मत सोचिए । आप का दृष्टिकोण सभी के प्रति समान होना चाहिए । आपके नजर में जब कोई बड़ा और छोटा नहीं है, सभी के प्रति समान व्यवहार करते हैं तो कहीं किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं होती, आपस में सद्भाव रहेगा । मुझे लगता है कि उसके बाद आप अर्थपूर्ण जीवन जी सकते हैं । तीसरा सूत्र है– जो काम आप खुद कर सकते हैं, उसके लिए किसी को भी मत कहिए, खुद कीजिए । चौथा सूत्र है– अगर आप से सम्भव है तो बिना स्वार्थ किसी को भी सहयोग कीजिए, जिसके लिए सहयोग आवश्यक है । ऐसा सहयोग, जो आर्थिक, भौतिक, वैचारिक तथा मनोवैज्ञानिक कोई भी हो सकता है और आप के सहयोग से उसका जीवन धन्य हो सकता है । ऐसे सहयोग से बड़ा दुनियां में कोई भी यज्ञ और पुण्य नहीं है । याद रखिए, आप उसको सहयोग कीजिए, जिसके लिए सहयोग की सख्त आवश्यकता है । और सहयोग पानेवाला पात्र हो सके तो ऐसा हो, जिसने आपसे सहयोग पाने की उम्मीद भी नहीं रखी थी । इस तरह आप किसी के लिए अनस्पेक्टेड सहयोग करते हैं तो उसके लिए आप एक भगवान की तरह रहेंगे । वह आप को भगवान के रूप में मानेंगे । और जिसके लिए सहयोग करते हैं, उनसे कुछ भी उम्मीद मत रखिए । मेरे खयाल से उल्लेखित चार सूत्र अपने जीवन में प्रयोग करते हैं तो जीवन अर्थपूर्ण बन सकता है ।
मैं एक सामान्य व्यक्ति हूँ, जीवन में महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं किया हूँ । इसीलिए शायद अर्थपूर्ण जीवन मेरा भी नहीं है, लेकिन अर्थपूर्ण बनाने का कुछ प्रयास किया हूँ । कहां तक अर्थपूर्ण हो गया, मुझे नहीं पता । दूसरों की नजर में मैं क्या हूँ, कैसा हूँ, यह मुझे पता नहीं । लेकिन जितना हो सका, खुद की नजर में अर्थपूर्ण जीवन जीने की कोशीश किया हूँ ।
अन्त में ! भगवान हैं, इस बात को पुष्टि करने के लिए कोई भी प्रमाण नहीं है । लेकिन मैं विश्वास करता हूँ कि कोई ऐसी अदृश्य शक्ति है, जो सिर्फ मानव जीवन को ही नहीं, पूरे ब्रह्माण्ड को नियन्त्रित करता है । इसके लिए खुद अपने जीवन का कुछ उदाहरण पेश करता हूँ– मैं निर्वाचन आयोग में आयुक्त बन गया । कैसे ? यह बात तो अभी भी मेरे समझ और कल्पना के बाहर है । प्रोफेसर हो या शान्ति प्रक्रिया अनुगमन समिति का सदस्य, जहां–जहां रह कर मैंने काम किया और जो कुछ मेरे द्वारा हो गया, वह सब मेरे ही नियन्त्रण में था, ऐसा नहीं है । जिस पद के लिए मैंने कुछ भी प्रयास नहीं किया, वह मुझे प्राप्त हो गया, इसका मतलब मेरा जीवन मेरे हाथ में नहीं है । यह मेरा विश्वास है, तर्क से इस विश्वास की पुष्टि नहीं की जा सकती । इसी घर में मेरी पत्नी कहती है कि भगवान नहीं है । मैं कह देता हूँ कि यह भी ठीक है । क्योंकि वह विश्व–प्रसिद्ध ‘बिड़ला’ कम्पनी के फैक्ट्री मैनेजर की बेटी है । आज मेरे घर में आकर बर्तन साफ करती है, कपड़ा धोती है अर्थात् सब काम करती है । शायद इसीलिए वह कहती है कि भगवान नहीं है ।
मैं तो गांव का एक सामान्य व्यक्ति हूँ, व्यक्तिगत स्वास्थ्य ठीक है, बेटी डाक्टर है, बेटा इञ्जीनियर है । रहने के लिए अपना घर है, पेन्सन आता है, जीने के लिए वही काफी है । लगता है कि जो सोचा था, उससे ज्यादा प्राप्त कर लिया हूँ । अर्थात् मेरे पास जो कुछ है, पर्याप्त है ।
प्रस्तुतिः लिलानाथ गौतम

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