Wed. Nov 21st, 2018

व्यापारिक विकास के लिए आवश्यक है संतुलित नीति : अशोक टेमानी

श्री अशोक टेमानी ‘नेपाल उद्योग वाणिज्य महासंघ’ के कार्यकारिणी सदस्य, ‘सड़क एवं पारवहन संघ’ के अध्यक्ष हैं तथा ‘वीरगंज उद्योग वाणिज्य संघ’ के पूर्व अध्यक्ष हैं । व्यापार जगत के इन प्रतिष्ठित और जिम्मेवार पदों पर काम करते हुए उन्होंने उद्योग–व्यापार जगत के अनेक जटिलताओं से साक्षात्कार किया है । उनसे बातचीत के आधार पर इस क्षेत्र की मुख्य समस्याओं को इस आलेख में विशेषतः भारत के सन्दर्भ में समेटने का प्रयास किया गया है ।
नेपाल और भारत का जो व्यापारिक सम्बन्ध है वह संसार के दूसरे देशों के साथ के व्यापारिक सम्बन्धों से भिन्न है । नेपाल एक भूपरिवेष्ठित राष्ट्र है । इसलिए हमारा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार कलकत्ता पोर्ट से होता है । नेपाल का ७० प्रतिशत माल भारत से आता है और शेष तीस प्रतिशत जो बाहर से आता है, वह भी भारत के माध्यम से ही आता है । इस प्रकार भारत नेपाल के शत–प्रतिशत व्यापार का साझेदार है । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि भारत का नेपाल बहुत बड़ा बिजनेस पार्टनर है ।
हमारी समस्या यह है कि हमारे जो व्यावसायिक सम्बन्ध हैं और नेपाल तथा भारत के बीच जो व्यापार एवं पारवहन संधि है वह बहुत पुरानी है औेर उस समय की है जब कोटा सिस्टम हुआ करता है । वह ऐसा समय था जब मुक्त व्यापार अवधारणा सामने नहीं आयी थी । इसलिए उस समय जो समझौते हुए थे, उसमें बहुत परिवर्तन की आवश्यकता है । आज हम मुक्त व्यापार की अवस्था से गुजर रहे हैं और पूरा विश्व एक ग्लोबल मार्केट बन चुका है । ऐसे में नेपाल की भी व्यापक व्यापारिक महत्वाकांक्षाएँ हैं जिन्हें समेटने के लिए इन समझौतों का परिसंस्कार अत्यन्त आवश्यक है ।
नेपाल का सबसे बड़ा उद्योग कृषि है और सत्तर प्रतिशत इसकी आबादी इस पेशे से संलग्न है । हमारी क्षमता है कि हम कृषि उत्पादों को भारत निर्यात कर सकते हैं । लेकिन हमारा यह क्षेत्र आज उपेक्षा का शिकार है और हम निर्यात तो क्या, आत्मनिर्भर होने की भी अवस्था में नहीं हैं । इसका कारण है कि हमारे पास रसायनिक उर्वरकों की कमी है, उन्नत किस्म के बीज का अभाव है, कृषि के आधुनिक तकनीक से हमारी अनभिज्ञता है और इस क्षेत्र में प्रशिक्षित जनशक्ति का भी अभाव है । आज स्थिति यह है कि एक अच्छा कृषि–विश्वविद्यालय के अभाव का त्रास यह क्षेत्र झेल रहा है ।
यह एक विडम्बना है कि एक कृषिप्रधान राष्ट्र होने के बावजूद हमारे देश में एक भी रसायनिक उर्वरक का कारखाना नहीं है और इसका खामियाजा हमारे कृषिक्षेत्र को भुगतना पड़ता है । सही समय पर अपेक्षित रसायनिक उर्वरक हमारे किसानों को नहीं मिल पाता और इसका खामियाजा तो उन्हें भुगतना ही पड़ता है मगर राष्ट्र की समग्र उत्पादकता में कमी आती है । यद्यपि इस समस्या के प्रति निजी क्षेत्र की चिन्ताएँ हैं लेकिन हमारी समस्या है कि इसकी स्थापना में जितनी बड़ी भौतिक संरचना और आर्थिक निवेश की आवश्यकता होती है, उसके लिए निजी क्षेत्र सक्षम नहीं है । इसलिए सरकार को चाहिए कि या तो निजी क्षेत्र के साथ संयुक्त रूप में इस क्षेत्र में निवेश करे अथवा दूसरे देश से ही संयुक्त निवेश के द्वारा नेपाल में उर्वरक उद्योग लगाया जाए और यहाँ के कृषकों की इस समस्या का स्थायी समाधान तलाशा जाए ।
यह सच है कि भारत हमारा बहुत बड़ा ट्रेड पार्टनर है । इसके बावजूद उसके साथ हमारी बहुत सारी व्यापारिक समसयाएँ भी हैं जिनका समाधान किया जा सकता है । इसमें हमारी सरकार को आगे आने की आवश्यकता है । आज हमारा सौ प्रतिशत व्यापार भारत के माध्यम से हो रहा है लेकिन हमारी जितनी भी प्रवेश सीमाएँ हैं, वे बदहाल अवस्था में हैं और वहाँ की भौतिक संरचना बहुत ही खराब अवस्था में है । इसके कारण पारवहन या ट्रांसपोर्टेशन का खर्च हमारा बहुत ज्यादा होता है । भारत से करीब एक हजार ट्रकें प्रतिदिन नेपाल आती हैं । लेकिन भौतिक संरचना की कमजोरी और यातायात व्यवस्था सुव्यवस्थित नहीं होने के कारण तकरीबन बीस हजार रूपया प्रति ट्रक हमलोग से ज्यादा लिया जाता है । अगर हिसाब लगाया जाए तो एक वर्ष में यह राशि लगभग सात सौ करोड़ की होती है । यह एक बहुत बड़ी राशि है । ट्रांसपोर्टर को इसका अतिरिक्त भुगतान किया जाता है ।
इसके अतिरिक्त अन्य देशों से जो सामान हम मँगाते हैं, वह कोलकता बन्दरगाह के द्वारा आता है । इस बन्दरगाह में अव्यवस्था इतनी गहरी है कि इसके कारण करोड़ों रूपए क्षति और विलम्ब दण्ड के रूप में हमें भुगतान करना पड़ता है । मेरा मानना है कि अगर इतनी राशि नेपाल की अर्थव्यवस्था में प्रतिवर्ष खर्च हो तो न केवल हमारा निर्यात बढ़ेगा वरन देश का विकास दर भी तेजी से बढ़ जाएगा ।
आज भारत और नेपाल के आयात–निर्यात की स्थिति को अगर देखा जाए तो कहा जा सकता है कि हमारा व्यापार घाटा दिनानुदिन बढ़ता जा रहा है । आज से पाँच साल पहले अवस्था यह थी कि हमारा व्यापार घाटा १÷६ था जो आज बढ़कर १÷१५ हो गया है । इस आँकड़े के आधार पर अनुमान किया जा सकता है कि हमारी अर्थव्यवस्था की स्थिति क्या है ? इस व्यापार घाटा को कम करने का एक मात्र उपाय है हमारे कृषि क्षेत्र की उन्नति । लेकिन विभिन्न कारणों से यह क्षेत्र उपेक्षित है । यह व्यापार घाटा बढ़ने का एक कारण यह भी है कि विलम्ब दण्ड आदि के रूप में जो भुगतान हम करते हैं उसका भार किसी न किसी रूप में उन उत्पादों पर आ जाता है जो हम आयात करते हैं । इसलिए चीजें महँगी होती है और हमारा आयात किसी न किसी रूप में प्रभावित होता है । इसका नकारात्मक प्रभाव सीधे तौर पर हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है ।
नेपाल के व्यापार जगत की यह भी एक समस्या है कि अगर विदेशी कच्चामाल या मशीन आदि के छोटे–छोटे पार्टस की हमें आवश्यकता होती है और इसकी कम मात्रा हमें चाहिए तो यह हमारी बाध्यता है कि हम ये विदेश से ही मँगाएँ । अगर वही सामान भारतीय बाजार में कम मूल्य में उपलब्ध हैं तो भी हम इसे भारत से नहीं ले सकते । इसे प्राप्त करने का कोई प्रयास अवैधानिक माना जाता है । विकल्प के रूप में इन्हें जब हम विदेश से मँगाते हैं तो कम से कम एक कंटेनर माल मँगाना पड़ता है । कम मात्रा में मँगाने पर इसकी कीमत काफी बढ़ जाती है । अगर यही सामान भारतीय बाजार में उपलब्ध है तो ऐसी व्यवस्था तो होनी चाहिए कि हम भारतीय बाजार से इसे खरीद सके । लेकिन नीतिगत मामलों से जुड़े होने के कारण हम ऐसा नहीं पाते ।
भारत और नेपाल के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौता है । इसके अनुसार हम एक दूसरे देशों के आन्तरिक उत्पादों का ही एक दूसरे के देश में आयात–निर्यात कर सकते हैं । विदेशों से आयातित वस्तु का आयात और निर्यात हम एक दूसरे के देश में नहीं कर सकते । इस समस्या के कारण हमारे उद्योगों को परेशानी होती है और यह हमारे निर्यात को प्रभावित करता है । इसलिए दोनों देशों की सरकारों को चाहिए कि पूरा व्यापार समझौता को ही खारिज कर समय की आवश्यकता को देखते हुए ऐसा समझौता का प्रारूप पर सहमति करे जो उद्योग और व्यापार के लिए समय–सापेक्ष्य के साथ–साथ सान्दर्भिक हो ।
इन समस्याओं को निजी क्षेत्र सरकार के समक्ष उठाती रही है । लेकिन समझौतों के नवीकरण में इन्हें समेटा नहीं गया है । हमने सरकार से कहा कि अगर हम विश्व के किसी भी देश से आयात करते हैं और मूल्य तथा गुणवत्ता के स्तर पर हम प्रतिस्पद्र्धात्मक स्थिति में हैं तो यह निर्यात हम अन्य देशों में भी कर सकें । इसके लिए नेपाल पर किसी भी तरह का प्रतिबंध नहीं होना चाहिए । मैं समझता हूँ कि यह एक प्रैक्टिकल समस्या है जिसमें दोनों देश चूक रहे है । इसका प्रभाव हमारे व्यापार पर भी पड़ता है ।
हमारे नेपाल के व्यापार जगत में एक समस्या यह भी है कि यहाँ लॉजिस्टिक कम्पनियाँ नहीं हैं(लॉजिस्टिक का तात्पर्य है कन्टेनर और ट्रांसपोर्ट सेवा उपलब्ध कराने वाली कंपनी जो इस क्षेत्र में प्रयोग की जाने वाली सारी मशीनरी से संलग्न रहती है )। अगर देश में कोई उत्पादन होता है और उसकी सप्लाई का जिम्मा अगर हम इस तरह की कम्पनी को दे देते हैं तो व्यापार की अनेक समस्याओं से हम बच जाते हैं और समानों को निर्धारित जगह और समय पर पहुँचाना इसका काम हो जाता है । लेकिन नेपाल में इस कम्पनी से सम्बन्धित कानून ही नहीं है । इसलिए इस क्षेत्र में कोई कम्पनी भी नहीं है । इसके अभाव में यहाँ के व्यापार जगत को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है । इसलिए सरकार द्वारा यथाशीघ्र इस तरह की कम्पनी की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया जाना चाहिए । अपनी कम्पनी नहीं होने के कारण हमें बाहर की कम्पनियों का सहारा लेना पड़ता है जिसके कारण समय पर उत्पादों को हम निर्धारित जगह पर नहीं पहुँचा पाते और इससे हमारा निर्यात प्रभावित होता है ।
इसके लिए सरकार को चाहिए कि हमारे विश्वविद्यालयों में लॉजिस्टिक की पढ़ाई की व्यवस्था की जानी चाहिए । विभिन्न प्रोत्साहनों के द्वारा निजी क्षेत्र को भी इसमें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और नियम–कानून बनाकर व्यापार को प्रोत्साहित करना चाहिए । इस तरह की आवाज हम सरकार के समक्ष कई वर्षों से उठा रहे हैं लेकिन अब तक कोई परिणाम निकलकर सामने नहीं आया है ।


विश्व के सारे देश अपने निर्यात को लेकर काफी संवेदनशील हैं । जैसे एशिया महादेश के देशों में हम बंगाल, भूटान या चीन को ही लें । इन देशों ने निर्यात के क्षेत्र में काफी उन्नति की है । इन्होंने सिर्फ यह किया कि समय के साथ–साथ इस क्षेत्र की समस्याओं पर नजर रखते हुए अपनी नीतियों में वे सुधार करते गए और विगत एक–दो दशकों में उन्होंने काफी उन्नति की । मगर नेपाल में ऐसा कुछ नहीं हो पाया है । हमारी समस्या यह हे कि हमारी सरकार निर्यात के प्रवद्र्धन के लिए संवेदनशील नहीं है और इसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है ।
इतना ही नहीं, हमारी समस्या यह है कि हमारी श्रमनीति उद्योगों के अनुकूल या प्रशिक्षित जनशक्ति हमारे पास है या नहीं, यह हमारे नीति–निर्धारकों की चिन्ता का विषय नहीं । हमारे उद्योगों के आसपास जो गाँव बस गए हैं उनके सम्बन्ध में क्या नीतियाँ होनी चाहिए ? अब जो उद्योग–धन्धे खुलेंगे उनके आसपास आबादी बढ़ेगी या नहीं, इन बातों को भी औद्योगिक नीतियों में शामिल करना होगा । आज वीरगंज पथलैया आद्योगिक कॉरीडोर में देश के सत्तर प्रतिशत उद्योग–धन्धे हैं लेकिन इसे औद्योगिक क्षेत्र के रूप में घोषित नहीं किया गया है । सच यह है कि ये बहुत सफलता पूर्वक चल रहे हैं । लेकिन समस्या यह है कि यहाँ मानव वस्तियाँ बस गई है । इसलिए सरकार को चाहिए कि निश्चित क्षेत्र को औद्योगिक कॉरिडोर घोषित कर यह यह नियम बनाए कि इसके एक या दो किलोमीटर तक मानव वस्तियाँ नहीं बसे ताकि भविष्य में इसकी वजह से किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़े ।
अभी जो व्यापार की स्थिति है उसमें चीन कहीं नहीं दिखलाई दे रहा है । हमारा सत्तर प्रतिशत सामान भारत से आता है और शेष तीस प्रतिशत में चीन की भागीदारी अधिक है लेकिन वह भी भारत के माध्यम से ही होता है । आज नेपाल में भारतीय रेल का ९० रैक प्रतिमाह हमारे लिए आती है । अर्थात तीन रैक प्रतिदिन की दर से । लेकिन वन वे रेलरोड और इन पर दौड़ने वाली गाडि़यों के दबाब आदि के कारण इसके आने में बहुत ज्यादा समय लगता है । यह समस्या रेलवे का है मगर इसके लिए विलम्ब दण्ड हमें भुगतना पड़ता है । यह सच है कि भारत से हमें व्यापार के लिए कलकत्ता बंदरगाह मिला है । इसलिए भारत सरकार का भी यह दायित्व होता है कि हमें सुविधा सम्पन्न करे । लेकिन यहाँ की अवस्था बहुत बदतर है जिसका खामियाजा किसी न किसी रूप में हमें भुगतना पड़ता है ।
भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापार मित्र है और हम चाहते हैं कि भविष्य में भी यह स्थिति बनी रहे । नेपाल की भौगोलिक अवस्था यह है कि इसका मुँह भारत की ओर खुला हुआ है । भारत के लिए भी यह अवसर है कि उसके उत्पादों के निर्यात के लिए एक बड़ा बाजार नेपाल है । लेकिन यातायात की सुविधाओं के अभाव के कारण इस क्षेत्र में निराशा की स्थिति है जिसे किसी रूप में अच्छा नहीं माना जा सकता । इसलिए भारत सरकार को चाहिए कि उसके द्वारा नेपाल के सीमा–क्षेत्र का विकास हो और वह नेपाल के व्यापार जगत की समस्याओं के प्रति गंभीर हो । अगर ऐसा होता है तो नेपाल के साथ उसका व्यापार और अधिक विकसिात हो सकता है । मैं यह भी मानता हूँ कि नेपाल भारत के सम्बन्धों में कभी–कभी जो उतार–चढ़ाव देखा जा रहा है उसे भी व्यापार प्रवद्र्धन के द्वारा संतुलित किया जा सकता है ।

प्रस्तुति : कुमार सच्चिदानन्द

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