Mon. Oct 15th, 2018

कौन करते हैं सोने की तस्करी ?: लिलानाथ गौतम

नेताओं के संरक्षण बिना सिर्फ कर्मचारी और व्यापारियों से इस तरह की तस्करी सम्भव नहीं है

हिमालिनी, मई अंक ,२०१८ | नेपाल में सोना–तस्करी सामान्य बात हैं । त्रिभुवन अन्तर्राष्ट्रीय विमानस्थल से ही बारबार सोने की तस्करी होती है । कभी–कभार पुलिस कुछ तस्करों को गिरफ्तार भी करती है । ऐसी ही अवस्था में गत माघ महीना में एक समाचार बाहर आया– ‘त्रिभुवन अन्तर्राष्ट्रीय विमानस्थल से साढे ३३ केजी सोना तस्करी की गई है ।’ समाचार आने से पूर्व नेपाल पुलिस के भीतर एक चर्चा–परिचर्चा हुई थी । उस समय पुलिस अधिकारियों के बीच चर्चा होने लगी कि ३३ केजी सोना सम्बन्धित व्यक्ति के पास नहीं पहुँची है । ऐसी ही अवस्था में सनम शाक्य की हत्याकाण्ड संबंधी घटना बाहर आयी । उसके बाद पुष्टि हो गयी कि सोना सम्बन्धित व्यक्ति के पास नहीं पहुँची है । चर्चा–परिचर्चा और विविध समाचारों के बीच में ही उक्त तस्करी काण्ड में आरोपित अन्य दो व्यक्तियों ने आत्महत्या की । इसतरह इस काण्ड में अभी तक तीन लोगों की जान गई है । सोना की तस्करी का इतिहास को देखते हैं तो यह घटना, आज तक के लिए सबसे चर्चित घटना है ।
उल्लेखित घटना में प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष संलग्न होने के आरोप में नेपाल पुलिस ने ६३ व्यक्तियों के ऊपर मुद्दा पंजीकृत किया है । ६३ व्यक्तियों में से ३० को गिरफ्तार कर पुलिस बयान भी ले चुकी है । अनुसंधान से पता चला है कि विगत ३४ महीने के अन्दर त्रिभुवन अन्तर्राष्ट्रीय विमानस्थल से ३८०० केजी (३ हजार ७ सौ ९९ केजी ५ सौ ५९ ग्राम) सोना की तस्करी हुई है । प्रचलित मूल्य अनुसार उक्त सोना की मूल्य १७ अरब १ करोड ८० लाख से अधिक है ।
अब प्रश्न उठता है– जितने परिमाण में सोने की तस्करी की गई, क्या यह सब सिर्फ जुनियर लेभल के व्यापारी और कर्मचारी से सम्भव है ? शतप्रतिशत स्वीकार्य सत्य है– सम्भव नहीं है । चर्चित ३३ केजी सोना की तस्करीकाण्ड में अभी तक विमानस्थल के सरकारी कर्मचारी, एयरलाइन्स के कर्मचारी, सुरक्षा के लिए परिचालित पुलिस अधिकारी संलग्न हैं, इस बात की पुष्टि हो चुकी है । लेकिन सिर्फ उन लोगों की पहल में इस तरह की तस्करी सम्भव है ? नहीं । क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय विमानस्थल स्वाभाविक रूप में अति संवेदनशील जगह है, अगर उच्चस्तरीय प्रशासनिक तथा राजनीतिक शक्ति केन्द्र से सहयोग नहीं होता तो सिर्फ कर्मचारी और व्यापारी इस तरह की हिम्मत करते हैं, यह तो हो ही नहीं सकता । हाँ, दिखने के लिए तो पर्दा के आगे सिर्फ कर्मचारी और व्यापारी ही होते हैं, कलाकार की भूमिका में । लेकिन पर्दा के पीछे निर्माता और निर्देशक कोई दूसरे ही होते हैं । लेकिन निर्माता और निदेर्शक कौन हैं ? आज तक सोने की तस्करीकाण्ड में जितने भी चर्चा–परिचर्चा और अनुसंधान हो रहे हैं, उसमें इस प्रश्न का जबाव नहीं है । सिर्फ लोगों में अनुमान है ।
इस बार भी हम लोग सिर्फ अनुमान ही कर सकते हैं । उसके लिए सोने तस्करी संबंधी कुछ चर्चित काण्ड को स्मरण कर सकते हैं । आज तक जो भी उच्च परिमाण में सोने की तस्करी सामने आयी है, उसमें से कुछ घटना में बड़ी पार्टी के गिनेचुने नेता से लेकर गृहमन्त्री और प्रधानमन्त्री तक का नाम आया है, यह हमारा इतिहास है । पूर्व प्रधानमन्त्री स्व गिरिजाप्रसाद कोइराला, स्व. सूर्यबहादुर थापा से लेकर पूर्वगृहमन्त्री वामदेव गौतम को भी सोना तस्करी काण्ड में जोड़कर कई सामाचार प्रकाशित हो चुके हैं । इन लोगों से जुनियर अन्य कई नेता तथा सांसदों का नाम भी सोना की तस्करी काण्ड से जोड़कर देखा जाता है । लेकिन सार्वजनिक समाचारों की पुष्टि अभी तक कहीं से नहीं हुई है । फिर भी इस क्षेत्र से सरोकार रखनेवाले समझते हैं कि राजनीतिक संरक्षण बिना नेपाल में इस तरह की तस्करी हो ही नहीं सकता । क्या अवस्था ऐसी ही है ?
प्रमाण तो नहीं है, लेकिन इतिहास और वस्तुस्थिति से अनुमान लगाया जाता है– नेताओं के संरक्षण बिना सिर्फ कर्मचारी और व्यापारियों से इस तरह की तस्करी सम्भव नहीं है । अर्थात् जो पार्टी सत्ता में हैं, उसी पार्टी के नेता व्यापारियों के प्रभाव में आ कर अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हैं, व्यापारी और कर्मचारी को तस्करी के लिए परिचालित करते हैं और कमिशन सभी को मिलता है ।
गत साल पौष महीना में भी त्रिभुवन अन्तर्राष्ट्रीय विमानस्थल से भारी परिमाण में सोना की तस्करी की गई थी, घटना सामने आने के बाद तत्कालीन अर्थमन्त्री तथा माओवादी केन्द्र के नेता कृष्णबहादुर महरा ने कहा– ‘सोना की तस्करी के लिए तो हम लोग छोटी मछली हैं, बड़ी मछली तो कोई दूसरे ही हैं ।’ उस समय में भी अनुमान किया जा रहा था कि सोना की तस्करी में सत्ता में रहनेवाले पार्टी और उसके नेता ही संलग्न हैं । उसी में से एक थे, महरा भी । ऐसी ही पृष्ठभूमि में उल्लेखित वाक्य महरा की मुंह से निकल गया । उनके मुंह से जो वाक्य निकला, उस को सुनकर बहुतों ने सहज अनुमान लगाया– सोना की तस्करी में उन का भी हाथ है, जो उन्होंने स्वीकार किया । ऐसी अवस्था में आशंका है कि कई तस्कर स्वयम् खूद तस्करों की खोजी में तो नहीं निकल रहा है ?
आश्चर्य की एक और भी बात है, जितनी बार तस्करी की गई सोना गिरफ्तारी में पड़ता है, सामान्यतः हर बार उसके असली मालिक के बारे में पता नहीं चलता । हां, निचले लेभल के मजदूर, कर्मचारी और व्यापारी को गिरफ्तार कर उनके ऊपर जरुर अनुसंधान किया जाता है । क्यों ? क्योंकि अनुसंधान को उससे आगे बढ़ाया जाता है तो परिणाम भयावह भी हो सकता है, देश और जनता की सेवा करने की कसम खानेवाले नेताओं का असली चेहरा सामने आ सकता है । अगर ऐसा नहीं है तो ३४ महीनों के अन्दर ३८ सौ केजी सोना की तस्करी कैसे सम्भव है ? और उसका मालिक कौन है ? इन प्रश्नों का सही जबाव देने के लिए क्या राज्य संयन्त्र पूरी तरह असफल हो चुका है ? राज्य संयन्त्र अगर चाहता है तो क्या ऐसी तस्करी रोक नहीं सकता ? सच तो यह है कि राज्य संयन्त्र परिचालन करनेवाले ही इस तरह की तस्करी को बढ़ावा देते हैं । और राज्य संयन्त्र की सबसे अधिक शक्तिशाली पोष्ट राजनीतिक पार्टी और नेताओं के ‘पॉकेट’ में होता है । वही से राज्य संयन्त्र का दुरुपयोग शुरु होता है । इसीलिए तस्करी में पकड़े गये सोने के असली मालिक और योजनाकार कभी भी सामने नहीं आते हैं ।
इस बार के तस्करी काण्ड में भी नेपाल पुलिस के सई, डीएसपी, एसपी और डिआईजी तक संलग्न हैं, इस बात की पुष्टि लगभग हो चुकी है । लेकिन अनुसंधान उससे आगे नहीं बढ़ पा रहा है । बताया जाता है कि सोने की तस्करी में संलग्न मुख्य अभियुक्त चुडामणि उप्रेती ‘गोरे’ हैं । थोड़ी देर के लिए ही सही, मानते हैं कि तस्करी से लाया गया ३८ सौ केजी सोने की असली मालिक गोरे ही हैं । लेकिन किसी के संरक्षण बिना गोरे इस तरह खुल्लम–खुला (खुल्लम खुला का मतलब है कि विमानस्थलों में कार्यरत कर्मचारियों के सहयोग बिना इस तरह की तस्करी शत–प्रतिशत सम्भव नहीं है) तस्करी कर सकते हैं ? नहीं । लेकिन आज भी अनुसंधान उससे आगे नहीं जा रहा है । नागरिकों की अपेक्षा है कि अनुसंधान कम से कम तत्कालीन आईजीपी, गृह–सचिव और गृहमन्त्री तक पहुँचना चाहिए । लेकिन नेपाल में यह सम्भव नहीं है । समस्या यही है । यहां तत्कालीन अर्थमन्त्री तथा माओवादी केन्द्र के नेता कृष्णबहादुर महरा का कथन ‘छोटी मछली’ याद आती है । हां, छोटी मछली को तो गिरफ्तार किया जाता है, लेकिन बड़ी मछली हरदम भाग जाती है । इस काण्ड में भी छोटी मछली तो गिरफ्तार हो चुकी हैं, लेकिन बड़ी मछली कहां है, किसी को पता नहीं है । हो सकता है कि बड़ी मछली ही छोटी मछली को ढूँढ़ रही हो ! इसीलिए गिरफ्तार छोटी मछली से बयान जो लिया जाए, अब उससे बड़ी मछली किस तरह सुरक्षित हो सकती है, अनुसंधान और कारवाही उसकी ओर ले जाने की आवश्यकता है । क्योंकि वि.सं. २०५२–०५४ की तस्करी काण्ड में भी ऐसा ही हुआ था ।

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