Tue. May 21st, 2019

मुख्यमंत्री लालबाबु राउत का खिसकता जनाधार, बिछड़ गये सभी बारी-बारी : मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु)

मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु), बीरगंज, बैशाख १९ गते विहिवार | स.स.फोरम के प्रदेश अधिवेशन में बहुत बाते सामने आई, खासकर मुख्यमंत्री पक्ष के हार के बारे में। इस हार के कारण के तह पर पहुंचने में कई चौकाने वाली बातें सामने आई। मुख्यमंत्री शुरू से फोरम के भरोसेमंद नेता रहे है। फोरम में उनका राजनितिक क़द जिला सदस्य से शुरू हुआ, फिर तीन जिला मिलाकर सिमरोनगढ़ समिति का जिम्मा मिला। समय-समय पर फोरम में टूट-फुट होते रहा, बड़े कद के नेता फोरम छोड़कर जाते गए और मुख्यमंत्री एक-एक पायदान ऊपर चढ़ते गए, हांलाकि हरेक दौर में उसका पक्ष और बिपक्ष रहा। एक समय तो ऐसा भी आया की केंद्रीय सदस्य के लिए उन्हें मात्र तीन वोट मिले थे, वे तत्कालीन जिला कोषाध्यक्ष सुधीरनाथ पांडे से हार गए थे।  मुख्यमंत्री ने अपने राजनितिक जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव देखे है, कुछ मजबूरियों के कारण संविधान सभा १ में सभासद बनने का अवसर छोड़ना पड़ा, उस समय उनका और तत्कालीन सभासद आत्माराम साह से टकराव का दौर था।

संविधान सभा २ में उनका सभासद बनने का मौका छूट चूका था, लेकिन जैसे-तैसे उन्हें सभासद बनने का अवसर मिला। वे स्थानीय चुनाव के समय महानगरपालिका में मेयर का चुनाव लड़ना चाहते थे, वहां भी बिजय सरावगी के आने के कारण उनकी हशरत अधूरी रह गई। सब तरफ से टूटने के बाद मुख्यमंत्री ने प्रदेश सभा का चुनाव लड़ना चाहा लेकिन ऐन वक़्त नगरपालिका में उनके ही समकक्षी शंभु गुप्ता नौकरी छोड़कर उनके ही सीट पर दावेदारी कर बैठे। उनके लिए फिर संकट खड़ा हो गया, लेकिन पार्टी में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें मौका मिला। प्रदेश सभासद चुने जाने के बाद बिजय यादव भी मुख्यमंत्री के रेस में थे, लेकिन राजधानी के लिए हंगामा होने पर जनकपुर को राजधानी मिला और सान्तवना पुरस्कार के तौर पर पर्सा को मुख्यमंत्री मिला। वहां से मुख्यमंत्री की किस्मत बदली।

मुख्यमंत्री ललबबु राउत गद्दी की पृष्ठभूमि कर्मचारी के तौर पर रही है। उनमे एक कुशल कर्मचारी के गुण और अवगुण दोनों मिलते है। जहां चुप रहने, सहने और विवाद नहीं करने से लाभ मिलता हो उस जगह बेशक लाभ मिला, लेकिन जहा लड़ने-भिड़ने और नेतृत्व लेने का समय आए वहां वे चूक जाते है। उनकी खूबियों में उनकी शालीनता, विद्धवता, धैर्य आता है, शुरू से वे लोगो को पार्टी में लाते और असन्तुष्टो को मनाते रहे है। एक बार की घंटना है एक साथी ने कुछ साधरण बात में कह दिया अब इस पार्टी में दिल नहीं लगता, ये सुबह की बात थी, रात को वो अपने घर पंहुचा तो उसके घर की सीढ़ियों पर बैठकर मुख्यमंत्री चार घंटे से उसका इंतजार कर रहे थे। उनको देखते ही सारे गीले-शिकवे दूर हो गए। वो एक ऐसा समय था किसी एक साथी को बुखार होता था तो बाकि सभी साथी दवा लेकर मिलने जाते थे। तीन कप चाय को पांच कप चाय बनाकर पिते थे, आंदोलन से लौटते समय एक ही अख़बार के टुकड़े में सभी लाई-पकौड़ी खाते थे, तब सांसद तो दूर वार्ड तक में चुनाव लड़ने की बात सपनो में भी नहीं आती थी। उस समय याद रहता था तो सिर्फ और सिर्फ आंदोलन।

आज बहुत कुछ मिला है, स्थानीय स्तर में प्रतिनिधित्व, जिला सभापति, मनपा मेयर, प्रदेश सांसद, संघीय सांसद, मुख्यमंत्री, केंद्र में मंत्री लेकिन दूरिया बढ़ गई है। मुख्यमंत्री बनने के समय गला फाड़कर समर्थन करने वाले मा.प्रदीप यादव बिरोध में है। मा. हरिनारायण रौनियार नाराज चल रहे है।  मा.बिमल श्रीवास्तव निष्क्रिय हो गए है। कभी बीरगंज में पर्सा के प्रदेश सांसद के साथ कोई संयुक्त बैठक तक नहीं किए है। प्रदेश सांसद मा.जन्नत अंसारी, मा.भीमा यादव, मा.रागिनी वर्णवाल, मा.करीमा बेगम नाराज होकर मा.प्रदीप यादव के साथ है। पर्सा में फोरम के सबसे बुजुर्ग और अनुभवी नेता मा.प्रह्लाद गिरी मुख्यमंत्री से सम्पर्क बिहीन है। मा.प्रह्लाद गिरी के अनुभव का सदुपयोग किया जा सकता था, उनके नेतृत्व में सबको एक सूत्र में जोड़ा जा सकता था। मा.मंजूर अंसारी और मा.सिंघासन साह मुख्यमंत्री के साथ खड़े रहते थे, आज मा.मंजूर अंसारी मुख्यमंत्री से अलग होकर अपनी भूमिका तलाश रहे है। मा.सिंघासन साह ने अधिवेशन में साबित कर दिया की वे भी पूरी तरह मुख्यमंत्री के नहीं है। वैसे भी मा.सिंघासन साह का इतिहास प्रयोग करने, लाभ उठाने के बाद उसे छोड़कर, उससे बड़े को पकड़ने की रही है। मेयर बिजय सरावगी और मुख्यमंत्री में छतीस का आकड़ा है।  

मुख्यमंत्री अपने शुरुआती दिनों में शशिकपूर के घर, एक ही बेड पर वर्षो रहे, लेकिन वे नही चाहते कि आंदोलन के नायक शशिकपूर मिया किसी पद पर पहुंचे, शशिकपूर के प्रभाव से मुख्यमंत्री को खतरा लगता है, साथ ही अगर शशिकपूर स्थापित हो जाते है तो मुस्लिम के नाम पर जो मुख्यमंत्री को मिलता है उसका विकल्प खड़ा होने का भी आशंका है। इसलिए शशिकपूर को हराने के लिए मुख्यमंत्री ने अपना पूरी शक्ति लगा दी थी, नतीजतन आज शशिकपुर भी मुख्यमंत्री से अलग है।
फोरम पर्सा के एक केंद्रीय सदस्य कभी मुख्यमंत्री के बड़े प्रशंसक हुआ करते थे, कही भी मुख्यमंत्री के पक्ष में वकालत करने वाले, उनके तारीफ में कसीदे पढ़ने वाले आज मुख्यमंत्री के इतने दूर है की मुख्यमंत्री के सहयोग से मिले केंद्रीय सदस्य छोड़कर नेपथ्य में जाने वाले है। फोरम के केंद्रीय सलाहकार बीरेंद्र यादव जो कभी मुख्यमंत्री के सारथि हुआ करते थे, आज मुख्यमंत्री का नाम तक सुनना नहीं चाहते। बीरगंज के पूर्व मेयर प्रदीप सुबेदी मुख्यमंत्री द्वारा बार-बार ठगा हुआ महसूस करते है। मुख्यमंत्री के बालसखा सुशिल भटराई चुनाव के पहले का व्यवहार याद करते हुए आने वाले चुनाव का आह भरते हुए इंतजार कर रहे है। केंद्रीय सदस्य फिरोज मंसूर कभी मुख्यमंत्री के साए की तरह हुआ करते थे, सुबह पांच बजे से रात के दस बजे तक साथ रहने वाले फिरोज मंसूर को चाय की मख्खी की तरह फ़ेक दिया गया।
आज मुख्यमंत्री के पास दीपक यादव, सल्लाउद्दीन अहमद, अमोद यादव, संदीप कुमार, बीरेंद्र यादव और सिंघासन साह के अलावा कोई नहीं है। सलाउद्दीन अहमद मुख्यमंत्री के इतने चहेते है कि बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, मुख्यमंत्री स्वच्छता अभियान, यू.इन प्रतिनिधी, रेडक्रॉस, प्रदेश सचिव के साथ-साथ अन्य पदों पर मुख्यमंत्री के कारण इनका चयन हुआ। सलाउद्दीन को स्थापित करने के लिए प्रदेश तदर्थ समिति गठन करने के समय मुख्यमंत्री ने प्रदेश सचिव बनवाया। सलाउद्दीन को मुख्यमंत्री ने लिफ्ट करके अपना उत्तराधिकारी बनाने का प्रयास किया, जिसके लिए मदरसा बोर्ड और मुस्लिम आयोग भी बनाने का प्रयास किया गया। एक ही व्यक्ति को पांच-पांच राजनीतिक नियुक्ति करने के कारण मुख्यमंत्री की आलोचना भी हुई।  जहाँ एक व्यक्ति को पांच नियुक्ति किया गया, वही पांच जिले में पांच लोगो को किया जाता तो जनसम्पर्क बढ़ता। जब सब लोग साथ थे तब मुख्यमंत्री की गरिमा थी, कोई भी ब्यक्ति अकेले शख्सियत नहीं बनता, शख्सियत बनती है जमात से, समाज से। इसी तरह मुख्यमंत्री का जनाधर खिसक रहा है। ये मुख्यमंत्री का गोल्डन समय चल रहा है, आगे कई समस्या आएँगी, पत्ता नहीं वे कार्यकाल पूरा कर पाए या नहीं ? उन्हें दूसरा कार्यकाल मिलेगा या नहीं ? आगे संघीय सरकार में कभी मंत्री बनने का मौका मिले या नहीं ? इन बातो पर मुख्यमंत्री को सोचना चाहिए और समय रहते समाज को जोड़ना चाहिए।

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पार्टी के लिए यह स्थिति काफ़ी चिंताजनक है,सत्ता का सदुपयोग होना चाहिए।निजी स्वार्थ का त्याग ही सत्ताधारी का सारथी है जो माया के वस में हो गया वो तो क्षणभंगुर हो गया।पार्टी में गुटबंदी हो पर द्वेष घातक सिद्ध होते है।सच्चा सचेतक और अगुआ वही रहता है जो सभी(लालच लोभ को छोड़) के दिलो पर राज करे सबको एक धागे में पिरोए रखने का काम करे।अगुआ का कर्तव्य है सभी के विचारों से अवगत होना और अपने विचारों से अवगत कराना।राजनीति में बहुमत बहुत ही मायने रखता है अपना स्तित्व बनाना और गँवाना अगुआ पर निर्भर है।फिर भी आज का… Read more »