Tue. Dec 11th, 2018

मोक्ष सहज नहीं है इसके लिए कठिन साधना की आवश्यकता होती है : डा. चरित्र प्रज्ञा

हिमालिनी, अंक अक्टूबर 2018 ।समणी डा. चारित्र प्रज्ञा एक आध्यात्मिक महिला हैं । आप जैन धर्म की अनुयायी हैं । आध्यात्मिक यात्रा के दौरान आपने अमेरिका एवं यूरोप के कई देशों का भ्रमण किया है । जैन विश्व भारती संस्थान से ‘तुलनात्मक धर्मशास्त्र एवं दर्शनशास्त्र’ में स्नातकोत्तर की हुईं डा. चारित्र प्रज्ञा ने जैन दर्शन–शास्त्र एवं तुलनात्मक विश्व–धर्म, प्राच्य–संस्कृति एवं परम्परा, प्रेक्षा–ध्यान एवं योग, जीवन–विज्ञान, अहिंसा एवं शान्ति अध्ययन, आध्यात्मिकता एवं नैतिकता, तनाव एवं जीवन प्रबंधन, महिला सशक्तिकरण एवं शिक्षा जैसे विषयों में दक्षता और विशेषज्ञता हासिल की है । अगस्त १२–१३ में नेपाल की औद्योगिक शहर वीरगंज में आयोजित ‘नेपाल भारत साहित्य महोत्सव–२०१८’ में आपकी गरिमामय उपस्थिति रही । जहाँ चरित्र प्रज्ञा के साथ हिमालिनी के लिए लिलानाथ गौतम ने आध्यात्मिक बातचीत की । प्रस्तुत है– बातचीत का सम्पादित अंश–

dr charitra prajya
डा. चरित्र प्रज्ञा

 

० आपने आध्यात्मिक जीवन में कैसे प्रवेश किया ? अपने विषय में कुछ बताइए !
– चेन्नई में मेरा जन्म हुआ । मेरे संसार पक्षीय पिता जी रेडियोलोजिस्ट डाक्टर हंै । मेरी संसार पक्षीय माता गृहिणी हैं । हम लोग ३ बहनें, १ भाई हंै और परिवार में सबसे छोटी मैं ही हूँ । जैन धर्म हो चाहे हिन्दु धर्म, अर्थात् भारतीय दर्शन में जितने भी धर्म हैं, सब पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं कि हमारी आत्मा है और आत्मा का जन्म–मरण होता है । विश्वास है कि जब तक कर्म होगा, तब तक जन्म मरण चलता रहेगा । मैं यह मानती हूँ– हो सकता है कि पिछले जन्म में शायद कोई ऐसे अच्छे काम किए हैं, या कोई अच्छे संस्कार रहे हैं, इसीलिए बचपन से ही मेरे मन में संसार के प्रति आकर्षण नहीं था ।
वैसे मेरी संसार पक्षीय माँ, जब वह खुद छोटी थीं, वह अपनी दादी के पास रहा करती थी, राजस्थान के छोटे गांव में । शादी से पहले की बात है यह । उस समय वह साधु–सन्त के सम्पर्क में बहुत रहा करती थी । मेरो बड़ी दादी (नानी) हमेशा कहा करती थी कि तुम दीक्षा ले लो, वह छोटी उम्र में विधवा हो गई थी । मेरी मां उस समय कुछ बोल नहीं सकी थी । मुझे ऐसा लगता है कि उनके अन्तर में अध्यात्म के थोड़े संस्कार थे, वैराग्य की भावना थी । बाद में शादी हो गई, हम सब लोगों का जन्म हो गया, वह नहीं बोल सकी । लेकिन उनके मन के अन्दर में कुछ ऐसा था, कि सब कुछ छोड़ करके संन्यास ले लो । लेकिन बच्चों की जिम्मेदारीसामने थी जिसके कारण वो ऐसा नहीं कर पाईं । हो सकता है कि उसका कोई प्रभाव मेरे अवचेतन मन में पड़ा हो ।
० आप कितने साल की थी जब आप अध्यात्म की ओर आकर्षित हुईं ?
– बचपन से ही । जब हम लोग स्कूल में जाते थे, मुझे बहुत ज्यादा पहनना, फैशन करना ये सब कुछ शौक नहीं था । शादी–ब्याह में जाती थी तो बिना मन के जाती थी । अर्थात् मुझे वहां जाने का मन नहीं होता था । बचपन से ही ही मेरे दिमाग में स्पष्ट था कि मुझे इस रास्ते में नहीं जाना है, मुझे अध्यात्म के रास्ते में जाना है । लेकिन अध्यात्म का रास्ता क्या होगा, छोटी–सी उम्र में यह बात इतना स्पष्ट नहीं हो पाया । चेन्नई एक बड़ा शहर है, वहां जैन साधु–साध्वी का चातुरमांस होता है । बरसात के समय यानि चार महीना वे लोग एक जगह में रहते हैं । चार महीनों मे हम लोग कई बार उनके पास जाए करते थे । हम साध्वियों के पास बैठते, उनकी बात सुनते, वह हमें कुछ सिखाती थी । कथा बताती थी । अपने जीवन के विषय में बताती थीं तो मैं सोचतीथी कि मुझे भी ऐसे ही रहना है । साधारण और शांत तरीके से । जीने का मकसद कि खुद भीजियो और औरों को भी जीने दो । जब कैं छ या सात कक्षा में थी तभी सोच लिया था कि मुझे सन्यास लेना है । लेकिन घर अनुमति नहीं मिली । क्योंकि मैं सबसे छोटी थी । अभिभावकों ने कहा– जब तक सबकी शादियां न हो जाए, तबत क कुछ नही करो और जब तुम्हारा नम्बर आएगा तभी सोचेंगे । तब तक तुम पढ़ाई करो । उसके बाद मैंने हाइस्कुल किया, कॉलेज में भी गई । कॉलेज का वातावरण मुझे ठीक नहीं लगा । मुझे लगा कि यहाँ पढ़ने के लिए नहीं, केवल मनोरंजन के लिए विद्यार्थी आते हैं । उसके बाद मैंने कॉलेज छोड़ दिया । उस वक्त शायद मैं १६–१७ साल की थी । मेरे से बडीÞ वाली बहन थी, उसकी शादी हो गई । तब मैंने अपने अभिभावक को समझाने की कोशिश की । संसार पक्षीय मां को कन्भिन्स करने में मुझे बहुत समय लगा । क्योंकि वह थोड़ा ज्यादा अट्याच थीं मुझसे । पिता जी ने तो कहा था कि तुम अच्छे रास्ते पर जाओ, हम तुझे मना नहीं करेंगे । लेकिन मां…, फिर मैंने उनको समझाया ।
हमारे यहां एक सिस्टम है, पहले आप को एक ट्रेनिङ सेन्टर में रहना पड़ता है । वहां आप को सब तरह से शिक्षित किया जाता है । वहां बाह्य और अध्यात्म दोनों एजुकेशन दिया जाता है । जहाँ यह पता लगाया जाता है कि उस का स्वभाव कैसा है, वह कर पाएगा या नहीं ? क्योंकि यह ६ महीना, २ साल या ५ साल की बात नहीं है । पूरी जिन्दगी का कमिटमेन्ट है । किसी का दवाब या किसी चीज की कमी से अगर कोई साधु–साध्वी हो जाते हैं तो वह ज्यादा दिन नहीं टिक पाते हैं । व्यक्तिगत रूप में हमारा अच्छा परिवार है, कोई दिक्कत नहीं थी, कहीं कोई सुविधा में कमी नहीं रही । यह तो एक व्यक्ति का वैराग्य भाव है । वह भाव अपने आप जगता है । हां, सभी में यही बात लागू नहीं होती । कोई कुछ घटना देख लेता है तो जग सकता है । लेकिन मेरे साथ कोई एक्सीडेन्ट नहीं हुआ । लेकिन मुझे अन्दर से एहसास था कि मुझे इस लाइफ को नहीं जीना है ।
० आपके इस राह को चुनने में क्या किसी धार्मिक गुरू के प्रति आस्था थी ?
–नहीं ऐसी कोइृ खास घटना या व्यक्ति नहीं है । लेकिन साधु–साध्वी आते रहते थे, चौमासा के अवसर पर । चेन्नई में हर साल चौमासा होता है । उस वक्त कईयों से मिली । किसी से बात हुई, किसी ने कुछ प्रेरणा दिया । बस इतना ही !
० मेरे ख्याल से जैन धर्म में भी कुछ विविधता है, इसके बारे में कुछ कहेंगी ? और हिन्दू धर्म और जैन धर्म में क्या फर्क है ?
– जैन धर्म में दो धारा है– श्वेताम्बर और तेरापन्थ । श्वेताम्बर में भी तीन डिभिजन हैं । हम लोग हैं– तेरापन्थ । हिन्दू और जैन धर्म में बहुत कुछ सामानता है और कुछ विविधता भी । हिन्दू धर्म में भी आत्मा को माना गया । सबसे बड़ी बात यही है । आत्मा है यानि आत्मा का पुनर्जन्म है । पुनर्जन्म क्यों होता है ? क्योंकि कर्म है । और यह भी माना गया कि हमारा अन्तिम लक्ष्य मोक्ष है । यह सारी चीजें बहुत मिलती–जुलती है । अन्तर कुछ फन्डामेन्टल चीजों का है । जैसे हिन्दू धर्म में या वैदिक संस्कृति में माना जाता है कि इस संस्कार को बनानेवाला कोई निर्माता है, यानि विश्वास किया जाता है कि ईश्वर ने इस दुनिया को बनाया है । लेकिन जैन धर्म यह कहता है कि इस दुनियां को बनानेवाला कोई नहीं है । यह दुनिया अपने आप बनती है, बिगड़ती है । इसका अपना कानून है, नियम है । यह अपने नियम से चलती है । जैन धर्म में भगवान उसे कहा गया, जिसे हम सिद्ध कहते हैं, या परमात्मा कहते हैं, जो सब कर्मों से मुक्त हो गए, जिनका दुबारा अवतार नहीं होता । जैसे कि हिन्दू धर्म में कहते हैं कि भगवान अवतार लेते हैं । जब–जब परिस्थिति आती हैं, तो राम के रूप में कृष्ण के रूप में, या कल्कि के रूप में अवतार होता है, यह माना जाता है । और पहले भी बहुत सारे अवतार हुए हैं, जैसे कि मत्स्य–अवतार, नरसिंह–अवतार । लेकिन जैन धर्म यह कहता है कि भगवान वही है जिसका दुबारा न तो जन्महोता है और न ही मरण । और भगवान इस दुनिया को बनानेवाला नहीं है । भगवान सब के लिए बराबर है । उसके लिए कोई छोटा या कोई बड़ा नहीं । न कोई धनी या न कोई गरीब, न कोई ऊँचा या न कोई नीचा, न इस देश का ना उस देश का । भगवान के लिए सब समान है, ऐसी मान्यता हमारी है । इस दुनिया में जो कुछ भी हम अन्तर देखते हैं, मानव–मानव के बीच, एक देश से दूसरे देश के बीच, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच, इन सब का मूल कारण है– अपने–अपने कर्म । जिसने जैसा कर्म किया, उसके अनुसार उसको फल मिलता है । मैंने जो कर्म किया है, मुझे ही उस का परिणाम भुगतना पड़ेगा । कर्म के अनुसार ही यह सारा परिवर्तन हो रहा है । कोई ईश्वर के कारण नहीं । सबसे बड़ी भिन्नता यही है ।
० धर्म और अध्यात्म के बीच अन्तर क्या है ?
– ‘धर्म’ कह कर आप ने हिन्दू, बौद्ध, क्रिश्चियन आदि सम्प्रदायों की ओर संकेत किया । एक बात पर गौर करिए– धर्म कहां से निकला ? अध्यात्म से ही धर्म निकला या धर्म से अध्यात्म आया ! अध्यात्म को सिखाया किसने ? अध्यात्म सिखानेवाला तो धर्म ही है । धर्म की परिभाषा बिल्कुल सीधी है– आत्मशुद्धि साधनम् धर्म है । जिस साधना से आत्मा की शुद्धि होती है, उसे धर्म कहते हैं । लेकिन कोई धर्म को नेचर मानता है, कोई ब्युटी भी । और कोई धर्म को अनावश्यक भी ठानते हैं । कोई धर्म को किसी नाम के साथ भी जोड़ता है । इसतरह अलग–अलग परिभाषाएं हो गई । वस्तुतः धर्म का मूल अर्थ यही था कि जिससे मेरा मन शान्त हो, मन को शान्ति मिले, मेरी आत्मा की शुद्धि हो, मान, माया लोभ, जो मूल चीज आज देख रहे है, यह मेरी कम होनी चाहिए । अगर यह खतम हो जाते हैं तो धर्म है । आजकल जो परिभाषा धर्म की हो रही है, यह बिल्कुल हठग्राहिता है, धर्म के नाम में रुढि़वादिता आ गई है । और यह हो गया कि यह मेरा धर्म, यह उसका धर्म, यह तेरा धर्म । यह मेरा–तेरा होने से मन में जो अहंकार आता है, उसके कारण ही आतंकवाद पैदा हुआ है । अर्थात् आतंकवाद पनपने का सबसे बड़ा कारण यही है । धर्म आजकल केवल बहकाने की क्रियाओं में रह गया । मूल उद्देश्य से हटकर आजकल क्रियाकाण्ड में धार्मिक लोग ज्यादा बहलने लगे । ऐसे लोग धार्मिक तो हैं, परन्तु उसमें अध्यात्म नहीं है । अगर कोई पूजा करेगा, मन्दिर जाएगा या प्रार्थना करेगा, साधु–सन्तों के पास जाएगा तो वह धार्मिक कहलाता है, लेकिन जब अपीे दुकान में बैठते हैं या जब अपने प्रोफेशन में आते है, तो वह बिल्कुल अधार्मिक बन जाता है । इसीलिए आचार्य तुलसी ने एक बहुत बड़ी बात कही– वास्तव में धार्मिक वह है, जो नैतिक है । और जो नैतिक नहीं है, वह धार्मिक नहीं कहला सकता । धार्मिक तो वह होना चाहिए, जिसके भीतर में नैतिकता है । बिना नैतिकता के धार्मिकता किस काम की ? अध्यात्म कहता है कि अध्यात्म में न तेरा न मेरा, कोई नहीं है । वहां हर आदमी का हित देखा जाता है । इसके लिए कोई जरुरी नहीं है कि आप कुछ क्रियाकाण्ड करो । बिना क्रियाकाण्ड के अगर आप की सोच सही है, आपका मन सही है, आपका विचार अच्छा है, तो आप किसी का नुकसान नहीं करोगे, किसी का शोषण नहीं करोगे, किसी का कुछ लोगे नहीं, बदले में आप उसको सहयोग करने के लिए तैयार रहोगे ।
० हर धर्म के व्यक्ति कहते हैं कि हमारा अन्तिम उद्देश्य मुक्ति है । लेकिन सभी का रास्ता अलग–अलग है । आप के दृष्टिकोण में मुक्ति कैसे सम्भव है ?
– जहां इतनी आधुनिकता है, इतना भौतिकवाद है, इतने सारे दुनिया की वस्तुओं के ऊपर हम निर्भर हो गए हैं, इन सबसे परे आज की आवश्यकता है, कि हम थोड़ा–सा संयम करना सीखें । आचार्य जी तुलसी ने एक बार कहा था– संयम खलू जीवनम् । जहां संयम है, वह जीवन है । अगर संयम नहीं है तो वह अपना जीवन भी बिगाड़ रहा है, समाज को भी अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त बना रहा है । क्योंकि पैसा केवल सब को त्राण नहीं दे सकता । पैसा एक साधन है, लेकिन उस के भीतर में अध्यात्म होना बहुत जरुरी है । मुक्ति एक जीवन में नहीं मिलती, उसके लिए साधना करनी पड़ती है । उस साधना की शुरुआत होती है– संयम, त्याग और वैराग्य से । इसके लिए थोड़ा–सा ध्यान करें । ध्यान से अपने आप को बदलें, उसके बाद आप अध्यात्मिक जीवन के प्रथम चरण में प्रवेश कर सकते हैं । मुक्ति के लिए अपने आप को बदलना होगा, दूसरो को बदलने से आप को मुक्ति नहीं मिलेगी । अपनी जीवन को पहले कैसे बदलूं, अपना जीवन पहले अच्छा कैसे बनाऊं, ताकि मैं दूसरों को अच्छी बात सिखा सकूं, मन में यह सब होना चाहिए । उसकी शुरुआत ध्यान से करें, अच्छा–सा साहित्य पढ़े, संयम करना सीखें, थोड़ा त्याग, वैराग्य को अपने जीवन में अपनाएं । अगर ऐसा करते हैं तो मुक्ति का रास्ता हमारे सामने स्पष्ट हो सकता है ।
० आज के युवाओं में धर्म और अध्यात्म के प्रति ज्यादा रुचि नहीं है, आप उन लोगों के लिए क्या कहना चाहेंगी ?
– आज की युवा पीढि़यों को संस्कारित करने की बहुत बड़ी आवश्यकता है । इसके लिए घर में अच्छा माहौल दिया जाए, परिवार में अच्छा वातावरण दिया जाए, और उन्हें थोड़ी–सी अध्यात्म की शिक्षा भी दी जाए । जैसे सब प्रकार की शिक्षा हम देते हैं, अच्छी–अच्छी युनिवर्सिटी में जाकर वे डिग्री हासिल कर लेते हैं, लेकिन अध्यात्म की शिक्षा कहां से मिले ? जब तक हम अध्यात्मिक शिक्षा नहीं देंगे, अच्छें संस्कारों की शिक्षा नहीं देंगे, तो उनका जीवन अच्छा कैसे बनेगा ? इसके लिए आवश्यकता है– बचपन से ही उनको अच्छे संस्कार दिए जाए, अध्यात्म उनको सिखाया जाए । अध्यात्म में कोई अन्तर या भेदभाव नहीं है । भाषा का, जाति का, वर्ग का कोई भेदभाव यहां नहीं है । यहां मानव कल्याण सबसे बड़ी चीज है । संसार के समस्त जीवों का, समस्त प्रणियों का कल्याण हो, यह अध्यात्म की भाषा है तो युवा पीढी को यह समझ में आना चाहिए कि केवल भौतिक बाद जीवन में सुख और शान्ति नहीं दे सकता । भौतिकता जीवन का एक पक्ष है, लेकिन जीवन का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है, अध्यात्म । दोनों का सन्तुलन चाहिए ।
० हम लोग देखते हैं कि बड़े–बड़े धार्मिक गुरु जो हैं, वे भी भौतिक जगत से जुड़े हुए विभिन्न विवाद में फंसते हैं, इस को आप किस तरह देखती हैं ?
– जब आप किसी गुरु का चयन करते हैं तो सच्चे गुरु को चयन करो । हम तो कई बार कहते हैं– आजकल भगवान बनने की, गुरु बनने की, आचार्य बनने की एक होड़–सी लगी है । और हर कोई पण्डित अपने आप को भगवान कहलाता है । लेकिन वह पण्डित तो हो सकता है, ज्ञानी नहीं । क्योंकि ऐसे व्यक्ति पुस्तकों को पढ़ कर ज्ञान बाँट रहे हैं । उसका अपना ज्ञान नहीं है । यहां प्रश्न उठ सकता है– सच्चा गुरु कौन ? सच्चा गुरु वह है– जो खुद त्याग का रास्ता दिखाए । अगर खुद भोग में रहे और दुनियां को कहे कि आप ऐसे करो, यह तो विलासिता है ।
० एक सामान्य व्यक्ति सद्गुरु को कैसे पहचान सकता है ?
– उस को पहचाना होगा कि इनकी कथनी और करणी में समानता है या नहीं ? जब हम स्टेज पर जाते हैं, व्याख्यान देते हैं तो महात्मा बनने लगते है । ऐसे में लोगों को लगता है कि इनसे ज्यादा कोई अच्छा होगा ही नहीं । पर यथार्थ में उनका जीवन देखना पड़ता है, उनका व्यक्तिगत जीवन कैसा है ? क्योंकि केवल कथा वाचक होने से कोई भी व्यक्ति त्यागी नहीं हो सकता, केवल लोगों को भाषण देने से क्या वह पण्डित और ज्ञानी हो गया ? वह तो कोई भी दे सकता है । आज अच्छे से अच्छा वक्ता बहुत मिलेंगे आप को । बहुत सारी मोटिभेसनल स्पिकर मिलेंगे आप को । क्या उससे त्यागी, सन्यासी, वैराग्य, ब्रह्मचारी सब कुछ आ गया उनमें ? नहीं आया । व्यक्तिगत जीवन में देखों कि उनका, खुद का जीवन कैसा है । जैसे मान लीजिए हम लोग जो हैं, हमारे यहां कुछ नियम है । जैन साधु या साध्वी बनना है उसको ५ नियम लेने बहुत जरुरी है– अहिंसा का पालन करना, सत्य का पालन करना, चोरी नहीं करना, ब्रह्मचर्य का पूर्ण रूप से पालन करना और कोई प्रकार का परिग्रह नहीं रखना । जैसे की हमारे नाम से यहां ना कोई बैंक व्यालेन्स है, न मकान । हमारे नाम से कुछ भी नहीं है । जो कुछ है, समाज का है । और जब भी आवश्यक होता है, समाज हमें सहयोग करता है, समाज हमारी व्यवस्था करता है । हमारी आवश्यकता भी सीमित है, उससे ज्यादा कुछ नहीं रखते हैं । मेरे कहने का मतलब है कि आप जिसको गुरु मानते हैं, उसका कथन और व्यवहार कैसा है, उसको जानना जरूरी है ।
० अन्त में कुछ कहना चाहेंगे ?
– जिस युग में हम लोग जी रहे हैं, इस में अपनी कुछ समस्या होती है । व्यक्तिगत, पारिवारिक तथा सामाजिक समस्या सबके पास है । राष्ट्र की भी कुछ समस्या होती है तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की भी कुछ समस्या होती ही है । तो जब हम जीवन जीते हैं, सब चीजों का हमारे ऊपर प्रभाव पड़ता है । ऐसी अवस्था में सबसे पहले व्यक्ति अपने जीवन को अच्छा बनता है । आप भी अपने जीवन को अच्छा बनाना चाहते हैं तो कुछ प्रयोग करें– ध्यान–साधना का प्रयोग करे, ताकि आपकी जीवन में तनाव ना हो, शान्ति हो । परिवार में भी आपस में प्रेम कैसे रहे, एक दूसरे के प्रति हमारा संबंध कैसे अच्छा रहे, इसमे खयाल रखना जरुरी है । हम दूसरे से संबंध बना लेते हैं, लेकिन परिवारवालों से संबंध नहीं बना पाते हैं । इसीलिए तलाक हो जाता है, आपस में दूरियां बढ़ जाती हैं, एक–दूसरे के मन में कटुत आ जाती है । हमें परिवार में भी प्रेमभाव और सौहार्द बनाए रखना जरुरी है ताकि हमारे संबंधों में मिठास आए, एक–दूसरे का सम्मान करें, एक–दूसरे की आवश्यकताओं को समझे और अच्छी तरह से मिलकर रहें ।
बात रही समाज की, समाज में भी आजकल ऐसा हो गया है कि पैसे का ज्यादा प्रभाव है । व्यक्ति के चरित्र का प्रभाव नहीं है । जबकि चरित्र को महत्व देना चाहिए । अर्थात् जिनका चरित्र सही है, उस व्यक्ति को महत्ता देनी चाहिए । लेकिन समाज में केवल पैसे को देख करके लोगों की महत्ता बढ़ जाती है, उसका बड़ा सम्मान हो जाता है । चरित्रवान का कोई मूल्य नहीं होता है । इस सोच में परिवर्तन आवश्यक है । समाज कभी भी गलत नीति से सही रास्ते पर नहीं चल सकता । राष्ट्र की समस्या देखें तो एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र में गरीबी की समस्या है, हिंसा की समस्या है, बलात्कार की समस्या है । इन सब में व्यक्ति–व्यक्ति का दोष है । अगर व्यक्ति सही रास्ते पर रहता तो ऐसी समस्या न आती । दूसरी बात, हमारे समाज में पाश्चात्य संस्कृति का इतना बड़ा प्रभाव पड़ रहा है कि लोग अपनी अच्छी चीजें भूल रहे हैं । और जो बुरी चीजें है, उसको स्वीकार कर रहे हैं । पत्र–पत्रिका, टिभी, इन्टरनेट इतना ज्यादा एक्सपोजर मीडिया है, जहां अच्छी चीजों को स्थान कम दिया जाता है, फालतू चीजों को उस जगह पर स्थान दिया जाता है । आप भी मीडिया से हैं, इसीलिए आप भी समाज को गाइड–लाइन प्रदान कर सकते है । समाज को किधर ले जाना है, आप की भी जिम्मेदारी बनती है ।

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