Thu. May 23rd, 2019

अगर डाक्टर नहीं बन पाता तो साधु बन जाता : डा. सुन्दरमणि दीक्षित


हिमालिनी, अंक मार्च 2019 |‘दीक्षित परिवार’ का नाम नेपाल में सम्मान के साथ लिया जाता है, जो एक खानदानी परिवार के रूप में भी जाना जाता है । तत्कालीन श्री ५ महाराज (राजा) और श्री ३ महाराज (राणा) खानदान के साथ दीक्षित परिवार निकट माने जाते हैं । उसी परिवार के सदस्यों में से एक हैं– डॉ. सुन्दरमणि दीक्षित । लेकिन डॉ. सुन्दरमणि दीक्षित सही मायने में एक आम इंसान है किसी भी तामझाम से बिल्कुल अलग । राजनीति पार्टी, विश्लेषक तथा राज्य सत्ता की नजर में आप एक ‘विद्रोही’ व्यक्तित्व के मालिक हैं । आपने कम्युनिष्ट पार्टी के निकट रहकर भी काम किया । लेकिन जब कम्युनिष्ट पार्टी सत्ता में आ गई तो आप उनके विरोधी के रूप में खड़े दिखाई दिए । पेशागत रूप से आप मेडिकल डाक्टर हैं । आप अपने पेशा के प्रति ही नहीं, समाज और राष्ट्र के लिए भी सक्रिय और समर्पित व्यक्तित्व हैं । वि.सं. २०६२–६३ साल के जनआन्दोलन के वक्त आप नागरिक समाज के प्रतिनिधि के रूप में परिचित थे । नेपाल के राजा और राणा प्रधानमन्त्रियों के साथ आप का निकट का सम्बंध रहा । आपके समक्ष चिर–परिचित शख्सियत डॉ. सुन्दरमणि दीक्षित का जीवन–सन्दर्भ यहां प्रस्तुत है–

पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा

मेरा जन्म सन् १९४१ दिसम्बर २२ में पुल्चोक में हुआ है । आज हिमालय होटल जहां है, उसके ठीक सामने हमारा घर था । मेरे पिता जी केदारमणि आचार्य दीक्षित और माता विद्यादेवी आदी हैं । मेरे पिताजी तत्कालीन जरसाहेब मदन शमशेर के प्राइभेट सेक्रेटरी थे । मदन शमशेर तत्कालीन श्री ३ चन्द्र शमशेर के कनिष्ठ पुत्र हैं । माता जी जोशी परिवार से थी । हमारे माता–पिता के कुल १० सन्तान हैं– मेरे दो बड़े भाई, ७ बहनें और मैं । उन में से आज मैं और ४ बहने बाकी हैं, अन्य स्वर्गीय हो चुके ।
मेरी स्कूलिङ यही (पुल्चोक) श्री दरबार से शुरु हुई । राणा जी का दरबार था, दरबार में ही एक मास्टर साहब आकर हम लोगों को पढ़ाते थे । मास्टर साहब दरबार के छिढ़ी में रहते थे । पिता केदारमणी जी जरसाहेब मदन शमशेर के प्राइभेट सेक्रेटरी होने के नाते मुझे भी राणाओं के सन्तानों के साथ शिक्षा–दीक्षा प्राप्त करने का सौभाग्य मिला । लेकिन असली और औपचारिक पढ़ाई तो दार्जिलिङ से हुई, उसमें भी राणा परिवार का ही योगदान है । दार्जिलिङ स्थित माउन्ट हर्मन स्कूल से मेरी औपचारिक शिक्षा शुरु हुई थी । इसके पीछे एक अजीब–सी घटना जुड़ी हुई है । मेरे पिता जी राणाओं के लिए एक सामान्य नौकर थे, उनकी मासिक पारिश्रमिक १ सौ रुपये थी । तब भी मेरे पिता जी ने मुझे दार्जिलिङ भेज कर माउन्ट हर्मन स्कूल में पढ़ाने का सपना देख लिया । उस स्कूल में पढ़ने के लिए मासिक १ सौ रुपया फीस देना पड़ता था । पिता जी की मासिक परिश्रमिक १ सौ रुपया, मेरी मासिक फीस १ सौ रुपयां ! इस तरह देखते हैं तो उस स्कूल में पढ़ने की हमारी आर्थिक हैसियत नहीं थी । तब भी उन्हाेंने साहस किया और एक दिन जनरल मदन शमशेर से मेरी पढ़ाई के बारे में बात की और कहा कि पुत्र सुन्दरमणि को मैं दार्जिलिङ (माउन्ट हर्मन) भेज रहा हूँ ।

मेरा सौभाग्य ही कहें ! देश में राणा शासन था, राणाओं के लिए बहुत सारे नौकर–चाकड़ होते थे । उनमें से अविवाहित महिला (जिसको ‘सुसारे’ कहा जाता था) बच्चा पैदा करती थी, जो राणाओं के साथ हुए अवैध सम्बन्ध का परिणाम होता था । जनरल मदन शमशेर के लिए भी कई सुसारे काम करती थीं, उन्हीं में से कुछ सुसारे की भी सन्तान पैदा हुई थी, जो सार्वजनिक पहचान में नहीं थे । उस समय के नियमानुसार सार्वजनिक भी नहीं किया जाता था । अर्थात् राणाओं के साथ हुए अवैध सम्बन्ध से जो सन्तान होती थी, उसको राणा लोग अपना नाम नहीं देते थे । जब मेरे पिता जी ने मुझे दार्जिलिङ भेजने का निर्णय लिया, तब मदन शमशेर ने पिता जी से एक प्रस्ताव किया । प्रस्ताव के अनुसार यह कहा गया कि मदन शमशेर के अवैध सम्बन्ध से जन्म लेनेवाले कुछ बच्चों को भी मेरे साथ ही पढ़ाई के लिए दार्जिलिङ ले जाना होगा । उन्होंने दीक्षित नाम देकर ही उन लोगों को भी मेरे साथ दार्जिलिङ ले जाने के लिए कहा । इसके बदले मेरी पढ़ाई खर्च राणा जी ने दिया । इस तरह मेरी पढ़ाई सहज हो गई । नहीं तो मेरी पढ़ाई माउन्ट हर्मन में सम्भव ही नहीं थी ।

माउन्ट हर्मन में मैंने ४ साल तक पढ़ाई की । वहां से मैं नैनीताल स्थित सेन्ट जोसेफ कॉलेज में भर्ती हुआ, वहीं से मैंने स्कूल लेबल की पढाई खतम की । उसके बाद कलकत्ता स्थित सेन्ट जेभियर्स कॉलेज से इन्टर साइन्स आईएसी किया । आईएसी करने के बाद कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में भर्ती होकर एमबीबीएस पास किया । रानी जगदम्बा कुमारी देवी की मेडिकल सीट में मैंने यह अवसर पाया । रानी जगदम्बा कुमारी (मदन शमशेर की रानी) मेरे पिता जी की मालिक थीं । उन्हीं जगदम्बा कुमारी को आप लोग मदन पुरस्कार की संस्थापिका के रूप में भी जानते हैं । वह भारत बलरामपुर राज्य की बेटी भी हैं । उनके ही योगदान से मैंने डाक्टरी पढ़ने का अवसर प्राप्त किया ।
कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने के बाद मैंने मुम्बई जाकर एमडी किया । उसके बाद बेलायत जाकर कार्डियो संबंधी ट्रेनिङ ली और नेपाल वापस आ गया । स्मरणीय बात यह है कि थीसिस लिखकर एमडी करनेवाला प्रथम नेपाली नागरिक मैं ही हूँ । मैंने ‘लिभर’ विषय पर एमडी के लिए थीसिस लिखा था ।

‘दीक्षित’ टाइटल का इतिहास
मेरे ग्रेट, ग्रेट ग्राण्डफादर का नाम शिरोमणि आचार्य हैं, वह चिर–परिचित पण्डित थे, सिर्फ नेपाल में ही नहीं, भारत में भी । लेकिन वह एक ‘गर्भे टुहुरो’ थे । अर्थात्, उन के जन्म होने से पहले ही उनके पिता जी का स्वर्गवास हो गया था । उस समय पति का स्वर्गवास होना पत्नी के लिए बहुत ही दुःखद क्षण होता था, विभिन्न सामाजिक आरोप से पीडि़त होना पड़ता था । इसीलिए अपने पुत्र शिरोमणी को लेकर मां बनारस पहुँच गई, वहां वह भीख मांगने के लिए सड़क में बैठती थी और अपने पुत्र को संस्कृत विद्यालय में भर्ती करवा दी थी । वही शिरोमणी बाद में जब नेपाल आए तो नामी पण्डित हो गए । उस समय पण्डित शिरोमणि का स्थान जो था, उस के बाराबर आनेवाले अन्य पण्डित बहुत ही कम थे । इसीलिए शिरोमणि आचार्य को सीधे धीर शमशेर के दरबार में प्रवेश मिला । धीर शमशेर वही हंै, जो १७ भाई वाले राणा प्रधानमन्त्रियों के पिता थे । शिरोमणि आचार्य ने चन्द्र शमशेर, वीर शमशेर लगायत राणा प्रधानन्त्रियों को पढ़ाया । सभी राणाओं के लिए वह गुरु बन गए । यही से हमारे पुर्वजों का इतिहास दरबार और राणाओं के साथ जुड़ने लगा ।
जब मेरे ग्रेट, ग्रेट ग्राण्डफादर बुजुर्ग होने लगे, तब वह पुनः बनारस चले गए । वहां जाकर उन्होंने बडेÞ–बड़े तीन यज्ञ आयोजन किया । उन्होंने ऐसा यज्ञ किया, जो भारत से ही विलुप्त हो रहा था । उनके इसी सामथ्र्य को पहचान कर बनारस के तत्कालीन विद्वत वर्ग ने उनको ‘दीक्षित’ उपाधि प्रदान की । उनके लिए प्राप्त ‘दीक्षित’ टाइटल से ही आज भी हम लोगों को पहचाना जाता है । मेरे ग्राण्डफादर राममणि आचार्य ‘दीक्षित’ को तत्कालीन राजा पृथ्वी विरविक्रम शाह के लिए एक भरोसेमन्द व्यक्ति के रुप में जाना जाता था ।
इसीतरह नेपाल के प्रथम एयरपोर्ट (गौचर, काठमांडू) से प्लेन में चढ़ कर विदेश (कलकत्ता) जानेवालों में मैं प्रथम व्यक्ति हूँ । तत्कालीन जनरल मदन शमशेर ने अपने और अपने परिवार के लिए उक्त प्लेन मंगवाया था । यह सन् १९५० दिसम्बर की बात है । देश में राजनीतिक आन्दोलन चरम सीमा पर थी । राणा शासन खतम होने जा रहा था । इसी को दृष्टिगत करते हुए तत्कालीन श्री ३ महाराज मोहन शमशेर के अनुरोध पर उक्त प्लेन काठमांडू लाया गया था । प्लेन उन की अपनी ही कम्पनी की थी । मदन शमशेर और महावीर शमशेर की साझा कम्पनी थी– हिमालयन एविएसन, जो कलकता में थी, उसी कम्पनी का प्लेन था वह और मुझ उसमें चढने का अवसर मिला ।

डाक्टर बनने की सोच
जब मैं ४ साल का था, उसी समय से ही मेरे अन्दर डाक्टर बनने का सपना पलने लगा था । इसके पीछे एक घटना जुड़ी हुई है । मेरी मां विद्यादेवी आदी को पित्ताशय में पत्थरी (गल्सस्टोन) हुई थी । उस समय गल्सस्टोन का ऑपरेशन नेपाल में तो सम्भव ही नहीं था, लेकिन भारत में भी सिर्फ कलकत्ता में होता था । कलकत्ता में ‘कार माइकल’ नामक एक हॉस्पीटल था । आज भी है वह हॉस्पीटल । नाम परिवर्तन कर आज उसका नाम ‘आरजीकार’ हॉस्पिटल रखा गया है । उस वक्त वहां ललितमोहन (एलएम) बनर्जी) नाम के एक डाक्टर थे । एलएम बनर्जी को भारत में ही सबसे बड़ा सर्जन के रूप में देखा जाता था । मेरा भाग्य ही कहें, वह डाक्टर अच्छी तरह नेपाली भाषा बोलते थे । नेपाल के साथ उनका रिश्ता भी था । नेपाल के राजपरिवार, राणा परिवार तथा अन्य नेपाली उपचार के लिए उनके पास ही पहुँचते थे । मां के गल्सस्टोन ऑपरेशन के लिए भी उन्हीं के पास ले गया था, ऑप्रेशन हो गया । आज के दिन में ऑपरेशन के अगले दिन ही मरीजों को घर भेज दिया जाता है । लेकिन उस समय ऑपरेशन के बाद डाक्टरों की निगरानी में कम से कम २०–२२ दिन हॉस्पिटल में ही रहना पड़ता था । मां का बेड ऊपरवाले मंजिल में था, लेकिन मैं नीचेवाले मंिजल के गेट के आसपास खेलता रहता था । हर दिन डाक्टर बनर्जी उसी रास्ते से आते थे और मुझे देखते थे । कुछ दिनों के बाद उन्होंने मुझे अपने गोद में लेना शुरु किया । मुझे लेकर ही वह मेरी मां के पास जाते थे और रास्तें में नेपाली भाषा में मेरी नाक को टच करते हुए कहते थे– ‘आप को डाक्टर बनना है ।’ सिर्फ एक बार नहीं, हर रोज, वह मुझे यही सेन्टेन्स कहते । बाद में मां और मेरे बड़े भाई ने यह बात मुझसे कही । डाक्टरी पढ़ाई शुरु होने के बाद मेरी मां ने मुझे कई बार कहा है– ‘शायद उसी डाक्टर का कथन तेरे मस्तिष्क में प्रवेश कर गया ।’ ना जाने क्यों, मुझे भी ऐसा ही लगता है । क्योंकि जब मैं थोड़ा–सा समझने के लायक हुआ, उसी समय से मैं सोचने लगा कि मुझे डाक्टर ही बनना है ।

वीर अस्पताल में निःशुल्क सेवा
मैं एक आम आदमी हूँ, आस्तिक हूँ, साधारण ब्राह्मण परिवार से प्रतिनिधित्व करता हूँ । हां, मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि तत्कालीन राजा और राणाओं के साथ जुड़ा हुआ है, धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी नेपाल में दीक्षित परिवार को सम्मानित नजर से देखा जाता है । पेशे से मैं मेडिकल डाक्टर हूँ । डाक्टरी पढ़ाई पूरा करने के बाद मैं वि.सं. २०२६ साल में नेपाल आया, अगर मेरी इच्छा होती तो उस वक्त मैं अमेरिका और बेलायत भी पहुँच सकता । मेरे बैच में डाक्टरी पढ़नेवाले ९० प्रतिशत से अधिक विद्यार्थी बेलायत और अमेरिका चले गए थे । उस समय वहां जाना आसान था । बेलायत और अमेरिका दोनों देशों से हम लोगों को बुलाया वाता था । लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया । क्योंकि माता–पिता नेपाल में ही थे, उन लोगों को स्मरण किया । रानी जगदम्बा कुमारी द्वारा प्राप्त स्कॉलरशीप में मैंने डाक्टरी पढ़ने का अवसर प्राप्त किया था, उनके प्रति मेरा जो कर्तव्य होना चाहिए, उसको स्मरण किया । इतना ही नहीं, मैंने अपने देश को भी स्मरण किया । लम्बे समय से जो देश के बाहर होते हैं, उनके हृदय में देशप्रेम ज्यादा उमड़ता है, मैंने भी यही महसूस किया और नेपाल में रहकर सेवा करने का निर्णय लिया ।
नेपाल आने के बाद मैंने तत्कालीन राजा महेन्द्र के साथ दर्शन भेंट किया और ‘डाक्टरी सेवा’ के लिए विनतीपत्र (निवेदन) पेश किया । राजा महेन्द्र के हुकुम से ही मैने वीर अस्पताल में प्रवेश पाया । आज की तरह वीर अस्पताल में डाक्टरी सेवा करने के लिए मैंने कोई भी निजामती सेवा पास नहीं की थी । सीधें राजा के आदेश से मैंने उक्त अवसर प्राप्त किया ।
उस समय पूरे नेपाल में एमडी करनेवाले डाक्टर सिर्फ दो ही थे, एक– मृगेन्द्रराज पाण्डे और दूसरा सच्चेकुमार पहाडी । पाण्डे राजा महेन्द्र के निजी डाक्टर थे और पहाडी तत्कालीन युवराज वीरेन्द्र के लिए । दोनों को अधिकांश समय राजा तथा युवराज के साथ रहना पड़ता था । इसीलिए वीर अस्पताल में तो डाक्टर ही नहीं था । ऐसी अवस्था मैं नेपाल आया था । आने के तुरन्त बाद ही मैंने डॉ. मृगेन्द्रराज पाण्डे के साथ रह कर काम शुरु किया । वीर अस्पताल प्रवेश के लिए उन्होंने ही सहयोग किया ।
कई लोगों को यह सुनकर आश्चर्य भी लग सकता है कि मैंने वीर अस्पताल में निःशुल्क सेवा किया है । हां, वहां मैंने २४ साल काम किया, लेकिन मैने कोई भी पारिश्रमिक नहीं लिया । जिस वक्त मैंने वीर अस्पताल प्रवेश किया था, उस समय ‘डाक्टरों को पारिश्रमिक देना पड़ता है’, ऐसी मानसिकता ही नहीं थी । मुझे भी खाने–पीने के लिए कोई दिक्कत नहीं थी । जिसके चलते पारिश्रमिक के बारे में मैंने भी नहीं सोचा । राजा महेन्द्र को ‘विनतीपत्र’ देते वक्त ही मैंने लिखा था– ‘देश और नरेश की सेवा करने का अवसर मिल सके ।’ जिसमें मैंने पारिश्रमिक मांग नहीं की थी । उसके बाद किसी ने भी मुझे पारिश्रमिक लेने के लिए नहीं कहा, मैंने भी मांग नहीं की । तत्कालीन अवस्था में मुझे काम करना था, काम मिल गया ।
एक समय तो ऐसा भी रहा कि पूरे वीर अस्पताल (मेडिकल पार्ट) की जिम्मेदारी मेरी ही होती थी । मरीजों की अधिक भीड़ होती थी, डाक्टर कम पड़ते थे । कई ऐसे दिन भी थे, जिस दिन (सुबह के समय में) मैं एक असिस्टेन्ट का सहयोग लेकर २५० मरीजों को देखता था । यह मेरी बाध्यता भी थी । इस तरह मुझे पैसा नहीं काम मिल गया, जिससे मुझे बहुत–कुछ सीखने का अवसर मिला । भगवान की कृपा कहे, या रानी जगदम्बा कुमारी और माता–पिता का आशीर्वाद ! खाने–पीने के लिए मुझे कभी भी कोई चिन्ता नहीं पड़ी, आज भी नहीं है । आज मेरे पास जो जमीन है, वह रानी जगदम्बा कुमारी से ही प्राप्त है । मेरे पिता जी और मैंने तहे दिल से उनकी सेवा की थी, इसीलिए उन्होंने हम लोगों को प्रशस्त दिया है । आज मैं जो डाक्टर हूँ, उसमें भी रानी जगदम्बा कुमारी का ही हाथ है । डाक्टरी पढ़ने के लिए मैंने जो स्कॉलरशीप प्राप्त किया था, वह देश का नहीं, रानी जगदम्बा कुमारी का ही था ।

राजा महेन्द्र की राष्ट्रभक्ति !
शायद वि.सं. २०२७ साल की बात है । तत्कालीन राजा महेन्द्र शिकार खेलने के लिए स–परिवार सूदुरपश्चिम स्थित जिला कञ्चनपुर पहुँच गए । सभी सदस्य बाघ का शिकार करने के लिए जंगल में घुस गए थे । योजना मुताबिक बाघ को घेर लिया गया । राजा महेन्द्र ने बाघ के ऊपर गोली चलाई । लेकिन उक्त गोली सामने रहे एक पत्थर में लगी और रिटर्न होकर रानी रत्नराज्यलक्ष्मी देवी को लगी । रानी ने कहा– ‘गोली लग गई । वहां उपस्थित सभी ने सोचा कि गोली बाघ को लगी है । लेकिन कुछ देर बाद पता चला कि गोली बाघ को नहीं, रानी को लगी थी । रानी रत्न के साथ प्रिन्स धीरेन्द्र भी वहीं थे । उन्होंने ही बाद में इस घटना के बारे में मुझे कहा है । मुझे लगता है कि इसके बारे में बाहर ज्यादा लोगों को आज भी पता नहीं है ।
प्रिन्स धीरेन्द्र के अनुसार गोली लगने के बाद सभी लोग बेसक्याम्प में वापस हो गए । रानी रत्न गोली लगने से घायल थी, उनके पेट में गोली अटक कर रह गई थी, उस को जल्द से जल्द निकालना जरुरी था । लेकिन गोली निकालने के लिए दक्ष चिकित्सक नहीं थे । रात का समय हो रहा था । काठमांडू लाने के लिए आज की तरह तत्काल प्लेन तथा हेलिकॉप्टर की सुविधा नहीं थी । तत्कालीन शाही नेपाली सेना के पास ‘भस्काइ–भ्यान’ नामक एक विमान था, जिसकी गति अत्यन्त ‘स्लो’ थी । उक्त विमान कञ्चनपुर से काठमांडू आने के लिए कम से कम ३ घण्टा लगता था । रात का समय होने के कारण काठमांडू में ‘नाइट ल्याण्डिङ’ की सुविधा भी नहीं थी, इसीलिए काठमांडू लाने की सम्भावना राजा महेन्द्र के अलावा किसी ने नहीं देखा ।
पास में ही दिल्ली दरबार था, अगर राज परिवार से अनुरोध होता तो आधे घंटे में हेलिकॉप्टर कञ्चनपुर पहुँच सकता था । इसीलिए वहां मौजूद सेना के आफिसर और डाक्टरों ने राजा महेन्द्र से कहा कि भारतीय सहयोग लिया जाए, रानी रत्न को तत्काल दिल्ली पहुँचाना चाहिए, यह जरुरी है । लेकिन राजा महेन्द्र ने दिल्ली से सहयोग लेने की बात को अस्वीकार किया । उन्होंने जिद ठान ली कि जैसे भी हो काठमांडू ही ले जाना चाहिए । इसी जिद के साथ उन्होंने कहा– ‘मैं दिल्ली जाने की बात से असहमत हूं । गोली निकालने के लिए जो आप्रेशन करना चाहिए, यह तो आप लोग ही कर पाएंगे । जहां तक काठमांडू में ‘नाइट–ल्याण्डिङ’ की बात हैं, वह भी सम्भव है । नेपाली सेना ‘मसाल’ जला कर उसकी प्रैक्टिस कर चुकी ही है । आज भी मसाल जला कर ही ल्याण्डिङ करना है ।’
बाद में मुझे पता चला कि राजा महेन्द्र ने राष्ट्र प्रति के स्वाभिमान के कारण इस तरह की बात की थी । तत्कालीन अवस्था में राजा महेन्द्र और भारत के बीच अच्छा सम्बन्ध नहीं था । इसीलिए उनको लगा कि अगर ऐसी हालत में मैं भारत से सहयोग मांग करता हूं तो भारत हरदम नेपाल को अपमानित करता रहेगा । दिन ३–४ बजे के समय में रानी को गोली लगी थी । राजा महेन्द्र के कारण ही उनको दिल्ली नहीं ले गया । लगभग १२–१३ घण्टा के बाद रात ३ बजे रानी को ‘भस्काइ–भ्यान’ के सहयोग से काठमांडू लाया गया । उसके बाद आप्रेशन हुआ, गोली निकाली गई । मैं भी उपचार में संलग्न था । रानी रत्न के शरीर में ३ जगहों में छेद हो गया था ।

 डाक्टरों के प्रति दरबार की उदारता !
दूसरी अविस्मरणीय घटना भी है । यह पूर्वी नेपाल की बात है । नेपाल में राजनीतिक आन्दोलन शुरु हो चुका था । कम्युनिष्ट लोग अपने विचार विरोधी समूह रहे लोगों का सिर छेदन करते थे । शायद तत्कालीन समय में उस समूह को ‘माले’ समूह से जाना जाता था । इसीलिए उस पार्टी को ‘सिर–छेदन करनेवाली पार्टी’ कहकर भी लोग जानते थे । उस आन्दोलन में सहभागी अधिकांश नेता आज नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (नेकपा) में हैं । वर्तमान प्रधानमन्त्री केपीशर्मा ओली उसी समूह के सदस्यों में से एक हैं ।
पूर्व नेपाल में रहनेवाला एक जनजाति समुदाय है, जिस को हम लोग ‘राजवंशी’ समुदाय के रूप में जानते हैं । राजवंशी समुदाय के ही एक व्यक्ति थे, जो स्थानीय स्तर तथा उक्त समुदाय के लिए चर्चित नेता थे, वह भी आन्दोलन में शरीक थे । लेकिन एक बार वह बहुत बीमार पड़ गए । उपचार के लिए काठमांडू लाया गया । हथकड़ी के साथ उसको वीर अस्पताल पहुँचाया गया, चारों ओर सैनिक तैनात थे । अस्पताल में बेड पर रहते वक्त भी उनके पैर पर हथकड़ी लगाई गई थी । लेकिन उसकी अवस्था नाजुक थी, भागने के लिए उसके शरीर में ताकत नहीं थी । ऐसी नाजुक अवस्था देखकर मैंने कहा– ‘यह तो अन्याय है, हथकड़ी में बांध कर उपचार नहीं हो सकता, खोल दिया जाए ।’ लेकिन उनके सुरक्षा में परिचालित सुरक्षाकर्मी ने हथकड़ी खोलने के लिए इनकार किया । बात दरबार तक पहुँच गई । दरबार ने कहा कि जो डाक्टर कहते हैं, उस को मान लिया जाए, उसके बाद हथकड़ी खोल दिया गया । हम लोगों ने उपचार कर उसको ठीक किया । इस घटना से स्पष्ट होता है, उस समय छोटी–सी छोटी बात के लिए भी दरबार की अनुमति लेना अनिवार्य था ।
इसीतरह राजा त्रिभुवन की सबसे छोटी पत्नी ईश्वरी राज्यलक्ष्मी (राजा वीरेन्द्र की छोटी ग्राण्डमदर) के साथ जुड़ी हुई एक घटना को भी स्मरण करना चाहता हूँ । उनके लिए डाक्टर मैं ही था, ईश्वरी हॉर्ट की मरीज थी । एक दिन ईश्वरी जी ने मुझसे कहा– ‘डाक्टर साहब ! राजा वीरेन्द्र (बेटा) ने मुझसे कहा है कि वह हेलिकॉप्टर चढ़ाकर मुझे गोसाइकुण्ड ले जाना चाहता है । कह रहा है कि हेलिकॉप्टर वह खुद चलाएंगे ।’ उस समय राजा वीरेन्द्र हेलिकॉप्टर चलाना सीख भी रहे थे । वह अपनी ग्राण्डमदर को लेकर गोसाइकुण्ड जाना चाहते थे । लेकिन उसके लिए डाक्टर की अनुमति लेनी जरुरी थी । इसीलिए मुझे फोन आया था । मैंने कहा– ‘यह तो असम्भव है, आप हार्ट के मरीज हैं, गोसाइकुण्ड की हाइट इतनी ऊंचाई पर है, जहां आप नहीं जा सकते हैं ।’ उन्होंने फोन रख दिया । कुछ समय के बाद राजा वीरेन्द्र के एडीसी (मल्ल जरसाहेब) ने फोन किया । उन्होंने कहा– ‘आप ने राजा के हुकुम को इन्कार किया है, जैसे भी हो राजा अपने ग्राण्डमदर को गोसाइकुण्ड ले जाना चाहते हैं, आप भी चलिए । मैंने जबाव दिया– ‘हुकुम तो आया है, लेकिन मैं जाने के लिए सुझाव नहीं दे सकता, उस तरह का जोखिम लेना मैं नहीं चाहता हूं ।’ फिर उन्होंने कहा कि आक्सिजन सिलिण्डर लेकर जाना है । उस बात को भी मैंने इन्कार किया । दरबार तक बात पहुँच गई । बाद में वही मल्ल जरसाहेब ने फोन किया और कहा– ‘बधाई है, डाक्टर साहेब ! आपकी बात ही सदर हो गई । इसतरह की कई घटना और अनुभव मेरे पास है ।
कभी–कभार अनावश्यक दबाव का भी सामना करना पड़ता था, जो डाक्टरी सेवा को ही प्रभावित कर देता था । राजा और राजपरिवार के सदस्यों की ओर से ही नहीं, दरबार में काम करनेवाले सामान्य से सामान्य कर्मचारी भी अपने को ‘दरबारिया कर्मचारी’ बताते हुए हम लोगों को धमकी देते थे । वि.सं. २०३६ साल आसपास की बात है । राजनीतिक आन्दोलन जारी ही था । उस समय मैं हफ्ता में ३ दिन ईमरजेन्सी वार्ड देखता था । जिस दिन इमरजेन्सी वार्ड की जिम्मेदारी रहती थी, उस दिन रात १०–११ बजे भी अस्पताल जाना पड़ता था । एक दिन मुझे रात ११ बजे अस्पताल जाना पड़ा । एक मरीज की अवस्था नाजुक थी, जब मैं इमरजेन्सी वार्ड में प्रवेश किया, तब मेरे नाम लेकर हल्ला होने लगा । मेरे विरुद्ध बोलनेवाले लोग ऊंचे स्वर में कह रहे थे कि मेरे ऊपर मारपीट होनी चाहिए । सिर्फ मुझे ही नहीं, अन्य डाक्टरों के विरुद्ध भी इसतरह की आवाज आ रही थी । हल्ला करनेवालों में से एक कह रहा था कि वह इन्टेलिजेन्स ब्युरो (दरबार) में काम करनेवालों में से हैं । उस समय तो मुझे उसका नाम भी पता था, लेकिन आज याद नहीं है ।
उस समय पुष्पराज नाम के एक व्यक्ति दरबार में बडा काजी (राजदरबार के सबसे बड़ा पदाधिकारी) थे, उन को मैं करीब से जानता था । इस घटना के बारे में मैंने उनसे बात की । वो उसका नाम लेकर गया । कुछ दिन बात पता चला कि उस को दरबार (नौकरी) से निकाल दिया गया । कहने का मतलब है कि अगर कहीं से सही सूचना दी जाती थी तो दरबार तत्काल एक्सन में उतर आता था । लेकिन दरबार की एक कमजोरी थी । वह यह है कि वहां सही सूचना ही नहीं पहुँच पाती थी । राज संस्था अन्त होने के पीछे यह भी एक कारण है । इसमें राजाओं की भी कमजोरी है ।
उदाहरण के लिए हम लोग अन्तिम राजा ज्ञानेन्द्र शाह को ही ले सकते हैं । राजा वीरेन्द्र की हत्या होने के कुछ समय के बाद उन्होंने सत्ता अपने हाथ में लिया, राजनीतिक दल तथा प्रजातन्त्र के विरुद्ध ‘कू’ किया, लेकिन इसकी क्या जरुरत थी ? इस तरह का कदम उठाना आवश्यक ही नहीं था । लेकिन सूचना और सलाह देनेवाले व्यक्ति गलत होने के कारण ही उन्होंने ऐसा किया । परिणामतः राजसंस्था को ही नेपाल से हाथ धोना पड़ा ।
राणा प्रधानमन्त्री चन्द्र शमशेर के सवाल में यह बात लागू नहीं होती थी । अगर किसी के विरुद्ध चन्द्र शमशेर के सामने किसी प्रकार की शिकायत पहँुचती थी तो वह खुद उसके बारे में अनुसंधान करने लगते थे । सूचना सही है या नहीं ? पता लगाने के लिए वह कम से कम ४–५ व्यक्ति गोप्य रूप में परिचालित करते थे । चारों ओर से दोषी प्रमाणित होने के बाद ही, वह एक्सन लेते थे । उनका मानना था कि निर्दोष व्यक्ति पर कोई कारवाही ना हो । लेकिन अन्य राणा प्रधानमन्त्री में इसतरह की खूबी नहीं थी ।
हमेशा सत्ता का दुश्मन
वैसे तो मैं हरदम सत्ता के लिए विद्रोही ही रहा । क्योंकि मैं अन्याय नहीं देख सकता । मैंने यह देखा और अनुभव किया है कि जो भी पार्टी और व्यक्ति सत्ता में पहुँचते है तो उसमें दम्भ भर जाता है और वह अन्याय करने लगता है । आप एक बात पर गौर करते हैं तो पता चलता है कि मैंने हरदम किसी न किसी पार्टी के निकट रहकर काम किया है । एक समय मैं राजपरिवार अर्थात् दरबार के निकट रहा, लेकिन वि.सं. २०३६ साल की जनमत संग्रह में मैंने बहुदल के पक्ष में वोट ही नहीं दिया, बल्कि राजा और सक्रिय राजतन्त्र के विरुद्ध अभियान ही संचालन किया । क्योंकि मुझे पता था कि उसके भीतर क्या होता है । इसीलिए मैंने अन्याय के विरुद्ध लगने का निर्णय किया । इसीतरह एक समय मैंने नेकपा एमाले निकट रहकर काम किया । क्योंकि एमाले अन्याय के विरुद्ध काम कर रहा था और उसको राजनीतिक मूलधार में भी लाना था । साथ में एमाले को प्रजातन्त्र के प्रति प्रतिबद्ध बनाना भी था । इसीलिए मैंने एमाले निकट रहकर काम किया । जब एमालेसत्ता में पहुँच गई तो वह भी अन्याय करने लगी । इसीलिए मैं उससे दूर होने लगा । इसीतरह एक समय ऐसा भी था, जिस समय मैं माओवादी के पक्ष में वकालत करता था । मुझे पता था कि माओवादी अन्याय के विरुद्ध लड़नेवाली राजनीतिक शक्ति है । लेकिन जब माओवादी सत्ता में पहुँच गई तो स्वयम् पीड़क बनने लगा । इसके बाद मेरा रुख माओवादी के विरुद्ध हो गया । कुछ लोग होते हैं कि मित्र शक्ति सत्ता में पहुँचने के वाद सत्ता की सहायता से कुछ न कुछ लाभ प्राप्त करते हैं, लेकिन जब मेरी मित्र शक्ति सत्ता में पहुँचती है तो मैं उसके विरुद्ध में हो जाता हूँ । क्योंकि मुझे लाभ प्राप्त करने की कोई भी अभिलाषा और स्वार्थ नहीं है । संक्षेप में कहें तो मैं सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी के सहयोगी के रूप में नहीं, नागरिक समाज के अगुवा के रूप में रहा । वि.सं. २०६२–०६४ साल में हुए जनआन्दोलन में मुझे एक जुझारु नागरिक अगुवा के रूप में लोग पहचानते थे । सही को सही और गलत को गलत कहने की खुशी मेरे अन्दर है, यही कारण मैं हरदम सत्ताधारियों के लिए दुश्मन बन जाता हूं । इसमें मुझे किसी से कोई शिकायत भी नहीं हैं, क्योंकि मैं सत्य के पक्ष में बोलता हूँ ।

सामाजिक कार्य
मैंने ‘सई समाज सेवा निधि’ नामक एक ट्रस्ट खोला है । ट्रस्ट की ओर से विभिन्न सामाजिक कार्य संचालित होता आ रहा है । ट्रस्ट की पूँजी करीब ५० लाख की है, उससे प्राप्त ब्याज से हम लोग समाजसेवा का काम करते हैं । ‘जगदम्बा मेडिकल गुठी’ नामक दूसरी संस्था भी है । उस संस्था की ओर से डाक्टरी सेवा संबंधी काम किया जाता है । इसीतरह ‘केबी सेवा सदन गुठी’ नामक एक और संस्था भी है, जो मेरे माता–पिता के नाम से शुरु किया गया है । इस संस्था की ओर से भी सामाजिक कार्य होता आ रहा है । पिछली बार हम लोगों ने धादिङ जिला स्थित एक गांव में चेपाङ बालबालिकाओं की शिक्षा के लिए सहयोग किया है । इसीतरह भरतपुर चितवन में शहीद स्मारक नामक एक मावि स्कूल है । तत्कालीन एमाले नेता नरबहादुर खाँड ने उक्त स्कूल शुरु किया था, जो बहुत पुराना भी है । उक्त स्कूल के लिए हर साल सहयोग करते आ रहे हैं । इसीतरह देवघाट में एक क्लिनिक सञ्चालित है, जो निःशुल्क है । भरतपुर और देवघाट में हमारे द्वारा प्राप्त स्कॉलरशिप से कुछ विद्यार्थी पढ़ रहे हैं । विशेषतः शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में हम लोग काम करते हैं । बालबालिका और आर्थिक रूप में कमजोर समुदाय हमारी प्राथमिकता में पड़ते हैं । विभिन्न स्थान में मठ–मन्दिर भी निर्माण किए गए हैं ।

मेरी कमजोरी !
जीवन के प्रति मुझे कोई भी पश्चाताप नहीं है । मेरी दृष्टिकोण से आज तक मैंने जानकार कोई भी गलती नहीं की है । अनजान में कुछ हो गया होगा ! लेकिन उसके बारे में मुझे अभी पता नहीं है । हां, जानकर कुछ गलती किया है, जो आज भी करता हूं जैसे कि उपचार के लिए मेरे क्लिनिक पर बहुत सारे मरीज आते हैं । अपनी क्षमता के अनुसार मैं उन लोगों के लिए काम करता हूं । कई रोग तथा समस्या इस तरह जटिल होती है, जो जल्दी ठीक नहीं होती है । ऐसी अवस्था में कई मरीज ऐसे होते हैं, जो मेरे यहां से निकल जाते हैं और अन्यत्र जगहों में पहुँचते हैं । डाइग्नोसिस, औषधि सभी परिवर्तन करते हैं । और २–३ साल के बाद पुनः मेरे सामने आकर कहते हैं कि आप ही उपचार कर दीजिए । लेकिन उन लोगों को मैं उपचार के लिए इन्कार करता हूँ । कह देता हूं– ‘माफ कीजिए, मेरा और आप का ग्रहदशा ठीक नहीं है, इसीलिए मैं आप को उपचार करने में असमर्थ हूं ।’ सिर्फ सामान्य नागरिकों के लिए ही नहीं, चिरपरिचित लोगों के लिए भी मेरा जबाव यही रहता है । मुझे पता है कि मेरे द्वारा ऐसा कहने से उन लोगों को चोट पहुँचती है । कई मरीज तो रोते हुए लौट जाते हैं । ऐसी अवस्था में मैं सोचता हूं कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था । लेकिन आज भी कर रहा हूं । सिर्फ मरीजों के लिए ही नहीं, समय लेकर मुझसे मिलने के लिए आनेवालें व्यक्ति अगर १ मिनट भी लेट से आते है तो उससे भी मैं नहीं मिलता हूं । मेरे इस निमय को मैंने लिखकर ही रखा है, जो कई लोगों के लिए असरदार होता है ।

डाक्टर नहीं तो मैं साधु बन जाता
बाल्यकाल में ही मेरे अन्दर एक छाप पड़ गया– मुझे डाक्टर बनना है । लेकिन आज आकर लगता हैं कि अगर मैं डाक्टर नहीं बन पाता , तो आप मुझे एक साधू के रूप में पाते । क्योंकि संसारिक जीवन के प्रति मेरा ज्यादा मोह नहीं है । जब अपने पिता–पुर्खा, हमारी धर्म–संस्कृति, आध्यात्मिक चिन्तन आदि के बारे में सोचता हूं तो साधु बनने के लिए प्रेरित हो जाता हूं । मुझे लगता है कि आदमी जितना भी बड़ा उद्योगपति, राजनीतिज्ञ तथा प्रशासक क्यों ना हो, लेकिन उसके जीवन के लिए आधारभूत और अत्यावश्यक पक्ष अध्यात्म ही है । अगर जीवन में अध्यात्मिक पक्ष नहीं है तो वह जीवन खोखला हो जाता है, सिर्फ दिखावा के लिए बन जाता है । अध्यात्मिक चिन्तन से बाहर रहकर राज्य शक्ति और पैसा के पावर में रहनेवाले व्यक्ति अगर वहां से गिर कर सड़क में आ जाते हैं तो वह महसूस करता है कि जीवन समाप्त हो गया । इसीलिए अध्यात्मिक चिन्तन और ज्ञान के अनुभव के बिना प्राप्त पैसा और पावर से खुशी मिलने की सम्भावना नहीं है ।
मैं डॉ. सुन्दरमणि दीक्षित, मेरी इच्छा अनुसार मैंने इस धरती में जन्म नहीं लिया । अर्थात् मुझे जो माता–पिता मिले, उसका चुनाव मैंने नहीं किया । डॉ. उपाधि तो बाद में प्राप्त हुआ है । मेरे लिए दीक्षित परिवार ही क्यों चुना गया ? यह सब मैं नहीं जानता । अगर यह सब मेरी इच्छा के मुताबिक होता तो मैं इससे भी बड़ा खानदान में जन्म ले सकता था, अथवा इससे कमजोर परिवार में भी मैं जन्म ले सकता था । मेरा जन्म क्यों और किस के गोद में होना है, यह हमारे बस की बात नहीं है, दूसरी बात जन्म के बाद मृत्यु भी निश्चित है । इसीलिए इस धरती में हम लोग कुछ दिनों के मेहमान हैं । मेरी मृत्यु कब और कैसे होगी, इसके बारे में भी मैं अनभिज्ञ हूं । अगर ऐसा हैं तो आखिर मैं कौन हूं ? यही चिन्तन व्यक्ति को अध्यात्म की ओर खींचता है । अगर कोई व्यक्ति क्षणभर के लिए ही सही, मृत्यु के बारे में चिन्तन करता हैं तो उसके हाथों अपराध होने की सम्भावना अधिक कम रहती है । इस तरह का चिन्तन हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी आ ही जाता है । जिस वक्त यह चिन्तन आता है, उसी वक्त जीवन को अध्यात्मिक मार्ग पर ले जाना चाहिए, नहीं तो जीवन डूब भी सकता है । अर्थात् आप जहां हैं, जिस पेशे में हैं, आपका पेशा दैविक नहीं, राक्षसी बन सकता है, जो समाज, देश और मानव जाति के लिए ही घातक है ।
मैं अपने अनुभव से कहता हूं कि आध्यात्म हर मानव के लिए प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिए । मेरी पढ़ाई मेडिकल डाक्टर बनने के लिए रही । इसीलिए मेरी प्रथम प्राथमिकता और उद्देश्य डाक्टर बनने के लिए थी । मेरे पास मातृभूमि के प्रति श्रद्धा भी थी, इसीलिए देश में ही सेवा की । आध्यात्म अर्थात् मुक्ति मेरी तीसरी प्राथमिकता रही । लेकिन आज महसूस कर रहा हूं कि मैंने गलती की । क्योंकि मेरी प्रथम प्राथमिकता और उद्देश्य आध्यात्म होनी चाहिए थी, आध्यात्मिक जग निर्माण के लिए मुझे अध्ययन और काम करना चाहिए था । उसके बाद ही अपने पेशा और मातृभूमि के प्रति चिन्तित रहना चाहिए था । अगर हमारी आधारभूत प्राथमिकता आध्यात्म हो जाती है तो कोई भी पेशा और व्यवसाय राक्षसी नहीं बन सकता, मातृभूमि के प्रति सेवा भी सही और स्वार्थरहित हो जाता है । अगर पेशे से आध्यात्म को निकाल दिया जाता है तो हर वकील राक्षस बन जाता है, अपने फायदे के लिए वह कुछ भी कर सकता है, डाक्टरों की अवस्था भी यही है । अगर डाक्टरों में आध्यात्मिक चिन्तन नहीं रहेगी तो उनकी प्राथमिकता मरीजों का उपचार नहीं, मरीजों से कैसे अधिक पैसे कमाया जाया, उसकी ओर होता है । यही सोच उसको राक्षस बना देता है, ‘हिप्पोक्रेसी’ बना देता है । शिक्षक, राजनीतिज्ञ तथा उद्योगपति सभी की अवस्था यही है । अर्थात् अध्यात्मिक चिन्तन के बिना होनेवाला हर पेशा और व्यवसाय दैविक नहीं, राक्षसी बन जाता है, मैं यह देख रहा हूँ ।
इसीलिए मृत्यु परम सत्य है, उसको वश में करना हमारे वश की बात नहीं हैं । जो भी कमाते हैं, मृत्यु के बाद वह भी साथ में नहीं ले पाते हैं । अगर इतना ज्ञान हो जाता है तो हमारा हर पेशा सेवा में रूपान्तरण हो जाता है । सुबह–सुबह २ घण्टा लगाकर पूजा–पाठ करना और अपने पेशा में लगने के बाद उसकी मर्यादा से बाहर निकल कर सिर्फ पैसो के लिए काम करना, आध्यात्मिक होना नहीं है । मुझे यहां रामकृष्ण परमहंश (स्वामी विवेकानन्द के गुरु) का एक कथन याद आ रहा है । उन्होंने कहा है– ‘जिन लोगों को हम लोग पण्डित के रूप में जानते हैं, वे लोग पण्डित नहीं हैं । हां, वे लोग स्त्रोत पाठ करते हैं, ज्ञान–गुण और विद्या के बारे में प्रवचन भी देते हैं, लेकिन उनका चरित्र आकाश में उड़ने वाले ‘गिद्ध’ की तरह होता है । ‘गिद्ध’ जितनी भी ऊँचाई पर हो, उसकी आंख जमीन में रहे सड़े हुए मांस की ओर ही रहता है । मानव जीवन में सड़ा हुआ मांस का मतलब पावर, पैसा, यौन–सुख आदि हैं । हमारे यहां जो भी पण्डित हैं, अधिकांश तो वहीं गिद्धÞ है ।’ उनकी कथन में मैं सच्चाई देखता हूं ।
इसीलिए यहां मैं कुछ कहना चाहता हूं– इस जन्म में हम लोग नेपाली नागरिक के रूप में हैं । कम से कम हमारा कर्म नेपाल देश के लिए होना चाहिए, जिससे हम लोग सुख और शान्ति की अनुभूति भी कर सकते हैं । दूसरी बात, मैं हरदम भगवान से यही प्रार्थना करता हूं कि हे भगवान मेरे पास जो भी है, उसमें मुझे सन्तुष्टि प्रदान करें । संक्षेप में कहे तो जीवन में खुश रहने के लिए आप के पास जो कुछ हैं, उसमें सन्तुष्ट रहना चाहिए और आप अपने हर प्रयास से दूसरों को भी खुश रखने का प्रयास करें । हमारा यही प्रयास खुद के लिए भी सुखी और खुशी का अनुभव देता है । इसका मतलब यह नहीं है कि आप जीवन में कुछ भी प्रयास न करें । जीवन में ऊँचें स्थान में पहुँचना है, सम्मानित व्यक्ति बनाना है, बहुत सारा पैसा कमाना है, इस तरह का लक्ष्य तो होना ही चाहिए । लेकिन उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आप के हाथों से कोई भी अपराध नहीं होना चाहिए । अर्थात् जीवन को आध्यात्म से दूर रखना नहीं चाहिए और राष्ट्र ही मेरे लिए सर्वोपरि है, ऐसी मान्यता हरदम रहनी चाहिए । जो आप को खुशी प्रदान करती है, आप को आध्यात्मिक बना देती है ।

प्रस्तुतिः लिलानाथ गौतम

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