Wed. Sep 26th, 2018

भगवान शिव अनादि देवता हंै, ये अत्यन्त महिमाशाली एवं रहस्यमय देव हैं । शिव अपनी भक्तप्रियता, दयालुता, सर्वकल्याणकारिता आदि के रूप में हमारे सामने अति प्रसिद्ध हंै और सर्वदा रहेंगे ।
देव प्रतिमाओं का धर्म से बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है । शिव प्राचीन देवों में सबसे प्राचीन है । प्राचीन सभ्यता के जो अवशेष भूगर्भ खुदाई में प्राप्त हुए है, वे शिवलिंग एवं शिव से सम्बन्धित प्रतिमाएं ही है । मोहन जोदड़ो से प्राप्त मुहर पर शिव की ही मूर्ति है । इस में पशुपतिनाथ शिव पशुओं से घिरे हुए है । सिन्धु घांटी के लोग लिंग पूजा से परिचित थे । वैद्धिक रुद्र ही शिव के स्वरूप हैं । संधोजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष एवं ईशान शिव के ये पाँच रूप हैं । महाकाव्यों के युग में शिव की उपासना लोकप्रिय हो चुकी थी । उज्जन के आहत सिक्को में शिव लिंगोम्दूव मानव रूप में दृष्टिगोचर होते हैं । भारतीय कला में शिव–प्रतिमाओं का वर्गीकरण इस प्रकार हुआ है ।
१. रूप–प्रतिमा, २. लिंग–प्रतिमा
रूप प्रतिमाओं में शान्त या सौम्य मूर्तियां और रूप प्रतिमाओं में शान्त या सौम्य मूर्तियां और लिंग प्रतिमाओं में अशान्त या उग्र मूर्तियां आती है ।
इन मूर्तियों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है– अनुग्रहः मूर्तिया शिव का कल्याणकारी शान रूप प्रदर्शित करती है । अनुग्रह मूर्तियों में एक हाथ को अग्य और दूसरे को वरद मुद्रा में बतलाया जाता है । शिव अपने भक्तों को वरदान देते हैं । इस की यह विशेषता होती है कि भक्त की कथा भी इस में पत्थरों में विशेषता के साथ उकेरी गयी है, अनुग्रह, मूर्तियाँ शिव की कई प्रकार की है, जैसे– १. विष्णु–अनुग्रह, २. किरातर्जुनीय–अनुग्रह, ३. रावणनुग्रह, ४. चण्डेस–अनुग्रह, ५. विध्नेश–अनुग्रह ।
विष्णु–अनुग्रह मूर्ति में शिव की कृपा से अुसरों के वध के लिए विष्णु को चक्र प्राप्त करते दिखाया गया है । विष्णु ने पूजा में एक कमल घट जाने पर अपना एक नेत्र निकालकर शिव को अर्पित किया था । यह दृष्टि काजीवरम् के केदारनाथ मन्दिर एवं मथुरा के एक मन्दिर में देखने योग्य है ।
अर्जुन–अनुग्रह मूर्ति में महाभारत के किरात अर्जुन युद्ध की कथा का अंकन हुआ है । अर्जुन ने कौरवों को परास्त करने के लिये घोर तपस्या द्वारा पाशुवत अस्त्र की प्राप्ति की । किरात भेषधारी शिव से अर्जुन का युद्ध हुआ था ।
रावण–अनुग्रहमूर्ति में कुबेर को जीत कर रावण जब लंका लौट रहा था, उस समय का चित्रांकन है । रावण ने अपनी बीसों भुजाओं से पर्वत उखाड़ने की कोशिश की और पर्वत उठा लिया । घबराकर भगवती उमां शिव से लिपट गयी । शिवजी ने अपने पैर के अंगुठे से न केवल पर्वत को दबाया बल्कि रावण को भी उसके नीचे दवा दिया । रावण की आंखें खुली । उसने एक हजार वर्ष तक रोते हुए शिव की आराधना की । इसी कारण से उसका नाम रावण पड़ा । यह मूर्ति एलोरा के दशावतार मन्दिर में प्राप्त होती है ।
चण्डेश–अनुग्रह मूर्ति का सम्बन्ध दक्षिण भारत के चोल देश के एक गांव के निवासी यज्ञदत के पुत्र विचारशमा चण्डेश्वर अनुग्रह से है । पिता द्वारा बालू के शिवलिंग पर पैर मारने पर शिव का अपमान न सहकर उसने पिता का पैर कुल्हाड़ी से काट दिया । शिव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिया एवं अपने गणों में प्रमुख स्थान दिया । शिव की प्रथम चण्डेस अनुग्रह मूर्ति चोलपुरम मन्दिर में है । इसी मूर्ति का दूसरा मौलिक नमूना कांजीवरम के कौलाशनाथ मन्दिर में है । भगवती उमा ने इस पर वात्सल्य प्रकट किया है ।
पौराणिक मूर्ति के अन्तर्गत गंगाहार मूर्ति एवं अधिनारीश्वर की मूर्ति आती है । एलोरा एलीफेण्टा तथा बदनामी के गुफा मन्दरों में यह मूर्ति मिलती है ।
कल्याण सुन्दर मूर्ति में शिव पार्वती के विवाह से सम्बद्ध अनेक दृश्यों को दिखलाया गया है । इस मूर्ति में शिव–पार्वती का हाथ पकड़े हुए दिखाये गए है । एलिफेण्ट एवं एलोरा के देवालयों में देखने योग्य है ।
लिंगोंदम्ब मूर्ति में ब्रह्मा एवं विष्णु के सृष्टि निर्माणकर्ता होने के विदायक तत्व को बताया गया है । उस में एक स्तम्भ के माध्याम से शिव की प्रतिष्ठा बताई गयी है । ब्रह्मा हंस पर एवं विष्णु कच्छप के रूप में उस शक्ति का पता लगाने में असफल रहे यही भारत के शिला में लंगादम्ब मूर्ति कहलाती है । इसके अलावा चन्दशेषर मूर्ति, आदि । सुखाशन मूर्ति में शिव उमा सहित आसन में विराजमान है ।
सम्पूर्ण भारत वर्ष शिवमय है, शिव आदि अनादि देवता है । स्थान–स्थान पर वे शिवलिंग के रूप में प्रकट होकर भक्तों को कल्याण करते हैं ।
और देवों की तुलना में इनकी पूजा करना आसान है क्योंकि और देवों को सम्पूर्ण सामग्री होना ही चाहिए लेकिन हमारे भोलेनाथ शंकर सचमूत भोलेभाले हैं । कारण इनकी पूजा में खास द्रव्य की जरुरत नहीं देखते है । जल, भष्म, वेलपत्र, अगर कुछ न ही है तो ये तीन वस्तु से भी भोलेनाथ प्रसन्न रहते हैं । अगर भष्म बेलपत्र भी नहीं है तो एक लोटा जल देने से भी होगा । एक शास्त्र में उनकी स्तुति इस प्रकार की गई है–
हे शम्भो महेश करुणामय शुलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशनि । काशिपते करुणया जगदेतदेक स्त्वं हंसि पासि विध्यासि महेश्वरोअसि । त्वत्ता जगम्दवति देव भव स्मरारे त्वह्ेव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ ।
त्वध्येव गच्छति लय जगदेतदीश लिंगात्मक हर चराचर विशवरुपिनन् ।
हे शम्मो ! हे महेश ! हे करुणामय ! हे शूलपाणे !
हे गौरीपते ! हे पशुपते ! हे पशुपाशनाशिन !
हे काशिपते ! आप ही अपनी अपार करुणा से इस जगत की सृष्टि करते हैं, इसका पालन करते है और इसका संहार करते है । आप देवों के भी देव महादेव हैं । हे दव ! हे सब आप से ही जगत की उत्पति होती है । हे स्मराहे ! आप से ही जगत की प्रतिष्ठा (स्थिति) है और हे मृड ! हे विश्वनाथ ! यह जगत अन्त में आप में ही लीन भी हो जाता है ।
हे. ईश ! हे हर ! हे चराचर विश्वरुपनि !
आप लिंगात्मक बाबा वैद्यनाथ सबों को नमस्कार है !
शिव शिव जपत मन आनन्द, कटत चहुदिस नव फन्द, शिव शिव जपत मन आनन्द ।
इसलिए जो अपना कल्याण हो, उसे सब कुछ छोड़कर केवल भगवान शिव में मन लगा उनकी अराधना करनी चाहिए । जीवन बड़ी तेजी से जा रहा है, यौवन शीघ्रता से बीता जा रहा है और रोग तीव्र गति से निकट आ रहा है, इसलिए सब को पिनाकपाणि महादेव जी की पूजा करनी चाहिए । जब तक मृत्यु नहीं आती, तब तक वृद्धावस्था का आक्रमण नहीं होता और जब तक इन्द्रियों की शक्ति क्षीण नहीं हो जाती है, तब तक ही भगवान शंकर की आराधना करे । भगवान शिव की आराधना के समान दूसरा कोई धर्म तीनों लोक में नहीं है ।

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