Sat. Apr 20th, 2019

धर्म जीवन को संयमित करता है : श्वेता दीप्ति

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एकवर्णं यथा दुग्धं भिन्नवर्णासु धेनुषु ।
तथैव धर्मवैचित्त्यं तत्वमेकं परं स्मृतम् ।।
आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् ।
सर्व देव नमस्कारः केशवं प्रति गच्छति ।।

(सम्पादकीय) हिमालिनी, अंक फेब्रुअरी 2019 | अर्थात् जिस प्रकार विविध रंग रूप की गायें एक ही रंग का (सफेद) दूध देती है, उसी प्रकार विविध धर्मपंथ एक ही तत्व की सीख देते है । आकाश से गिरा जल विविध नदियों के माध्यम से अंतिमतः सागर से जा मिलता है उसी प्रकार सभी देवताओं को किया हुआ नमन एक ही परमेश्वर को प्राप्त होता है । सभी पंथ ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बताते हैं, सदाचार सिखाते हैं, नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं और ईश्वर एक हैं यह सीख देते हैं हाँ इनकी पद्धतियाँ अलग होती हैं । इस सबके बावजूद आखिर धर्मान्तरण का सिलसिला क्यों बढ़ रहा है ? आज धर्मान्तरण का प्रश्‍न एक यक्ष प्रश्‍न बन कर उभरा है । यह सच है कि धर्म को स्वीकार करने के लिए हम स्वतंत्र हैं । परन्तु धर्मान्तरण के मूल में सिर्फ हमारी स्वेच्छा है या अस्वाभिवक दवाब इस प्रश्न का उत्तर आज खोजना लाजिमी हो गया है ।

ईसाई धर्म में होने वाला धर्मान्तरण किसी पूर्व गैर ईसाई व्यक्ति का ईसाइयत के रूप में होनेवाला धार्मिक परिवर्तन है, स्वाभाविक रूप से किसी का सच्चा धर्मान्तरण बल पूर्वक नहीं किया जा सकता, अधिकांश ईसाइयों का विश्‍वास है कि धर्म परिवर्तन जिसे ईसा मसीह के वचनों व कर्मों में धर्मोंपदेश को साझा करने के रूप में समझा जाता है, ‘न्यू टेस्टामेन्ट’ के अनुसार ईसा ने अपने शिष्यों को सभी राष्ट्रों में जाने व शिष्य बनाने का आदेश दिया था । जिसे सामान्यतः ‘ग्रेट कमीशन’ के नाम से जाना जाता है, ईसाई धर्म में धर्मान्तरण की प्रक्रिया में ईसाई सम्प्रदायों के बीच कुछ अन्तर है जैसे कैथोलिक और प्रोटेस्टेन्ट में से अधिकांश प्रोटेस्टेन्ट मोक्ष प्राप्ति के लिये विश्‍वास के द्वारा धर्मान्तरण को मानते हैं, परन्तु ईसाई समुदाय का हर वर्ग ऐसा नहीं मानता । वैसे ही इस्लाम की शिक्षा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मुस्लिम होता है, क्योंकि जन्म लेनेवाले प्रत्येक शिशु का स्वाभाविक झुकाव अच्छाई की ओर और एक सच्चे ईश्‍वर की आराधना की ओर होता है लेकिन उसके अभिभावक और समाज उसे सीधे मार्ग से भटका सकते हैं, जब कोई व्यक्ति इस्लाम को स्वीकार करता है तो ऐसा माना जाता है कि वह अपनी मूल स्थिति में लौट आया है, लेकिन इस्लाम से किसी अन्य धर्म में धर्मान्तरण को स्वधर्म त्याग का घोर पाप माना जाता है और हिन्दुत्व धर्मान्तरण का समर्थन नहीं करता यह स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है कि कोैन व्यक्ति हिन्दू कब बनता है क्योंकि हिन्दू धर्म ने कभी भी किसी धर्म को अपना प्रतिद्वन्द्वी नहीं माना, हिन्दुत्व की एक सामान्य अवधारणा है कि हिन्दू होने के लिये व्यक्ति को हिन्दू के रूप में जन्म लेना पड़ता है, यदि कोई व्यक्ति हिन्दू के रूप में जन्मा है तो वह सदा के लिये हिन्दू ही रहता है । इन तथ्यों के आधार पर धर्म परिवर्तन के कारणों को खोजना और उसका समाधान करना आवश्यक है ।

धर्म अगर जीवन को संयमित करता है तो प्रकृति उसी जीवन की रक्षा करती है जिसमें पाच तत्वों की मुख्य भूमिका रही है । इसी सन्दर्भ में बात करें जल की तो आज इसकी सुरक्षा और संरक्षण का सवाल जीने के लिए आवश्यक होता जा रहा है जहाँ हर चेतनशील प्राणी की सजगता के साथ ही सरकारी संयंत्र की चेष्टा आवश्यक है । नेपाल जलस्रोत का धनी देश माना जाता है इसलिए उसी जल के स्रोत का प्रशोधन, सुरक्षा एवं संरक्षण की ओर सरकार का ध्यान देना आवश्यक है । देश का अस्तित्व टिका होता है देश की अर्थव्यवस्था पर नेपाल के लिए ज्ञात है कि पर्यटन यहाँ अर्थ प्राप्ति का एक महत्तवपूर्ण साधन है, आज यह भी अपेक्षा सरकार और प्रांतीय सरकार से है कि इस ओर उनका ध्यान जाय और इसके विकास की योजनाओं का विस्तार करते हुए ,देश के विकास की सही दिशा निर्धारित की जाय । हिमालिनी का यह अंक ऐसे ही ज्वलंत मुद्दे को समेट कर नए कलेवर के साथ आपके समक्ष उपस्थित है सराहना और सुझाव की अपेक्षा है ।

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