Fri. Apr 19th, 2019

कालजयी भाषा है हिंदी : डॉ. कौशलेन्द्र श्रीवास्तव

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डॉ. कौशलेंद्र श्रीवास्तव
पराशी

हिमालिनी, अंक जनवरी 2019 | हिमालिनी के अगस्त अंक में २ नम्बर प्रदेश की सम्मानित सभासद डॉ. रीना यादव का एक शुभकामना सन्देश पढ़कर मुझे बेहद खुशी हुई थी । जिसमें उन्होंने बड़े गर्व के साथ कहा कि ‘हिन्दी हमारी कालजयी भाषा है, हम सब की आशा और जीवन की परिभाषा है । ’ बहुत ही प्रेरणादायक और यथार्थ है उनका यह उद्घोष । उनके इन मार्मिक शब्दों के साथ मैं यह भी जोड़ता चाहता हूं कि हिन्दी हमारे सम्मान और स्वाभिमान की भाषा है, हमारी एकता और पहचान की भाषा है, हमारी संस्कृति और संस्कार की भाषा है, हमारी आत्मा और अनुराग की भाषा है । डॉ. रीता जी द्वारा हिन्दी को कालजयी भाषा बताना सर्वथा सत्य अभिव्यक्ति है । भारत और नेपाल के इतिहास से इसकी पुरी तरह पुष्टि होती है । इन दोनों देशों की घटनाओं को देख कर हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि जिस किसी कालखंड में जिस किसी भी शासनतन्त्र ने हिन्दी को मारने की कोशिश की वह स्वयं काल का ग्रास बन गया लेकिन हिन्दी नहीं मरी । वह सदैव काल पर विजयी रही ।
भारत में बाहर से आए मुस्लिम शासकों ने लगभग चार सौ वर्ष तक शासन किया और उन्होंने हिन्दी को पीछे धकेल कर अपनी फारसी और ऊर्दू भाषा को आगे बढ़ाया । उनके शासन में हिन्दी के लिए कोई स्थान नहीं रहा । लेकिन उन्ही के जमाने में सूर, तुलसी, कबीर, अनेक महान् स्रष्टा सामने आए औरु अनेक कालजयी काव्यों की रचना करके अपने नाम को अमर कर गए । कालान्तर मुस्लिम शासन समाप्त हो गया, लेकिन हिन्दी समाप्त नहीं हुई । मुस्लिम शासकों का दबदबा और फारसी भाषा का प्रभुत्व उसका कुछ नहीं बिगाड़ सका । हिन्दी जिंदा रही और शान के साथ आगे बढ़ती रही ।

मुस्लिम शासन के बाद भारत में विलायत से आए अंगरेजों का साम्राज्य खड़ा हुआ । उन्होंने अपनी जातीय भाषा अंगरेजी को आगे रख कर उसे ही राष्ट्रभाषा बनाया और उर्दू को दूसरा स्थान दिया । अंगरेजों ने भी हिन्दी को शासकीय मान्यता नहीं दी । सारे संसार के इतिहास से हम पाते हैं कि हरेक देश में उपनिवेशवादी शासकों ने अपने शासित समुदाय पर अपनी भाषा और संस्कृति का बोझ जबरदस्ती लादने का प्रयास किया है । वे अपने राजनीतिक वर्चस्व के साथ ही भाषिक और सांस्कृतिक वर्चस्व भी कायम करने के लिए लालायित रहे हैं । इसलिए उन्होंने दूसरों की भाषा तथा संस्कृति को हेय दृष्टि से देखते हुए उन्हें कुचलने में कोई संकोच नहीं किया । लेकिन भारत में गुलामी के उस माहौल में भी हिन्दी बहुत ही उत्साह और सफलता के साथ आगे बढ़ती रही और दिनानुदिन समृद्ध ही होती गई । राज्य का आश्रित न पाने के बावजूद भी वह निस्तेज नहीं हुई । बल्कि उस विपरीत परिस्थिति में भी हिन्दी के क्षितिज पर रामधारी सिंह दिनकर, मैथिली शरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, जय शंकर प्रसाद, प्रेमचन्द और प्रताप नारायण मिश्र जैसे अनेक युगान्तकारी दिग्गज कवियों और लेखकों का उदय हुआ जो हिन्दी के सम्मान को उच्चतम शिखर तक पहुँचाने में सफल रहे । स्वतन्त्रता की भावना से ओतप्रोत इन सचेत साहित्यकारों ने अपनी सशक्त रचनाओं के माध्यम से जनता में गुलामी के विरुद्ध विशेष जागरण पैदा किया और अपनी संस्कृति, स्वाभिमान और भाषा की चेतना भी जगाई । दो सौ वर्षों तक शासन करने के बाद अँगरेज भी भारत से खत्म हो गए लेकिन हिन्दी खत्म नहीं हुई । और भारत के आजाद होते ही वह राष्ट्रभाषा के सिंहासन पर आसीन हो गई । इस प्रकार हम देखते हैं कि अपने भाषा विस्तार के माध्यम से भारतीयों में मानसिक गुलामी का संस्कार भरने की कूटनीति में अँगरेज असफल रहे, साथ ही भारतीय जनता के हृदय से हिन्दी को हटा देने का उनका प्रयास भी व्यर्थ रहा ।

नेपाल का ताजा उदाहरण भी हमारे सामने है । सन् १९६० में राजा महेन्द्र लोकतन्त्र को खत्म करके देश के तानाशाह शासक बन गए । वे लोकतन्त्र की हत्या के साथ ही हिन्दी की हत्या के लिए भी तत्पर हो गए और हिन्दी को जड़ से ही उखाड़ फेंकने का बीड़ा उठा लिया । उनसे पहले हिन्दी पर किसी भी राजा या शासक ने हमला नहीं किया था । उनके इसी विरोधी मंशा के अनुसार हिन्दी पर विदेशी और अराष्ट्रीय भाषा का अपमानपूर्ण आरोप लगा कर उसके व्यापक बहिष्कार का अभियान सारे देश में शरू कर दिया गया । इस अनुचित दोषारोपण के साथ ही महेन्द्र की सरकार ने बहुत ही कड़ा रुख दिखाना शरू किया । हिन्दी में पत्रपत्रिका निकालने का अधिकार खत्म कर दिया । किसी के लिए भी हिन्दी लिखना या बोलना जुर्म हो गया । सभाओं, बैठकों और आफिसों में हिन्दी बोलने की छूट नहीं रही । हिन्दी में भाषण या बातचीत करना घोर आपत्ति तथा अराष्ट्रीयता और असभ्यता की बात मानी जाने लगी । हिन्दी में भाषण करने या बोलने से लोग डरने और शर्माने लगे । हिन्दी का प्रयोग पाप जैसा हो गया । रेडियो से हिन्दी में समाचार दिया जाना बंद कर दिया गया । हिन्दी के भजन किर्तनों पर भी पाबंदी हो गई । सरकार की ओर से सभी निकायों में हिन्दी का प्रयोग वर्जित कर दिया गया । राजनीतिक तथा सामाजिक संस्थाओं में भी हिन्दी निषेधित हो गई । शिक्षा, संचार तथा व्यापार आदि सभी क्षेत्रों से हिन्दी हटा दी गई । हिन्दी के हर काम और व्यवहार पर प्रतिबंध हो गया । इस तरह हिन्दी की हंसी और खुशी पूरी तरह छीन ली गई । हिन्दी को शत्रु और अपवित्र भाषा मान कर उसके अस्तित्व और आदर को पूरी तरह खत्म कर देने की भरपूर कोशिश हुई । इस तरह पंचायती शासन काल में पूरे तीस वर्षों तक हिन्दी अनेक अपमान और उपेक्षा की यातना सहती हुई एक अछूत भाषा के रूप में जीने के लिए मजबूर रही । हिन्दी की अवमानना और उपहास का यह बहुत ही दर्दनाक दृश्य रहा । किसी भी भाषा विशेष के प्रति ऐसे विचित्र विरोध और कट्टर परहेज का व्यवहार संसार में शायद ही कहीं हुआ हो । लेकिन ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं था क्योंकि हर जगह तानाशाही का शासन सत्यता और उदारता से दूर ही रहा है । संकीर्णता तथा दमन के राह पर चलना उसका स्वभाव होता है ।

हमने देखा कि अधिनायकवादी राजा महेन्द्र द्वारा पैदा की गई वह अन्यायकारी पंचायती व्यवस्था ३० वर्ष से ज्यादा जिंदा नहीं रह सकी और पचास वर्ष के भीतर ही उनके खानदान की पुश्तैनी राजशाही भी खत्म हो गई । उनका वंशानुगत राजतन्त्र ही नदारद हो गया । लेकिन अनेक षडयन्त्रों और प्रहारों के बावजूद हिन्दी नदारद नहीं हुई और ०४६ साल में लोकतन्त्र की पुनःस्थापना के बाद वह फिर से सांस लेने लगी । उसका बंधन कुछ ढीला हुआ । उसी का परिणाम है कि आज हम हिमालिनी जैसी एक सुन्दर, सम्पूर्ण और गौरवपूर्ण पत्रिका पढ़ने का मौका पा रहे हैं । ये सारे उदाहरण सिद्ध कर रहे हैं कि हिन्दी निःसंदेह कालजयी भाषा है और उस में काल से टक्कर लेकर जिंदा रहने की अद्भूत शक्ति है । जो भी आक्रमणकारी शक्ति उसे मारने की कोशिश करती है, वह स्वयं ही मार खा जाती है ।
इतिहासकारों का मानना है कि जब कोई भाषा संकट की स्थिति से गुजर रही हो तो उसके बीज संभाल कर रखने की कोशिश अवश्य करनी चाहिए ताकि अनुकूल स्थिति आने पर वह पुनः अंकुरित और पल्लवित हो सके । इस माने में नेपाल की धरती पर हिन्दी के बीज सुरक्षित रखने में पूर्वी मधेश के सचेत एवं सुयोग्य विद्वानों तथा विदुषियों का प्रयास और परिश्रम बहुत ही प्रशंसनीय रहा है । उनका गौरवपूर्ण योगदान हिन्दी के इतिहास में अमर रहने वाला है ।

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Janakmithilesh chaurasiya Recent comment authors
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mithilesh chaurasiya
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mithilesh chaurasiya

हिन्दी कैसे स्थानीय भाषा को निगल गई इस पर भी रोशनी दीजिए जनाब । केवल हिन्दी वाद से क्या स्थानीय भाषा समाप्ती के ओर नहीं धकेला गया ? इस का भर पाई कौन देगा ? आप के हिन्दी मोह हमारे भोजपुरी, मैथली, अवधि को कैसे निगल गई, इस पर भी रोशनी डालिए सर ।

Janak
Guest
Janak

chaurasiya jee , bhojpuri ke bare me to nahi janta hu ……. lekin maithi bhasha ko kisi ne nahi nigla hai ….. Maithili bhasha ko MAITHILI dukandaro ne luta hai …..

Janak
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Janak

chaurasiya jee , bhojpuri ke bare me to nahi janta hu ……. lekin maithi bhasha ko kisi ne nahi nigla hai ….. Maithili bhasha ko MAITHILI dukandaro ne luta hai …..