Wed. Nov 21st, 2018

-कीर्ति श्रीवास्तव

आज जहां मैं खड़ी हूँ
वहां से सूनी राह दिख रही है
हाँ मैंने ही तो चुनी थी ये राह
हूँ अकेली, पर अकेली मैं नहीं
संग मेरे सपने हैं

सोचा देखूँ कौन हैं मेरे लिए खड़ा
पीछे देखा मुड़कर तो
इंतजार कर रही थी
वही राह जो
आगे नजर आ रही थी
खुद ही सवाल कर बैठी
क्यों हूँ अकेली आज मैं
जवाब भी मेरे पास ही था
मेरे अपनो को मेरे सपने
खोखले लग रहे थे
समय का बदलाव
स्वीकार नहीं था उन्हें
मेरे सपनों को दोषी ठहरा
कटघरे में उन्हें खड़ा कर दिया
और साथ मेरा छोड़ दिया
पर चाँद की रौशनी
संग मेरे चल रही थी
फितरत तो उसकी भी
बदली में छुपने की ही थी
वो भी अंधेरे में छोड़ गई
मैं फिर भी चलती रही
अपने सपनो को पूरा करने के लिए
इस विश्वास के साथ
कि बदली छंटेगी और मेरा चांद
मेरे साथ होगा कभी न कभी
एक नई रोशनी लिए ।

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