Fri. Feb 22nd, 2019

जिजीविषा : आलोक कुमार

radheshyam-money-transfer

 

ये सुइयों की चुभन और
कीमों की जलन ने
भर डाला था मुझमें
विषाद और हताशा
दिखते थे मुझे, बस
सूखे पेड़
रेत पर तड़पती मछलियाँ
झिंझोड़ डाला उसके चँद शब्दों ने
धार के साथ तो तिनका भी किनारा पा लेता है
विपरीत परिस्थिति में साबित करो अपना पुरुषार्थ
क्षितिज पर दिखने लगी है
एक नया प्रकाश ।
जगने लगी है चाहत
कि बंद कर लूँ
मुट्ठियों में आकाश
धार के विपरीत चलकर
किनारा पा लेने की आस ।

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of