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नेपाली भाषा साहित्य और नेपाल में हिंदी की स्थिति : राजकुमार श्रेष्ठ

हिमालिनी, अंक जनवरी 2019 | युगों–युगों से लाखों सैलानियों को अपनी सुन्दरता से मुग्ध करने वाला, अपार शांति की पोखर में डुबोने वाला, आध्यात्मिक चेतना से सींचने वाला देश नेपाल अपनी प्राकृतिक, सांस्कृतिक, धर्मिक एवं ऐतिहासिक संपदाओं के लिए पूरे विश्व में जाना–माना जाता है । पौराणिक काल से ही यह दर्शन और अध्यात्म का केंद्र रहा है । यहाँ के कई देवस्थलों, मार्गों और नदियों के नामों को लेकर कई पौराणिक किवदंतियां पायी जाती हैं । जैविक व भौगोलिक विविधताओं, परम्पराओं का धनी देश नेपाल विश्व में अलौकिक एवं पूण्य है । भगवान गौतम बुद्ध और जानकी माता की जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त नेपाल विश्व में रुद्राक्ष, शालिग्राम और चन्दन का प्रमुख स्रोत भी है । हिंदुओं की आस्था का केंद्र पशुपतिनाथ यहीं अवस्थित है । विश्व का सर्वोच्च शिखर सगरमाथा माउंट एवरेस्ट यहीं है । बारहों महीने लगातार बहने वाली कोसी, गण्डकी, कर्णाली और महाकाली जैसी विशाल नदियाँ यहीं हैं, इसीलिए ब्राजील के बाद नेपाल को पानी का द्वितीय धनी देश भी कहा जाता है ।

घने जंगलों, वन्यजन्तु, खनिज संसाधनों, अनुपम प्राकृतिक दृश्यों के लिए प्रसिद्ध देश नेपाल अपनी भाषा, कला, साहित्य व संस्कृति के लिए भी विश्व में सबसे पृथक है । किसी भी देश की राष्ट्रभाषा उसके इतिहास, वैभव, साहित्य, संस्कृति व सभ्यता का प्रतिनिधित्व करती है । भाषा के बगैर कोई भी देश पूर्णतया स्वतंत्र नहीं हो सकता । किसी भी सार्वभौम सम्पन्न देश की राष्ट्र भाषा में वह शक्ति निहित होती है जो प्रजा को राष्ट्रीय बोध की भावना से बाँधे रखती है । भौगोलिक, सांस्कृतिक, धर्मिक, सामाजिक विविधताओं के बावजूद भी लोगों में सहिष्णु, प्रेम, भाईचारा, बंधुत्व, संगठनिक एक्यबद्धता के सूत्र में जोड़ने की केन्द्रीय भूमिका निर्वाह करती है । नेपाल एक बहु–भाषीय, बहु– जातीय, बहु–संस्कृति एवं परम्पराओं का अनुपम देश है । राष्ट्रीय जनगणना २०११ के अनुसार नेपाल में १२३ भाषाएँ बोली जाती हैं । जो भाषा की हरियाली यहाँ देखने एवं सुनने को मिलती है वह अन्यत्र कहीं नहीं है ।

नेपाल की राष्ट्र भाषा नेपाली है और यह नेपाल के लोगों की संपर्क भाषा के साथ–साथ लगभग पचास प्रतिशत लोगों की मातृभाषा भी है । नेपाली भाषा एक विनम्र, सभ्य और समृद्ध भाषा है । यह भाषा नेपाल के अलावा भारत के सिक्किम, पश्चिम बंगाल, उत्तर–पूर्वी राज्यों आसाम, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड के अनेक लोगों की भी मातृभाषा है । इसके अतिरिक्त भूटान, तिब्बत और म्यांमार के अनेकों लोग भी नेपाली लिखते, बोलते, पढ़ते व जानते–समझते हैं । हिन्दी, संस्कृत, मराठी, कोंकणी, बोड़ो, डोगरी, मैथिली की ही तरह नेपाली भाषा की लिपि भी देवनागरी लिपि है । नेपाल विश्व में मित्रवत व्यवहार करने वाला, शांतिप्रिय व अनुशासित देश है । नेपाली भाषा साहित्य एक चेतनामयी, समृद्ध, परिपक्व, विवेकी, ओजस्वी एवं स्वस्थ साहित्य है । नेपाली भाषा का इतिहास बहुत पुराना है यद्यपि नेपाली भाषा साहित्य का इतिहास इतना लंबा नहीं है । नेपाली भाषा साहित्य का उद्गम अठारहवीं शताब्दी से माना जाता है । नेपाली भाषा के प्रथम कवि के रूप में भानुभक्त आचार्य का नाम लिया जाता है । इसीलिए उन्हें नेपाली भाषा साहित्य के आदिकवि के रूप में जाना जाता है । उनसे पहले का नेपाली साहित्य केवल मौखक एवं श्रुति परंपरा पर आधरित हुआ करता था । ‘ बधु शिक्षा’, ‘ प्रश्नोत्तर’ और ‘भक्तमाला’ आदि इनकी प्रसिद्ध कृतियाँ है । भानुभक्त के काल को भक्तिकाल अथवा भक्ति धारा के रूप में जाना जाता है । आदिकवि भानुभक्त आचार्य ने संस्कृतनिष्ठ अध्यात्म रामायण का नेपाली भाषा में अनुवाद कर नेपाली भाषा साहित्य को एक अतुलनीय योगदान दिया । भानुभक्तकृत रामायण वस्तुतः नेपाली ‘रामचरित मानस’ है । नेपाली भाषा साहित्य में अनुवाद की नींव भी सर्वप्रथम भानुभक्त आचार्य द्वारा ही डाली गयी । उनके द्वारा ही नेपाली भाषा को शक्ति एवं आत्मबोध प्राप्त हुआ । प्रारंभिक नेपाली साहित्य में वार्णिक छंद का आरम्भ भी उन्हीं के द्वारा हुआ । उनकी इस छंदोबद्ध रामायण के कारण ही ‘रामायण’ नेपाली घर–घर में लोकप्रिय हुई । नेपाली साहित्य में भानुभक्तकृत रामायण को सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है–

एक दिन नारद सत्यलोक पुगि गया लोकको गरौं हित भनी ।
ब्रह्मा ताहीं थिया पर्या चरणमा खुसी गराया पनि । 

भानुभक्त के बाद नेपाली भाषा साहित्य में मोतीराम भट्ट का नाम सगौरव लिया जाता है । उनके द्वारा ही नेपाली साहित्य में बंगला, हिन्दी और उर्दू साहित्य का प्रभाव पड़ा जिससे नेपाली भाषा और साहित्य में व्यापकता का प्रसार हुआ । मोतीराम भट्ट की मृत्यु अल्पायु में हुई लेकिन नेपाली साहित्य में उनका बहुत बड़ा योगदान है । वे मूलतः श्रृंगारिक धार के कवि थे । ‘कनक सुंदरी’, ‘प्रियदर्शिका’ ‘गजेन्द्र मोक्ष’ आदि उनकी श्रृंगारिक धार की प्रमुख कृतियाँ हैं । वे प्रकाशक, पत्रकार, नाटककार, जीवनी लेखक, समालोचक, कवि एवं भाषासेवी भी थे । अपने संपादकत्व में गोरखा भारत जीवन नामक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन भी किया । नेपाली भाषा में समालोचना विधा की शरूआत भी मोतीराम भट्ट ने ही की थी । नेपाली भाषा साहित्य के प्रथम गजलकार और जीवनीकार का श्रेय भी उन्हीं को जाता है । मोतीराम भट्ट ने नेपाली जनमानस के समक्ष आदिकवि भानुभक्त आचार्य को पहचान दिलाने का काम किया । भानुभक्त के अप्रकाशित व फुटकर काव्यों को खोज–खोज कर उनकी जीवनी को साकार रूप देने का काम मोतीराम भट्ट ने ही किया । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के प्रभाव से पहले ही नेपाली साहित्य में आधुनिकता का प्रवेश हो चुका था । जब पूरे भारतवर्ष में अंग्रेजी हुकुमत कायम थी तब नेपाल में वंशवादी, निरंकुश एकतंत्रीय राणा शासनतंत्र थी । उस कालखण्ड में जनता को शिक्षा के अधिकार से पूर्णतया वंचित रखा जाता था । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी बंदेज थी । जनता का शोषण किया जाता था । राणा शासन के विरुद्ध बोलने वाले सख्त सजा के भागीदार होते थे । ऐसे क्रुर और निर्दयी राणा शासन से लोहा लेने वाले आधुनिक चेतना के कवियों की कमी नहीं थी । तब शासन के विरूद्ध प्रत्यक्ष रूप से विद्रोह नहीं किया जा सकता था । कवियों को शब्दों की चातुर्यता और बिम्बों के माध्यम से बड़े ही घुमावदार तरीके से जनता के समक्ष अपनी बात रखनी पड़ती थी । तब के साहित्य को ठीक से समझने के लिए माथे के पसीने छूटते थे । ऐसी पाबंदियों के बावजूद भी जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले, विद्रोह व क्रांति करने वाले कवियों में युगकवि सिद्धचरण श्रेष्ठ, भवानी भिक्षु, महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा, बालकृष्ण सम, शिरोमणि लेखनाथ पौडेल, ध्रणीध्र कोइराला, भीमनिधि तिवारी, युद्ध प्रसाद मिश्र एवं केदारमान व्यथित इत्यादि के नाम उल्लेखनीय हैं ।
युगकवि की पदवी से सम्मानित कवि सिद्धचरण श्रेष्ठ को स्वच्छंदतावादी काव्यधरा के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है । इनकी कविताओं में एकतंत्रीय राणा शासन विरोधी युगीन विद्रोह और क्रांति की आवाज पायी जाती है । बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि भवानी भिक्षु के काव्यों में अस्तित्ववाद व समाजवाद के स्वर मुखरित हैं । आधुनिक नेपाली कविता में परिष्कारवादी काव्य धारा की शरूआत लेखनाथ पौडयाल द्वारा की गयी थी । लेखनाथ पौडयाल के आगमन के साथ ही नेपाली साहित्य में आधुनिक काल का प्रवेश हुआ । ‘ऋतु विचार’, ‘तरुण तपसी’, ‘बुद्धि विनोद’ एवं ‘सत्यकलि संवाद’ आदि उनकी परिष्कारवादी धारा की प्रमुख कृतियाँ हैं । नेपाली भाषा साहित्य के उच्चकोटी के कवि, निबंधकार, नाटककार, कथाकार, समालोचक के रूप में महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा का नाम अग्रपंक्ति में लिया जाता है । वे चौदह भाषा के ज्ञाता थे । देवकोटा के सम्बन्ध् में महापंडित राहुल सांकृत्ययान ने कहा है कि अगर पन्त–प्रसाद–निराला तीनों की काव्य चेतना को देवकोटा से तुलना की जाय तो भी देवकोटा इनमें अतुलनीय व विशिष्ट हैं । इसीलिए उन्होंने देवकोटा को भारतीय कवि पन्त–प्रसाद–निराला का समुच्च रूप कहा है । देवकोटा ओजस्वी आशरूकवि थे । सुलोचना महाकाव्य, शाकुन्तल महाकाव्य और मुनामदन खण्डकाव्य आदि की रचना कुछ ही दिनों में कर डाली थी । एक साक्षात्कार में उन्हाेंने कहा था कि मुनामदन को छोड़कर मेरी सारी रचनाएँ जला दी जाये । मुनामदन नेपाल में सर्वाधिक लोकप्रिय खंड काव्य है । उनकी विख्यात ‘पागल’ कविता के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं –

जरूर साथी मैं पागल हूँ !
ऐसा ही है मेरा हाल मैं शब्दों को देखता हूँ, दृश्यों को सुनता हूँ,
खुशबू से संवाद करता हूँ ।
आसमान से भी महीन चीजों को छूता हूँ
वे चीज, जिसका अस्तित्व लोक नहीं मानता
जिसका आकार संसार नहीं जानता मैं बोलता हूँ उनके साथ,
जैसे बोलते हैं वो मेरे साथ
एक भाषा, साथी !

नाटय शिरोमणि के नाम से विख्यात बालकृष्ण सम को वल्र्डमार्क इंसाइक्लोपिडिया ऑफ नेशंस में नेपाली साहित्य का ‘शेक्सपीयर’ कहा गया है । नेपाली साहित्य को बौद्धिकता की छाप देने वाले सम एक कुशल वक्ता, अभिनेता, चित्रकार व दार्शनिक चिन्तक भी थे । वे नेपाल के प्रथम समाचार पत्र ‘गोरखापत्र’ के संपादक भी रहे । रेडियो नेपाल के निदेशक पद पर भी लम्बे समय तक आसीन रहे । सर्वश्रेष्ठ नाटककार व निबंधकार होने के साथ–साथ उन्होंने ‘आगो र पानी’ (आग और पानी), ‘चिसो चुलो’ (ठंडा चूल्हा) जैसी खंडकाव्यों एवं महाकाव्यों की भी रचना की । ‘मुकुंद इंदिरा’, ‘अमर सिंह’, ‘प्रहलाद’, ‘ध्रुव’, ‘भक्त भानुभत’, ‘भीमसेन का अंत’, ‘कैकेयी’, ‘तानसेन की झड़ी’, ‘प्रेम पिंड’ और ‘तपोभूमि’ इत्यादि इनकी चर्चित कृतियाँ हैं ।
नेपाली भाषा साहित्य की आधुनिकतम काव्यधारा सशक्त है । इस समय के कवियों में गोपाल प्रसाद रिमाल, पारिजात, भूपी शेरचन, म. बी. वि. शा, श्यामदास वैष्णव, तुलसी दिवस, प्रेमा शाह, व काली प्रसाद रिजाल इत्यादि के नाम उल्लेखनीय हैं । जब आधुनिक नेपाली काव्य परंपरा में पद्य और शास्त्रीय छन्दोबद्ध काव्यों का वर्चस्व था तब छंदविहीन काव्य की शरूआत गोपाल प्रसाद रिमाल ने की । ‘आमाको सपना’ (माँ का सपना) उनकी इसी धार की एक चर्चित नेपाली कविता है जो आज भी उतनी ही सांदर्भिक लगती है । देखिए, उनकी ‘होश’ कविता के कुछ अंश–

मैं इंसान अपनी खुशी से पैदा नहीं हुआ, अपनी खुशी से मरूँगा भी नहीं यह ज्ञान किसे है साथी ?
यह संसार एक सपना है,
जीवन पानी का बुलबुला है,
यहाँ कोई भी अपना नहीं है,
जो भी हैं, वे सभी
तुम्हारी ही तरह पैदा हुए हैं ।

शरू में इस धारा की कविताओं को कविता के रूप में स्वीकार ही नहीं किया जाता था । लेकिन इस विधा को आगे बढ़ाने का काम किया भूपि शेरचन ने । थोड़े शब्दों में, बिम्ब और प्रतीकों के माध्यम से गहन भाव अभिव्यक्त करने की कला भूपि में पायी जाती है । संभ्रात परिवार में जन्में भूपि ने हमेशा सत्ता और सामंती शक्ति के विरुद्ध लिखा । गोपाल प्रसाद रिमाल को नेपाली साहित्य की काव्य धार परिवर्तन करने का पूरा श्रेय दिया जाता है और भूपि ने उसमें भी अपनी एक पृथक शैली स्थापित की । जहाँ रिमाल ज्यादा आक्रामक, विद्रोही और क्रन्तिकारी थे वहीँ भूपि व्यंग्यात्मक, शब्दों व बिम्बों की चातुर्य और सरल भाषा का प्रयोग किया करते थे । ‘यह हल्ला–ही–हल्लाओं का देश है’ उनकी एक छंदविहीन बहुचर्चित कविता है । आज के लोकतंत्रीय नेपाल में भी यह कविता समसामयिक लगती है ।

हे ! मेरे देश के राष्ट्र कवियों
हे ! मेरे देश के सम्मानीय नेताओं
कहना ही है तो कहो मुझे
स्वदेश निंदक अथवा घृणा चिन्तक
लेकिन यह देश जितना तुम्हारा है उतना मेरा भी है अगर बाँटना भी चाहो तो
इस देश के एक करोड़ टुकड़ों में से एक टुकड़े पर मेरी झोपड़ी भी होगी
यही भावना मुझे कहने को विवश करती है और हौसला देती है यह कहने को
कि यह हल्ला–ही–हल्लाओं का देश है ।

कथ्य और शिल्प दोनों ही दृष्टि से नवीनतम साहित्यिक आंदोलन के रूप मे प्रयोगवादी धारा को लिया जाता है । परंपरागत भाषा व्याकरण से इतर भाव संयोजन बिम्ब और प्रतीकों का इस धरा की कविताओं मे अधिक प्रयोग किया जाता है । नेपाली साहित्य मे प्रयोगवादी काव्य धारा की नींव मोहन कोइराला ने रखी । ‘लेक’, ‘नदी किनारे का मांझी’, ‘तु नियंत्रण’ आदि उनकी प्रयोगवादी कृतियाँ हैं । उनके बाद बैरागी काईंला, ईश्वर वल्लभ, इंद्रबहादुर राई, तोया गुरूघ, वानिरा गिरि, गोपाल पराजुली आदि इस धारा के प्रमुख कवि हैं ।
काव्य के बाद नेपाली साहित्य में संख्यात्मक हिसाब से कथा का दूसरा स्थान है । सामाजिक यथार्थवादी धारा के कथाकारों में गुरूप्रसाद मैनाली, भीमनिध् ितिवारी, हृदयचन्द्र सिंह प्रधान, श्यामदास वैष्णव, अगमसिंह गिरि एवं चक्रपाणी चालिसे आदि महत्वपूर्ण माने जाते हैं । मनोवैज्ञानिक यथार्थवादी धार के महत्वपूर्ण कथाकारों में विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला, भवानी भिक्षु, गोविन्द बहादुर मल्ल ‘गोठाले’, विजय मल्ल, कमल दीक्षित आदि के नाम उल्लेखनीय हैं । नेपाली साहित्य में नाटकों का आरम्भ संस्कृत के नाटकों के अनुवाद से हुआ । पौराणिक कथनों के आधार पर मौलिक नाटकों की रचना में लेखनाथ पोडयाल, बालकृष्ण सम और भीमनिध् ितिवारी का नाम उल्लेखनीय हैं । निबंध, उपन्यास, एकांकी एवं समीक्षा के क्षेत्र में भी नेपाली साहित्य समृद्ध है । अग्रपंक्ति के निबंधकारों में पारसमणि प्रधान, सूर्यविक्रम ज्ञवाली, रूद्रराज पाण्डेय, लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा व बालकृष्ण सम के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं । इसके बाद के निबंधकारों में शंकर लामिछाने, राजेश्वर देवकोटा, बालचंद्र शर्मा आदि के नाम प्रमुख हैं ।
पिछले दशक में आकर नेपाली साहित्य उत्तर आध्ुनिक चिंतन से प्रभावित हुआ है । चिंतन, शैली और विषयों को अत्याधुनिक तरीके से साहित्य में प्रयोग किया जा रहा है । नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान और मदन पुरस्कार के स्थापना लगायत के अन्य साहित्यिक गतिविधियंो ने भी नेपाली भाषा साहित्य की समृद्धि में अतुलनीय योगदान दिया है ।

भारतीय साहित्य में नेपाली भाषा साहित्य का योगदानः
वर्तमान समय में भारत में १७९ भाषाएँ एवं ५४४ उपभाषाएँ हैं । भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में बाईस भाषाओं को ‘राजभाषा’ का दर्जा प्राप्त है, जिसमें से एक नेपाली भाषा भी है । सन् १९९२ मे नेपाली भाषा को भारत की १९ वीं राजभाषा के तौर पर शामिल कर लिया गया था । नेपाली साहित्य नेपाली भाषा का साहित्य अथवा नेपाली भाषा में रचित साहित्य है । यह भाषा नेपाल के अलावा भारत के सिक्किम, पश्चिम बंगाल, पूर्वोत्तर राज्यों आसाम, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड में भी बोली जाती है । सिक्किम भारत का एक ऐसा राज्य है जहाँ केवल नेपाली भाषा ही बोली जाती है । भारत के कई बड़े शहरों में भी मुख्यतः दिल्ली, कोलकाता, बैंगलोर एवं मुम्बई आदि में नेपाली भाषियों की बहुलता पायी जाती है । भारत में भी नेपाली भाषा साहित्य भरपूर मात्रा में लिखा–पढ़ा जाता है । साहित्य अकादमी द्वारा प्रत्येक वर्ष भारतीय नेपाली साहित्यकारों द्वारा लिखे गए नेपाली भाषा साहित्य व नेपाली भाषा में अनूदित साहित्य को प्रोत्साहित व पुरस्कृत किया जाता है । भारतीय साहित्य में नेपाली भाषा साहित्य का विशिष्ट योगदान है । जैसे पशरूपतिनाथ के दर्शन किए बिना तमाम हिंदुओं की सभी तीर्थ यात्रा निरर्थक है, ठीक उसी तरह भारतीय साहित्य नेपाली भाषा साहित्य के बिना अपूर्ण है । भारतीय साहित्य की सम्पूर्ण पहचान नेपाली भाषा साहित्य के साथ नाखून और मांस के सम्बन्ध् की तरह एक–दूसरे से जुड़ी हुई है । भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में कई नेपाली भाषियों का अतुलनीय योगदान है । दुर्गा मल्ल से लेकर राम सिंह ठकुरी व गोपाल सिंह नेपाली आदि ने हिन्दी और नेपाली भाषा में राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत गीत के माध्यम से भारतीय साहित्य की सेवा की है । भारतीय स्वतन्त्रता सेनानी दुर्गा मल्ल की प्रतिमा भारत के संसद भवन में लगी हुई है । भारतीय राष्ट्रीय गान जन–गण–मन को संगीतबद्ध करने का काम कप्तान राम सिंह ठकुरी ने किया था जो मूलतः नेपाल के थे । उन्होंने‘कदम–कदम बढ़ाए जा’ तथा ‘शरूभ सुख चैन’ जैसे कई राष्ट्रीय भावना के गीतों को संगीतबद्ध किया तथा भारतीय स्वतन्त्रता सेनानियों को उत्प्रेरित करने के लिए अनेकों राष्ट्रभक्ति गीतों की रचना की । हिन्दी एवं नेपाली के प्रसिद्ध कवि गोपाल सिंह नेपाली ने १९६२ के भारत–चीन युद्ध के दौरान कई देशभक्तिपूर्ण गीत एवं कविताएं लिखीं । ‘पंछी’, ‘रागिनी’, ‘पंचमी’, ‘हमारी राष्ट्र वाणी’और ‘हिमालय ने पुकारा’ इनके काव्य और गीत संग्रह हैं । गोपाल सिंह नेपाली ने सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के साथ सुधा, योगी, रतलाम टाइम्स जैसी कई पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया । उन्होंने भारतीय चलचित्रों के लिए भी कई गीत लिखे तथा नजराना, सनसनी और खुशबू नाम के चलचित्रों का निर्माण भी किया ।

नेपाल में हिन्दी भाषा की स्थितिः
पौराणिक काल से ही नेपाल और भारत दो घनिष्ठ पड़ोसी देश हैं । दोनों देशों की भाषा, कला, साहित्य व संस्कृति में भी काफी समानताएँ पायी जाती हैं । नेपाल एक बहु भाषीय देश है । अतः यहाँ भी हिन्दी भाषा बोली जाती है । भारतीय सीमाओं से सटे नेपाल के तराई क्षेत्र में हिन्दी बोलने वालों की काफी संख्या है । अवधी, मैथिली, भोजपुरी के साथ–साथ तकरीबन अस्सी लाख लोग नेपाल में हिन्दी बोलते हैं । नेपालगंज, वीरगंज, महेन्द्रनगर, जनकपुर आदि नेपाल के हिन्दी भाषी क्षेत्र हैं । भारत के विभिन्न शहरों में रोजगार, शिक्षा व उपचार के लिए आने वाले नेपालियों के कारण ही हिन्दी भाषा नेपाल के पहाड़ी इलाकों तक पहुँची । हिन्दी सिनेमा और हिन्दी गानों का भी इसमें बहुत बड़ा योगदान है । नेपाल के सुदूर और दुर्गम क्षेत्रों में भी हिन्दी की लोकप्रियता बढ़ाने में रेडियो नेपाल, नेपाल टेलिविजन, नेपाली एफ. एम. में प्रस्तुत किए जाने वाले हिन्दी के कई कार्यक्रमों का विशेष योगदान है । नेपाल के अधिकांश लोग हिन्दी भाषा आसानी से बोलते और समझते हैं । बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली तथा राजस्थान आदि राज्यों के लोगों की नेपाल में वैवाहिक व व्यापारिक अंतर संबंध् होने से भी हिन्दी भाषा के प्रचार–प्रसार में बढ़ोतरी हुई । १९५६ में नेपाल से ‘नेपाली’ नाम का हिन्दी दैनिक निकलना प्रारम्भ हुआ । नेपाली भाषी साहित्यकारों ने भी हिन्दी भाषा में कई अच्छी रचनाएँ की । लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा, मोतीराम भट्ट, भवानी भिक्षु, केदारमान व्यथित, गोपाल सिंह नेपाली, राम हरि जोशी, यदुवंश लालचन्द्र, ध्ीरेन्द्र मल्ल, शरूक्रराज शास्त्री, घुस्वा सायमि, दुर्गा प्रसाद श्रेष्ठ आदि साहित्यकारों ने हिन्दी में अच्छी रचनाएँ कीं । हिन्दी साहित्य का भी इसमें काफी बड़ा योगदान रहा है । शरतचंद उपाध्याय, बंकीम चंद्र चट्टोपाध्याय, रवीन्द्र नाथ टैगोर, निर्मल वर्मा, केदारनाथ सिंह, अरुण कमल, आर. के.नारायण, हरिवंश राय बच्चन इत्यादि साहित्यकारों की नेपाल में इतनी लोकप्रियता है कि नेपाली पाठक व साहित्यकार भी उनकी किताबें खोज–खोज कर पढ़ते हैं । साथ ही अनुवाद साहित्य के माध्यम से भी लोग हिन्दी से जुड़े हुए हैं । हिन्दी अखबारों और पत्रिकाओं की ही देन है कि नेपाली पाठकगण किसी न किसी रूप से हिन्दी भाषा से जुड़े रहे । भारतीय सिनेमा में काम करने वाले नेपाली कलाकारों की बदौलत नेपाल में हिन्दी भाषा की लोकप्रियता और भी ज्यादा बढ़ गयी है । जहाँ पुरानी पीढ़ी हिन्दी नगमों, गजलों तक ही सीमित थी तो वहीं आज नई पीढ़ी और विशेषकर युवा वर्ग बाकायदा हिन्दी भाषा सीखकर भारतीय सिनेमा और टेली चलचित्रों में काम कर रहें हैं । बच्चों के मनोरंजनात्मक कार्टून चैनल और बाल साहित्य की पुस्तकें भी नेपाली बाजारों में काफी लोकप्रिय हैं । नेपाल के पूर्व प्रधनमंत्री और साहित्यकार लोकेन्द्र बहादुर चन्द ने कहा था कि नेपाल में हिन्दी भाषा को बढ़ावा देना चाहिए । नेपाल में हिन्दी काफी समय से प्रचलित है । हिन्दी और नेपाली दोनों भाषाओं को समान रूप से प्रोत्साहित करने की जरूरत है । नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान की वार्षिक पत्रिका ‘रूपान्तरण’ में हिन्दी भाषा की अनुवाद सामग्रियों का प्रकाशन होता है । यह पत्रिका विशेषकर हिन्दी भाषा के लिए ही समर्पित है । इसी तरह नेपाल से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘हिमालिनी’ हिन्दी पत्रिका है जो निरंतर बाइस वर्ष से प्रकाशित हो रही है । पंडित दीप साहित्य परिषद’ नेपाल में हिन्दी भाषा के प्रचार–प्रसार के लिए कार्य कर रही है । काठमाण्डू स्थित नेपाल–भारत पुस्तकालय भी हिन्दी के प्रचार–प्रसार और नेपाली साहित्यकारों के साथ भाषा के समन्वय के लिए उल्लेखनीय कार्य करता है । राजनीतिक मामलों में भी नेपाल में हिन्दी भाषा को लेकर काफी विवाद हुए हैं । एक समय ऐसा भी था जब नेपाल में हिन्दी भाषा को नेपाल की दूसरी राजभाषा के रूप में अपनाने के लिए पहल की जा रही थी, लेकिन राजनीतिक विवादों के कारण इसे अस्वीकार किया गया । नेपाल के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. परमानन्द झा ने जुलाई २००८ में अपने पद का शपथ ग्रहण हिन्दी में लिया था । फलस्वरूप नेपाल में इसे लेकर काफी विवाद रहा ।
लोगों ने पाँच दिनों तक सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया साथ ही पुतले भी जलाए गए । नेपाल के उच्चतम न्यायालय ने २००९ में फैसला सुनाया कि हिन्दी में शपथ अवैध है । अंततः परमानन्द झा ने नेपाली और अपनी मातृभाषा मैथिली में ७ फरवरी, २०१० को शपथ लेकर इस विवाद को समाप्त किया । परमानन्द झा ने ही २०१५ में माँग की थी कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की छः आधिकारिक
भाषाओं में से एक भाषा का दर्जा मिलना चाहिए । इससे यह ज्ञात होता है कि केवल आम बोलचाल की भाषा, शिक्षा और साहित्य तक ही हिन्दी भाषा को नेपाल में स्वीकार्यता प्राप्त है ।

साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत नेपाली भाषा के साहित्यकारों की सूची
 १९९१ गिरमी शेर्पा–हिपोक्रेट चाँप – गुराँस र अन्य कविता –कविता
 १९९२ आर.पी. लामा. – इंद्रधनुष – निबंध
 १९९३ गदुल सिंह लामा – मृगतृष्णा –लघु कथा
 १९९४ जीवन नामडूंग – पर्यवेक्षण – निबंध
 १९९५ नगेन्द्रमणि प्रधन – डॉ. पारसमणिको जीवन यात्रा – जीवनी
 १९९६ मोहन ठकुरी – निशब्द – कविता
 १९९७ मणि प्रसाद राई – वीर जातिको अमर कहानी –जीवनवृत
 १९९८ मन प्रसाद सुब्बा – आदिम बस्ती – कविता
 १९९९ बिक्रम बीर थापा – बिसौं शताब्दीकी मोनालिसा –लघु कथा
 २००० रामलाल अध्किरी – निसंस्मरण – निबंध
 २००१ लखी देवी सुंदस – आहात अनुभूति – लघु कथा
 २००२ प्रेम प्रधान – उदासीन रूखहरू – उपन्यास
 २००३ बिनद्या सुब्बा – अथाह – उपन्यास
 २००४ जस योंजन ‘प्यासी’– शान्ति सन्देह – कविता
 २००५ कृष्ण सिंह मोत्तफान – जीवन गोरेटोमा – उपन्यास
 २००६ भीम दहाल – द्रोह – उपन्यास
 २००७ लक्षमण श्रीमल – कफ्रर्यू – नाटक
 २००८ हेमनदास राई ‘किरात’ – केही नमिलेका रेखाहरू –लघु कथा
 २००९ समीरन छेत्रा ‘प्रियदर्शी’ – गैरीगाउँकी चेमेली – लघु कथा
 २०१० गोपी नारायण प्रधन – आकाशले पनिठाउँ खोजीरहेछ –कविता

राजकुमार श्रेष्ठ ,हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी

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