Tue. Dec 11th, 2018

पशुबलि हिन्दू सनातन धर्म एवं विश्व मानवता पर एक कलंक है : अजय कुमार झा

हिमालिनी, अंक नोभेम्बर 2018,आज हम इक्कीसवीं सदी के वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं । तर्क, तथ्य, प्रमाण की कसौटी पर ही कसकर आज का जनसामान्य किसी तथ्य को स्वीकार करता है । विज्ञान के द्वारा प्रदत्त नई दृष्टिकोण का ही परिणाम है कि भौतिक क्षेत्र में सुविधाओं और उपलब्धियों का अम्बार लग गया है । विज्ञान और धर्म परस्पर पूरक हैं । यदि दोनों का सही अनुपात बना रहेगा तो निश्चित ही अध्यात्म सम्मत विज्ञान एवं विज्ञान सम्मत धर्म लोक हितकारी बनेगा । हमारी संस्कृति चिरपुरातन है एवं विज्ञान ने आज जो दृष्टि दी है, वह हमारे ऋषि मुनियों ने हमें वैदिक काल में ही देकर जीवन को सर्वांगपूर्ण बना दिया था। लेकिन जीव हिंसा के पाप को हमने समझने में बड़ी भूल कर दी । सभी धर्मों में जीव हिंसा को पाप माना गया है । जो धर्म प्राणियों की हिंसा का आदेश देता है, वह कल्याणकारी नहीं हो सकता ।

 

धर्म का प्रादुर्भाव ही संसार में शांति और सद्भाव बढ़ाने के लिये हुई है । यदि धर्म का उद्देश्य यह न होता तो उसकी इस संसार में आवश्यकता न रहती । संसार के आदिकाल में पशुओं के समान ही मनुष्य वन्य जीव जन्तुओं का वध किया करता था । उसकी सारी प्रवृत्तियाँ भी पशुओं के समान ही थीं । धीरे धीरे मनुष्य में ईश्वरीय तत्त्व का विकास हुआ । उसकी बुद्धि जागी और वह बहुत सी पाशविक प्रवृत्तियों को अनुचित समझकर बदलने लगा । हिंसा वृत्ति के शमन से समाजिकता का विकास किया, समाज व परिवार बनाया और दया, करुणा, सहायता, सहयोग का मूल्य समझकर निरन्तर विकास करता हुआ, इस सभ्य अवस्था तक पहुँचा ।

ज्यों ज्यों मनुष्य का विकास होता गया, त्यों त्यों वह स्थूल से सूक्ष्म की ओर, शरीर से आत्मा की ओर, और लोक से परलोक की ओर विचारधारा को अग्रसर करता गया और अन्त में परमात्मा तत्त्व के दर्शन कर लिये । स्रुथूल सेरु जोरु जितना सूक्ष्म की ओरुररु बढरुा है, वह उतना ही सभ्य तथा सुसंस्रुरुकृत माना जायेरुगा औररु जिसमेरुं जितनी अधिक पाशविक औररु हिंस्रक प्रवृत्तियाँ शेरुष हैं, वह उतना ही असभ्य एवं असंस्रुरुकृत माना जायेरुगारु।
थूल से जो जितना सूक्ष्म की ओर बढ़ा है, वह उतना ही सभ्य तथा सुसंस्कृत माना जायेगा और जिसमें जितनी अधिक पाशविक और हिंस्रक प्रवृत्तियाँ शेष हैं, वह उतना ही असभ्य एवं असंस्कृत माना जायेगा ।
दुर्भाग्य की बात है कि आदिम मानव नरपशुओं के समय जैसी कुप्रथाएँ, जो किसी षड्यंत्रवश वेदों के शब्दों का गलत अर्थ लगाकर मध्यकाल में पनपायी गयीं, आज भी दिखाई देती हैं ।। पशुबलि उनमें से एक है । आज से २५ सौ वर्ष पहले “अहिंसा परमोधर्मः’’ का विवेचन कर धर्म को नया आयाम देने वाले गौतम बुद्ध के धरती पर आज भी हो रहे क्रुर अंधविश्वासपूर्ण पशुबलि हमारे पतनोन्मुख सभ्यता का परिचायक ही तो है ।
वेदों के विषय में सबसे अधिक प्रचलित अगर कोई शंका है तो वह है कि क्या वेदों में पशुबलि, मांसाहार आदि का विधान है ? इस भ्रांति के होने के मुख्य कारण हैं पाश्चात्य विद्वानों जैसे मैक्समुलर, ग्रिफ्फिथ आदि द्वारा यज्ञों में पशुबलि, मांसाहार आदि का विधान मानना । द्वितीय मध्य काल के आचार्यों जैसे सायण, महीधर आदि का यज्ञों में पशुबलि का समर्थन करना, तीसरा ईसाइयों, मुसलमानों आदि द्वारा मांसभक्षण के समर्थन में वेदों की साक्षी देना,चौथा साम्यवादी अथवा नास्तिक विचारधारा के समर्थकों द्वारा सुनी सुनाई बातों को बिना जांचे बार बार रटना । किसी भी सिद्धांत अथवा किसी भी तथ्य को आंख बंद कर मान लेना बुद्धिमान लोगों का लक्षण नहीं है ।
पशुबलि की यह प्रथा कब और कैसे प्रारंभ हुई, कहना कठिन है । कुछ लोग तर्क देते हैं कि वैदिक काल में यज्ञ में पशुओं की बलि दी जाती थी । ऐसा तर्क देने वाले लोग वैदिक शब्दों का गलत अर्थ निकालने वाले हैं । वेदों में पांच प्रकार के यज्ञों (ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वदेवयज्ञ और अतिथि यज्ञ) का वर्णन मिलता है ।
कात्यान्न श्रोतसूत्र मे आया है, दुष्टस्य हविषोक्प्सवहरणम् ।।२५,११५ ।। उक्तो व मस्मनि ।।२५,११६ ।। शिष्टभक्षप्रतिषिध्द दुष्टम ।।२५,११७ ।। अर्थात होमद्र्व्य यदि दुष्ट हो तो उसे जल मे फेक देना चाहिए उससे हवन नहीं करना चाहिए, शिष्ट पुरुषों द्वारा निषिध मांस आदि अभक्ष्य वस्तुयें दुष्ट कहलाती है । शतपत में भी माँस भोजी को यज्ञ का अधिकार नही दिया है । ‘नमासमश्रीयात्, यन्मासमश्रीयात्, यन्मिप्रानमुपेथादिति नेत्वेवैषा दीक्षा ।’ (श. ६,२  ) अर्थात मनुष्य मास भक्षण न करे, यदि मास भक्षण करता है अथवा व्यभिचार करता है तो यज्ञ दीक्षा का अधिकारी नही है . यहाँ स्पष्ट कहा है की मास भक्षी को यज्ञ का अधिकार नही है ।
मासीयन्ति ह वै जुह्वतो यजमानस्याग्नयः। एतह ह वै परममान्नघ यन्मासं,स परमस्येवान्नघ स्याता भवति (शत .११,७)’।। हवन करते हुआ यज्मान की अग्निया मास की आहुति की इच्छा रखती है । परम अन्न ही मास है परम अन्न से आहुति दे,.. यहाँ मास को परम अन्न कहा है ओर यदि ये जीवो का मास होता तो यहाँ अन्न का प्रयोग नही होता क्यूँ की मास अन्न नहीं होता है । परम अन्न के बारे मे अमरकोष के अनुसार ‘परमान्नं तु पायसम् ’ अर्थात दूध और चावल से तैयार (खीर) को परम अन्न कहा है ।
इमं मा हिंसीर्द्िवपाद पशुम् (यजु १३र४७ ) दो खुरो वाले पशुओ की हिंसा मत करो, इमं मा हिंसीरेकशपÞm पशुम (यजु १३र४८ ) एक खुर वाले पशु की हिंसा मत करो, मा नो हिंसिष्ट द्विपदो मा चतुष्यपदः(अर्थव ११र२र१) हमारे दो,चार खुरो वाले पशुओ की हिंसा मत करो, मा सेंधत (ऋग. ७÷३२÷९ ) हिंसा मत करो, वेद स्पष्ट अंहिसा का उल्लेख करते है जबकि माँस बिना हिंसा के नही मिलता और यज्ञ में भी बलि आदि हिंसा ही है ।
बलि प्रथा का प्राचलन हिंदुओं के शाक्त और तांत्रिकों के संप्रदाय में ही देखने को मिलता है लेकिन इसका कोई धार्मिक आधार नहीं है। शाक्त या तांत्रिक संप्रदाय अपनी शुरुआत से ऐसे नहीं थे लेकिन लोगों ने अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए कई तरह के विश्वास को उक्त संप्रदाय में जोर दिया । बहुत से समाजों में लड़के के जन्म होने या उसकी मान उतारने के नाम पर बलि दी जाती है तो कुछ समाज में विवाह आदि समारोह में बलि दी जाती है जोकि अनुचित मानी गई है । वेदों में धर्म के नाम पर किसी भी प्रकार की बलि प्रथा कि इजाजत नहीं दी गई है । यदि आप मांसाहारी है तो आप मांस खा सकते हैं लेकिन धर्म की आड़ में नहीं ।
’’इममूर्णायुं वरुणस्य नाभिं त्वचं पशूनां द्विपदां चतुष्पदाम् ।
त्वष्टुः प्रजानां प्रथमं जानिन्नमग्ने मा हिश्सी परमे व्योम ।।’’
(यजु. १३÷५०)
अर्थ ः “उन जैसे बालों वाले बकरी, ऊंट आदि चौपायों और पक्षियों आदि दो पगों वालों को मत मार ।।’’
सायण, महीधर आदि के वेद भाष्य में मांसाहार, हवन में पशुबलि, गाय, अश्व, बैल आदि का वध करने की अनुमति थी जिसे देखकर मैक्समुलर, विल्सन ग्रिफ्फिथ आदि पाश्चात्य विद्वानों ने वेदों से मांसाहार का भरपूर प्रचार कर न केवल पवित्र वेदों को कलंकित किया अपितु लाखों निर्दोष प्राणियों को मरवाकर मनुष्य जाति को पापी बना दिया ।
मध्यकाल में हमारे देश में वाम मार्ग का प्रचार हो गया था, जो मांस, मदिरा, मैथुन, मीन आदि से मोक्ष की प्राप्ति मानता था । आचार्य सायण यूं तो विद्वान थे, पर वाम मार्ग से प्रभावित होने के कारण वेदों में मांसभक्षण एवं पशु बलि का विधान दर्शा बैठे ।
निरीह प्राणियों के इस तरह नृशंश हत्या एवं बोझिल कर्मकांड को देखकर ही महात्मा बुद्ध एवं महावीर ने वेदों को हिंसा से लिप्त मानकर उन्हें अमान्य घोषित कर दिया, जिससे वेदों की बड़ी हानि हुई एवं अवैदिक मतों का प्रचार हुआ ।
सामान्यतया मेध शब्द को गलत दृष्टिकोण से देखा गया है । मेध शब्द का अर्थ केवल हिंसा नहीं है । मेध शब्द के ३ अर्थ हैं १. मेधा अथवा शुद्ध बुद्धि को बढ़ाना, २. लोगों में एकता अथवा प्रेम को बढ़ाना, ३. हिंसा । इसलिए मेध से केवल हिंसा शब्द का अर्थ ग्रहण करना उचित नहीं है । जब यज्ञ को अध्वर अर्थात ‘हिंसारहित’ कहा गया है तो उसके संदर्भ में ‘मेध’ का अर्थ हिंसा क्यों लिया जाए ? बुद्धिमान व्यक्ति ‘मेधावी’ कहे जाते हैं और इसी तरह लड़कियों का नाम मेधा, सुमेधा इत्यादि रखा जाता है, तो क्या ये नाम क्या उनके हिंसक होने के कारण रखे जाते हैं ? या बुद्धिमान होने के कारण ?
अश्वमेध शब्द का अर्थ यज्ञ में अश्व की बलि देना नहीं है अपितु शतपथ १३.१.६.३ और १३.२.२.३ के अनुसार राष्ट्र के गौरव, कल्याण और विकास के लिए किए जाने वाले सभी कार्य ‘अश्वमेध’ है ।
गौमेध का अर्थ यज्ञ में गौ की बलि देना नहीं है अपितु अन्न को दूषित होने से बचाना, अपनी इन्द्रियों को वश में रखना, सूर्य की किरणों से उचित उपयोग लेना, धरती को पवित्र या साफ रखना ‘गोमेध’ यज्ञ है । गोघ्न शब्द में हन धातु का प्रयोग है जिसके दो अर्थ बनते हैं हिंसा और गति । गोघ्न में उसका गति अथवा ज्ञान, गमन, प्राप्ति विषयक अर्थ है । मुख्य भाव यहां प्राप्ति का है अर्थात जिसे उत्तम गौ प्राप्त कराई जाए । यजुर्वेद ८÷४३ में गाय का नाम इडा, रंता, हव्या, काम्या, चन्द्रा, ज्योति, अदिति, सरस्वती, महि, विश्रुति और अघन्या कहा गया है । स्तुति की पात्र होने से इडा, रमयित्री होने से रंता, इसके दूध की यज्ञ में आहुति दी जाने से हव्या, चाहने योग्य होने से काम्या, हृदय को प्रसन्न करने से चन्द्रा, अखंडनीय होने से अदिति, दुग्धवती होने से सरस्वती, महिमशालिनी होने से महि, विविध रूप में श्रुत होने से विश्रुति तथा न मारी जाने योग्य होने से अघन्या कहलाती है । ‘गो’ शब्द का एक और अर्थ है पृथ्वी । पृथ्वी और उसके पर्यावरण को स्वच्छ रखना ‘गोमेध’ कहलाता है।
नरमेध का अर्थ मनुष्य की बलि देना नहीं है अपितु मनुष्य की मृत्यु के बाद उसके शरीर का वैदिक रीति से दाह–संस्कार करना नरमेध यज्ञ है । मनुष्यों को उत्तम कार्यों के लिए प्रशिक्षित एवं संगठित करना नरमेध या पुरुषमेध या नृमेध यज्ञ कहलाता है ।
अजमेध का अर्थ बकरी आदि की यज्ञ में बलि देना नहीं है अपितु अज कहते हैं बीज, अनाज या धान आदि कृषि की पैदावार बढ़ाना है । अजमेध का सीमित अर्थ अग्निहोत्र में धान आदि की आहुति देना है ।
इंद्र द्वारा बैल खाने के समर्थन में ऋग्वेद १०÷२८÷३ और १०÷८६÷१४ मंत्र का उदाहरण दिया जाता है । यहां पर वृषभ और उक्षन् शब्दों के अर्थ से अनभिज्ञ लोग उनका अर्थ बैल कर देते हैं । ऋग्वेद में लगभग २० स्थलों पर अग्नि को, ६५ स्थलों पर इंद्र को, ११ स्थलों पर सोम को, ३ स्थलों पर पर्जन्य को, ५ स्थलों पर बृहस्पति को, ५ स्थलों पर रुद्र को वृषभ कहा गया है । व्याख्याकारों के अनुसार वृषभ का अर्थ यज्ञ है ।
उक्षन् शब्द का अर्थ ऋग्वेद में अग्नि, सोम, आदित्य, मरुत आदि के लिए प्रयोग हुआ है । जब वृषभ और उक्षन् शब्दों के इतने सारे अर्थ वेदों में दिए गए हैं, तब उनका व्यर्थ ही बैल अर्थ कर उसे इंद्र को खिलाना युक्तिसंगत एवं तर्कपूर्ण नहीं ह ै।
वैसे पंचमहायज्ञ अंतर्गत बलि के कई अवांतर भेद कहे गए हैं — आवश्यक बलि, काम्यबलि आदि इस प्रसंग में ज्ञातव्य हैं । कई आचार्यों ने छागादि पशुओं के हनन को तामसपक्षीय कर्म माना है, यद्यपि तंत्र में ऐसे वचन भी हैं जिनसे पशु बलिदान को सात्विक भी माना गया है । कुछ ऐसी पूजाएँ हैं जिनमें पशु बलिदान अवश्य अनुष्ठेय होता है ।
वीरतंत्र, भावचूड़ामणि, यामल, तंत्रचूड़ामणि, प्राणतोषणी, महानिर्वाणतंत्र, मातृकाभेदतंत्र, वैष्णवीतंत्र, कृत्यमहार्णव,दुर्गा सप्तसती, वृहन्नीलतंत्र, आदि ग्रंथों में बलिदान (विशेषकर पशुबलिदान) संबंधी चर्चा है । परन्तु समता, दया एवं करुणा के आधार पर ‘वसुधैव कुटुम्बकं’ का महान् सिद्धान्त हिन्दू धर्म की आधारशिला है । अपनी इसी उदारता के कारण ही यह धर्म संसार में सभी धर्मों का सिरमौर बना है । यदि हिन्दू धर्म से दया तथा करुणा का तत्व निकाल दिया जाये तो वह एक कथा से ज्यादा हैसियत नहीं रख सकेगा ।
एक हिन्दू धर्म ही नहीं, संसार के सारे धर्मों में जीव–जन्तुओं पर दया करने का निर्देश किया गया है । ईसाई, यहूदी तथा मुसलमान आदि अनेक जातियाँ भौगोलिक एवं अन्नाभाव की परिस्थितियों की विवशता से माँस मछली आदि खाते और पशुओं का वध करते हैं तथापि उनके धर्मग्रन्थों में जीव पर दया करने का ही निर्देश किया गया है कि ‘परमात्मा का आदेश है कि तुम सब जीवों पर दया करो ।’ तीर्थयात्रा एक धर्मकृत्य माना गया है । मुसलमानों को उनके पैगम्बर का आदेश है कि ‘मक्का की यात्रा पर जब जाओ और वहाँ से वापस आओ तब रोजÞा रक्खो, किसी जीव की हत्या न करो और न माँस ही खाओ ।’ मुसलमानों के मूल पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब किसी पशुपक्षी का माँस नहीं खाते थे । इसी प्रकार मुसलमानों के धार्मिक नेता हजरत अली ने कहा है, ‘तू अपने पेट को पशुपक्षियों की कब्र मत बना ।’ ईसामसीह का मुख्य उपदेश दया और अहिंसा ही है । उन्होंने एक स्थान पर कहा है, ‘तुझे संसार की सारी जड़चेतन प्रकृति का ज्ञान क्यों न हो पर तेरे हृदय में यदि दया नहीं है तो तेरा वह ज्ञान परमात्मा के सम्मुख किसी काम न आवेगा ।’ यहूदी धर्म में कहा गया है कि ‘बकरों तथा बछड़ों के रक्त से नहीं, अपने ही परिश्रम, पुरुषार्थ एवं परमार्थ द्वारा ही स्वर्ग अथवा मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है ।’
गंभीर बात तो यह है कि, इस प्रकार के निर्देश तो उन धर्मों में हैं जो अभारतीय हैं और जहाँ अन्न तथा फलफूलों का अभाव रहता है । परन्तु हमारे यहाँ तो पेड़ों,पहाड़ों को पूजने का विधान है । नदियों तालाबों को पूजने का संस्कार है, प्रेमाभक्ति ही हमारे जीवन का लक्ष्य है । फिर हमने हिंसा और हत्या को धर्म के आड़ में छुपकर क्यों अपनाया ? हमारी या तो समझने की क्षमता मर गई है, या की हम संवेदनहीन हो गए हैं । इस दोनों की अनुपस्थिति सभ्यता के विनाश का कारण होता है ।
जीवों के साथ क्रुरता का व्यवहार करने वाले व्यक्ति का हृदय भावनाशून्य होकर कठोर हो जाता है । ऐसा हृदयहीन व्यक्ति न तो आत्मिक उन्नति कर सकता है और न समाज में अपने आचरण को शालीन रख सकता है ।
आज के उन्नति एवं विकास के युग में भी जो विनाश की सम्भावनाएँ संसार के सिर पर मँडराती दिखाई देती हैं, उसका मूलभूत कारण मनुष्य की हृदयहीनता ही है, जो पशु पक्षियों पर अत्याचार करने के फलस्वरूप प्रगाढ़ हुआ है । जब तक मनुष्य अपने हृदय में जीव दया, समस्त प्राणियों के प्रति सहानुभूति की वृत्तियों का विकास नहीं करेगा, बहुत कुछ भौतिक उन्नति कर लेने पर भी वह वास्तविक सुख शांति की प्राप्ति नहीं कर सकेगा । उसका आत्मिक, आध्यात्मिक,धार्मिक तथा सामाजिक जीवन यों ही हिंसा और इष्र्या की आग में जल जलकर नष्ट होता रहेगा ।
अधिकतर लोग काली के मन्दिरों में अथवा भैरव के मठों पर पशुबलि देने का विशेष आयोजन किया करते हैं । उन्हें विश्वास होता है कि माता काली पशुओं का माँस खाकर अथवा खून पीकर प्रसन्न होती है । उस जग जननी जगदम्बा के प्रति ऐसा क्रुर एवं कुत्सित विश्वास रखना उसके विश्व मातृत्व पर बहुत बड़ा आघात है । परमात्मा की जो आधार शक्ति संसार के जीवों को उत्पन्न और पालन करने वाली है, वह अपनी सन्तानों का रक्त माँस पी खा सकती है, ऐसा किस प्रकार माना जा सकता है ? साधारण मानवी माता भी जब बच्चे के जरा सी चोट लग जाने पर पीड़ा से छटपटा उठती है, उसकी सारी करुणा उमड़कर अपने प्यारे बच्चे को आच्छादित कर लेती हैं, तब उस दिव्य माता, उस करुणा, दया और प्रेम की मूर्ति जगतजननी के प्रति यह विश्वास किस प्रकार किया जा सकता है कि वह अपने उन निरीह बच्चों का खून पीकर प्रसन्न हो सकती है ?
नेपाल के जनकपुर स्थित राजदेवी मंदिर में प्रति वर्ष की तरह इसबार भी अष्टमी के दिन १४ हजार खासी को बलि चढ़ा दिया गया । वह भी जगदम्बा को खुश करने के हेतु से । इस प्रकार क्रुर, करुण दारुण और पिशाचिनी के रूप में मानकर माता के सम्मुख जीवों की बलि देना उनके कोमल मर्म को बेधना ही है । जब माता के सम्मुख ही उनकी निरीह सन्तानों को काटकर उनका रक्त माँस उस माता के मुँह में देना कितना क्रुर और भयंकर कर्म हैं, इसका विचार आते ही किसी भी विचारशील के रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।
अतः अब हमें गंभीर होना पड़ेगा । किसी पशु और पक्षियों को प्यार करके उसकी स्नेहमयी प्रतिक्रिया को महसूस करना होगा । अपने बगीचे की पेड़ो पर ममता लुटा के देखना होगा की वह किस प्रकार आनंद मग्न हो नाचता हुआ आपको आलिंगन करता है । तुलसी बाबा ने कहा है “प्रेम से प्रकट हो ही भगवान“ “निर्मल मन जन सो मोहि पावा“ फिर हिंसा रूपी घोर मलीनता पूजा कैसे हो सकता है ? ये सारे षडयंत्र राक्षसी प्रवृत्ति के दुष्ट और धूर्त पंडितो द्वारा किया गया है, जिसका हम सब शिकार हो रहे हैं । संसार के सारे संतों ने एक स्वर में हिंसा का निषेध किया है,और प्रेम तथा करुणा का समर्थन किया है । सदगुरु ओशो सिद्धार्थ औलिया कहते हैं की जहां जहाँ हिंसा को प्रश्रय दिया जाएगा वहाँ की भूमि बंजर और रक्तरंजित होकर रहेगी ।
जहां क्रुरता असभ्य का द्योतक है वही हार्दिकता सभ्यता का प्रतीक है । जहां प्रेम,शालीनता और सम्यकता चेतना के चरमोत्कर्ष का प्रमाण है,वही हिंसा,दुष्टता और निर्दयता पाशविकता का लक्षण है ।

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