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नेपाल के पूर्वाग्रह का शिकार हुआ भारत ? डा. गीता कोछड़ जायसवाल

  नेपाल में भारतीयों का बहिष्कार!!!

डा. गीता कोछड़ जायसवाल
भारत–नेपाल संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, पारंपरिक, भाषाई और धार्मिक बंधन का प्रतिबिंब हैं, फिर भी नकारात्मक भावनाओं ने लंबे समय से चले आ रहे भारत–नेपाल संबंधों को बदल दिया है ।
३१ जुलाई १९५० को ‘भारत–नेपाल शांति और मैत्री संधि’ के चलते नेपाल में यह संधि बहस का बड़ा मुद्दा बन गई, जिसके चलते भारत को ‘बड़े भाई’ के रूप में देखा जाता है जो कि नेपाल को नियम सिखाता है । नेपाल में लंबे समय से यह विवाद है कि संधि असमान थी और भारत ने नेपाल को नियम और शर्तों को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया था, जिससे नेपाल की संप्रभुता (कयखभचभष्नलतथ) को अतिक्रमण कर दिया गया । इसलिए, नेपाल में भारत को दक्षिण एशियाई में बड़े शक्ति के सपने देखने वाले के रूप में पेश किया जाता है जो पूरे दक्षिण एशिया को नियंत्रित कर प्रभावी होना चाहता है, विशेष रूप से नेपाल को रिमोट कंट्रोल करना चाहता है ।
हालांकि, अगर हम इसे चीन नेपाल संबंधों के इतिहास से जोड़ते हैं, जहां पारंपरिक और धार्मिक सांस्कृतिक बंधन कम जीवंत है, तो नेपाल की मुख्यधारा में चीन नेपाल की बेत्रावती संधि (त्चभबतथ या द्यभतचबधबतष्) का विवरण आम तौर पर नहीं होता है । २ अक्टूबर १७९२ को छींग सम्राट (त्तष्लन भ्mउभचयच) के साथ एक महायुद्ध के बाद चीन ने नेपाल को असमान संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया और अंत में नेपाल को चीनी सम्राट की आधिपत्य को स्वीकार करना पड़ा ।
नेपाल में भारत के प्रति इस असमान व्यवहार और मुख्यधारा के वक्तव्य में इस पूर्वाग्रह के कारणों को अगर परिभाषित करें तो दो विचारधाराएँ सामने आएगी ः एक, नेपाल के कम्युनिस्ट लोगों ने भारत विरोधी राजनीति को बढ़ाने वाले अतिराष्ट्रवादी दृष्टिकोणों को पूरे नेपाल में बहुत प्रभावित किया है । दूसरा, भारत ने भारत समर्थक थीसिस को बढ़ावा देने के लिए नेपाल की लोकतांत्रिक चर्चा को किसी भी तरह नियंत्रित या प्रभावित नहीं किया ।
इस तर्क के गहरे विच्छेदन से पता चलता है कि क्योंकि यह क्षेत्र भू सामरिक और भू राजनीतिक परिवर्तनों को सावधानी से देख रहा है, नेपाल ने धीरे धीरे भू आर्थिक लाभ के आकर्षण के साथ चीन समर्थक दृष्टिकोण को मजबूती से समेकित कर दिया है । १९८० के दशक में, जब इंग्लैंड और अमेरिका दोनों ने भारत के साथ माओवादी विद्रोह के खिलाफ लड़ाई के लिए नेपाल के राजा ज्ञानेंद्र (प्ष्लन न्थबलभलमचब) को हथियार समर्थन प्रदान करने से इनकार कर दिया, तब चीन ने राजा को हथियार और गोला बारूद की आपूर्ति करके नेपाल को समर्थन दिया था, हालांकि माओवादी चीन के विचारधारात्मक समर्थक थे । इसलिए, चीन नेपाली शासन के संरक्षक बन गए, हालाँकि आज का तथ्य यह है कि वर्तमान समय में नेपाल आंशिक रूप से पूर्व माओवादी विद्रोह नेता प्रचंड द्वारा शासित है ।
नेपाली लोगों के लिए भारत में विशेषाधिकारः
यद्यपि नेपाल के भीतर सबसे विवादास्पद मुद्दा संवैधानिक अधिकारों से संबंधित है, खासतौर पर तराई क्षेत्र में रहने वाले लोग और उनके भारतीय संबंध, परंतु नेपाल में भारत की भूमिका एक सबसे बड़ा मुद्दा है । २०१५ के नाकाबंदी के दौरान, अधिकांश समाचार रिपोर्टों और सोशल मीडिया की बहस नेपाली लोगों के जीवन को अस्त व्यस्त करने में ‘भारत के हाथ’ को दर्शाती है, खासकर के गैस और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में भारत की भूमिका । इससे नेपाल में भारतीयों के प्रति प्रतिशोध बढ़ा है । तब से, नेपाली लोग नेपाल में गैर निष्पादित परियोजनाओं या भारतीय पक्ष धीमी गति से परियोजनाओं पर काम करने के मुद्दों को उठा रहे हैं । सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फÞ भारत है जो नेपाल में नकारात्मक कलाकार रहा है या इस विभाग को बढ़ाने में कुछ और गहरे इरादे हैं ?
अगर हम नेपाल में चीनी परियोजनाओं को देखते हैं, तो अधूरी परियोजनाओं का इतिहास है या कई परियोजनाओं के पूरा होने में देरी होती आ रही है । चीनी कंपनियों के साथ हस्ताक्षर किए गए सभी तीन जल विद्युत परियोजनाएं निर्धारित समय के पीछे चल रही है । चीन के तीन गार्जेस इंटरनेशनल कारपोरेशन (त्जचभभ न्यचनभक क्ष्लतभचलबतष्यलब िऋयचउयचबतष्यल) को ७५० मेगावाट बिजली उत्पादन पश्चिम सेती परियोजना (ध्भकत क्भतष् एचयवभअत) दी गई, जो अभी भी लम्बे समय से पूरी नहीं हो रही है । २००८ में चचियां चियाहु (श्जभवष्बलन व्ष्बजग) और चीन हाइड्रो (क्ष्लय ज्थमचय) कंपनियों को कुलेखानी ३ (प्गभिपजबलष् घ) परियोजना दी गई, जिसके अभी पूरा होने की कोई आशा नहीं है और शुरुआती अनुमानित लागत २.४३ अरब रुपये से बढ़ कर ४.२२ अरब रुपए हो गई है । बुढीगंडकी परियोजना (द्यगमजष्नबलमबपष् ज्थमचयउयधभच एचयवभअत) भी समय से पूरी नहीं हो रही है । इसी प्रकार, चीन सीएएमसी इंजीनियरिंग (ऋब्ःऋ भ्लनष्लभभचष्लन) को दिए गए पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा परियोजना (एयपजबचब क्ष्लतभचलबतष्यलब िब्ष्चउयचत एचयवभअत) की समापन तिथि को एक वर्ष आगे बढ़ा कर २०२१ तक कर दिया है । अक्टूबर २०१४ में चीन के नार्थवेस्ट सिविल एविएशन एयरपोर्ट कंस्ट्रक्शन ग्रुप (ऋजष्लब’क ल्यचतजधभकत ऋष्खष् िब्खष्बतष्यल ब्ष्चउयचत ऋयलकतचगअतष्यल न्चयगउ) को गौतम बुद्ध एयरपोर्ट अपग्रेडेशन प्रोजेक्ट (न्बगतबm द्यगममजब ब्ष्चउयचत ग्उनचबमबतष्यल एचयवभअत) को २०१९ तक पूरा करने के लिए फिर से निर्धारित किया गया है, हालांकि काम का केवल २५ प्रतिशत ही अब तक पूरा हो पाया है।
इसके विपरीत, नेपाल की ओर भारत सरकार की उदारता सहायता तक ही सीमित नहीं है, नेपाली लोगों को भारत में कई विशेषाधिकार दिए गए है, जिसमें सरकारी और सैन्य नौकरियां भी शामिल हैं । गोरखा सैनिकों का भारत के साथ गहरा संबंध है और उन्होंने लंबे समय तक भारतीय सेना के लिए काम किया है। इसके अलावा, एक नेपाली नागरिक प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से सिविल सेवाओं (अष्खष् िकभचखष्अभक) में भी शामिल हो सकता है । हालांकि, नेपाल में भारतीयों के लिए ऐसे कोई विशेष प्रावधान नहीं हैं ।
नेपाल में भारतीयों का बहिष्कारः
अगर हम वास्तव में नेपाली राजनीति में भारतीयों की सक्रिय भूमिका का सही जायजÞा लें तो जहां ‘भारत का हाथ’ का आरोप सबसे ज्यादा है, तो हम पाते हैं कि किसी भी स्तर पर नेपाल में पार्टी नेता के रूप में एक भी भारतीय नागरिक मौजूद नहीं है, हालांकि नेपाल के सबसे अधिक आबादी वाले पश्चिमी क्षेत्र में लोगों और समुदाय के करीब बंधन हैं । नेपाल में किसी भी उच्च पद या राज्य नौकरियों में भारतीयों का स्वागत नहीं है, जिसका अर्थ है कि निजी व्यवसाय उद्यमों को छोड़कर सभी क्षेत्रों में भारतीयों का बहिष्कार है । यह व्यवस्थित बहिष्कार मधेसी समुदायों के प्रति भी भेदभावपूर्ण है, जिनके भारतीय समुदायों के साथ गहन संबंध है । इसलिए, समाज ने प्राकृतिक देशी नेपाली (ल्बतगचब िलबतष्खभ ल्भउबष्)ि और भारतीय मूल (क्ष्लमष्बल(यचष्नष्ल) या भारत से सम्बंधित (क्ष्लमष्ब(बााष्ष्बितभम) नेपाली के बीच विच्छेदन बनाया है । इस प्रभाग ने नेपाल के भीतर एक दरार डाल दी है, जिससे भारत के साथ कोई निकटता और संबंध राष्ट्र विरोधी भावना के रूप में देखे जाते हैं । जबकि चीन के प्रति किसी भी संबंध का विशेष प्यार से स्वागत होता है । यह राज्य और सरकार के लिए प्यार है या यह मौद्रिक लाभ के लिए आकर्षण, जोकि ‘भारत में आसानी से प्रवेश’ (भबकथ बअअभकक तय क्ष्लमष्ब) से प्रवर्तित होकर ‘चीन से आसान लाभ’ (भबकथ नबष्ल ाचयm ऋजष्लब) में स्थानांतरित हो गया है ?
नेपाल अभी भी एक गरीब और पिछड़ा देश है जो की अपने नागरिकों के जीवन स्तर को बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहा है । नेपाल की आबादी का पांचवां हिस्सा राष्ट्रीय गरीबी रेखा के तहत है और सकल घरेलू उत्पाद (न्चयकक म्यmभकतष्अ एचयमगअत न्म्ए) का लगभग एक तिहाई नेपाल के बाहर काम कर रहे ५० लाख लोगों के प्रेषण (च्झष्ततबलअभक) से आता है । कई नेपाली प्रत्येक दिन बेहतर जीवन की तलाश में भारतीय सीमाओं को पार करते हैं या भारत के दूरदराज के इलाकों में नौकरियां हासिल करने के लिए एक पारगमन मार्ग के रूप में उपयोग करते हैं । आकर्षण इतना है कि कुछ के लिए यह मानव तस्करी का एक व्यवसाय बन गया है । नेपाल में २०१५ के विनाशकारी भूकंप के बाद स्थिति और भी खराब हो गई है । क्योंकि कई नागरिक अब गरीब राज्य में सबसे गरीब रहते हैं और उनके लिए मूल निर्वाह मुख्य मुद्दा है । नेपाल का गृहयुद्ध एक बेहतर जीवन जीने के वादे के साथ एक क्रांतिकारी संघर्ष था, जो ओली के वर्तमान कम्युनिस्ट शासन की विचारधारा भी है । अगर नेपाल भारत माडल नहीं दोहराना चाहता है तो क्या वह चीन माडल अपनाना चाहता है ?
अधिकांश नेपाली लोगों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा यह होगा कि किस कीमत पर विकास और बेहतर जीवन मिलेगा और फिर कुछ लोगों के विकास के लिए कितने लोग अपना बलिदान देंगे। संघर्ष तब तक चलता रहेगा जब तक कि सामाजिक घर्षण (कयअष्ब िाचष्अतष्यलक) जड़ से दूर नहीं किया जाता और एक समावेशी दृष्टिकोण आगे नहीं लाया जाता । समावेशन के लिए उन लोगों के लिए समान उपचार और समानता की आवश्यकता होती है जिन्हें सामाजिक एवं व्यवस्थित रूप से बाहर रखा गया है, भले ही वह नेपाल गणराज्य में भारत समर्थक का स्वरूप ही क्यों न हो । इसका यह भी अर्थ है कि नेपाल अपने अस्तित्व की वास्तविक जगह को ‘दक्षिण एशिया’ में मानें, जहां भारतीय राजनीतिक नेता राम माधव ने ३१ जुलाई २०१८ को काठमांडू में अपने भाषण में नेपाली सरकार को देखने के लिए कहा था । यह नेपाली कम्युनिस्ट शासन का एकतरफा दृष्टिकोण है जो भारत को नेपाल के राजनयिक ओवरचर में ‘पीडि़त’ के रूप में रखता है, हालांकि भारत नेपाल के बीच गहरे संबंधों की कोई तुलना नहीं की जा सकती, जो ना केवल राजनीतिक स्तर पर दिखती है, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी है ।
प्रस्तुतिः मुरली मनोहर तिवारी

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