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नेपाल–भारत की साझी समस्या : खुशीलाल मण्डल

हिमालिनी,अंक जून 2018 । भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र दामोदर मोदी के तीसरे नेपाल भ्रमण से धार्मिक तथा सांस्कृतिक सबंधों में व्यापक प्रचार आया है । मगर नेपाल के मधेश तथा भारत के यू.पी. बिहार तथा बंगाल के उत्तरी क्षेत्र की समस्या अब तक अनदेखी हैं जिसपर गहनता से विचार करने की आवश्यकता है । धार्मिक संबंध भी अर्थतन्त्र से जुड़ा हुआ है । जेब में रकम होने के बाद ही लोग धार्मिक भ्रमण पर निकलते हैं । दोनों देशों की सीमा क्षेत्र की समस्या दोनों सरकारों को मिलकर समाधान करना आवश्यक है क्योंकि अस्तव्यस्त सीमा सिर्फ परेशानियों को जन्म देती है जिसकी वजह से आवागमन में आम नागरिक को कष्ट उठाना पड़ता है । अगर पर्यटन को बढाना है तो इस दिशा में कार्यवाही की आवश्यकता है जिस पर अविलम्ब दोनों देशों की सरकारों का ध्यान देना होगा ।
समान समस्या क्या है ?
नेपाल का प्रमुख नारा था– “हराभरा वन नेपाल का धन” । परन्तु आज यह स्वप्न बन गया है । हरा वन और उर्वरा समतल कृषि भूमि मधेश में ही अवस्थित था । और यही मधेशियों के उत्पीड़न का कारण बना । जिसका पहला शिकार मोरङ (वर्तमान झापा) के मूलवासी राजवंशी, गनगाई, धिमाल, थारु, सन्थाल, कोचे, मेचे, ताजपुरिया, धानुक इत्यादि जाति को बनाया गया भारत में इष्ट इण्डिया कम्पनी के शासन प्रारम्भ होने के बाद नेपाली लकड़ी का मूल्य बढ़ने लगा, इसी कारण राणा ३ सरकार भीम शमसेर ने, असम, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय इत्यादि जगहों पर आजीविका के खोज में गए नेपाली को स्वदेश बनाने के नाम पर ४५ हजार बीघा जंगल में पहाड के लोगों को बसाने का काम किया । नाम रैती बसाने का था । परन्तु लक्ष्य काठ बेचकर प्राप्त धन से अपने सन्तान के लिए महल बनाने और जमीन का बन्दोबस्त करके उससे प्राप्त मालपोत (भूमिकर) से अपने सन्तान को सुख सुविधा उपलब्ध कराना था । राणा सरकार के समय ऐसे किसानों से जमीन छीनकर अपने संगे संबंधी तथा दरबारी को बिर्ता देने का प्रथा शुरु किया । किसी समय मधेश के चार लाख से ऊपर जमीन राणा परिवार को बिर्ता दिया गया । नेपाल के काठ को ढोने के लिए इष्ट इण्डिया कम्पनी ने गलगलिया, जोगबनी, जयनगर से जनकपुर, रक्सौल से अमलेखगंज आदि जगहों में रेल सेवा विस्तार किया था । २०१७ साल पौष १ गते (१५ दिसम्बर १९०७) को राजा महेन्द्र राष्ट्रीय अखण्डता नेपाल के सार्वभौमिकता के नाम पर शिशु प्रजातन्त्र का गला घोंटकर तत्कालीन पाकिस्तानी तानाशाह अयुवखाँ के बुनियादी जनतन्त्र के तरह ही नेपाल मे शासन व्यवस्था लागू करने के खिलाफ नेपाली कांग्रेस आन्दोलन करने का निर्णय किया । आन्दोलन का बेस भारत और मधेश होने के कारण राजा महेन्द्र सिर्फ भारत नहीं मधेश विरोधी राष्ट्रवाद का नीति बनाया ।
उसी नीति के तहत मधेश का जंगल विनाश करवा कर पुनर्वास तथा सुकुम्बासी को बसाने की योजना लागू करके पहाड़ के लोगों को मधेश में बसाने का कार्यक्रम लागू करके मधेश का जंगल विनाश करवाया । झापा से लेकर कञ्चनपुर के कई जिला में मधेश के मूलवासी अल्पमत में आ गए । उसका दुष्पपरिणाम उजाड़ चुरे क्षेत्र में हो रहा है । भूक्षय के कारण मधेश के नदियों का सतह आकार तो बढ़ ही रहा था, कुछ वर्षों से बिना योजना पहाड़ी क्षेत्रों में जथाभावी डोजर तथा एक्साभेटर प्रयोग करके पहाड़ को चीरकर सड़क बनाने का क्रम शुरु होने के बाद पहाड़ी क्षेत्रों से बहकर आनेवाल पत्थर, गिट्टी तथा बालु के कारण मधेश का पाँचवा हिस्सा कृषि भूमि के बंजर बालु में परिणत होता जा रहा है । भू–क्षय, बाढ और सूखा का दुष्परिणाम न सिर्फ मधेशवासी भोग रहा है । उसका दुष्पपरिणाम यूपी, बिहार तथा बंगाल के नेपाल के सीमा क्षेत्रों से चुरे लोगों को भी भोगना पड़ रहा है । भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के भ्रमण काल में जारी हुआ १६ बुँदे प्रेस विज्ञप्ति के बुदां नं. ८ में दोनों देश जलस्रोत को द्विपक्षीय लाभ में प्रयोग करने तथा बाद सूखा निर्णय सहमति बनाया है ।
संवत २०६४ साल के संविधानसभा के चुनाव के बाद डा. रामवरण यादव ने राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद चुरे संरक्षण पर बल दिया था । उन्हीं के पहल पर चुरे संरक्षण योजना भी बना । मगर देश के अन्य निकाय के तरह चुरे संरक्षण परियोजना भी दलीय स्वार्थ तथा भागबण्डा का शिकार बन कर भ्रष्टाचार के दलदल में फंस गया है । अरबों रुपयां खर्च होने के बाबजूद परिणाम शुन्य है । १० वर्ष का परिणाम देख कर स्पष्ट हो गया है कि चुरे संरक्षण मात्र नेपाल सरकार द्वारा सम्भव नहीं है । दोनों देशों की साझा समस्या होने के कारण दोनों सरकार को पहल करना आवश्यक है । संघीय व्यवस्था अन्तर्गत २ नम्बर प्रदेश में मात्र मधेशवादी दल की सरकार है इसलिए आवश्यक है कि २ नम्बर प्रदेश सरकार नेपाल तथा भारत दोनों सरकार के साथ पहल करके चुरे संरक्षण का योजना संचालन करावे ।
जल यातायात की सिचाई आयोजना
नेपाली प्रधानमन्त्री केपीशर्मा ओली के भारत भ्रमण के समय नेपाल के हिमालय से सागर तक जोड़ने के लिए पानी जहाज चलाने का खबर सामने आया । नेपाल के नदियों का जलस्तर प्रति वर्ष घटता जा रहा है । जो कोशी नदी १२ महीना उफान पर रहती थी । कुछ वर्षों से सूखा समय में पैदल आरपार करने की स्थिति में पहुँच गयी है । अन्य नदियों की भी वही हालत है । सदा जल प्रवाह होनेवाली छोटी–छोटी नदी का स्रोत सूख गया है । इस का परिणाम मधेश का कुआँ मात्र नहीं सूखे मौसम में चापाकल भी सूख जाता है । कभी २५–४५ फिट के बीच चापाकल में पानी का स्रोत मिलता था । अब दो सौ से ढाई सा फिट पाइप गाड़ने पर पानी मिलता है ।
गंगा नदी में जगह–जगह पुल तथा फरखा में बांध बनाने के बाद सूखे मौसम में पानी बटवारा के लिए भारत तथा बंगलादेश के बीच विवाद होता आया है । महाकाली के पंचेश्वर में बांध बनाकर बिजली निकालने की सहमति नेपाल–भारत के बीच हो चुका है । टनकपुर से नहर निकाल कर नेपाल के कञ्चनपुर में सिंचाई किया जाने लगा है । शारदा बैरेज से उत्तर प्रदेश की भूमि संचित हो रहा है । कर्णाली (भेरि) नदी का पानी बबई नदी में गिराकर बर्दिया जिला में सिंचाई करने के लिए सुरंग बनाया जा रहा है । तो कहाँ के पानी से नेपाल तक पानी जहाज चलेगा । नेपाल को जलस्रोत का धनी देश माना जाता था । मगर विगत से लेकर वर्तमान सरकार की गलत नीति के कारण ८० प्रतिशत जमीन में खेती आकाश के पानी पर निर्भर है । कभी अन्न निर्यात करनेवाला देश अरबों का अन्न आयात करने को बाध्य हो गया है ।
नेपाल–भारत बीच की दूसरी साझी समस्या
सन् १९५४ में नेपाल–भारत बीच सम्पनन कोशी सम्झौता में बैरेज को बालु से बचाने तथा बाढ़ नियन्त्रण करने के लिए चतरा में उच्च बाँध बनाने का प्रावधान रखा गया था । लगभग ६५ वर्ष बीत जाने के बाद भी कोशी उच्च बाँध बनाने के लिए अध्ययन का विषय मात्र बना हुआ है । नेपाल सरकार सम्झौता के बाद से ही उच्च बाँध के विपक्ष में है । वर्तमान प्रधानमन्त्री ओली के मातृ पार्टी नेकपा माले जन्म काल से ही नेपाली कांग्रेस ऊपर कोशी, गण्डक, सुस्ता, बेचने का आरोप लगाती आ रही है । एमाले बनने के बाद टनकपुर बेचने का आरोप लगना शुरु हुआ । कोशी उच्च बाँध बना कर उससे बिजली निकालने के साथ साथ चुरिया पहाड़ के बगल से नहर निकाल कर सिचाई का प्रबन्ध मिलाना दोनों देशों के हित में है ।
लगभग १५ वर्ष पहले नेपाल सरकार ने विश्व बैंक के ऋण सहयोग से सुनकोशी नदी का पानी कमला नदी में डालकर उससे धनुषा, महोत्तरी, सिरहा, सप्तरी के जमीन सिंचाई करने का सपना उस क्षेत्र के जनता में बाटा था । तब से उस क्षेत्र के किसान सिचाईं के आस में जी रहे हैं । अरबों का निवेश बटोरा गया है, नेपाल का जलस्रोत कुछ वर्ष पहले तक आर्थिक साधन नहीं राजनीतिक दोधारी तलवार थी । उसका शिकार पंचायत काल के प्रधानमन्त्री सूर्यबहादृुर थापा तथा प्रजातन्त्र काल के अन्तरिम प्रधानमन्त्री कृष्णप्रसाद भट्टराई को बनना पड़ा कर्णाली योजना भारतीय सहयोग में बनाने का विचार रखने पर उनके खिलाफ बबण्डर मचाया गया । बाध्यताबश उन्हें राजीनामा करना पड़ा । उसी तरह उन्होंने नेपाल भारत के बीच बहनेवाली नदियों को साझा नदी कह कर उसके विकास में दोनों देशों का सहकार्य होना आवश्यक बताया था । उनके खिलाफ भी दरबार तथा वामपन्थी दलों ने मिलकर इतना माहोल बिगाड़ा की ३० वर्ष के बाद स्थापित प्रजातन्त्र काल के अन्तरिम प्रधानमन्त्री को एकबार नहीं दो बार काठमांडू के दो क्षेत्रो से चुनाव हारना पड़ा । सम्वत २०५६ में वीरगंज वासी उन्हे संसद पद में निर्वाचित नहीं करा देता तो जीवन में कभी संसद नहीं बन पाते । वर्तमान परिस्थित में कर्णाली और अरुण तीसरा योजना भारत के कम्पनी द्वारा निर्माण करने का सम्झौता हो चुका है । अरुण योजना का शिलान्यास नेपाल भारत दोनों देश के प्रधानमन्त्री कर चुके हैं । अब वर्षों से लम्बित चतरना बांध निर्माण की प्रक्रिया भी शुरु हो ताकि कोशी क्षेत्र में रहने वाले नागरिक त्रास मुक्त हो सके ।
हुलाकी सड़क निर्माण
कुछ वर्षों से नेपाल के प्रधानमन्त्री के भारत भ्रमण काल में हुलाकी सड़क निर्माण को प्रमुखता देने की परम्परा बन गयी है । पंचायत काल में राजा राष्ट्रीय पंचायत को सम्बोधन करते थे, उस में एक लाइन होता था– हाम्रो सरकार ले नागरिकता समस्या को समाधान गर्नेछ(हमारी सरकार नागरिकता समस्या का समाधान करेगी) । परन्तु पंचायत काल के ३० वर्षों तक नागरिकता समस्या समाधान विकट बनता गया । ठीक वही हालत हुलाकी सड़क की हो रही है । देश का सबसे पुराना तथा मधेश की आत्मा मानी जानेवाली हुलाकी सड़क की दुर्दशा जैसी की तैसी है । सम्वत २०६३ के मधेश आन्दोलन के वाद मधय पहाडी राजमार्ग बनाने का योजना लागू किया गया । नेपाली साधन स्रोत से बनायी जा रही मध्य पहाड़ी लोक मार्ग का ट्र्याक पहाड़ी जिला में भी ७० प्रतिशत काम पूरा हो चुका है । तो दो सरकारे मिलकर बना रही हुलाकी राजमार्ग निर्माण में गति क्यों नहीं आ रही है ? हुलाकी सड़क जल्दी से जल्दी बने, यही मधेशवासी की आकांक्षा है ।
रामायण सर्किट
भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के दूसरे भ्रमण काल मे ही जनकपुर आकर पूजापाठ का प्रसंग सर्वविदित है । बारबार रामायण सर्किट का प्रसंग सामने आता रहा जिसे इस भ्रमण काल में भी रामायण सर्किट बनाने पर विशेष बल दिया गया । तथा जनकपुर अयोध्या बस संचालन का शुभारम्भ भी किया गया है । यह स्वागत योग्य होने के बावजूद मुख्य प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है । राम चन्द्र जी का विवाह जनकपुर में सीता जी के साथ होने की जानकारी आमजन को है मगर उनके भाई भरत, लखन, शत्रुघन का विवाह कहाँ हुआ आमजन कोे मालुम नहीं है । उसका अध्ययन आवश्यक है । जो वर्तमान सिन्धुली, रामेछाप, तथा दोलखा में अवस्थित है । रामायण सर्किट का विस्तार भिठ्ठामोड़ से दोलखा से लामाबगर तक हो ताकि उससे न सिर्फ सांस्कृतिक सम्बन्ध का विस्तार होगा । बल्कि यह आर्थिक हब भी बनेगा । लोग समृद्ध बनेंगें । धार्मिक प्रयत्न से समृद्धि के द्वार खुलेंगे ।

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